रविवार, 26 मार्च 2017

आतंक और कालाधन पर देशभर में मोदी की छापेमारी



पी मार्कण्डेय
गत दिनों संसद में विपक्ष की ओर से कटाक्ष किया था कि प्रधानमंत्री ने चीन में जी-2० की बैठक में 'काला धन’ के ऊपर टिप्पणी की है, वो नाकाफी है और हमें शीघ्र परिणाम चाहिए। हम उनसे ये जानना चाहते हैं कि चुनाव से पहले जब वो पूरे देश में बखान कर रहे थे कि कालाधन 1०० दिन के भीतर वापस लाएंगे तो अब देर किस बात की है? क्या उनको इस बात का ज्ञान नहीं था कि अंतर्राष्ट्रीय मनी लांड्रर्स भी हैं? क्या इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि जो अंतर्राष्ट्रीय कानून हैं वो इस मामले में बड़े पेचीदा हैं और कई मुल्कों में कई ऐसे बैंक हैं जो वहाँ के कानून के तहत गोपनीयता मैन्टेन करते हैं?

कांग्रेस पार्टी ने जोर देकर कहा कि हम साफ तौर से ये कहना चाहते हैं कि पिछले दो साल में जो काला धन देश में वापस आया भी है, उसकी सारी बुनियाद यूपीए सरकार के समय में रखी गई थी। 1०० से ज्यादा टैक्स इनफर्मेशन एक्सचेंज एग्रीमेंट साईन किए गए थे, ड्यूल टैक्स अवॉयडेंस ट्रीटी साईन की गई थी और एक जो ढांचा आर्थिक महामंदी के बाद, 2००8 के बाद यूपीए की सरकार ने तय किया था, या फिर उसकी बुनियाद रखी थी, उसके कारण पिछले दो वर्ष में ये कुछ काला धन वापस लेकर आ सके। आगे कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया कि पनामा पेपर्स के माध्यम से जिन लोगों के नाम का खुलासा हुआ क्या सरकार ने उन नामों को सार्वजनिक किया? क्या सरकार ने उन लोगों को गिरफ्तार किया ?

लेकिन विपक्ष सहित कांग्रेस को इस बात का इलहाम नहीं था कि प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी देशभर में एक साथ इनकम टैक्स की रेड मार देंगे। काला धन सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं है बल्कि इसके वृहत्तर आयाम हैं जो न केवल सामान्य आपराधिक कृत्यों से संबद्ध है अपितु आतंकवाद से भी जुड़ जाता है। काले धन के मामले में सरकार ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए 5०० और 1००० रुपए के नोट को गत आठ नवंबर की रात 12 बजे से बंद कर दिया।

लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि 5०० एवं 1००० के जाली नोट से आतंकवादियों को भी फंडिग होती थी। इस तरह से इस कदम से आतंकवाद व काला धन दोनों पर चोट होगा क्योंकि दोनों आपस में अंतर्संबंधित हैं। काले धन से तात्पर्य अघोषित आय अथवा कर अपवंचित आय से है अर्थात जिस पर आय कर और अन्य कर नहीं चुकाए जाते हैं। सामान्यत: अवैध खनन करके, सरकारी विकास योजनाओं के धन की चोरी करके, रिश्वतखोरी व टैक्स चोरी करके जो धन देश व विदेश में जमा किया जाता है, वह धन कालाधन है। जिस धन पर एक महत्वपूर्ण भाग सरकार को करों के रुप में प्राप्त होता है और अंतत: देश की समृद्धि एवं सामाजिक आर्थिक विकास में समायोजित होता है, वह काले धन के रूप में कुछ विशेष वर्गों के पास ही रह जाता है। ऐसे में सरकार के इस कदम के महत्व को समझा जा सकता है।
सरकार के इस कदम से देश की राजनीति और चुनाव प्रक्रिया को भी कालेधन से मुक्त किया जा सकेगा। ठेके उपलब्ध कराने, कारोबार में छूट देने, लाइसेंस देने, गोपनीय सूचनाएं देने तथा ऐसे कानून बनवाने, जिनमें बचने के रास्ते हों, के नाम पर प्रभावशाली राजनीतिज्ञ जमकर काला धन कमाते हैं। इसमें नौकरशाही की संलिप्तता रहती थी। काला धन देश की अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्र की सामुदायिक विकास योजनाओं पर घातक प्रभाव डालकर गतिरोध पैदा करता है। काले धन के कारण उत्पादन दर, स्फीति दर, बेरोजगारी एवं निर्धनता आदि की सही दरों को मापने में भी बाधा पहुंचती है। इससे एकओर सामाजिक असमानता बढ़ती है, वहीं ईमानदार नागरिकों में निराशा और हताशा बढ़ती है। अधिकांशत: काले धन का उपयोग अवैध कार्यों एवं आतंकवाद को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाता है।

इन नोटों के बाहर होने से संपूर्ण अर्थव्यवस्था कैशलैस बनेगी। ब्लैकमनी, भ्रष्टाचार, अन्य अपराधों को नियंत्रित करने के अतिरिक्त यह संपूर्ण बैंकिग व्यवस्था को मजबूत करेगा, जो पुन: संपूर्ण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त रियल स्टेट जो ब्लैकमनी का हब हुआ करता था में काफी सुधार होगा। इससे उनके मूल्य तर्कसंगत होंगे तथा सामान्य लोग भी अपने घर के सपनों को पूरा कर सकेंगे। चिकित्सा, इंजीनियरिग इत्यादि व्यावसायिक शिक्षा में भी काले धन की संबद्धता थी तथा ये काफी हद तक विशिष्ट वर्ग के लिए संबंधित हो गई थी, परंतु अब ब्लैक मनी के सफाये के बाद चीजें काफी बदलेंगी। सरकार के उपरोक्त कदम से ऑफिसियल ट्रांजिक्शन में वृद्धि होगी। इससे केन्द्र एवं राज्य सरकारों के राजस्व में जबरदस्त लाभ होगा क्योंकि ब्लैकमनी की समानान्तर अर्थव्यवस्था खत्म होगी। अधिकृत ट्रांजिकशन से लंबी अवधि में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों पर भी प्रभाव बढ़ेगा।

हांलाकि पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने काले धन की जांच हेतु पूर्व जज की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया था। विदेशों में जमा काले धन हेतु 2०15 में भारत सरकार द्बारा मजबूत कानून बनाया गया और विभिन्न देशों के साथ टैक्स समझौते में परिवर्तन किया गया। अमेरिका सहित विभिन्न देशों के साथ सूचना आदान प्रदान करने का प्रावधान किया गया ताकि बेनामी संपत्ति को रोका जा सके। 2०15 के इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत अवैध धन रखने पर 1० वर्ष की सख्त सजा एवं जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इसके साथ ही लोगों को डिसक्लोजर विडो बनाकर ब्लैक मनी घोषित करने के लिए कहा गया। इस स्कीम के तहत 65,००० करोड़ रुपये बाहर आए। इसके बाद सरकार का यह चौंकाने वाला दूरगामी निर्णय सामने आया।

काले धन और काले नोटों में लिपटे देश विरोधी तत्वों के पास मौजूदा 5०० व 1००० के नोट मात्र कागज के टुकड़े के समान रह जाएंगे। इन पहलों के और भी अच्छे परिणाम मिल सकेंगे, जब काले धन के विरुद्ध लड़ाई में जन सहभागिता बढ़े तथा देशवासी समस्या के प्रति जागरूकता का परिचय दें। वैसे, सरकार के इस कदम से जागरूकता बढ़ी है और माहौल काफी अच्छा बनता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के इस ऐतिहासिक फैसले से कालाधन व आतंकवाद चारो खाने चित हो गए है।
कैसे निपटेगा आतंकवाद और कालाधन से
नकली नोटों के धंधे में शामिल लोग ज्यादातर बड़े नोटों का ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें इस्तेमाल में लाना बेहद आसान होता है। कालाधन पैदा करने वाले और इस्तेमाल में लाने वाले ज्यादातर अपराधी बड़े नोटों का ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें लाना और ले जाना काफी आसान होता है। 5०० और 1००० के नोटों पर रोक लगाने से ऐसे सभी अपराधों पर लगाम लगाई जा सकेगी। गौरतलब है कि फिलहाल पूरे देश में चल रही करेंसी में 5०० और 1००० रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 86 फीसदी है, जबकि 2००7 में यह आंकड़ा 69 फीसदी था।
ज्यादातर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए भी नकली नोट, हवाला का पैसा और काला धन का ही इस्तेमाल किया जाता है। बड़े करेंसी नोटों पर लगाम कसने के चलते आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने की संभावना अधिक होगी। विश्व बैंक ने जुलाई, 2०1० में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2००7 में भ्रष्टाचार की अर्थव्यवस्था देश की इकॉनमी के 23.2 फीसदी के बराबर थी, जबकि 1999 में यह आंकड़ा 2०.7 फीसदी के बराबर थी। इसके अलावा भारत समेत कई एजेंसियों ने भी इसी तरह के अनुमान जताए थे। हार्वर्ड की स्टडी के मुताबिक बड़े करेंसी नोटों को बंद करने से टैक्स से बचने वालों, वित्तीय अपराधियों, आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी। 5०० रुपए के 165० करोड़ नोट चलन में हैं। यानी कुल करेंसी का 47.85% है। 1००० रुपए के 67० करोड़ नोट चलन में हैं। मूल्य 6.3 लाख करोड़ रुपए। यानी कुल करेंसी का 38.54% है।

कम होंगी प्रॉपर्टी की कीमत, घर का सपना होगा साकार
हालांकि ये फैसला अप्रत्याशित रूप से अचानक ले लिया गया है लेकिन उसके बावजूद जानकारों की माने तो ये फैसला गरीब, मिडिल क्लास और नौकरी पेशा लोगों के लिए बेहद फायदेमंद रहने वाला है। इसके जो दो सबसे बड़े फायदे बताए जा रहे हैं वो हैं रियल एस्टेट की कीमतों में गिरावट आएगी और जो लोग उच्च शिक्षा लेने से वंचित रह जाते हैं उन्हें परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
हार्वर्ड की एक स्टडी के मुताबिक भारत समेत विकासशील देशों में सबसे ज्यादा काला धन का इस्तेमाल रियल एस्टेट के कारोबार में ही किया जाता है। फिलहाल भ्रष्टाचार में लिप्त लोग अपनी अघोषित आय को रीयल एस्टेट सेक्टर में निवेश करके खुद को साफ-सुथरा साबित करने की कोशिश करते हैं। इस फैसले से ऐसे लोग नकद भुगतान नहीं कर सकेंगे। ऐसे में प्रॉपर्टी की कीमतें कम होंगी और गरीबों के लिए मकान का सपना आसान हो सकेगा।

सरकार के रेवेन्यू में होगा इजाफा होगा
इस फैसले के चलते एक तरफ सरकार के रेवेन्यू में इजाफा होगा। वहीं, ब्लैक मनी को वाइट इकॉनमी के दायरे में लाने में भी मदद मिलेगी। यही नहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी इसे अहम माना जा रहा है। इसके अलावा हायर एजुकेशन ऐसा सेक्टर है, जहां भ्रष्टाचार में लिप्त लोग अपनी पूंजी लगाते हैं। कैपिटेशन फीस के चलते उच्च शिक्षा आम लोगों की पहुंच से दूर हो चुकी है। इस फैसले से उच्च शिक्षा के मामले में भी समानता की स्थिति आ सकेगी क्योंकि अवैध कैश लेनदेन संभव नहीं होगा। यही नहीं इससे महंगाई पर भी लगाम लग सकेगी।

25 देशों में बैन हैं बड़े नोट
चीन, ब्रिटेन, अमेरिका, सिगापुर जैसे 25 से ज्यादा बड़े देशों में बड़े नोटों पर पूरी तरह से बैन है। चीन में 1०० युआन, अमेरिका में 1०० डॉलर और ब्रिटेन में 5० पाउंड से बड़ा नोट चलन में नहीं रहता। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने बड़े नोटों को भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह बताया था।


आशियाने की आस होगी पूरी ?


पी मार्कण्डेय
उत्तर प्रदेश और चार राज्यों के चुनाव के समय पेश होने वाले केंद्रीय बजट को लेकर विपक्ष कई आशंकाओं से भरा था। इसके लिए विपक्ष ने चुनाव अयोग के चौखट तक गुहार लगाया लेकिन संवैधानिक प्रतिबद्धता के इसे पेश होना ही था। विपक्ष को डर था कि चुनाव में फायदा न उठा ले केंद्र सरकार, लोक लुभावन हो सकता है आगामी बजट, चुनावी राज्यों के लिए खास पैकेज हो सकता है इस बजट में। लेकिन हुआ इसके विपरीत।
हालांकि मंदी की मार झेल रहे रियल स्टेट की कमर नोटबन्दी ने तोड़ दी थी फिर भी जीएसटी को लेकर सरकार की तेजी, सबके लिए आवास पिछले बजट में किफायती आवासों को आयकर के दायरे से मुक्त करने आदि की सरकारी पहल को लेकर रियल स्टेट इस बजट से काफी आशान्वित था। देश की जीडीपी में सबसे अधिक योगदान करने वाले और रोजगार प्रदान करने वाले रियल एस्टेट सेक्टर को भी इस साल के बजट से काफी उम्मीदें थी। बजट पेश होते ही रियल स्टेट कारोबारियों के चेहरे खिल गए।
गत कुछ महीनों में केंद्र सरकार इस सेक्टर को बेहतर बनाने के लिए विशेष रूप से सक्रिय रही है। रियल एस्टेट बिल (रेरा), वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), हाल ही में विमुद्रीकरण के 5०दिन पूरे होना, प्रधानमंत्री द्बारा साल के आखिरी दिन पर अफोर्डेबल हाउसिग से जुड़ी तमाम रियायतें, और साल की शुरुआत में बैंकों के ब्याज दर में कटौती, कुल मिलाकर ये सभी संकेत 2०17 रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होने वाले हैं।
बजट में अफोर्डेबल हाउसिंग को सरकार ने आधारभूत ढांच के अंर्तगत लिया है। वास्तव में रियल स्टेट कारोबारियों के लिए यह बहुत बड़ा अवसर है। यह न केवल कारोबारियों के लिए बल्कि खरीददारों के लिए भी राहत भरा कदम है। अब बिल्डर भी मकानों को बेचने में जल्दी करेंगे और कीमतों को लेकर उतार-चढाव, सौदेबाजी का माहौल खत्म होगा। सिग्नेचर ग्लोबल के प्रदीप अग्रवाल कहते हैं कि हमें जैसी उम्मीद थी बजट वैसा ही आया है। सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बिल्डरों को मकान बनाकर बेचने में जो फायदा होगा उस पर टैक्स नहीं देना पड़ेगा। टैक्स में छूट मिलने से आवासों के दाम घटेंगे। अब तक आवासों के कंपलीशन सर्टिफिकेट मिल जाने के बाद सरकार यह मान लेती थी कि आावास बिक गए अथवा किराए पर दे दिए गए और टैक्स वसूली शुरु हो जाती थी। लेकिन अब बजट में ऐलान किया गया है कि यदि आवास निर्माण पूरी होने के बाद भी आगामी एक साल तक यदि आवास बिकते नहीं है तो बिल्डर को कोई टैक्स नहीं देना होगा।




अवनीश सूद , डायरेक्टर , ईरोस ग्रुप

केंद्रीय बजट सत्र 2०16-17 की घोषणा के समय से ही सरकार रियल्टी सेक्टर के लिये काफी सक्रिय रही है। अफोर्डेबल हाउसिग के तहत सरकार ने डेवलपर्स और खरीदार के साथ रेंटल हाउसिग के लिये कई घोषणायें की बैंकों के द्बारा ब्याज दरों में कटौती का सभी होम लोन लेने वालों को लाभ मिलेगा लेकिन अफोर्डेबल हाउसिग के तहत खरीदने वालों को इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा।

दीपक कपूर , प्रेसिडेंट- क्रेडाई पश्चिमी ऊ.प्र. एवं डायरेक्टर, गुलशन होम्.ज
अफोर्डेबल हाउसिग और हाउसिग फॉर ऑल, यह सरकार के दो मुख्य मुद्दे रहे, और इन पर काम भी पूरी निष्ठा के साथ हुआ। बजट में काफी कुछ बाते हैं जो रियल स्टेटक के लिए वरदान साबित होंगी।

अशोक गुप्ता , सीएमडी, अजनारा इंडिया

इस साल के बजट में हम इन्फ्रास्ट्रकचर डेवलपमेंट को सरकार के मुख्य लक्ष्य के तौर पर देख पायेंगे। इस से जुड़ी बड़ी घोषणाओं का अनुमान हम लगा सकते हैं, खासतौर से उन क्षेत्रों में जो की प्रधान मंत्री की ही अम्रुत (अटल मिशन फॉर रेजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉरमेशन) स्कीम के तहत आती हैं। जीएसटी का कार्यान्वन, इनकम टैक्स में रियायतें, डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न छूट प्रदान करना एवं रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट और इन्फ्रास्ट्रकचर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट को प्रोत्साहित करना मुख्या होन्ो की उम्मीद थी जो पूरी होती दिख रही है।

धीरज जैन , डायरेक्टर , महागुन ग्रुप


इस साल के बजट में हम रियल एस्टेट सेक्टर से जुडे तमाम उद्योगों जैसे स्टील एवं सीमेंट उद्योगों की नीतियों में भी स्पष्टीकरण एवं मानिकरण होने की आशा थी जो पूरी हो रही है। उद्योग घरों के दामों पर सीधे तरीके से प्रभाव डालते हैं। वही दूसरी तरफ गृह ऋण पर मिलने वाली टैक्स कटौती की सीमा को 2 लाख रुपयों से ज्यादा बढ़ाना चाहिए। यह राशि आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही कम हैं, और टियर 1 के शहर में तो कई बार औसत दाम ही एक करोड़ के हैं।

प्रदीप अग्रवाल,चेयरमैन,सिग्नेचर ग्लोबल


प्रधानमंत्री ने अफोर्डेबल हाउसिग सेगमेंट के तहत बड़ी घोषणाएं की और ईडब्लूएस एवं एलआईजी वर्ग के लोगों को घर खरीदने की तरफ प्रेरित किया, साथ ही साथ साल के शुरुआत में कई बैंको ने भी अपने ब्याज दरों में कटौती की यानी की कुलमिलाकर सभी संकेत सेक्टर के लिए अच्छे नजर आ रहे हैं।

अश्वनी प्रकाश , ईडी, पैरामाउंट ग्रुप

इस साल के बजट में रियल एस्टेट को सीधे तरीके से लाभ पहुंचाने वाली कोई घोषणा नहीं दिखाई देती। पिछले साल हाउसिग फॉर आल को गति मिली और साथ ही कई अहम बिल भी पास हुए पर इस साल बजट में बुनियादी संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण घोषणाएं होने की उम्मीद थी जो जिसने निराश किया है।




जाट आरक्षण कल से आज तक


पी मार्कण्डेय
कालिका रंजन अपनी किताब में लिखते हैं कि जाट मरते वक्त अपने उत्तराधिकारी को यह बता कर मरता है कि किस-किसका कितना कर्जा चुकाना है। जाटों की उत्पत्ति और इतिहास पर कालिका रंजन कानूनगो, उपेंद्र नाथ शर्मा, जदुनाथ सरकार, नत्थन सिह और कुंवर नटवर सिह ने भी लिखा है और जाटों के गौरवशाली इतिहास का वर्णन किया है। भारत पर विदेशी हमले होते रहे हैं। अपनी जमीन की लड़ाई जाटों ने अपनी जान की बाजी लगाकर लड़ी है। इस लड़ाई में जाट महिलाओं का योगदान भी कम नहीं रहा है। हरियाणा पंजाब सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यदि गर्भवती मां खेत में काम करते हुए दिखे या देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लोहा लेता हुए कोई जवान दिखे तो समझ जाईये वह जाट होगा। साहस और शारीरिक श्रम करना जाट का सहज गुण है, इसलिए जाटों को लेकर ही कभी लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था जय जवान जय किसान। मदन मोहन मालवीय ने कहा था भारत की रीढ़ जाट ही हैं।
जाटों में अभिव्यक्ति की भारी कमी है कारण अपनी बात को कैसे कहना-रखना है, यह जाट के लिए काफी मुश्किल है। जाटों से जुड़ी एक कहावत मशहूर है कि आगे सोचे दुनिया और पीछे सोचे जाट यानी दुनिया के दूसरे लोग तो करने से पहले सोचते हैं लेकिन जाट करने के बाद सोचता है। यह जाटों की सबसे बड़ी खामियों में से एक है, जिसे अब दूर करना चाहिए।
औरंगजेब की धर्म विरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह के बारे में ठाकुर सुरजनसिह शेखावत अपनी पुस्तक गिरधर वंश प्रकाश जो राजस्थान के तत्कालीन खंडेला ठिकाने का वृहद् इतिहास है में लिखते है कि मेवात प्रांत के बृजमंडल के निवासी जाट हांलाकि खेतिहर किसान थे लेकिन वे जन्मजात लड़ाकू वीर योद्धा भी थे। अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार हेतु शक्तिशाली सत्ताबल से टकराने के लिए भी वे सदैव कटिबद्ध रहते थे। औरंगजेब की हिन्दू धर्म विरोधी नीति व मथुरा व वृन्दावन के देवमन्दिरों को ध्वस्त करने के चलते उत्तेजित जाटों ने गोकुला के नेतृत्व में संगठित होकर स्थानीय मुगल सेनाधिकारियों से डटकर मुकाबला किया था। उनसे लड़ते हुए अनेक मुगल मनसबदार मारे गए। जाटों ने गांवों का लगान देना बंद कर दिया मुगल सेना से लड़ते हुए गोकुला के मारे जाने पर सिनसिनी गांव के चौधरी भज्जाराम के पुत्र राजाराम जो अप्रतिम वीर और योद्धा था ने उस विद्रोह का नेतृत्व संभाला।

राजाराम ने बादशाह के खालसा गांव में जमकर लूटपाट की एवं दिल्ली आगरा के बीच आवागमन के प्रमुख मार्गों को असुरक्षित बना दिया जो भी मुगल सेनापति उसे दबाने व दंडित करने के लिए भेजे गए वे सब पराजित होकर भाग छूटे। राजाराम ने आगरा के समीप निर्मित सम्राट अकबर के भव्य और विशाल मकबरे को तोड़फोड़ कर वहां पर सुसज्जित बहुमूल्य साजसामान लुट लिया व कब्रों को खोदकर सम्राट अकबर व जहाँगीर के अस्ति-पंजरों को निकालकर अग्नि को समर्पित कर दिया। केसरीसिह समर के अनुसार-
ढाही मसती बसती करी, खोद कबर करि खड्ड
अकबर अरु जहाँगीर के , गाडे कढि हड्ड
प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहास लेखक विन्सेंट स्मिथ ने भी अपनी पुस्तक अकबर दी ग्रेट मुगल में निकोलो मनूची के उल्लेख की पुष्टि करते लिखा है कि औरंगजेब जब दक्षिण में मराठा युद्ध में सलंग्न था मथुरा क्षेत्र के उपद्रवी जाटों ने सम्राट अकबर का मकबरा तोड़ डाला। उसकी कब्र खोदकर उसके अवशेष अग्नि में जला डाले। इस प्रकार अकबर की अंतिम आंतरिक इच्छा की पूर्ति हुई। आगरा सूबा में नियुक्त मुगल सेनाधिकारियों से राजाराम का दमन नहीं किया जा सका, तो बादशाह ने आंबेर के राजा बिशनसिह को,जिसका पिता राजा रामसिह उन्ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हुए थे मथुरा का फौजदार बनाकर जाटों के विरुद्ध भेजा। राजा बिशनसिह उस समय नाबालिग था सो लांबा का ठाकुर हरिसिह उसका अभिभावक होने के नाते सभी कार्य संचालित करता था। ठाकुर हरीसिह ने ही खंडेला के राजा केसरी सिह जो खुद भी बाद में औरंगजेब का विद्रोही बना और शाही सेना से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था।

अटल जी ने दिया था सबसे पहले आरक्षण
1998 में पूर्व प्रधानमंत्री इन्दर कुमार गुजराल की सरकार के वक्त पिछड़ी जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में जाटों को शामिल किए जाने की सिफारिश की थी। लेकिन गुजराल सरकार ने इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया। अगस्त 1999 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ओबीसी श्रेणी के तहत जाटों को आरक्षण देने, राजस्थान के जाटों को पिछड़े वर्ग का दर्जा देने का वादा किया। भाजपा ने राज्य में 25 सीटों में से 16 जीती। इस प्रकार जाट आरक्षण के राजनीतिकरण की शुरुआत हुई। अक्टूबर 1999 में बाजपेयी सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में राजस्थान के जाटों को आरक्षण देने के अपने वादे को पूरा दिया। इसके बाद, अन्य राज्यों में भी जाटों को आरक्षण की मांग शुरू हो गई। 2००4 के लोकसभा चुनावों के दौरान, जाटों के लिए आरक्षण के वादे को एक बार फिर राजनीतिक दलों ने हवा दी। चुनावों के बाद आरक्षण की मांगों को बल नही मिला, तब छोटे आंदोलन और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
9 मार्च 2००7 को दिल्ली में अखिल भारतीय जाट महासभा के सम्मेलन में जाट आरक्षण की मांग उठाई गई। इस बार सम्मलेन में कई केंद्रीय और राज्य के मंत्रियों और सांसदों ने भाग लिया, जिसके कारण यह सम्मलेन अधिक महत्वपूर्ण था। चौधरी यशपाल मलिक ने जाट आरक्षण की मांग के लिए लड़ने के के लिए अखिल भारतीय जाट महासभा से अलग अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति का गठन किया। अपनी स्थापना के बाद से ही संगठन ने कई विरोध प्रदर्शनों और रैलियों का आयोजन किया है। जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने हिसार से 15 किलोमीटर दिल्ली हाइवे पर मय्यड़ गांव में जाम लगाया। देश भर में 62 जगहों पर रेलवे व हाइवे पर प्रदर्शन हुए।
देश भर के 15 रेलवे ट्रैक के पास धरने पर बैठे थे जाट समुदाय के लोग
पुलिस ने भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारियों को उठाया गया। लोगों ने इसका विरोध किया। लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले, पथराव। मय्यड़ गांव के संदीप कड़वासरा की गोली लगने से मौत। शव को रेलवे ट्रैक पर रख कर जाट समुदाय ने आंदोलन किया।

हरियाणा में सरकार ने जाटों को 1० प्रतिशत अलग से आरक्षण में शामिल किया
संसद के बजट सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर देश भर में 55 जगहों पर धरने की शुरूआत 31 मार्च तक 55 जगहों पर धरना व जंतर-मंतर पर लगातार 1० मई 2०13 तक संसद के बजट सत्र की समाप्ति तक धरना जारी रहा। बाद में आंदोलन के दौरान जिनकी मौत हुई उनके नाम पर शहादत दिवस का आयोजन करके राष्ट्रीय स्तर की रैली का आयोजन हुआ और 3० अक्टूबर तक आरक्षण ना मिलने पर दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश में जाटों से कांग्रेस को वोट ना देने का संकल्प का आहवान। केंद्रीय मंत्रीमंडल की ओर से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 9 राज्यों के जाटों की आरक्षण की मांग पर राज्यों के आधार पर दी सुनवाई शुरू करने का निर्देश दिया गया। मार्च 2०14 को राष्ट्रीय चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने से एक दिन पहले यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने जाट समुदाय के लिए आरक्षण को मंजूरी दे दी। अप्रैल 2०14 में जाटों को दिया गया अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोटा देने से केंद्र को रोकने के लिए मना कर दिया। 17 मार्च 2०15 को सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी में जाटों को शामिल करने के केंद्र सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया और कहा कि सिर्फ जाति ही आरक्षण का आधार नहीं हो सकती। हांलाकि बाद में नरेंद्र मोदी सरकार ने भी सिद्धांत रुप से जाट आरक्षण का समर्थन किया है और अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।







यूपी सरकार का डàीम प्रोजेक्ट: संस्थाओं का यादवीकरण


पी मार्कण्डेय
आपने मार्कोस का नाम सुना है? इतिहास में यह व्यक्ति सबसे भ्रष्ट नेता के रुप में दर्ज है। मार्कोस ने अपने व्यक्तिगत लाभ और सत्ता में बने रहने के लिए एकप्रकार से अपने देश को गिरवी ही रख दिया। इस कड़ी में उसने सबसे पहले भर्ती संस्थाओं को खत्म किया और अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक पद रेवड़ियों की तरह बांटे। बाद में यह परंपरा रुढ हो गई और आज भी उनके पटवारी, तहसीलदार से लेकर विदेशी राजदूत तक सत्ताधारी दल के कार्यकताã बनाए जाते हैं।
खैर, जब सईया भए कोतवाल तो डर काहे का? कहावत तो सुनी होगी आपने, अब यह पूरी तरह उत्तरप्रदेश में भर्ती संस्थाओं पर सटीक बैठने लगा है। पहले पश्चिम बंगाल की सरकार पर यह आरोप लगता था कि वामपंथी कैडर को शासन और प्रशासन से लेकर नौकरियों के अंतिम पायदान तक भर दिया गया है। यदि आपको सरकारी मुलाजिम होना है तो उसके लिए जरुरी योग्यता यह है कि आपने लाल झंडा और लालसलाम बोलना सीख लिया है। बात यहां तक होती तो भी गनीमत था, लेकिन उत्तरप्रदेश की समाजवादी सरकार ने तो और भी ''प्रगतिशील’’ रुख अख्तियार किया हुआ है। लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फटकार लगने के बाद भी सरकार को कोई खास फर्क नहीं पड़ता और उत्तम प्रदेश में नौकरियों की भर्ती संस्थाएं समाजवादी कार्यालय का रुप ले चुकी है।
हांलाकि अखिलेश राज में उप्र लोकसेवा आयोग यादवों को नौकरी देने का 'ठेकेदार’ तो बन ही गया है। लेकिन अब ताजा मामले में हाईकोर्ट इलाहाबाद ने सिविल पुलिस में दरोगा और प्लाटून कमांडर के पदों पर भर्ती के लिए वर्ष 2०11 में जारी चयन प्रक्रिया रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने दोबारा से लिखित परीक्षा कराकर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का फैसला सुनाया है। दरोगा के 4०1० पदों के लिए 2०15 में चयनित अभ्यर्थियों की ट्रेनिग चल रही है। कोर्ट ने चयन के लिए पहले कराई गई लिखित परीक्षा और बाद की पूरी प्रक्रिया ही रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति राजन रॉय ने अभिषेक कुमार सिह व अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
याचियों के अधिवक्ता विधु भूषण कालिया के मुताबिक याचिका में आरोप लगाया गया था कि उक्त चयन में पात्र अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। हालांकि, राज्य सरकार ने कोर्ट में इस याचिका का विरोध किया लेकिन हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दोबारा से लिखित परीक्षा कराने का फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश पुलिस उपनिरीक्षक व प्लाटून कमांडर भर्ती 2०11 में उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार व उत्तर प्रदेश पुलिस प्रोन्नति व भर्ती बोर्ड द्बारा जमकर अनियमितता, भ्रष्टाचार व नियम विरूद्ध कार्य किए गए हैं जिसके कारण योग्य अभ्यर्थी चयन से वंचित हैं और अयोग्य अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया है, इस भर्ती में निम्न प्रकार से नियम विरुद्ध कृत्य व भ्रष्टाचार किया गया है
1-यह भर्ती प्रकिया मई 2०11 में बसपा सरकार के कार्यकाल में प्रारम्भ हुई थी। प्रारम्भिक परीक्षा से एक माह पूर्व बोर्ड ने परीक्षा के लिए अनुदेश जारी किये, जिसके अनुसार प्रत्येक पेपर में में 4०% तथा कुल 5०% अंक लाने वाले अभ्यर्थी ही सफल घोषित किये जायेंगे, कुल पेपर तीन था एक सामान्य अध्ययन का , दूसरा सामान्य हिदी का और तीसरा सामान्य गणित का । इसी आधार पर 11दिसम्बर 2०11 को प्रारम्भिक परीक्षा सम्पन्न हुई। प्रारम्भिक लिखित परीक्षा का परिणाम 1 जनवरी2०13 को घोषित किया गया।
2- प्रारम्भिक परीक्षा के विरूद्ध हर विषय में 4०% अंक लाने में विफल परन्तु कुल5०% अंक लाने वाले अभ्यार्थियों ने माननीय उच्च न्यायालय उत्तर प्रदेश की लखनऊ खण्डपीठ में याचिका संख्या 91/2०13 दायर की, जिस पर माननीय न्यायधीश ने 23/1/13 को निर्णय दिया कि आपको पूर्व ही सूचित किया जा चुका था कि 4०% प्रत्येक खंड में प्राप्त करना अनिवार्य है और आपने परिणाम घोषित होने के पश्चात याचिका दायर की है इसलिए आपकी अपील खारिज की जाती है। यह अपील समाजवादी सरकार द्बारा कराई गई थी क्योंकि बसपा सरकार में धांधली न कर पाने वाले छात्र फेल हो चुके थे ।

3-इस भर्ती प्रकिया के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा हेतु मानक 1० किलोमीटर एक घण्टा माना गया था । दक्षता परीक्षा 5 फरवरी 2०13 को शुरू हुई, परन्तु 18 फरवरी को दौड़ लगते समय एक अभ्यार्थी की मृत्यु हो जाने से इसे रोक दिया गया। हालांकि मृत्यु का कारण लखनऊ में चल रहे दौड़ में प्रतिभागियों हेतु डॉक्टर की व्यवस्था न होना था।

4- इस भर्ती प्रकिया में सरकार के कहने पर भर्ती बोर्ड द्बारा शारीरिक दक्षता परीक्षा में संसोधन कर 1०किमी० की दौड़ को 4.8 किमी० आधे घण्टे में कर दिया गया और प्रकिया पुन: 5 जुलाई 2०13 को प्रारम्भ गयी जिस पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद द्बारा रोक लगाये जाने के कारण दिनांक 7 जुलाई 2०13 को प्रकिया रोक दी गयी । माननीय उच्च न्यायालय का कहना था की खेल के नियम में खेल के बिच में परिवर्तन सम्भव नहीं है क्योंकि कई छात्र 1० किलोमीटर की दौड़ पास कर चुके हैं , प्रतिभागी छात्रों को दौड़ स्थल पर उचित चिकित्सा सुविधा दिया जाय ।

5- इसके पश्चात न्यायालय के फैसले को दरकिनार करने हेतु शासन ने भर्ती को रद्द कर दिया था जिसके विरूद्ध अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद में याचिका संख्या 5576/2०13 दायर की जिस पर न्यायाधीश ने दिनांक 9/12/2०13 को मूल विज्ञप्ति के अनुसार भर्ती प्रक्रिया को शुरू करने का आदेश दिया। यह समाजवादी सरकार के लिए करारा झटका था ।

6-इस भर्ती प्रकिया में दिनांक 25/०7/13 को उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ ने याचिका संख्या 1476/2०13 व 62 अन्य में आदेश दिया कि प्रारम्भिक लिखित परीक्षा में कुल5०% अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी सफल घोषित किये जाये और प्रत्येक विषय में न्यूनतम 4०% प्राप्त करने की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया जबकि यह मुद्दा याचिका संख्या 91 /2०13 द्बारा निस्तारित किया जा चुका था। दोनों ही याचिका पर सुनवाई माननीय न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ द्बारा ही की गयी।

7- याचिका संख्या 1476/2०13 के निर्णय के अनुपालन में 497०2 अभ्यार्थियों को भर्ती बोर्ड द्बारा सफल घोषित किया गया, इस आदेश के अनुपालन में भर्ती बोर्ड द्बारा उन अभ्यार्थियों को भी चयन किया गया जिन्होंने कुल 5०% अंक प्राप्त नही किये।
8- प्रारम्भिक लिखित परीक्षा में घोषित (सफल)497०2 अभ्यार्थियों के सापेक्ष 46578 अभ्यार्थियों के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा हेतु बुलावा पत्र भेजा गया। 2524 अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण होते हुए भी बुलावा नही भेजा गया जिससे वे अपने रोजगार के अधिकार से वंचित हो गये।

9- याचिका संख्या 57576/2०13 के अनुपालन में शारीरिक दक्षता परीक्षा 1० किमी० की बाध्यता के साथ दिनांक ०4/०8/2०14 को शुरू हुई और 3/०9/2०14 समाप्त हुई जबकि उपनिरीक्षक भर्ती नियमावली के अनुसार शारीरिक दक्षता परीक्षा अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में पूरी की जानी थी।

1०- शारीरिक दक्षता परीक्षा में आईएसआई प्रमाणित उपकरण का प्रयोग नहीं किया गया जबकि उपनिरीक्षक भर्ती नियमावली 2००8 के अनुसार उपकरण केवल आईएसआई प्रमाणित ही प्रयोग किये जाने थे, इस संबंध में माननीय उच्च न्यायालय में याचिका संख्या 613/2०15 व अन्य 47 याचिकाएं लंबित है और भर्ती बोर्ड बारबार इस मुद्दे पर न्यायालय को उचित जबाव नहीं दे पा रहा है।

11- शारीरिक दक्षता परीक्षा में 15777 अभ्यर्थी सफल घोषित किये गये जिनकी मुख्य लिखित परीक्षा 14 सितम्बर 2०14 को संपन्न हुई
12- मुख्य लिखित परीक्षा में 14256 अभ्यार्थी सफल घोषित किये गये।
13-भर्ती प्रकिया के अगले चरण समूह परिसंवाद के लिये विज्ञप्ति के अनुसार 4०1० रिक्तियों के सापेक्ष तीन गुना अभ्यार्थियों को अर्थात 12०3० अभ्यार्थियों को बुलाया जाना था परन्तु भर्ती बोर्ड द्बारा सभी सफल अभ्यार्थियों अर्थात 14256 अभ्यार्थियों को बुलाया गया।

14- शारीरिक दक्षता परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षामें जमकर नकल व व्हाइटनर का प्रयोग किया गया जिसके विरूद्ध याचिका संख्या 67782/2०14 व 2० अन्य माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दायर की गयी परन्तु इस याचिका पर निर्णय होने के पूर्व ही दिनांक 16/०3/2०15 को परीक्षा परिणाम घोषित कर दिया गया।

15- याचिका संख्या 67782/2०14 व 2० अन्य में न्यायधीश महोदय ने दिनांक 29/०5/2०15 को आदेश दिया कि व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग करने वाले अभ्यार्थी नियमावली अनुसार अयोग्य घोषित किये जाते है।

 16- याचिका संख्य 67782/2०14 व 2०अन्य के आदेश के अनुपालन में भर्ती बोर्ड ने संसोधित परीक्षा परिणाम घोषित किया परन्तु इस याचिका में भर्ती बोर्ड द्बारा माननीय उच्च न्यायालय को बताया कि 3०38 अभ्यार्थियों ने व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग किया परन्तु संशोधित परीक्षा परिणाम में ऐसे अभ्यार्थियों का भी चयन किया गया जिन्होंने माननीय उच्च न्यायालय में स्वीकार किया था कि हमने व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग किया है और हमारा अभ्यर्थन निरस्त न किया जाये। भर्ती बोर्ड द्बारा माननीय उच्च न्यायलय के सम्मुख बतायी गयी संख्या 3०38 के सापेक्ष 288० अभ्यार्थियों को ही सूची प्रस्तुत की।
उपरोक्त कारणों के अलावा भी अनेक कारण है जो सरकार की लीपापोती को उजागर करते हैं।

छात्रों का आरोप है कि समाजवादी सरकार ने दौड़ से ही प्रतियोगियों के साथ सौतेला व्यवहार शुरू कर दिया था। छात्रों को अलग-अलग स्थानों पर दौड़ के लिए बुलाया जाता था किन्तु दौड़ के लिए नियमानुकूल कोई इंतजाम नहीं किया जाता था । मसलन यदि शाम 5 बजे दौड़ के लिए बुलाया गया है तो अंधेरा होने तक इंतजाम करने का हवाला देकर प्रतिभागियों को इंतजार कराया जाता था और अंधेरे में प्रकाश तक की कोई व्यवस्था नहीं रहती थी । कई बार दौड़ समाप्त होने के बाद दौड़ को रद्द कर छात्रों को पुन: दौड़ के लिए बुलाया जाता था। भर्ती बोर्ड ने दौड़ के लिए किसी छात्र को गर्मी में तो किसी को बरसात में ही दौड़ा दिया । दौड़ में अपने मनचहों को पास करने हेतु भर्ती बोर्ड ने मनमानी करने हुए दौड़ चेस्ट नम्बर जो इलेक्टो मैग्नेटिक चिप था तथा जिससे दौड़ की गणना होनी थी में ही व्यापक धांधली की , जिन्हें पास करना था उन्हें कुछ इस प्रकार का चीप दिया गया जो 6 किलोमीटर में ही दौड़ की 1० किमी की रीडिग कर देता था बाकि को मार्का का चीप दिया गया ।
फिर भी कुछ होनहार सफल हुए। वास्तव में सफेदा के प्रयोग को लेकर जो मुकदमा किया गया उसने भर्ती बोर्ड ने उन छात्रों की बलि चढ़ाने का प्रयास किया जो किसी कारणवश अनुक्रमांक आदि सही करने हेतु सफेदा का प्रयोग किये थे। उन छात्रों का बायोडाटा छिपा लिया गया जिनको भर्ती बोर्ड द्बारा खुद सफेदा लगाकर पास कराया गया था ।
छात्रों का कहना है कि यह समाजवादी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था की पूरी भर्ती का यादवीकरण किया जाय। जिसमे हर स्तर पर मनमानी की है यही कारण है की परीक्षा के प्रत्येक चरण पर छात्रों को माननीय उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में बारबार जाना पड़ा । दिलचस्प यह है की सुप्रीम कोर्ट में भर्ती बोर्ड ने जिस समायोजन की बात कही थी उनमे कुछ चुनिदा छात्रों को ही बुलावा पत्र आया बाकि छात्र कई बार भर्ती बोर्ड का घेराव कर चुके हैं तथा शासन की लाठियों का सामना कर चुके हैं ।
अभी भी दौड़ की अनियमितता, मुख्य परीक्षा में धांधली, आरक्षण नियमावली का उल्लंघन को लेकर कई याचिकाएं लम्बित हैं। अब देखना है आगे क्या होता है।

सोमवार, 1 अगस्त 2016

केजरीवाल टांय टांय फिस्स


...मुझे चाहिए स्वराज की सफेद टोपी लगाकर अगर आप दिल्ली में बीच सड़क पर ही लघुशंका करते हैं तो पुलिस रोकेगी ही, फिर? केजरीवाल यह आरोप लगा सकते हैं कि मोदी जी स्वच्छता अभियान हमारे कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए चला रहे हैं। यह मजेदार टिप्पणी करते हैं आशुतोष तिवारी जो पेश्ो से इंजिनियर हैं। एक समय वह अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे और किरण बेदी में भगत सिंह का अक्श देखकर रातभर रामलीला मैदान में लोकपाल-लोकपाल की पश्चिमी धुन पर थिरकते रहते थ्ो। मालवीय नगर निवासी कुलदीप कहते हैं- उस दौरान हमसबके उपर भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने और पारदर्शी शासन व्यवस्था बनवाने का जूनून था लेकिन केजरीवाल ने देशभक्ति का वह आंदोलन अपने राजनैतिक महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ा दिया। ऐसे एक नहीं अब हजारों की तादात में वालंटियर आपको मिलेगें जो निराश हैं, और उन्होंनें देश को नियति के भरोसे मान लिया है।
बेशक, उस दौरान कांग्रेस की कड़ाही में लगातार उबलते भ्रष्टचार ने केजरीवाल, अन्ना और किरण बेदी को जनता के बीच क्रांतिकारी, जननायक, उद्धारक आदि की छवि गढè दी थी। यह कोई साधारण दौर नहीं था, इस आंदोलन का संबंध भी मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार तक सिमित नहीं था। जनलोकपाल के इस सुरुर में पूरी भारतीय राजनैतिक व्यवस्था, संविधान और लोकतंत्र को निशाने पर लेने की कोशिश थी। उस समय 2०11 का वैश्विक परिदृश्य देखें तो बात काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी। आपको याद होगा तहरीर चौक और आरेंज क्रांति, ब्लू क्रांति और इंद्रधनुषी क्रांति। इन दर्जन भर क्रांतियों का सुनहला ख्वाब दिखाकर अफ्रीका के कई देशों में लिबरल कम्युनिज्म की वापसी पिछले चोर दरवाज्ो से करने की पुरजोर कोशिश हो रही थी। लोकतंत्र की प्यास से तड़पता आम आदमी सड़कों पर उतरा था, कहीं सफलता मिली तो कहीं विफल भी होना पड़ा था। यही वह दौर था, जब भारत म्ों अन्ना आंदोलन भी अपने चरम पर था। लेकिन उसका हस्र क्या हुआ? आंदोलन सियासी महात्वाकांक्षा के आगे बलि का बकरा बना दिया गया। जो बनना ही था। कारण? जब अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि मै अराजकतावादी हूं तो वह उसी अल्टàा लेफ्ट या लिबरल लेफ्ट की तरफ ईशारा करते हैं। अराजकतावाद के बारे में राजनैतिक विचारक कहते हैं कि यह वामपंथ के अंदर का वामपंथ है। जिसका लक्ष्य था सत्ता हासिल करना, जबकि आंदोलन तो उसकी सीढ़ी थी।
बहरहाल, अब देश की राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल सत्त्ता में हैं। तमाम वायदो, इरादों और सपनों की मखमली कार्पेट पर चलकर वह सत्ता के सिंहासन पर आरुढè हुए हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली की जनता केजरीवाल के वायदों, ईरादों को भूलकर समझौतावादी हो चुकी है और अब उसे कठोर धरातल का अहसास भी होने लगा है। जो युवा कल तक मै आम आदमी हूं की टोपी पहने मेटàो में बड़े शान से चला करता था अब वही केजरीवाल के रोज नए-नए होने वाले पैतरेंबाजी का मजा लेने लगा है। वोडाफोन कंपनी में काम करने वाली रुचिका बाधवा कहती हैं कि अब हम जान गए हैं कि केजरीवाल का फ्री वाईफाई नहीं मिलने वाला तो हम भी रोज-रोज केंद्र सरकार पर दोषारोपण का मजा लेने लगे हैं। अब वास्तव में केजरीवाल सरकार के कामकाज की बातें नहीं होतीं। अब बात होती है तो उनके रोजाना मोदी सरकार पर दोषारोपण का मजा लिया जाता है।
विकास के वायदे अब केजरीवाल तक ही सीमित होकर रह गए हैं। उनको खुद अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार पर सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे ज्यादा अचंभे की बात और क्या हो सकती है कि जिन बातों पर हल्ला बोलकर केजरीवाल ने सत्ता कब्जाने का माहौल बनाया था वे सारी बातें आज उनके कामकाज के तरीकों से गायब हैं। एक लाइन में कहें तो मार्केटिंग की चमत्कारी विधियों से केजरीवाल ने अपना जो ब्रांड बनाया था उसके विस्तार के लिए वे अपनी नई शाखा पंजाब में खोलने का प्लान बना रहे हैं।
केजरीवाल को सत्ता विस्तार के लिए क्या दांव पर लगाना पड़ सकता है? दिल्ली में विकास की पर्याय बन चुकीं शीला दीक्षित को उखाड़ना आसान नहीं था। अन्ना के आंदोलन के जरिए केंद्र की यूपीए को उखाड़ने के लिए जो आंदोलन चलाया गया था उसने यूपीए को येनकेन सत्ता से बेदखल तो कर दिया लेकिन केजरीवाल भी बेपर्दा होते जा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल इस सबके बीच बड़ी चालाकी से और अपने सभी विश्वसनीय साथियों को दगा देकर, केवल अपनी निजी हैसियत बनाकर, दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने में सफल हो ही गए। सारी दिल्ली ठगी गयी। वरिष्ठ पत्रकार अनुराग श्रीवास्तव कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं हैं दिल्ली शुरु से ही अभिश’ है बारबार उजड़ने और बसने को।
दिल्ली को दांव पर लगाकर पंजाब जाने की जुगत में केजरीवाल को सबसे बड़ी दिक्कत आ रही है कि वह पंजाब में अपने काम का हिसाब क्या दें? वे लगातार दिल्ली के अखबारों में भारी विज्ञापन करवाने में लगे रहे कि पुल और सड़कों के काम सस्ते में करवा कर उन्होंने सरकारी खजाने का कितना पैसा बचवा दिया। लेकिन उनकी पोल तब खुली जब छह माह के अंदर ही निर्मित ओवर ब्रीज में दरारें देखी गई और सफाई कर्मियों ने वेतन न मिलने के कारण हड़ताल कर दिया। दिल्ली में ऑड-ईवन की कवायद के बावजूद बढ़ते प्रदूषण ने सरकार की पोल खोल दी। मीडिया मैनेजमेंट और मार्केटिंग से तब तक कुछ हासिल नहीं किया जा सकता जबतक धरातल पर आप नफा-नुकसान का हिसाब न दे दें। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इसलिए पंजाब में साम्राज्य विस्तार सिर्फ टेस्ट म्ौच खेलने जैसा साबित होगा। यही वजह है कि पंजाब में नशे का शोर मचाकर चुनाव में नया मुद्दा पेश करने की कोशिश में वह हाथ पांव मार रहे हैं। अंदरखाने से जो खबरें मिल रही है उसके मुताबिक केजरीवाल अगर जीत गए तो एलानिया तरीके से दिल्ली को अपने किसी विश्वसनीय दोस्त को सौंपकर पंजाब जाने का फैसला कर सकते हैं। सवाल उठता है कि उन्हें इतनी जल्दी पैर पसारने की जरूरत क्यों पड़ रही है? दिल्ली में जो शहीदी आभामंडल उन्होंने तैयार किया था वह अब क्षीण हो चुका है, केजरीवाल के सामने पलायन का रास्ता यही हैं कि एक तरफ तो वह अपनी नाकामियों के लिए मोदी-मोदी करते रहें दूसरी ओर दिल्ली की सल्तनत छोड़ कहीं दूर निकल जाएं। जो अब मुमकीन नहीं।
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नौटंकी के भी कुछ नियम हैं-
केजरीवाल का दावा था कि वे 48 घंटे में शासन को जनता की शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बना देंगे। जबकि हालत यह है कि वे शिकायतियों की भीड़ को संभालने की भी व्यवस्था नहीं बना पाए। अब सबकुछ पुराने ढर्रे पर है। केजरीवाल ने राजकाज का अर्थ यह समझा है कि अपनी हर नाकामी का तोहमत केंद्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मढè दिया जाए। इसलिए कभी वह दिल्ली पुलिस को अपने अधीन लाए जाने की मांग करते हैं तो कभी पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात करते हैं। उनके विधायक अयोग्यता अथवा आपराधिक मामलों को लेकर न्यायपालिका से दुत्कारे जाते है तो वह इसके लिए मोदी पर हमलावार हो जाते हैं। उपराज्यपाल नजीब जंग से उनकी कब्बडडी मोदी-मोदी करते हुए चलती ही रहती है। हाल में उन्होंने जनमत संग्रह का नया राग अलापा है। ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह ने सीएम केजरीवाल के सियासी अरमान जगा दिए हैं और उन्होंने ट्वीट करके कहा, यूके रेफरेंडम के बाद जल्द ही दिल्ली में भी पूर्ण राज्य को लेकर जनमत संग्रह किया जाएगा। लेकिन इसमें पेंच हैं यदि केजरीवाल की बात मानकर जनमत संग्रह होता है तो कल को यह मांग दूसरे राज्य भी अपने-अपने सियासी नफा-नुकसान से उठा सकते हैं। गौरतलब है कि कश्मीर घाटी में भी जनमत संग्रह की मांग काफी अरसे से उठती रही है। यदि दिल्ली में जनमत संग्रह हो सकता है तो कश्मीर और नागालैंड में क्यों नहीं?
केजरीवाल के इस बयान को लेकर भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी उनपर कानून नहीं मानने का आरोप लगा रही है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू कहते हैं कि लगता है केजरीवाल को ब्रिटेन का नशा चढ़ गया है। रिजिजू ने कहा कि केजरीवाल संविधान से बाहर गए तो केंद्र को दखल देना पड़ेगा। इसलिए उन्हें चाहिए कि संविधान के दायरे में काम करें।

श्रम और ठेका कानूनों पर मुकर गई सरकार -
दिल्ली के असंगठित मजदूर सरकार पर वायदा पूरा करने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। जो केजरीवाल ने विधान सभा चुनाव के दौरान किए थ्ो। श्रममन्त्री गिरीश सोनी ने ठेका मजदूरी उन्मूलन कानून लाने से साफ इंकार कर दिया और मजदूरों के प्रतिनिधियों से कहा कि उन्हें ठेकेदारों-मालिकों के हितों को भी देखना है। इसीतरह डीटीसी ठेका कर्मचारियों के बीच भाषण देने आए केजरीवाल को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। हजारों ठेका शिक्षकों ने कई दिनों तक सचिवालय को घेरे रखा और अन्त में केजरीवाल सरकार ने जबरन उन्हें सचिवालय से हटाया। केजरीवाल सरकार ने न्यूनतम मजदूरी व अन्य श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए श्रम विभाग में भ्रष्टाचार खत्म कर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के वायदे पर अमल के लिए 49 दिनों में एक कदम भी नहीं उठाया।

मुफ्त पानी बिजली
कच्ची व झुग्गी बस्तियों में चुनावों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पानी-टैंकर माफिया से मुक्ति मिलेगी और हर घर को 7०० लीटर मुफ्त पानी दिया जायेगा। हकीकत में मध्यवर्ग तक को ही 667 लीटर मुफ्त पानी दिया गया क्योंकि यह सिर्फ मीटर्ड कनेक्शन वालों को मिल पाया। बिजली के बिल को आधा करने का वायदा भी खटाई में पड़ गया। बिल पर पहले से 25 फीसदी सब्सिडी मिल रही थी। केजरीवाल सरकार ने 25 फीसदी सब्सिडी देकर दावा किया कि उसने पूरी 5० फीसदी सब्सिडी दे दी है। सरकार ने 5० फीसदी सब्सिडी को जारी रखने के लिए यह शर्त भी लगा दी कि बिजली कम्पनियों के ऑडिट पूरे होने के बाद इस सब्सिडी को जारी रखने या न रखने पर फैसला लिया जायेगा।
शीला दीक्षित के खिलाफ भ्रष्टाचार का हौवा खड़ा करने वाले केजरीवाल ने आज तक कोई प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की है। चुनाव से पहले केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ 37० पेज की रपट तैयार की थी लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही वह रपट ठंढे बस्ते में चली गई।

मंत्रियों की कारगुजारी
राखी बिड़लान-
केजरीवाल सरकार के मंत्री भी एक से बढकर एक निकले। जैसे कि राखी बिड़लान जिसने एक बच्चे की क्रिकेट बाल उनकी कार पर लग जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज करा दी कि उस पर जानलेवा हमला किया गया।
सोमनाथ भारती- निर्दोष महिलाओं पर वेश्यावृत्ति व ड्रग्स का आरोप लगाकर उन्हें सरेआम अपमानित किया और नस्लभेदी टिप्पणी की। इतना ही नहीं फर्जी डिग्री सहित पत्नी के साथ मारपीट के मामले में कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते रहे।
मनीष सिसोदिया- दिल्ली के कॉलेजों में दिल्ली के स्कूलों से बारहवीं करने वालों के लिए आरक्षण देने को कहा। बाद में अपने बयान से पलट गए। अरविंद केजरीवाल के बाद नंबर दो कहे जा रहे सिसोदिया के तमाम झूठ पकड़े गये जैसे कि उन्हें जबरन सरकारी बंगला दिया गया जबकि मुख्यमन्त्री बनने के अगले ही दिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर खुद ही बंगलों की माँग की थी।

लाभ के पद
कोर्ट की फटकार पर 24 विधायकों को लेकर केजरीवाल अजीब असमंजस में फंसे हैं। न उगलते बनता है न निगलते ही। आनन फानन में अपने उन विधायकों को कानून की जद से बाहर लाने के लिए उन्होंने कानून भी बना दिया लेकिन जब राष्ट्रपति ने दस्तखत से इंकार कर दिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हो गए।
हालिया मामला
अभी जब आआपा के एक विधायक को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर देश में आपातकाल लागू करने का आरोप मढ दिए। जबकि हकीकत में उस विधायक के खिलाफ उसके ही विधानसभा क्ष्ोत्र के एक बुजुर्ग मतदाता ने मारपीट करने का आरोप लगा कर एफआईआर दर्ज कराई थी।
 -पी. मार्कण्डेय

गले और मुंह का कैंसर: गुटका और पान मसालों पर प्रतिबंध कितना प्रभावी


-प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी आ रहे सामने
-स्मोकिंग फैशन आईकान बनने से मुंह के रोगियों की सख्यां अधिक
-मुंह और गले के कैंसर रोगी दुनियां में सबसे अधिक भारत में
 देशभर में प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी सामने आ रहे है, और जिनमें से 5० प्रतिशत की मौत बीमारी की पहचान के अंतराल में ही हो जाती है। इसमें युवा अवस्था में होने वाली मौतों का कारण भी मुंह व गले का कैंसर मुख्य है। हालांकि पूरी दुनिया में विश्व गला व सिर कैंसर दिवस मनाए जाने और जागरुकता के तमाम कवायद के बाद भी कैंसर की महामारी रुकने का नाम नहीं ले रही है। पिछले 16 सालों में मुख और गले के कैंसर रोगियों की संख्या पुरुषों और महिलाओं में तीव्र गति से बढ़ती जा रही है। इसका खुलासा एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन में जारी रिपोर्ट में हुआ है।
वायसॅ ऑफ टोबेको विक्टिमस और गुड़गांव के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ वेदांत काबरा कहते हैं कि देशभर में लाखों लोगों में देरी से इस बीमारी की पहचान, अपर्याप्त इलाज व अनुपयुक्त पुनर्वास सहित सुविधाओं का भारी अभाव है। करीब 3० साल पहले तक 6० से 7० साल की उम्र में मुंह और गले का कैंसर होता था लेकिन अब यह उम्र कम होकर 3० से 5० साल तक पहुंच गई। वही आजकल 2० से 25 वर्ष के कम उम्र के युवाओं में मुंह व गले का कैंसर देखा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी सभ्यता का पश्चिमीकरण साथ ही युवाअेां में स्मोकिग को फैशन व स्टाइल आइकान मानना है। मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में है।
भारत में पूरे विश्व की तुलाना में धूम्ररहित चबाने वाले तंबाकू उत्पाद (जर्दा,गुटखा,खैनी,) का सेवन सबसे अधिक होता है। यह सस्ता और आसानी से मिलने वाला नशा है। पिछले दो दशकों में इसका प्रयोग अत्यधिक रुप से बढ़ा है, जिस कारण भी हैड नेक कैंसर के रोगी बढ़े है। डा.काबरा बतातें है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिर्सच द्बारा वर्ष 2००8 में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक भारत में हैड नेक कैंसर के मामलों में वृद्बि देखी जा रही है। कैंसर में इन मामलों में नब्बे फीसदी तम्बाकू, मदिरा व सुपारी के सेवन से होतें है और इस प्रकार के कैंसर की रोकथाम की जा सकती है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान (आईसीएमआर) की रिपोर्ट मंे भी इस बात का खुलासा किया गया है कि पुरुषों में 5० फीसदी और महिलाओं में 25 फीसदी कैंसर की वजह तम्बाकू है। इनमें से 6० फीसदी मुंह के कैंसर हैं। धुआं रहित तम्बाकू में 3००० से अधिक रासायनिक यौगिक हैं, इनमें से 29 रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं।
उन्होने कहा कि हैड नेक कैंसर के मामले राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं, वंचित लोगों, परिवारों व समुदायों पर भार बढ़ा रहे हैं। भाग्यवश हैड नेक कैंसर से जुडे अधिकांश, मामलों में यदि बीमारी का पता पहले लग जाये तो इसे रोका जा सकता है और ईलाज भी किया जा सकता है। लेकिन लाखों लाखों लोग रोग की देरी से पहचान, अपर्याप्त ईलाज व अनुपयुक्त पुनवर्वास सुविधाओं के शिकार हो जाते है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्राचार्य और सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी जो इस अभियान की अगुवाई वैश्विक स्तर पर कर रहे है। वह बताते हैं कि हैड नेक कैंसर के नियंत्रण के लिये सरकारों, एनजीओ, चिकित्सा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षा व उद्योग संस्थानों सहित बहु क्षेत्रिय सहयोग की आवश्यकता है। हैड नेक कैंसर पर प्रभावी नियंत्रण और ईलाज की और वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिये अंतरर्राटàीय फेडरेशन ऑफ हेड एण्ड नेक ऑनोलोजिक सोसाईटिज आईएफएचएनओएस ने जुलाई 27 को विश्व सिर, गला कैंसर दिवस -डब्ल्यु एचएनसीडी- के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव रखा है। फेडरेशन को इसके लिये अनेक सरकारी संस्थानों, एनजीओ, 55 से अधिक सिर व गला कैंसर संस्थानों व 51 देशों का समर्थन प्राप्त है।
डा.पंकज चतुर्वेदी बतातें है कि एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन 2००8 व 2०16 में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार 2००1 में पुरुषों में मंुंह का कैंसर के 42725 मामले वहीं 2०16 में 652०5 मामले, महिलाअेां में 22०8० व 35०88, गले और श्वास नली के कैंसर के मामले 49331, 759०1, महिलाअेां में 9251, 1455०, भोजन नली 24936 व 38536 महिलाओं में 17511व 28165, अमाशय में 2०537 व 31538, महिलाओं में 11162 व 17699, फैंफड़े 39262 व 6०73०, महिलाओं में 9525 व 15191, स्तन कैंसर महिलाओं में 89914 व 14०975, गर्भाश्य महिलाओं में 79827 व 125821 तथा अन्य तरह के 214967 व 31584० तथा महिलाअेां में 166629 व 25241० रोगी पाए गए।
देश में अनेक परेशानियों के बावजूद, हालांकि गुटखे पर, जो की एक धुंआ रहित औद्योगिक उत्पाद है, पर लगभग पूरे भारत पर प्रतिबंध लग गया है। गुटखे के अलावा, 13 राज्यों ने अब उत्पादित सुगंधयुक्त चबाने वाले तम्बाकु को भी निषेध कर दिया है। तम्बाकु पीडिèतों की आवाज नामक तम्बाकू पीडिèतों के स्वयं के द्बारा चलाये गये निरंतर आंदोलन के परिणामस्वरूप यह प्रतिबंध प्रभाव में आया। इस आंदोलन से देश के नामी कैंसर विशेषज्ञ भी जुड़ गये।
वर्ष 2०14 में जॉन हॉपकिस यूनिर्वसिटी ब्लूूमबर्ज स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुटखा प्रतिबंध के प्रभावों पर एक अध्ययन करवाया। अध्ययन के दौरान देश के सात राज्यों असम, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट, उड़ीसा और दिल्ली में 1,००1 वर्तमान व पूर्व गुटखा उपभोक्ताओं और 458 खुदरा तम्बाकु उत्पाद विक्रेताओं पर सर्वे किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि 9० फीसदी रिस्पोडेंन्ट्स ने इच्छा जताई कि सरकार को धुंआ रहित तम्बाकु के सभी प्रकार के उत्पादों की बिक्री और डिस्टिब्यूशन पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। इस पर 92 फीसदी लोगों ने प्रतिबंध का समर्थन किया। 99 फीसदी लोगों ने कहा कि भारतीय युवाओं के स्वाथ्य के लिये प्रतिबंध अच्छा है। जो लोग प्रतिबंध के बावजूद गैरकानूनी ढंग से पैकेज्ड तम्बाकु का सेवन करते है उनमें से आधे लोगों ने कहा कि प्रतिबंध के बाद उनके गुटखा सेवन में कमी आई है। 8० फीसदी लोगो ने विश्वास जताया कि प्रतिबंध ने उन्हें गुटखा छोडने के लिये प्रेरित किया है और इनमें से आधे लोगों ने कहा उन्होंने वास्तव में छोड़ने की कोशिश भी की है। इंडेक्स ऑफ इंडिस्टरियल प्रोडक्शन आईआईपी के आंकडो पर गौर करे तो सिगरेट, बीड़ी व चबाने वाले तम्बाकू उत्पादों को उत्पाद मार्च 2०15 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 12.1 फीसदी गिर गया।
चबाने वाले तम्बाकु उत्पाद पर प्रतिबंध के प्रभाव यूरोमोनिटर इंटरनेशनल की रिपोर्ट दर्शाती है जिसके मुताबिक धंुआरहित तम्बाकु उत्पाद में निम्न गिरावट देखी गई है - वर्ष 2०11: 2 प्रतिशत 2०12: 26 प्रतिशत 2०13 य 8०: प्रतिशत पूर्वानुमान के मुताबिक यह दर 2०14 मे 4० फीसदी तक और 2०15 में करीब 35 प्रतिशत तक गिर गई। 2०16 तक 3० व 2०18 में 25 फीसदी तक गिर जायेगी।
-मार्कण्डेय पाण्डेय

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

मदर टेरेसा का असली चमत्कार क्या था


मार्कण्डेय पाण्डेय
गरीबों की सेवा में पूरा जीवन समर्पित करने वाली नोबेल शांति पुरस्कार प्रा’ ईसाई प्रचारिका एग्नेस उर्फ टेरेसा को अब रोमन कैथोलिक चर्च के संत की उपाधि से नवाजा जाएगा। वेटिकन के पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार को मान्यता दी है। क्या था चमत्कार ? उन्होंने ब्रेन टयूमर से पीड़ित ब्राजील के एक युवक को ठीक कर दिया था। एक समय टेरेसा से पत्रकारों ने पूछा था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है, ऐसा बाईबिल में लिखा है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, आप क्या मानती हैं? टेरेसा ने कहा जो बाईबिल में कहा गया है वह ठीक है। गत दो साल पहले ईसाई समुदाय ने इलाहाबाद में चंगाई महोत्सव किया। गांव-देहात के गरीब, अनपढè और अभावग्रस्त लोंगो को लाया गया। भूत-प्रेत की झाड़-फंू क कनाडा से आये एक अंग्रेज पादरी मिस्टर यंग्रीन ने शुरु किया। ये यूरोप के वे लोग हैं जो खुद को आधुनिक विज्ञान की विरासत का एकमेव वारिस होने का दावा करते हैं। खैर, कुछ साल पूर्व क्रिस्टोफर हिचेंस ने फिल्म बनाई नर्क का फरिश्ता तो देश के सेकुलरों को सांप सूंघ गया। कारण कि क्रिस्टोफर ने मदर टेरेसा के ऐसे ही तथाकथित सेवा और चमत्कारों की पोल खोल दी। नार्थ-ईस्ट के आदिवासी गरीब जो ईसाई बने। उनके लिये आरक्षण की मांग करते हुए वह नई दिल्ली में धरने पर बैठ गई। जब सवाल किया गया कि यदि हिंदू धर्म में छूआछूत है जिसके कारण आरक्षण दिया जाता है तो आपके धरने पर बैठने से यह स्वत:सिद्ध नहीं होता कि ईसाई मत में भी भ्ोदभाव है?
क्रिस्टोफर हिचेंस अपनी फिल्म में साफ कहते हैं कि अखबारों का बेहतरीन उपयोग करके टेरेसा को करुणा की देवी जैसी छवि बनाई गई है। आस्ट्रàेलिया की विख्यात लेखिका ग्राहम ग्रीन ने कहा कि वे करुणा की कारोबारी हैं। हिच्ोंस की फिल्म में टेरेसा के मरणासन्न रोगियों के केंद्र की हालत को दिखाया गया है। इस फिल्म में मैरी लुडन कहती हैं-हे भगवान यह क्या? एक कमरे में 5० से 6० रोगी कोई कुर्सी तक नहीं, नाही पर्या’ आक्सीजन या ग्लूकोज के बोतल, कैंसर जैसे भयंकर रोग में एसप्रीन या ब्रूफेन दिया जा रहा है। फिल्म में मदर टेरेसा बोलती है कि बहुत पहले से मैने गरीबों की सेवा करने का निश्चय किया था। जो धनी लोग अपने पैसे से प्रा’ करते हैं, उसे मै ईश्वर के प्रति प्रेम से गरीबों को देती हूं। कोलकाता से आगे नार्थ-ईस्ट के राज्य जनजातियों वाले हैं। गरीबी, असहायता, अभाव ने आज भी उनका साथ नहीं छोड़ा है। ऐसे में सेवा का के्रद्र वहां न बनाया जाता तो कहां बनता? आज भी नार्थ-ईस्ट सिसक रहा है, अरुणांचल में चीन घुस आता है, अलगाववादी अपने पैर पसार रहे हैं। क्यों ? क्यों कि देश से जोड़ने वाली जो धारा थी उसको चमत्कार करके सूखा दिया गया।