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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

7:02 am

रेल विभाग के दिग्गरजों की लडाई में आईबी भी कूदी


रेल विभाग के दो दिग्‍गजों की आपसी लडाई में देश की खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्‍यूरो भी कूद गई है। एक तरफ आल इंडिया आरपीएफ एसोसियेशन के अखिल भारतीय महासचिव यूएस झा हैं तो दूसरी तरफ आरपीएफ के महानिदेशक रंजीत सिन्‍हा। इन दोनों की खीचतान में आईबी ने आरपीएफ में मौजूद कर्मचारी यूनियन की संवैधानिकता पर सवाल खडे किये हैं और गृह मंत्री को चिट्ठी तक लिख डाली है। इतना ही नही, आईबी के इस पत्र में पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी के नाम का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख किया गया है। जिसमें आरोप है कि आल इंडिया आरपीएफ एशोसियेशन के महासचिव यूएस झा ममता बनर्जी के करीबी हैं और इसी कारण पद पर बने हुए हैं।
यह मामला रेल सुरक्षा बल की अखिल भारतीय यूनियन द्धारा रेल भवन से प्रकाशित रेल प्रहरी पत्रिका में छपे लेख को लेकर है। जिसमें आरपीएफ के महानिदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ आरोप प्रकाशित किये गये हैं। इस बारे में रेल सुरक्षा बल के अखिल भारतीय महासचिव और रेल प्रहरी पत्रिका के संपादक यूएस झा से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि हमने महानिदेशक के खिलाफ आरोप पत्र प्रकाशित किया है। इस बात से परेशान श्री सिन्‍हा ने आईबी में कार्यरत अपने किसी रिश्‍तेदार से यह पत्र केंद्रिय मंत्री चिदंबरम को लिखवाया है।
आईबी ने गृहमंत्री पी चिदंबरम को एक पत्र लिख कर आगाह किया था कि रेल सुरक्षा बल में मौजूद अखिल भारतीय रेल सुरक्षा बल एसोशियेशन देश के अन्‍य सुरक्षा बलों में अनुशासनहीनता पैदा कर रही है। पत्र में एसोसियेशन के कार्य को गैर संवैधानिक कहा गया है। पत्र में इसके महासचिoव पर यह आरोप भी लगाया गया कि श्री झा के पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी से मधुर संबंध है और इसी कारण वह पद पर काफी वर्षो से बने हुए हैं।
महासचिव यूएस झा ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 246 और 33 और 1966 के पुलिस रिफार्म रेगुलेशन एक्‍ट सुरक्षा बलों की उन यूनियन में मनाही करता है जो देश की सुरक्षा में हों या कानून व्‍यवस्‍था बनाने का कार्य करते हों।
लेकिन रेल सुरक्षा बल इनमें से किसी में भी नहीं आता। इसका कार्य सिर्फ रेल संपत्ति की सुरक्षा करना है। इस आधार पर आईबी की रिर्पोट पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त और गैरसंवैधानिक हैं। वह कहते हैं कि यह पत्र सिर्फ इस कारण लिखा गया है क्‍यों कि मैने रेल सुरक्षा बल में मौजूद कुछ भ्रष्‍ट अधिकारियों के खिलाफ अपनी पत्रिका में लिखा है।
उल्‍लेखनीय है कि आईबी द्धारा जारी पत्र के मजमून को एक पत्रिका ने अपनी साईट पर प्रकाशित भी कर दिया था जिसके बाद मामला और गरमा गया। रेल सुरक्षा बल के महानिदेशक पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप रेल भवन से प्रकाशित सुरक्षा बल की पत्रिका में लगाये गए हैं। रेल भवन से प्रकाशित पत्रिका अपने मार्च के अंक में लिखता है कि बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी रंजीत सिन्‍हा ने तत्‍कालीन बिहार के मुख्‍यमंत्री लालू यादव को चारा घोटाले में काफी मदद की।। इसके बाद उन्‍हें रेल मंत्री रहते समय लालू यादव ने रेल सुरक्षा बल का महानिदेशक बना कर पुरस्‍कृत किया।
रेल प्रहरी नाम की इस पत्रिका के संपादक अखिल भारतीय रेल सुरक्षा बल एसोशियेशन के महासचिव ही हैं जिनके उपर आईबी ने ममता बनर्जी के खास होने का आरोप लगाया है। पत्रिका लिखता है कि महानिदेशक रंजीत सिंहा अपने एक रिश्‍तेदार एमके सिन्‍हा को भी श्री लालू यादव से संबंधों के चलते महानिदेशक बनवा चुके हैं। इतना ही नहीं, रेल महानिदेशक रहते हुए उन्‍होंने अनेकों तबादले गलत तरीके से किये हैं और अपने चहेतों को उनके मनमाफिक पोस्टिंग करवाई है।
पत्रिका ने सिलसिलेवार स्‍थानांतरित अधिकारियों और कर्मियों का ब्‍यौरा दिया है, और आरोप लगाया महानिदेशक ने कई बार उच्‍च न्‍यायालय के आदेशों को भी नजरअंदाज किया तथा आरपीएफ नियम 1987 की धाराओं का भी उलंघन किया है। महासचिव यूएस झा ने आरोप लगाया कि रेल सुरक्षा बल में तबादला को उद्योग का दर्जा दिया जा चुका है। झा सवाल करते हैं कि जब देश में सेवानिवत लोग लोकसभा और राज्‍य सभा में चुने जा सकते हैं तो वह अपने संगठन का महासचिव क्‍यों नही हो सकते।
इस बारे में रेल सुरक्षा बल के महानिदेशक से संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन वह उपलब्‍ध नही हुए तथा कई अन्‍य रेल अधिकारियों ने टिप्‍पणी देने से इंकार कर दिया।
6:55 am

मुख्य मंत्री जी, बुनियादी सुविधाओं के बिना कैसे बनेगा उत्त म प्रदेश


उत्‍तर प्रदेश के विकास के बिना देश का विकास अधूरा है और प्रदेश अब तेजी से विकास के रास्‍ते पर चल पडा है। उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का मानना है कि देश का विकास तभी होगा जब प्रदेश का विकास होगा। किंतु सवाल यह है कि बुनियादी सुविधाओं को ठीक किये बगैर प्रशासनिक और राजनैतिक माहौल के बिना यह कैसे संभव है। ग्रामीण इलाकों में बिजली का दर्शन दो से तीन दिनों में एक बार होने लगा है वहीं छोटे शहरों में या जिला केंद्रों पर यह मात्र उपस्थिती दर्ज करा रही है। हमलावर विपक्ष अब यह कहने लगा है कि बिना बिजली कैसे चलेगा समाजवादी लैपटॉप वहीं सवाल यह भी है कि दिनों दिन गिर रहे शिक्षा के स्‍तर को सुधारे बगैर लैपटाप से छात्रों का क्‍या भला होगा।
प्राथमिक शिक्षा में जुगाडी और फर्जी शिक्षकों की भरमार है तो दूसरी तरफ हजारों ऐसे स्‍कूल भी हैं जो बुनियादों सुविधाओं का मुंह ताक रहे हैं। प्रदेश में पीपीपी मॉडल के आधार पर सडकों के निर्माण से लेकर विद्युत व्‍यवस्‍था को ठीक करने का कार्य किया जा रहा है। इस कार्य में पीपीपी मॉडल में प्राईवेट सेक्‍टर की कंपनियों को सामने लाने के लिये तभी माहौल बन पायेगा जब प्रदेश में राजनैतिक हस्‍तक्षेप कम हो और कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति ठीक हो। जबकि आंकडे कहते हैं कि सरकार के सौ दिन के कार्यकाल में सौ से अधिक आपराधिक घटनायें हो चुकी हैं।
वहीं मुख्‍यमंत्री के उपर यह भी आरोप लगने लगे हैं कि मुख्‍यमंत्री कोई फैसला मुककम्‍मल आधार पर नही ले पाते। अधिकारियों के स्‍थानांतरण को चौबीस घंटे में वापस लेने का मामला रहा हो या विधायकों को कार खरीदने का फैसला या फिर दुकानों को बिजली बचत हेतु बंद किये जाने का प्रदेश सरकार का निर्णय ये सभी चौबीस घंटे में वापस लेने पडे। अब सरकार के आलोचक यह कहने लगे है कि मुख्‍यमंत्री रिमोट से कहीं और से संचालित हो रहे हैं।
बाढ ग्रस्‍त और इंसेफेलाइटिस के अभिशाप को झेलने वाला प्रदेश का पूर्वी क्षेत्र जहां बुनियादी सुविधाओं के मामले में प्रदेश के बाकी हिस्‍सों की तुलना में अब भी काफी पीछे है तो वहीं सरकार वहां अंतरराष्टिय हवाई अड्डा निर्माण करने जा रही है। ऐसे में उस इलाके के लोगों का कहना है कि सरकार हमें रोटी के बजाये केक खिलाना चाहती है।
उद्योग वंधु योजना को और मजबूती प्रदान करने की सरकार की कोशिश तो ठीक है लेकिन उससे भी जरुरी यह होगा कि प्रदेश में उद्यम मित्र माहौल का सृजन किया जाये। प्रदेश के कुटीर उद्योगों सहित लघु उद्योगों की समस्‍याओं का त्‍वरित निराकरण के साथ ही इन उद्योगों को बिजली, पानी और बैंकिग सेवा जैसे सु‍विधाओं को विशेष ध्‍यान रखना चाहिये। गंगा रक्षा के मुद्दे पर सरकार को प्रभावी कदम उठाना होगा और इसके लिये उसे स्‍वयं पहल करके उत्‍तराखंड और बिहार सरकार के साथ मिलकर कार्य करना होगा।
ऐसे में सिर्फ घोषणाये करने और केंद्र से धन लेने के बजाये सरकार धन के नियोजन के साथ ही बेहतर प्रशासनिक व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध करा कर काफी कुछ हासिल कर सकती है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

11:28 pm

सोचिये, यदि गांधी हमारे बीच आ गये तो


सरकार अपनी आर्थिक नीतियां बदले या रुपये से मेरी तश्‍वीर हटा दे दूसरी बात की मै चाहता हूं कि राजघाट पर एक बोर्ड लगाया जाये जिस पर लिख दिया जाय कि यहां नेताओं का प्रवेश वर्जित है। ये गुदगुदाने वाली और व्‍यस्‍था पर तीखा व्‍यंग करने वाली पक्तियां जंतर-मंतर पर चल रहे अन्‍ना आंदोलन के दौरान कार्टूनिस्‍टों ने अपनी प्रर्दशनी में लगा रखा है।
ये कार्टून अन्‍ना आंदोलन में आने वालों के चेहरे पर मुस्‍कान ला रहे हैं तो वही भ्रष्टाचार पर तीखा हमला भी कर रहे हैं। एक कार्टून तो संसद को दिखाते हुए कहता है कि शिक्षा मंत्रालय का ऐतिहासिक फैसला अब बच्‍चों को दिया जाएगा शिष्‍टाचार के बजाय भ्रष्‍टाचार की शिक्षा। कतारबद्ध कार्टूनों की इस श्रृंखला में एक कार्टून बताता है कि फोर्ब्‍स ने एक सूची जारी किया है जिसमें भारतीय सांसद अरबपतियों की लिस्‍ट में दसवीं बार टाप पर है। सबसे रोचक और कार्टूनिस्‍ट की कल्‍पना पर आधारित कार्टून राष्‍टपिता महात्‍मा गांधी को लेकर है जिसमें कहा गया है मान लो यदि गांधी फिर एक बार हमारे बीच आ जायें तो क्‍या करेगें। सबसे पहले वह कहेंगे नेताओं भारत छोडों और इस बात को लेकर वह आंदोलन चलायेंगे। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को फोकस करता हुआ कार्टून कांग्रेस के इस नेता से कहलवाता है कि पहले अन्‍ना और रामदेव और अब गांधी भी आरएसएस के आदमी हैं। कार्टनिस्‍ट दीपक तिवारी का स्‍कूली बच्‍चों पर बने कार्टून पर लोगों ने खूब चुटकी ली जिसमें एक स्‍कूल में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी को बच्‍चों से प्रश्‍न करने को कहा जाता है, एक बच्‍चा कहता है मेरे दो प्रश्‍न है जनलोकपाल क्‍यों नही बनाया जाता तो दूसरा सवाल कि भ्रष्‍ट मंत्रियों के खिलाफ जांच में देरी क्‍यों हो रही है। तभी इंटरवल की घंटी बज जाती है और अगली मिटींग में एक दूसरा बच्‍चा कहता है कि मेरे सिर्फ दो ही सवाल है। पहला कि इंटरवल दस मिनट पहले क्‍यों हुआ और पहले प्रश्‍न करने वाला लडका गायब क्‍यों हो गया। सबसे मार्मिक कार्टून जो अंत में लगाया है लोंगों को भावुक कर देता है। इसमें शहीदे आजम भगत सिंह को दिखाते हुए कहा गया है कि भगत सिंह हम शर्मिदा हैं, भ्रष्टाचारी जिंदा है। इस बारे में कार्टूनिस्‍ट विजय कहते हैं कि हमारी कोशिश किसी का मजाक बनाने कि नही है। हम भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता की भावनाओं के साथ ही हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की छात्रा स्‍वतंत्र कार्टूनिस्‍ट सोनम कहती हैं कि कार्टून भी तत्‍कालीन समाज के आईना होते हैं और इन्‍हें सामाजिक भावनाओं के साथ ही समाज की हलचलों से अलग करके नही देखा जा सकता है।