सोमवार, 1 अगस्त 2016

केजरीवाल टांय टांय फिस्स


...मुझे चाहिए स्वराज की सफेद टोपी लगाकर अगर आप दिल्ली में बीच सड़क पर ही लघुशंका करते हैं तो पुलिस रोकेगी ही, फिर? केजरीवाल यह आरोप लगा सकते हैं कि मोदी जी स्वच्छता अभियान हमारे कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए चला रहे हैं। यह मजेदार टिप्पणी करते हैं आशुतोष तिवारी जो पेश्ो से इंजिनियर हैं। एक समय वह अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे और किरण बेदी में भगत सिंह का अक्श देखकर रातभर रामलीला मैदान में लोकपाल-लोकपाल की पश्चिमी धुन पर थिरकते रहते थ्ो। मालवीय नगर निवासी कुलदीप कहते हैं- उस दौरान हमसबके उपर भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने और पारदर्शी शासन व्यवस्था बनवाने का जूनून था लेकिन केजरीवाल ने देशभक्ति का वह आंदोलन अपने राजनैतिक महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ा दिया। ऐसे एक नहीं अब हजारों की तादात में वालंटियर आपको मिलेगें जो निराश हैं, और उन्होंनें देश को नियति के भरोसे मान लिया है।
बेशक, उस दौरान कांग्रेस की कड़ाही में लगातार उबलते भ्रष्टचार ने केजरीवाल, अन्ना और किरण बेदी को जनता के बीच क्रांतिकारी, जननायक, उद्धारक आदि की छवि गढè दी थी। यह कोई साधारण दौर नहीं था, इस आंदोलन का संबंध भी मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार तक सिमित नहीं था। जनलोकपाल के इस सुरुर में पूरी भारतीय राजनैतिक व्यवस्था, संविधान और लोकतंत्र को निशाने पर लेने की कोशिश थी। उस समय 2०11 का वैश्विक परिदृश्य देखें तो बात काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी। आपको याद होगा तहरीर चौक और आरेंज क्रांति, ब्लू क्रांति और इंद्रधनुषी क्रांति। इन दर्जन भर क्रांतियों का सुनहला ख्वाब दिखाकर अफ्रीका के कई देशों में लिबरल कम्युनिज्म की वापसी पिछले चोर दरवाज्ो से करने की पुरजोर कोशिश हो रही थी। लोकतंत्र की प्यास से तड़पता आम आदमी सड़कों पर उतरा था, कहीं सफलता मिली तो कहीं विफल भी होना पड़ा था। यही वह दौर था, जब भारत म्ों अन्ना आंदोलन भी अपने चरम पर था। लेकिन उसका हस्र क्या हुआ? आंदोलन सियासी महात्वाकांक्षा के आगे बलि का बकरा बना दिया गया। जो बनना ही था। कारण? जब अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि मै अराजकतावादी हूं तो वह उसी अल्टàा लेफ्ट या लिबरल लेफ्ट की तरफ ईशारा करते हैं। अराजकतावाद के बारे में राजनैतिक विचारक कहते हैं कि यह वामपंथ के अंदर का वामपंथ है। जिसका लक्ष्य था सत्ता हासिल करना, जबकि आंदोलन तो उसकी सीढ़ी थी।
बहरहाल, अब देश की राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल सत्त्ता में हैं। तमाम वायदो, इरादों और सपनों की मखमली कार्पेट पर चलकर वह सत्ता के सिंहासन पर आरुढè हुए हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली की जनता केजरीवाल के वायदों, ईरादों को भूलकर समझौतावादी हो चुकी है और अब उसे कठोर धरातल का अहसास भी होने लगा है। जो युवा कल तक मै आम आदमी हूं की टोपी पहने मेटàो में बड़े शान से चला करता था अब वही केजरीवाल के रोज नए-नए होने वाले पैतरेंबाजी का मजा लेने लगा है। वोडाफोन कंपनी में काम करने वाली रुचिका बाधवा कहती हैं कि अब हम जान गए हैं कि केजरीवाल का फ्री वाईफाई नहीं मिलने वाला तो हम भी रोज-रोज केंद्र सरकार पर दोषारोपण का मजा लेने लगे हैं। अब वास्तव में केजरीवाल सरकार के कामकाज की बातें नहीं होतीं। अब बात होती है तो उनके रोजाना मोदी सरकार पर दोषारोपण का मजा लिया जाता है।
विकास के वायदे अब केजरीवाल तक ही सीमित होकर रह गए हैं। उनको खुद अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार पर सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे ज्यादा अचंभे की बात और क्या हो सकती है कि जिन बातों पर हल्ला बोलकर केजरीवाल ने सत्ता कब्जाने का माहौल बनाया था वे सारी बातें आज उनके कामकाज के तरीकों से गायब हैं। एक लाइन में कहें तो मार्केटिंग की चमत्कारी विधियों से केजरीवाल ने अपना जो ब्रांड बनाया था उसके विस्तार के लिए वे अपनी नई शाखा पंजाब में खोलने का प्लान बना रहे हैं।
केजरीवाल को सत्ता विस्तार के लिए क्या दांव पर लगाना पड़ सकता है? दिल्ली में विकास की पर्याय बन चुकीं शीला दीक्षित को उखाड़ना आसान नहीं था। अन्ना के आंदोलन के जरिए केंद्र की यूपीए को उखाड़ने के लिए जो आंदोलन चलाया गया था उसने यूपीए को येनकेन सत्ता से बेदखल तो कर दिया लेकिन केजरीवाल भी बेपर्दा होते जा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल इस सबके बीच बड़ी चालाकी से और अपने सभी विश्वसनीय साथियों को दगा देकर, केवल अपनी निजी हैसियत बनाकर, दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने में सफल हो ही गए। सारी दिल्ली ठगी गयी। वरिष्ठ पत्रकार अनुराग श्रीवास्तव कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं हैं दिल्ली शुरु से ही अभिश’ है बारबार उजड़ने और बसने को।
दिल्ली को दांव पर लगाकर पंजाब जाने की जुगत में केजरीवाल को सबसे बड़ी दिक्कत आ रही है कि वह पंजाब में अपने काम का हिसाब क्या दें? वे लगातार दिल्ली के अखबारों में भारी विज्ञापन करवाने में लगे रहे कि पुल और सड़कों के काम सस्ते में करवा कर उन्होंने सरकारी खजाने का कितना पैसा बचवा दिया। लेकिन उनकी पोल तब खुली जब छह माह के अंदर ही निर्मित ओवर ब्रीज में दरारें देखी गई और सफाई कर्मियों ने वेतन न मिलने के कारण हड़ताल कर दिया। दिल्ली में ऑड-ईवन की कवायद के बावजूद बढ़ते प्रदूषण ने सरकार की पोल खोल दी। मीडिया मैनेजमेंट और मार्केटिंग से तब तक कुछ हासिल नहीं किया जा सकता जबतक धरातल पर आप नफा-नुकसान का हिसाब न दे दें। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इसलिए पंजाब में साम्राज्य विस्तार सिर्फ टेस्ट म्ौच खेलने जैसा साबित होगा। यही वजह है कि पंजाब में नशे का शोर मचाकर चुनाव में नया मुद्दा पेश करने की कोशिश में वह हाथ पांव मार रहे हैं। अंदरखाने से जो खबरें मिल रही है उसके मुताबिक केजरीवाल अगर जीत गए तो एलानिया तरीके से दिल्ली को अपने किसी विश्वसनीय दोस्त को सौंपकर पंजाब जाने का फैसला कर सकते हैं। सवाल उठता है कि उन्हें इतनी जल्दी पैर पसारने की जरूरत क्यों पड़ रही है? दिल्ली में जो शहीदी आभामंडल उन्होंने तैयार किया था वह अब क्षीण हो चुका है, केजरीवाल के सामने पलायन का रास्ता यही हैं कि एक तरफ तो वह अपनी नाकामियों के लिए मोदी-मोदी करते रहें दूसरी ओर दिल्ली की सल्तनत छोड़ कहीं दूर निकल जाएं। जो अब मुमकीन नहीं।
---------------------------------------------------------------------------------------------
नौटंकी के भी कुछ नियम हैं-
केजरीवाल का दावा था कि वे 48 घंटे में शासन को जनता की शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बना देंगे। जबकि हालत यह है कि वे शिकायतियों की भीड़ को संभालने की भी व्यवस्था नहीं बना पाए। अब सबकुछ पुराने ढर्रे पर है। केजरीवाल ने राजकाज का अर्थ यह समझा है कि अपनी हर नाकामी का तोहमत केंद्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मढè दिया जाए। इसलिए कभी वह दिल्ली पुलिस को अपने अधीन लाए जाने की मांग करते हैं तो कभी पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात करते हैं। उनके विधायक अयोग्यता अथवा आपराधिक मामलों को लेकर न्यायपालिका से दुत्कारे जाते है तो वह इसके लिए मोदी पर हमलावार हो जाते हैं। उपराज्यपाल नजीब जंग से उनकी कब्बडडी मोदी-मोदी करते हुए चलती ही रहती है। हाल में उन्होंने जनमत संग्रह का नया राग अलापा है। ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह ने सीएम केजरीवाल के सियासी अरमान जगा दिए हैं और उन्होंने ट्वीट करके कहा, यूके रेफरेंडम के बाद जल्द ही दिल्ली में भी पूर्ण राज्य को लेकर जनमत संग्रह किया जाएगा। लेकिन इसमें पेंच हैं यदि केजरीवाल की बात मानकर जनमत संग्रह होता है तो कल को यह मांग दूसरे राज्य भी अपने-अपने सियासी नफा-नुकसान से उठा सकते हैं। गौरतलब है कि कश्मीर घाटी में भी जनमत संग्रह की मांग काफी अरसे से उठती रही है। यदि दिल्ली में जनमत संग्रह हो सकता है तो कश्मीर और नागालैंड में क्यों नहीं?
केजरीवाल के इस बयान को लेकर भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी उनपर कानून नहीं मानने का आरोप लगा रही है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू कहते हैं कि लगता है केजरीवाल को ब्रिटेन का नशा चढ़ गया है। रिजिजू ने कहा कि केजरीवाल संविधान से बाहर गए तो केंद्र को दखल देना पड़ेगा। इसलिए उन्हें चाहिए कि संविधान के दायरे में काम करें।

श्रम और ठेका कानूनों पर मुकर गई सरकार -
दिल्ली के असंगठित मजदूर सरकार पर वायदा पूरा करने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। जो केजरीवाल ने विधान सभा चुनाव के दौरान किए थ्ो। श्रममन्त्री गिरीश सोनी ने ठेका मजदूरी उन्मूलन कानून लाने से साफ इंकार कर दिया और मजदूरों के प्रतिनिधियों से कहा कि उन्हें ठेकेदारों-मालिकों के हितों को भी देखना है। इसीतरह डीटीसी ठेका कर्मचारियों के बीच भाषण देने आए केजरीवाल को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। हजारों ठेका शिक्षकों ने कई दिनों तक सचिवालय को घेरे रखा और अन्त में केजरीवाल सरकार ने जबरन उन्हें सचिवालय से हटाया। केजरीवाल सरकार ने न्यूनतम मजदूरी व अन्य श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए श्रम विभाग में भ्रष्टाचार खत्म कर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के वायदे पर अमल के लिए 49 दिनों में एक कदम भी नहीं उठाया।

मुफ्त पानी बिजली
कच्ची व झुग्गी बस्तियों में चुनावों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पानी-टैंकर माफिया से मुक्ति मिलेगी और हर घर को 7०० लीटर मुफ्त पानी दिया जायेगा। हकीकत में मध्यवर्ग तक को ही 667 लीटर मुफ्त पानी दिया गया क्योंकि यह सिर्फ मीटर्ड कनेक्शन वालों को मिल पाया। बिजली के बिल को आधा करने का वायदा भी खटाई में पड़ गया। बिल पर पहले से 25 फीसदी सब्सिडी मिल रही थी। केजरीवाल सरकार ने 25 फीसदी सब्सिडी देकर दावा किया कि उसने पूरी 5० फीसदी सब्सिडी दे दी है। सरकार ने 5० फीसदी सब्सिडी को जारी रखने के लिए यह शर्त भी लगा दी कि बिजली कम्पनियों के ऑडिट पूरे होने के बाद इस सब्सिडी को जारी रखने या न रखने पर फैसला लिया जायेगा।
शीला दीक्षित के खिलाफ भ्रष्टाचार का हौवा खड़ा करने वाले केजरीवाल ने आज तक कोई प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की है। चुनाव से पहले केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ 37० पेज की रपट तैयार की थी लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही वह रपट ठंढे बस्ते में चली गई।

मंत्रियों की कारगुजारी
राखी बिड़लान-
केजरीवाल सरकार के मंत्री भी एक से बढकर एक निकले। जैसे कि राखी बिड़लान जिसने एक बच्चे की क्रिकेट बाल उनकी कार पर लग जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज करा दी कि उस पर जानलेवा हमला किया गया।
सोमनाथ भारती- निर्दोष महिलाओं पर वेश्यावृत्ति व ड्रग्स का आरोप लगाकर उन्हें सरेआम अपमानित किया और नस्लभेदी टिप्पणी की। इतना ही नहीं फर्जी डिग्री सहित पत्नी के साथ मारपीट के मामले में कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते रहे।
मनीष सिसोदिया- दिल्ली के कॉलेजों में दिल्ली के स्कूलों से बारहवीं करने वालों के लिए आरक्षण देने को कहा। बाद में अपने बयान से पलट गए। अरविंद केजरीवाल के बाद नंबर दो कहे जा रहे सिसोदिया के तमाम झूठ पकड़े गये जैसे कि उन्हें जबरन सरकारी बंगला दिया गया जबकि मुख्यमन्त्री बनने के अगले ही दिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर खुद ही बंगलों की माँग की थी।

लाभ के पद
कोर्ट की फटकार पर 24 विधायकों को लेकर केजरीवाल अजीब असमंजस में फंसे हैं। न उगलते बनता है न निगलते ही। आनन फानन में अपने उन विधायकों को कानून की जद से बाहर लाने के लिए उन्होंने कानून भी बना दिया लेकिन जब राष्ट्रपति ने दस्तखत से इंकार कर दिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हो गए।
हालिया मामला
अभी जब आआपा के एक विधायक को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर देश में आपातकाल लागू करने का आरोप मढ दिए। जबकि हकीकत में उस विधायक के खिलाफ उसके ही विधानसभा क्ष्ोत्र के एक बुजुर्ग मतदाता ने मारपीट करने का आरोप लगा कर एफआईआर दर्ज कराई थी।
 -पी. मार्कण्डेय

गले और मुंह का कैंसर: गुटका और पान मसालों पर प्रतिबंध कितना प्रभावी


-प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी आ रहे सामने
-स्मोकिंग फैशन आईकान बनने से मुंह के रोगियों की सख्यां अधिक
-मुंह और गले के कैंसर रोगी दुनियां में सबसे अधिक भारत में
 देशभर में प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी सामने आ रहे है, और जिनमें से 5० प्रतिशत की मौत बीमारी की पहचान के अंतराल में ही हो जाती है। इसमें युवा अवस्था में होने वाली मौतों का कारण भी मुंह व गले का कैंसर मुख्य है। हालांकि पूरी दुनिया में विश्व गला व सिर कैंसर दिवस मनाए जाने और जागरुकता के तमाम कवायद के बाद भी कैंसर की महामारी रुकने का नाम नहीं ले रही है। पिछले 16 सालों में मुख और गले के कैंसर रोगियों की संख्या पुरुषों और महिलाओं में तीव्र गति से बढ़ती जा रही है। इसका खुलासा एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन में जारी रिपोर्ट में हुआ है।
वायसॅ ऑफ टोबेको विक्टिमस और गुड़गांव के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ वेदांत काबरा कहते हैं कि देशभर में लाखों लोगों में देरी से इस बीमारी की पहचान, अपर्याप्त इलाज व अनुपयुक्त पुनर्वास सहित सुविधाओं का भारी अभाव है। करीब 3० साल पहले तक 6० से 7० साल की उम्र में मुंह और गले का कैंसर होता था लेकिन अब यह उम्र कम होकर 3० से 5० साल तक पहुंच गई। वही आजकल 2० से 25 वर्ष के कम उम्र के युवाओं में मुंह व गले का कैंसर देखा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी सभ्यता का पश्चिमीकरण साथ ही युवाअेां में स्मोकिग को फैशन व स्टाइल आइकान मानना है। मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में है।
भारत में पूरे विश्व की तुलाना में धूम्ररहित चबाने वाले तंबाकू उत्पाद (जर्दा,गुटखा,खैनी,) का सेवन सबसे अधिक होता है। यह सस्ता और आसानी से मिलने वाला नशा है। पिछले दो दशकों में इसका प्रयोग अत्यधिक रुप से बढ़ा है, जिस कारण भी हैड नेक कैंसर के रोगी बढ़े है। डा.काबरा बतातें है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिर्सच द्बारा वर्ष 2००8 में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक भारत में हैड नेक कैंसर के मामलों में वृद्बि देखी जा रही है। कैंसर में इन मामलों में नब्बे फीसदी तम्बाकू, मदिरा व सुपारी के सेवन से होतें है और इस प्रकार के कैंसर की रोकथाम की जा सकती है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान (आईसीएमआर) की रिपोर्ट मंे भी इस बात का खुलासा किया गया है कि पुरुषों में 5० फीसदी और महिलाओं में 25 फीसदी कैंसर की वजह तम्बाकू है। इनमें से 6० फीसदी मुंह के कैंसर हैं। धुआं रहित तम्बाकू में 3००० से अधिक रासायनिक यौगिक हैं, इनमें से 29 रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं।
उन्होने कहा कि हैड नेक कैंसर के मामले राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं, वंचित लोगों, परिवारों व समुदायों पर भार बढ़ा रहे हैं। भाग्यवश हैड नेक कैंसर से जुडे अधिकांश, मामलों में यदि बीमारी का पता पहले लग जाये तो इसे रोका जा सकता है और ईलाज भी किया जा सकता है। लेकिन लाखों लाखों लोग रोग की देरी से पहचान, अपर्याप्त ईलाज व अनुपयुक्त पुनवर्वास सुविधाओं के शिकार हो जाते है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्राचार्य और सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी जो इस अभियान की अगुवाई वैश्विक स्तर पर कर रहे है। वह बताते हैं कि हैड नेक कैंसर के नियंत्रण के लिये सरकारों, एनजीओ, चिकित्सा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षा व उद्योग संस्थानों सहित बहु क्षेत्रिय सहयोग की आवश्यकता है। हैड नेक कैंसर पर प्रभावी नियंत्रण और ईलाज की और वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिये अंतरर्राटàीय फेडरेशन ऑफ हेड एण्ड नेक ऑनोलोजिक सोसाईटिज आईएफएचएनओएस ने जुलाई 27 को विश्व सिर, गला कैंसर दिवस -डब्ल्यु एचएनसीडी- के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव रखा है। फेडरेशन को इसके लिये अनेक सरकारी संस्थानों, एनजीओ, 55 से अधिक सिर व गला कैंसर संस्थानों व 51 देशों का समर्थन प्राप्त है।
डा.पंकज चतुर्वेदी बतातें है कि एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन 2००8 व 2०16 में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार 2००1 में पुरुषों में मंुंह का कैंसर के 42725 मामले वहीं 2०16 में 652०5 मामले, महिलाअेां में 22०8० व 35०88, गले और श्वास नली के कैंसर के मामले 49331, 759०1, महिलाअेां में 9251, 1455०, भोजन नली 24936 व 38536 महिलाओं में 17511व 28165, अमाशय में 2०537 व 31538, महिलाओं में 11162 व 17699, फैंफड़े 39262 व 6०73०, महिलाओं में 9525 व 15191, स्तन कैंसर महिलाओं में 89914 व 14०975, गर्भाश्य महिलाओं में 79827 व 125821 तथा अन्य तरह के 214967 व 31584० तथा महिलाअेां में 166629 व 25241० रोगी पाए गए।
देश में अनेक परेशानियों के बावजूद, हालांकि गुटखे पर, जो की एक धुंआ रहित औद्योगिक उत्पाद है, पर लगभग पूरे भारत पर प्रतिबंध लग गया है। गुटखे के अलावा, 13 राज्यों ने अब उत्पादित सुगंधयुक्त चबाने वाले तम्बाकु को भी निषेध कर दिया है। तम्बाकु पीडिèतों की आवाज नामक तम्बाकू पीडिèतों के स्वयं के द्बारा चलाये गये निरंतर आंदोलन के परिणामस्वरूप यह प्रतिबंध प्रभाव में आया। इस आंदोलन से देश के नामी कैंसर विशेषज्ञ भी जुड़ गये।
वर्ष 2०14 में जॉन हॉपकिस यूनिर्वसिटी ब्लूूमबर्ज स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुटखा प्रतिबंध के प्रभावों पर एक अध्ययन करवाया। अध्ययन के दौरान देश के सात राज्यों असम, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट, उड़ीसा और दिल्ली में 1,००1 वर्तमान व पूर्व गुटखा उपभोक्ताओं और 458 खुदरा तम्बाकु उत्पाद विक्रेताओं पर सर्वे किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि 9० फीसदी रिस्पोडेंन्ट्स ने इच्छा जताई कि सरकार को धुंआ रहित तम्बाकु के सभी प्रकार के उत्पादों की बिक्री और डिस्टिब्यूशन पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। इस पर 92 फीसदी लोगों ने प्रतिबंध का समर्थन किया। 99 फीसदी लोगों ने कहा कि भारतीय युवाओं के स्वाथ्य के लिये प्रतिबंध अच्छा है। जो लोग प्रतिबंध के बावजूद गैरकानूनी ढंग से पैकेज्ड तम्बाकु का सेवन करते है उनमें से आधे लोगों ने कहा कि प्रतिबंध के बाद उनके गुटखा सेवन में कमी आई है। 8० फीसदी लोगो ने विश्वास जताया कि प्रतिबंध ने उन्हें गुटखा छोडने के लिये प्रेरित किया है और इनमें से आधे लोगों ने कहा उन्होंने वास्तव में छोड़ने की कोशिश भी की है। इंडेक्स ऑफ इंडिस्टरियल प्रोडक्शन आईआईपी के आंकडो पर गौर करे तो सिगरेट, बीड़ी व चबाने वाले तम्बाकू उत्पादों को उत्पाद मार्च 2०15 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 12.1 फीसदी गिर गया।
चबाने वाले तम्बाकु उत्पाद पर प्रतिबंध के प्रभाव यूरोमोनिटर इंटरनेशनल की रिपोर्ट दर्शाती है जिसके मुताबिक धंुआरहित तम्बाकु उत्पाद में निम्न गिरावट देखी गई है - वर्ष 2०11: 2 प्रतिशत 2०12: 26 प्रतिशत 2०13 य 8०: प्रतिशत पूर्वानुमान के मुताबिक यह दर 2०14 मे 4० फीसदी तक और 2०15 में करीब 35 प्रतिशत तक गिर गई। 2०16 तक 3० व 2०18 में 25 फीसदी तक गिर जायेगी।
-मार्कण्डेय पाण्डेय

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

मदर टेरेसा का असली चमत्कार क्या था


मार्कण्डेय पाण्डेय
गरीबों की सेवा में पूरा जीवन समर्पित करने वाली नोबेल शांति पुरस्कार प्रा’ ईसाई प्रचारिका एग्नेस उर्फ टेरेसा को अब रोमन कैथोलिक चर्च के संत की उपाधि से नवाजा जाएगा। वेटिकन के पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार को मान्यता दी है। क्या था चमत्कार ? उन्होंने ब्रेन टयूमर से पीड़ित ब्राजील के एक युवक को ठीक कर दिया था। एक समय टेरेसा से पत्रकारों ने पूछा था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है, ऐसा बाईबिल में लिखा है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, आप क्या मानती हैं? टेरेसा ने कहा जो बाईबिल में कहा गया है वह ठीक है। गत दो साल पहले ईसाई समुदाय ने इलाहाबाद में चंगाई महोत्सव किया। गांव-देहात के गरीब, अनपढè और अभावग्रस्त लोंगो को लाया गया। भूत-प्रेत की झाड़-फंू क कनाडा से आये एक अंग्रेज पादरी मिस्टर यंग्रीन ने शुरु किया। ये यूरोप के वे लोग हैं जो खुद को आधुनिक विज्ञान की विरासत का एकमेव वारिस होने का दावा करते हैं। खैर, कुछ साल पूर्व क्रिस्टोफर हिचेंस ने फिल्म बनाई नर्क का फरिश्ता तो देश के सेकुलरों को सांप सूंघ गया। कारण कि क्रिस्टोफर ने मदर टेरेसा के ऐसे ही तथाकथित सेवा और चमत्कारों की पोल खोल दी। नार्थ-ईस्ट के आदिवासी गरीब जो ईसाई बने। उनके लिये आरक्षण की मांग करते हुए वह नई दिल्ली में धरने पर बैठ गई। जब सवाल किया गया कि यदि हिंदू धर्म में छूआछूत है जिसके कारण आरक्षण दिया जाता है तो आपके धरने पर बैठने से यह स्वत:सिद्ध नहीं होता कि ईसाई मत में भी भ्ोदभाव है?
क्रिस्टोफर हिचेंस अपनी फिल्म में साफ कहते हैं कि अखबारों का बेहतरीन उपयोग करके टेरेसा को करुणा की देवी जैसी छवि बनाई गई है। आस्ट्रàेलिया की विख्यात लेखिका ग्राहम ग्रीन ने कहा कि वे करुणा की कारोबारी हैं। हिच्ोंस की फिल्म में टेरेसा के मरणासन्न रोगियों के केंद्र की हालत को दिखाया गया है। इस फिल्म में मैरी लुडन कहती हैं-हे भगवान यह क्या? एक कमरे में 5० से 6० रोगी कोई कुर्सी तक नहीं, नाही पर्या’ आक्सीजन या ग्लूकोज के बोतल, कैंसर जैसे भयंकर रोग में एसप्रीन या ब्रूफेन दिया जा रहा है। फिल्म में मदर टेरेसा बोलती है कि बहुत पहले से मैने गरीबों की सेवा करने का निश्चय किया था। जो धनी लोग अपने पैसे से प्रा’ करते हैं, उसे मै ईश्वर के प्रति प्रेम से गरीबों को देती हूं। कोलकाता से आगे नार्थ-ईस्ट के राज्य जनजातियों वाले हैं। गरीबी, असहायता, अभाव ने आज भी उनका साथ नहीं छोड़ा है। ऐसे में सेवा का के्रद्र वहां न बनाया जाता तो कहां बनता? आज भी नार्थ-ईस्ट सिसक रहा है, अरुणांचल में चीन घुस आता है, अलगाववादी अपने पैर पसार रहे हैं। क्यों ? क्यों कि देश से जोड़ने वाली जो धारा थी उसको चमत्कार करके सूखा दिया गया।

मरने से पहले अपनी कहानी बताना चाहता था


मार्कण्डेय पाण्डेय
मै पहले एक सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर कार्यरत था। अच्छा खिलाड़ी भी था इसलिये भारत सरकार ने राष्ट्रीय क्रीड़ा प्रशिक्षण के लिये मेरा चयन किया। लेकिन मेरे वरिष्ठ इसकारण मेरे से ईष्याã करने लगे और कुछ ही दिन में मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। मैने बार-बार निवेदन किया लेकिन वे नहीं माने और मै बेरोजगार हो गया। कुछ दिन बाद मेरे कुछ मित्रों ने एक आदमी से परिचय कराते हुए कहा कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और उसका बदला लेने में यह चच्चा तुम्हारी मदद करेंगे। मै उनकी बातों में बह गया और उनके साथ चल पड़ा। तीन दिन तक सफर करने के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से मुझे सीमापार कराया और मै पाकिस्तान आ गया। वहां पाकिस्तानी सेना के जवानों ने मेरा तहेदिल से स्वागत किया, हमारे खाने-पीने आदि की आलीशान व्यवस्था की और मुझे समझाया कि अपने विभाग के किसी वरिष्ठ अधिकारी को मारकर तुम्हे कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि तुम्हे ऐसे अधिकारियों को बनाने वाले भारत सरकार से बदला लेना है।
इसके बाद उन्होंने मुझे बंदूके और अन्य शस्त्र दिये और पाक जासूसों की सहायता से नियंत्रण रेखा के पार लाकर छोड़ दिया। मैने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों पर हमले किये और पकड़ा न जाउं इसलिये भागकर नियंत्रण रेखा के पार पहुंच जाता था। पाकिस्तान में मेरा इज्जत बढ़ने लगी और मुझे तंजिम का उपप्रमुख बना दिया गया। सेना के अधिकारियों ने बताया कि तुम्हारी प्रसिद्धी रावलपिंडी तक पहुंच गई। फिर बताया गया कि आपको श्रीनगर विश्वविद्यालय और शूरा मेडिकल कॉलेज को बम से उड़ाना है। मैने सोचा कि इन शिक्षा संस्थानों को खतम करके क्या हासिल होगा और मेरी समझ में आने लगा कि पाकिस्तान केवल भारत का अपमान और विभाजन चाहता है। मैने इस वारदात को अंजाम देने से इंकार कर दिया। अब मै जानता हूं कि मेरी हत्या वे कर देंगे लेकिन मरने से पूर्व अपनी कहानी किसी को बताना चाहता था जो आज पूरी हो गई। यह साक्षात्कार वर्ड फोरसाईट ग्रुप के निदेशक संजीव वासलेकर ने अपनी पुस्तक में लिखी है। वह लिखते हैं कि इसके कुछ दिन बाद ही उसकी हत्या हो गई।
अभी दो दिन पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नए साल के जश्न के मौके पर धमाका करने आये अलकायदा के आतंकी मोहम्मद आसिफ को गिरफ्तार किया है। 41 साल का आसिफ उत्तरप्रदेश के संभल का रहने वाला है। वहीं कटक से गिरफ्तार अब्दुल रहमान भी अलकायदा के लिये काम करता है जब कि रहमान मूलरुप से कटक का ही निवासी है। अलकायदा बहुत योजनाबद्ध तरीके से भारत के अंदर अपने पांव पसार रहा है। हांलाकि अलकायदा, जैश ए मोहम्मद और लश्करे तोयबा का आपस में ही प्रतिस्पर्धा है कि कौन सबसे अधिक जनसंहार करता है। जैश ए मोहम्मद का मुख्यालय इस्लामाबाद शहर में अनेक एकड़ जमीन पर फैला है। जबकि लश्करे तोयबा का लाहौर के पास मुदीर गांव में 14० एकड़ में है। वहां स्वीमींग पुल, चमड़ा उद्योग, घोड़ो के तबेले, मदरसे आदि हैं। लश्करे तोयबा के पूरे पाकिस्तान में 15० मदरसे, बड़े समाचार पत्र समूह, और दस हजार कमीशन एजेंट कार्यरत हैं। इन मदरसों में गरीब और अभावग्रस्त परिवार के बच्चों को लाकर जेहादी मानसिकता तैयार कराया जाता है। भारत में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो पाकिस्तान गु’चर एजेंसी से निश्चित रकम प्रा’ करके 35 फीसदी रकम उसके घर पहुंचा दी जाती है बाकी पैसा गोलमाल हो जाता है। पाकिस्तान सरकार को सब पता है और गहराई में जाये तो यह सरकार प्रायोजित आतंकवाद है। पाकिस्तान जानता है कि वह सीधी लड़ाई में भारत से पार नहीं पा सकता तो इस गैर सरकारी कुटिल सेनाओं को भरपूर मदद मुहैया भी कराता है।

वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जिस तरह छात्रों के एक गुट ने भारत विरोधी नारेबाजी की और उसके बाद कुछ राजनेताओं ने अपने-अपने चश्में से वोटब्ौंक तलाश करना शुरु किया वह निदंनीय है। इस तरह के राष्ट्रविरोधी मानसिकता के छात्रों का समर्थन सिर्फ वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये ही नहीं किया जा रहा बल्कि इसके पीछे मोदी सरकार के विरोध की मानसिकता गहराई तक बैठी हुई है। विरोध का कोई मुददा न होने पर विपक्ष इस समय भ्रम और याचक की भूमिका में टकटकी लगाए तलाश रहा है कि क्या घटना हो जिसपर मोदी सरकार को निशाने पर लिया जा सके।
गौर करने वाली बात जो है कि राष्ट्रविरोधी नारे लगाने और आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने वाले छात्र वामपंथी गुट के हैं। जो वामपंथ पूरी शिददत से अपने जन्मकाल से ही मानता आया है कि राज्य विलु’ हो जाएगा अर्थात स्टेट विदरर्स अवे। स्टेटलेस और कास्टलेस सोसाईटी के निर्माण का यूटोपिया अर्थात स्वप्न कार्ल मार्क्स ने देखा और दुनियां को दिखाया। उसी विचारधारा के छात्र नारे लगाते रहे कि भारत तेरे टुकड़े होंगे। यदि देश के टुकड़े होंगे तो यह कैसी विचारधारा? टुकड़े से सीमाएं और बढ़ ही जाएंगी। लेकिन वाममार्गियों को इसकी परवाह नहीं है। इतिहास में देखे तो दुनिया में जितने वामपंथी विचार को माानने वाले देश रहे सबसे अधिक सीमा विवाद को लेकर वहीं आपस में उलझे रहे। मार्क्सवाद पूरी तरह इस सिद्धांत पर ही फेल नहीं हुआ बल्कि रुस में जब पहला संविधान बना तो उसमें सेकुलर देश होने का दावा किया गया। इससे पूर्व कहा गया कि गॉड विल वी एक्पेल्ड फ्राम रसिया अर्थात ईश्वर को रुस से निष्कासित कर दिया जाएगा। सभी चर्च पर ताला बंद कर दिया जाएगा। क्यों कि धर्म अफीम की गोली है।
इतना ही नहीं पूंजीवाद के खिलाफ मार्क्स ने जो अनुमान किए वह पूरी तरह फेल साबित हुए। आज तक न तो किसी सर्वहारा ने क्रांति की नहीं पूंजीवाद खत्म हुआ। उल्टे वक्त के साथ पूंजीवाद का चेहरा और अधिक मानवीय होता गया। पूंजीवादियों ने मजदूर वर्ग के हित में काम करना और सोचना शुरू किया। सरकारों ने मजदूरों के हित में तरह-तरह के कानून बनाने आरंभ कर दिए। हेल्थ बीमा, बोनस, पीएफ आदि के माध्यम से मजदूरों को पूंजीवाद ने साध लिया। आज की दुनियां में वामपंथ पूरी तरह भ्रम की अवस्था में है। मुददा विहीन और विचारधारा के लगातार फेल होते जाने से वह अनाप-शनाप की हरकतों पर उतर आया है। उसे समझ नही आता कि फेसबुक, गूगल, अमेजान, श्नैपडील जैसी कंपनियां बिना किसी फैक्टàी बिना किसी मजदूर के करोड़ों की आमदनी कैसे कर रही है? आखिर हम कहां पर बैठकर हड़ताल करें ? कहां पर तालाबंदी करें? ऑनलाईन होती जा रही दुनिया और लगातार बदलते जा रहे बाजार के दर्शन ने मार्क्सवाद के दर्शन को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। ऐसे में कुछ युवाओं को गुमराह करके, छात्रों के एक सीमित गुट तक ही लालदुर्ग बाकी रह गया है।


ब्लूचिस्तान और पाक कब्जे वाले कश्मीर की छटपटाहट


मार्कण्डेय पाण्डेय
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इनदिनों भारी मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। एक के बाद एक जिसतरह की घटनाएं पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में घट रही है उससे नहीं लगता कि अधिक दिनों तक पाकिस्तान उसे अपने कब्जे में जबरन रख पायेगा। जैसे ही ब्लूच मुददे पर नवाज हटाओ अभियान वहां चला विश्ोषज्ञों को यह आशंका सताने लगी कि क्या फिर से पाकिस्तान मिलेटàी शासन की ओर बढ रहा है? हांलाकि सेना और नवाज के बीच समझौता हो गया लेकिन सबकुछ ठीकठाक नहीं है। नवाज शरीफ एक माह में दो बार अमेरिका अपना दर्द सुनाकर आये। नवाज आंतरिक मजबूरियों से निपटने और लोगों का ध्यान भटकाने के लिये पूरजोर कोशिश करते रहे कि भारत की तरह ही अमेरिका से पाकिस्तान परमाणु समझौता कर ले किंतु कामयाब नहीं हुए। कारण अमेरिका जानता है कि आज के वैश्विक हालात में भारत पाकिस्तान से बहुत लंबी लकीर खीच चुका है और पूर्ववर्तियों की तरह वह दोनो देशों को एक तराजू में नहीं रखना चाहता। दूसरा कारण यह कि भारत सैन्य मामलों में हमेशा ही जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाता है। भारत की परमाणु नीति भी नो फस्र्ट यूज की है जबकि पाकिस्तान को परमाणु आयुध संम्पन्न करने का मतलब कि हथियार कब आतंकियों के हाथ लगे कुछ नहीं कहा जा सकता।
इस समय पाकिस्तान के सामने दो बड़ी और चुनौतियां उभर आई है। पहला ब्लूचिस्तान और दूसरा पाक अधिकृत कश्मीर। ये दोनों हिस्से पाकिस्तान में कब तक रहेंगे पाकिस्तान भी नहीं जानता। पाकिस्तान कब्जे वाला कश्मीर किसी भी कीमत पर पाकिस्तानी हिस्सा नहीं होना चाहता अब वहां की जनता छटपटाने लगी है कि कम से कम भारतीय हिस्से वाले कश्मीर से ही हमलोग एकजुट हो जाएं। इसके भी कारण है। पहला पाक कश्मीर की बदतर हालत दूसरा भारतीय कश्मीर में मिल रही तमाम सरकारी सुविधाएं और तीसरा अपनी मूल प्रकृति को प्रा’ करना। मजे की बात यह कि जब-जब नवाज शरीफ अमेरिकी राष्ट्रपति और संबंधित मंचों पर गये इसबात का हायतौबा जरुर किये कि ब्लूचिस्तान को पाकिस्तान से भारत ही अलग करवा रहा है। इसलिये अमेरिका हमारे साथ परमाणु संधि कर ले। यदि ब्लूचिस्तान और पाक कश्मीर पाकिस्तान से अलग हो जाते हैं तो पाकिस्तान का इश्लामिक देश होने का मुलम्मा खतम हो जायेगा। उसकी सीमाएं घटेगीं, कटेंगी और सामरिक नजारा ही कुछ और हो जायेगा। आमीन ।।।

आरक्षण की समीक्षा आरक्षित वर्ग के लिये लाभप्रद



मार्कण्डेय पाण्डेय
भारत में आरक्षण का आधार सांस्कृतिक है न कि आर्थिक। क्योंकि अभी भारत में आर्थिक वर्गीय अवधारणा विकसित नही हो पाई है इसलिए जातीय आधार को पूरी तरह खारीज नही किया जा सकता। आरक्षण का विरोध सिर्फ आरक्षण के कारण करना न्यायसंगत नहीं होगा। वास्तव में यह अनारक्षित जातियों के ही दीर्घकालीक हित में है। क्योंकि इतनी बड़ी अविकसित जनसंख्या विकास के लाभों को यदि उच्च जातियों तक पहुंचने देना है तो उनके पदसोपान को आगे लाना ही होगा। यह न केवल सामाजिक न्याय की पश्चिमी अवधारणा को विकसित करेगा बल्कि भारत ज्ौसे देश में सामाजिक समरसता को भी मजबूत करेगा। लेकिन ज्वलंत सवाल यह है कि क्या वास्तव में आरक्षण उनको ही मिल रहा है जिनको इसकी वास्तव में जरुरत है? समाज शास्त के विचारक मानते हैं कि आरक्षण का लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ राज्यों की अनुसूचित जातियों का जब अध्ययन किया गया तो जो परिणाम सामने आए उसके अनुसार अनुसूचित वर्ग का एक हिस्सा आरक्षण का लाभ उठाकर मध्यवर्गीय जीवन जी रहा है और अपनी सामाजिक स्थिति भी मजबूत कर चुका है। विख्यात समाजशास्त्री पीके रॉय वर्मन कहते है कि आरक्षण का वस्तुनिष्ठ लाभ कम पर व्यक्तिनिष्ठ लाभ अधिक हुआ है।
आरक्षण के कारण अनुसूचित जातियो का समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की प्रति सकारात्मक विचार आया है। इसके अलावा तथा आरक्षण प्रा’ जातियो में सामाजिक मॉडल भी उभरे हैं। जैसे रेड्डी, पनियांन, पटेल (महाराष्ट्र व गुजरात), शिन्दे, गुर्जर, भील, मीणा, हरिजन, पासवान, यादव, कुर्मी, लोधी, जाट, कोइरी आदि जातियां अपने को सामाजिक व राजनितिक रूप से सशक्त महसूस करने लगी है। कुछ और सामाजिक चिंतक जैसे आंद्रे बेते, श्रीनिवास, सुरजीत सिन्हा, मजूमदार आदि मानते हैं कि आरक्षण के कारण जो जातियां विकसित हो चुकी है वह आज भी अपने को निम्न जातियों में गिनती करवाती है। जिससे उनको आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ मिलता रहे। अनुसूचित जाति 542 में लगभग 34 जातियों की आबादी तकरीबन 75 फीसदी है। तो इनमे 7 जातियां ऐसी है जो कुल अनुसूचित जाति की अकेले ही 9० फीसदी हैं। इसी तरह अनुसूचित जनजाति में मीणा ,गुर्जर, भील, टोडा कोटा आदि आरक्षण का 8० फीसदी लाभ लेकर अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर चुकी हैं और अपने ही कमजोर वर्ग का शोषण भी कर रही हैं। इसलिए अब आरक्षण की समीक्षा बेहद जरुरी कदम है ताकी जो परिवार एक बार क्लास वन या टू की नौकरी प्रा’ कर लेता है वह अपने ही स्वजातियों के हित में खुद ही पहल करके आरक्षण का लाभ लेना बंद कर दे।