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बुधवार, 7 सितंबर 2011

7:18 am

रामलीला मैदान ने दुहराया इतिहास

रामलीला मैदान एक बार फिर ऐतिहासिक घटनाक्रमों का गवाह बना । बारह दिनों तक गाँधीवादी अन्ना के अनशन के कारण पूरे देश कि निगाहें रामलीला मैदान कि तरफ लगी रही । एक तरफ सारा देश अन्ना के साथ तिरंगा लहरा रहा था वही वही देश कि सियासत का तापमान रोज चढ़ता जा रहा था । आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा और इस जुबानी जंग में किसी ने अन्ना को ही भ्रष्ट साबित करने कि बचकानी हरकत कि तो किसी ने अन्ना के आन्दोलन को संसदीय प्रजातंत्र के लिए ही खतरनाक बताया । तो क्या अन्ना और देशवासियों कि मांगे वास्तव में संसदीय व्यवस्था के खिलाफ हैं ? इस विषय में अन्ना स्पस्ट कर चुके है कि वह सत्ता या सरकार के खिलाफ नही बल्कि भ्रष्टाचार और भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ हैं । फिर भी यदि यह मान भी ले तो क्या देश कि जनता से बड़ी है देश कि संसद ? जिस पाश्चात्य राजनितिक चिंतन कि उपज है देश कि संसदीय व्यवस्था वह शुरू ही होती है प्राकृतिक समाज से नागरिक समाज कि तरफ। हाब्ब्स, लाक, रूसो का नागरिक समाज एक अनुबंध से आरम्भ होता है जिसमे समाज अपने समस्त अधिकार संप्रभु को सोप देता है इस आधार पर कि प्राकृतिक अवस्था में जो आराजकता का शासन था वह समाप्त होगा सब कुछ लेवियाथन के हाथों में देने का एकमात्र उद्देश्य था आराजकता का अंत लेकिन आज का लेवियाथन काफी मजबूत हो चुका है जो पूरी व्यवस्था को ही लील जाना चाहता है।
जनतंत्र जनता के लिए जनता से जनता द्वारा है फिर क्या कारण है यदि देश कि जनता तय कर ले कि हम इस शासन प्रणाली को बदलना चाहते हैं तो वह बदला नही जा सकता ? क्या संसद देश से बड़ा है ? क्या संसद देश कि जनता से बड़ी है ? संविधान है किसके लिए ? संबिधान को बनाया किसने ?भारत का संबिधान शुरू ही होता है हम भारत के लोग से जिसका अर्थ है कि हम भारत के लोंगो द्वारा यह संबिधान निर्मित और आत्मार्पित व स्वीकृत है ।
रही दूसरी बात क्या जन लोकपाल से रातो रात देश कि भ्रष्ट नौकरशाही और भ्रष्ट नेताओं का ह्रदय परिवर्तन हो जायेगा ? क्या सारे देश के भ्रस्ताचार में यही लोग व्याप्त है तो फिर हर्षद मेहता, निरा रादिया , हसन अली जैसे लोग किस श्रेणी में आयेंगे ?क्या जन लोकपाल भर्स्ट नही होगा ? क्या हर बात में जरुरी है देशवासियों को कानून का हथियार दिखाना ? वसत में यह लडाई ना तो अन्ना कि है नही किसी अन्ना टीम कि बल्कि यह पिछले ६२ वर्षो से उत्पन्न उस कुशासन कि प्रतिक्रिया है जिसमे संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के बीज निहित हैं । यदि महात्मा गांधीजी के संपूर्ण आन्दोलन का अध्ययन करें तो यह ना केवल स्वराज्य प्राप्ति का आन्दोलन था बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों कि पुनर्स्थापना का भी आन्दोलन था । भ्रस्ताचार के खिलाफ देशवासियों का यह आन्दोलन उसी आकांछा का प्रकटीकरण था जिसके बिना भारत अपनी श्रेष्ठ नियति नही प्राप्त कर सकता । आजादी के बाद नेहरूवियन समाजवादी माडल के कारण देशवासी उस कोटा परमिट और बाबु राज कि तरफ बढ़ते गए जिसमे भारत कि नैतिकता सुचिता कि हत्या होती रही बहुसंख्यक ग्रामीण समाज हर मोड़ पर छला जाता रहा जल जंगल जमीन खतरे में है तो शहरी समाज फोन बिजली पानी के संकट से ही नही उबर पा रहा। यह आन्दोलन बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के द्वारा देशवासियों के उसी गुस्से का प्रकटीकरण है जो वह वर्षों से दबाये था । वास्तव में यह आन्दोलन भ्रसताचार से आगे संपूर्ण व्यवस्था कि परिवर्तन कि लडाई में तब्दील हो जा जय तो कोई आश्चर्य नही ।
_ मार्कन्डेय पाण्डेय