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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

1:14 pm

चरित्र की चुनौति



मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है और जो मनुष्‍य समाज से बाहर रह सकता हो वह भगवान होगा या शैतान होगा - अरस्‍तु के इसी चिंतन को आगे बढाते हुए रोमन राजनैतिक विचारक प्रोटागोरस कहता है कि मनुष्य ही सभी चीजों का मापदंड है। मनुष्‍य का चरित्र कैसा है यह उस मनुष्‍य के चरित्र के साथ ही उसके पारिवारिक संस्‍कार और सामाजिक पृष्‍ठभूमि के साथ ही उस समाज और राष्‍ट्र के चरित्र का भी परिचय दे देता है।
समाज और राष्‍ट्र की सबसे छोटी ईकाई पवार ही होती है और परिवार ऐसी संस्‍था है जो मानव जीवन को सर्वाधिक न केवल प्रभावित करती है बल्कि उसके चेतन-अचेतन मन को भी अपने रंग से रंग देती है। परिवार पहली पाठशाला है जहां मनुष्‍य समाज और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों के प्रति अपने व्‍यवहार को सीखता और समझता है। यही कारण है कि पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन कहते हैं कि एक पुरुष यदि शिक्षित होता है तो सिर्फ एक पुरुष ही शिक्षित होता है जबकि एक महिला यदि शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। चरित्र गठन में शिक्षा की महत्‍वपूर्ण भूमिका है लेकिन प्रश्‍न है कि शिक्षा कैसी हो और उसकी दशा और दिशा क्‍या हो। परिवार शिशु की प्रथम पाठशाला होती है और मां को प्रथम शिक्षक कहा गया है। लेकिन भूमंडलीकरण और वैश्‍वीकरण ने हमारी परिवार व्‍यवस्‍था को भी विकृत किया है। परिवार जिसे लेकर हमारे प्राचीन शास्‍त्रों ने कल्‍पना करते हुए कहा कि वसुधैव कुटुंबकम वह धारणा आज क्षतिग्रस्‍त हो गई है। परिवार को भूमंडलीकरण उदारीकरण की व्‍यवस्‍था ने बाजार बना दिया है। जिसके कारण मूल्‍यों और प्राथमिकताओं में जबरजस्‍त परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
समाज की सबसे छोटी ईकाई परिवार का चिंतन भी समाजबोध और राष्‍ट्रबोध से अलग अर्थ आधरित हो गया है। ऐसे में संस्‍कारक्षम शिक्षा के बजाये प्रोफेशलन इजूकेशन को तरजीह दी जा रही है जहां पर ड्रग ड्रिंक डिस्‍को का कल्‍चर युवा पीढी को आर्थिक प्राणी या मैकेनिकल मैन बनाता जा रहा है, यही कारण है कि पारिवारिक संरचना में भी लगातार बिखराव होता जा रहा है।   
आज रोजगारपरक शिक्षा ने मूल्‍यों, संस्‍कारों को अलग कर दिया है जिसका परिणाम लगातार हताश और निराश हो रही युवा पीढी, हिंसा, अपराध, भष्‍ट्राचार सहित बलात्‍कार में लिप्‍त हो रहा युवा देश के राष्‍ट्रीय चरित्र को कलंकित कर रहा है। राष्‍ट्रीय चरित्र के अभाव में जिस दिशा में समाज बढ रहा है वह न केवल व्‍यक्ति को बल्कि पारिवारिक जीवन से लेकर सामाजिक जीवन में असंतोष, हिंसा, कुण्‍ठा आदि को ही बढावा देगा। यदि हम और हमारे समाज की सर्वागिण प्रगति होनी चाहिये ऐसा हम चाहते हैं तो अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना होगा। हमें नये सिरे से सोचना होगा कि हमारी अस्मिता क्‍या है ? हमारी प्रगति का पैमाना क्‍या है ? हमारे सफल होने और असफल होने का मापदंड क्‍या है? यह चर्चा सामाजिक स्‍तर पर होनी चाहिये। मुक्‍त वातावरण में खुले दिल और दिमाग से सोचना होगा कि हमें श्रवण कुमार चाहिये या पैसा के पीछे दिनरात भागने वाला, थकान को नशे से उतारने वाला पश्चिमपरस्‍त अगली पीढी ?  जो मां-बाप को अनावश्‍यक समझ ‘ओल्‍ड एज हाउस’ में डाल देता है और अपने फलैट का नंबर से लेकर फोन नंबर तक बदल लेता है। अपने मूल्‍यों मान्‍यताओं पर विचार करने के बाद हमें देखना होगा कि कौन सी बातें ग्रहण करने वाली है और कौन सी बातें त्‍यागने लायक हैं। ‘सास भी कभी बहू थी’ और ‘बूगी-बूगी’ को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर लेना होगा। अन्‍यथा इस कार्यक्रम में अपनी बेटी को नाचते देखकर पुलकित हो जाने से हम वैश्‍वीकरण की बाजी नही जीत जाते ना ही इससे कोई बहुत अच्‍छे संस्‍कार और चरित्र पैदा हो जाता है। 
बचपन में विज्ञान की कक्षा में हम सभी ने बर्फ जमाने की प्रक्रिया सीखी होगी जिसमें पहले पानी का एक कण बर्फ बनता है फिर दूसरा कण बनता है धीरे-धीरे पानी के कण बर्फ में बदलते जाते हैं और पूरा पानी बर्फ बन जाता है। इसी तरह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपने आप से शुरु करना होगा, सबसे पहले खुद के परिवार से ही चरित्र निर्माण के साधनों, विचारों और मूल्‍यों पर सोचना होगा। हांलाकि दुनियां का कोई भी समाज हो चरित्र का मूलभूत आधार सत्‍य, सदाचार, सहयोग, सहकारिता की भावना हर एक समाज में एक जैसी ही होती है और भारतीय समाज की पहचान चरित्रहीन सोने की लंका के बजाये चरित्रवान अयोध्‍या के रामराज से अधिक होती है। हमारे महाकाव्‍य गीता, रामायण अब हमारे घरो से लुप्‍त होते जा रहें हैं और दादा-दादी की कहानियों के बजाये किस चैनल पर क्‍या प्रोग्राम परोसा जा रहा है यह महत्‍वपूर्ण होता जा रहा है। कार्टून नेटवर्क देखने वाले बच्‍चों से किस संस्‍कार और चरित्र की आप उम्‍मीद कर सकते हैं ? माता जो शिशु की प्रथम शिक्षक थी जिसके आंचल में बालक की दुनियां होती थी वह आंचल भी अब नये फैशन में गायब होता जा रहा है। आवश्‍यक्‍ता पश्चिमपरस्‍त आधुनिकता के बजाये अपने भारतीय मूल्‍यों और जीवन पद्धति पर आधुनिक दृष्टिकोण से विचार करने की है।

सोमवार, 8 जुलाई 2013

9:27 am

विदेशियों की नजर में भारत

2 फरवरी सन 1833 को ब्रिटीश पार्लियामेंट में लार्ड मैकाले कहता है कि अपने 17 साल के भारत प्रवास दौरान मैने एक भी आदमी को गरीब और बेरोजगार नही देखा, भीख मांगना तो दूर की बात है। फ्रांस का इतिहासकार फ्रांसवा पियाड अपनी पुस्तक में लिखता है कि भारत में 36 प्रकार के उद्योग है और भारत दुनियां को हर चीज निर्यात करता है। इसीप्रकार स्काटलैंड का विद्धान मार्टिन कहता है कि इटली के राजा-रानी भारत के बने हुए कपडे पहनते हैं और हमें भी कोशिश करनी चाहिये कि भारत के कपडें मिल जायें। मद्रास प्रेसिडेंसी का गर्वनर रहा थामस मूनरो 1813 में ब्रिटेन की संसद में कहता है कि भारत में इतनी बारीक कपडे की बुनाई होती है कि तेरह गज का थान आप एक अंगूठी से बाहर निकाल सकते हैं। मैने कपडों को तौला है कुछ थान तो दस ग्राम से कम हैं जिनको तोला और रत्ती में तौलना पडता है। थामस मूनरो इसी वक्‍तव्‍य में भारत की आर्थिक स्थिति का लेखा-जोखा ब्रिटेन की संसद में देते हुए बताता है कि सारी दुनियां में जो माल का उत्पादन होता है उसका अकेला भारत ही 43 फीसदी करता है, सारी दुनियां में जो निर्यात होता है उसमें भारत का निर्यात 33 फीसदी है तो पूरे विश्व की आमदनी का 37 फीसदी अकेला भारत के पास है। थामस मूनरो, जी डब्लू लिटनेस, कैंपवेल और डॉ स्काट अलग-अलग स्रोतों से कहते हैं कि सर्जरी के लिये सबसे श्रेष्ठतम औजार भारतीय स्टील के बनाये जाने चाहिये। 1711 में डेनियल डिफो कहता है कि कापरनिक्स के पैदा होने के एक हजार साल पहले ही भारत के आर्यभटट ने पता कर लिया था सूर्य के बारे में, सूर्य के साथ अन्य ग्रहों के अंर्तसंबंधों के बारे में भारतीय काफी पहले ही शोध कर चुके थे। तो सवाल खडा होता है कि क्या भारत बिना शिक्षा और विज्ञान-तकनीकि के यह सब कर पाया होगा ? जर्मन चिंतक मैक्‍समूलर और लूडलो, अलग-अलग आंकडों मे 1822 में बताते है कि भारत में 7 लाख 32 हजार गांव है और सभी गांवों में गुरुकुल है। यहां सामान्य बच्चे जो पांच साल की आयु पूरी कर लेते हैं, गुरुकुल भेज दिये जाते हैं जहां 18 विषय सूर्योदय से सूर्यास्त तक 14 वर्षो तक पढाया जाता है। इन विषयों में संस्कृत माध्यम है और वेद उपनिषद बच्चों के नैतिक और सांस्कृतिक स्तर को बनाये रखने के लिये पढाये जाते हैं जबकि नक्षत्र विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, धातु विज्ञान, वैदिक गणित, रसायन शास्र् , ज्योतिष, आर्युवेद आदि की शिक्षा दी जाती है। इन गुरुकुलों में शिक्षा निश्शुल्क है जहां राजकुमार से लेकर सामान्य, बालक साथ-साथ पढते हैं। 1868 तक इग्लैंड में सामान्य बच्चों के लिये शिक्षा का कोई प्रबंध नही और उनके आदर्श राजनैतिक विचारकों सहित अरस्तू और सुकरात तक सामान्य बच्चों को शिक्षा दिये जाने के खिलाफ इसे स्पेशल स्तर तक ही सीमित रखते हैं ।

गुरुवार, 30 मई 2013

12:10 pm

समृद्धि के असली मायने



हमारे पास यदि पैसा हो तो सबसे पहला काम किसी बडे शहर में मकान या फलैट खरीदेगें, महंगी नई ब्रांड की कार और सुख-सुविधा का प्रत्‍येक साधन। अगले चरण में दो चार रायफल आदि खरीदेंगे फिर चुनाव लडने की सोचेंगे, वहीं जहां पुस्‍तैनी घर गांव होगा उसी निर्वाचन क्षेत्र से लडने के लिये बडे-बडे होर्डिंग लगाकर गांव वालों को फर्जी तौर होली, दिवाली, ईद या नये साल की शुभकामनाएं देना शुरु कर देंगे, खैर। कनाडा के एक मित्र से कभी-कभी बात करते-करते उबन होने लगती है कारण कि वह मेरा दिमाग चाटता है।  भारतीय जन-जीवन के बारे में पूछ-पूछ कर और मै हर कमी को भी विशेषता के रुप में बता कर उसके मन में उज्‍ज्‍वल छवि बनाये रखने का प्रयास करता हूं। उसने चर्चा के दौरान कुछ बातें बताई और पूछा आप जिम बाल्सिली को जानते हो ? मैने कहा नहीं। तो उसने बताना शुरु किया कि वह ब्‍लैकबेरी फोन के संस्‍थापक है और अपने जीवन के 40 वें साल में अरबपति बन गये। लेकिन उन्‍होंने अपना गांव वाटरलू नहीं छोडा और गांव के युवको को रोजगार मिले इसके लिये अपनी कंपनी ब्‍लैकवेरी को गांव में ही स्‍थापित कराया। उनके लिये टोरंटो और न्‍यूयार्क में घर बनाना आसान था लेकिन गांव में ही रहना पसंद किया और विश्‍वविद्यालय के शोध छात्रों के लिये प्रयोगशाला और शोधसंस्‍थान का निर्माण किया। अपने गांव में वह दुनियां के नामचीन वैज्ञानिकों को बुलाते हैं और विभिन्‍न विषयों पर वाद-विवाद करके गांव की बेरोजगारी कैसे दूर हो इसका उपाय खोजते र‍हते हैं। उनका सपना है कि उनका गांव दुनियां का नंबर वन शोध संस्‍थान कैसे बने। हमारे यहां के राजनेताओं की तरह वह करोड्रों रुपया खर्च करके सदी के सबसे बडा वैवाहिक समारोह पर पैसा नही खर्च करते।
इसीतरह इजरायल में स्‍टेफ वर्थहाईमर प्रसिद्ध उद्योगपति है और देश के कुल उत्‍पादन का दस फीसद वर्थ के उद्योगों द्धारा होता है, हम सभी वारेन वफैट को तो जानते ही हैं, कहा जाता है कि दुनियां के सबसे अमीर इंसान है। वारेन भी अब वर्थ के पार्टनर हैं और वह चा‍हते तो अपना व्‍यवसाय अमेरिका, यूरोप में कर सकते थे लेकिन उन्‍होंने इजरायल के अत्‍यंत पिछडे ईलाके में अपना उद्योग डाला जो लेबनान की सीमा पर है। आज युद्ध हो जाये तो इनका उद्योग तबाह हो जायेगा लेकिन उनको इसकी परवाह नही है। उनका सपना है कि देश के पिछडे क्षेत्र के युवक भी मुख्‍यधारा में आकर समृद्ध हों। इतना ही नही मनोरंजन के लिये आर्टगैलरी और संग्रहालय भी बनाकर उन्‍होंने रखा है साथ ही 14 से 18 साल के छात्रों को निश्‍शुल्‍क औद्योगिक प्रशिक्षण देने की कार्यशाला भी कार्य करती है। मेरे मित्र ने बताया कि वहां पर मौजूद वैज्ञानिक शोध केंद्र में तकरीबन 1800 इंजिनियर कार्य करते हैं और जब एकबार मै उनके उद्योग केंद्र को देखने गया तो स्‍वयं स्‍टेफ मेरे साथ चार-पांच घंटे तक प्रत्‍यके विभाग में घुमते रहे और कोई कर्मचारी न तो काम छोडकर उनके सम्‍मान में खडा हुआ और नाही उनके आने जाने का कोई गौर किया, बस सभी अपने काम में तल्‍लीन दिखे। यहां तक कि चौकीदार भी बस सुरक्षा ही करता नाकि खडे होकर बडे साहब को सलाम ठोकता।
हमारे यहां इसका उल्‍टा है मंहगी टयूशन बच्‍चा हिंदी में फेल हो जाये या किसी भी भारतीय भाषा में फेल हो जाये तो कोई फिक्र नहीं अग्रेंजी में पास हो जाये जिससे वह मम्‍मा को अंग्रेजी में कम से कम गाली तो दे सके। हमारी अस्मिता क्‍या है ? विकास क्‍या है ?  प्रगति क्‍या है ? संस्‍कार क्‍या है ? इस पर विचार करने का समय किसके पास है। ‘’सास भी कभी बहू थी’’ और ‘’बुगी-बुगी’’ की देखने और तेरह साल की बेटी के मिनी स्‍कर्ट पहन कर स्‍टेज पर नाचने से न तो हम बहुत प्रगतिशील हो गये है नाही वैश्‍वीकरण की बाजी हमने जीत ली है। 
-मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय

गुरुवार, 2 मई 2013

3:23 am

सोमनाथ चटर्जी का रास्ता खुला था आजम साहब


हाल ही में एक फोटो देखने में आई जिसमें इग्‍लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन को ट्रेन में सीट नही मिली तो वह खडे-खडे ही अखबार पढते हुए अपनी यात्रा कर रहे थे। मेरे संपर्क में एक सज्‍जन हैं जिनका अक्‍सर विदेशों में भ्रमण हुआ करता है। उनके एक स्‍वीज मित्र को डूयरिक हवाई अडडे से ट्रेन द्धारा राजधानी बर्न ले जाने की जिम्‍मेदारी एक महिला को दी गई थी। उसके पास 3-4 बैग थे। सौजन्‍यतावश उनके मित्र ने दो बैग अपने हाथ में उठाये और दोनों ट्रेन के दूसरे दर्जे के डिब्‍बे में चढ गये। उस महिला को दरवाजे के पास एक आरक्षित खाली सीट मिली जिस पर वह बैठ गई। उनका मित्र सीट न होने के कारण पास में ही खडा था। थोडी देर में टिकट निरीक्षक आया। टीटी ने उस महिला से कहा यह विकलांगों के लिये आरक्षित सीट है आप गलत जगह पर बैठी है। वह महिला तत्‍काल मांफी मांगते हुए खडी हो गई और भीड में दूसरे यात्रियों के साथ खडी हो गई। उस महिला को डिब्‍बे के लगभग सभी यात्री पहचानते थे उसका नाम था मिशेलिन काल्‍मी रे। वह स्‍वीटजलैण्‍ड की तत्‍कालिन राष्‍ट्रपति और विदेश मंत्री थी। भारत में यह सब कपोल कल्‍पना ही है। इसलिये अमेरिका के बोस्‍टन में चेकिंग होती है तो वहां भी लखनउ और रामपुर के चौधराहट को तलाशा जाता है।
यदि आपका इतना ही अपमान हुआ तो पूर्व लोकसभाध्‍क्ष सोमनाथ चटर्जी का रास्‍ता पकड लेते, सीधे हवाई अडडे से नई दिल्‍ली रवाना हो जाते। लेकिन यह कैसा विरोध कि अमेरिकी डीनर तो स्‍वीकार है लेकिन लेक्‍चर का विरोध कर दिया गया। दूसरे हावर्ड में लेक्‍चर के बाद प्रश्‍नोत्‍र का जो खुला सेशन होना था जिसमें वहां के शोध छात्र से लेकर बुद्धिजीवी होते ऐसे में लगता यही है कि प्रश्‍नोत्‍तर में कहीं पोल न खुल जाये इसलिये पहले ही नया आईडिया तलाश लिया गया हो। कहा यह भी गया कि उनके पास डिप्‍लोमेटिक वीजा था इसलिये चेकिंग गलत हुई तो ऐसा कहने वालों को पहले यह पता कर लेना चाहिये कि यूनाइ्रटेड स्‍टेट के कानून में किस पन्‍ने पर लिखा है कि डिप्‍लोमेटिक वीजा रखने वालों की सामान्‍य तलाशी नहीं ली जायेगी।
तलाशी तो पूर्व राष्‍ट्रपति कलाम की भी ली गई, समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडीज और अमेरिका में भारत की राजदूत रही मीरा शंकर को भी तलाशी से गुजरना पडा लेकिन इन लोगों ने इसे मुददा न बनाते हुए सामान्‍य तौर पर उस देश के नियमों के तहत लिया। यदि जाना पहचाना चेहरा होने के बावजूद फिल्‍म अभिनेता शाहरुख खान की तलाशी ली जाती है तो अमेरिका में आजम खान को पहचानने वाले कितने होंगे ? उत्‍तर प्रदेश को छोड दें तो उनको पहचानने वाले भारत में ही कितने लोग होंगे ? फिर अमेरी‍की नियमों को लेकर इतनी मुज्‍जमत क्‍यों है ?  दरअसल भारतीय भूभाग पर सामान्‍य नागरिक से अलग स्‍पेशल ट्रीटमेंट लेने के आदी हो चुके इन चंद नेताओ को जब कभी सामान्‍य नियमों से गुजरना पडता है तो तिलमिला उठते हैं। आजम खान जैसे लोग आज भी मुगलिया सल्‍तनत की अपनी सोच से बाहर नही निकले जिसके कारण ये पैन इस्‍लामिक मूवमेंट से खुद को अलग नही कर पाते, यही कारण है कि अमेरिकी युद्ध में मारे गये मुसलमानों के लिये मातम दिवस भारत में मनाना चाहते हैं। दुर्भाग्‍य से मुस्लिम समाज भी वास्‍तविक तरक्‍की के बजाये छदम नारों और तात्‍कालिक तुष्‍टीकरण से संतुष्‍ट होता रहा है जिनकी नब्‍ज आजम खान जैसे नेता बखूबी पहचानते हैं। बाकी सब ठीक है। 



शुक्रवार, 8 मार्च 2013

7:35 pm

भारत का वैज्ञानिक चिंतन


वर्ष 2005 में पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम जब इलाहाबाद आये तो म‍हर्षि भारद्धाज का आश्रम देखने की इच्‍छा उन्‍होंने प्रगट की और उन्‍होंने बताया कि महर्षि भारद्धाज ने सर्वप्रथम विमान शास्‍त्र की रचना की थी। महाकुंभ के अवसर पर देश-देशांतर के सभी विद्धान प्रयाग आते थे और इसी भारद्धाज आश्रम में महीने दो महीने रहकर अपने-अपने शोध और खोज पर चर्चा करते थे जिससे उनको जनकल्‍याण में लगाया जा सके। सोशल नेटवर्किंग साईट पर जब किसी ने अरब के किसी व्‍यक्ति का नाम देते हुए कहा कि सबसे पहले इन्‍होंने विमान की खोज की तो आश्‍चर्य हुआ और भारत के वैज्ञानिक योगदान पर थोडी सी चर्चा करने का विचार मन में आया।
आज आप एक छोटी सी पुस्तक लिख दें या कोई कविता तो उसके नीचे अपना नाम भी छपे यही प्रयास रहता है, लेकिन प्राचीन काल में वेद, मंत्र, उपनिषद किसने लिखे ? उन भारतीयों ने अपने से अधिक अपनी कृति से प्रेम किया होगा यही कारण है कि आज अनेक बातें हमारे सामने नही आ पाती। शिशु मंदिरों में एक श्‍लोक दुहराया जाता है-
  वैज्ञानिकाश्‍च: कपिल: कणाद: सुश्रुतस्‍तथा। चरको भास्‍कराचार्यो वाराहमिहिर: सुधी:। नागार्जुनो भरद्धाजो बसुर्वुध:। ध्‍येयो वेंकटरामश्‍च विज्ञा रामानुजादय:
पश्चिम में एक धारणा प्रचलित की गई है कि भारत में साहित्‍य में अच्‍छा कार्य हुआ है। रामायण, महाभारत, मेघदूत और शकुंतला विलुप्‍त नहीं हुए। संगीत के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई लेकिन भारत वैज्ञानिक प्रगति नहीं कर पाया। पश्चिम के लोग कहते हैं कि आपके साधु-संत आंखे मूंद लेते हैं और ब्रम्‍हाण्‍ड देख लेते हैं। दुनियां जानती है कि शून्‍य का आविष्‍कार भारत में हुआ इससे पहले यूरोप के अंदर दशमलव पद्धति नहीं अपनाई गई थी। रोमन लिपि में गिनती की जाती थी जिसमें अंको को ।, ।।, ।।। का प्रयोग किया जाता रहा। इसमें यदि हजार से उपर की संख्‍या लिखनी होतो समस्‍या  खडी हो जाती है और गुणा-भाग करना तो और भी कठिन कार्य है। 13 वीं शताब्‍दी तक यूरोप में गुणा-भाग विश्‍वविघालय स्‍तर पर पढाया जाता था। जोडने और घटाने के साथ ही गुणा-भाग का कार्य सिर्फ भारत में होता था क्‍यों कि हमारे यहां जीरो का आविष्‍कार हो चुका था। जीरो रहने से किसी भी अंक का मान दस गुना बढ जाता है। जीरो को सारे अरेबिया ने भारत से प्राप्‍त किया अरेबिया से यूरोप जाकर वह इंटरनेशनल फार्म आफ अरेबिक न्‍यूमरल कहा जाने लगा। आज भी अरब के लोग शून्‍य को हिंदसा कहते हैं तो यूरोप में इसे अरेबिक न्‍यूमरल कहा जाता है।
आर्यभटट ने पाई रेशो का मान 14 वीं शताब्‍दी में निकाला कि पाई का मान 3.14159256 होता है इतना ही नहीं बल्कि उन्‍होंने रेडियस, वृत, डायामीटर आदि का भी उल्‍लेख किया है। महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है कि योजनानां सहस्रेद्धि द्धिशत द्धियोजनम, वह प्रकाश जो एक निमिष इतना चलती है उसको नमस्‍कार है। महाभारत के समय रास्‍ते की माप योजन से होती थी, चार कोस का एक योजन और दो मील का एक कोस इसप्रकार आठ मील का एक योजन होता था। प्रकाश के बारे में शांति पर्व में कहा गया है कि दो हजार दो सौ योजन अर्ध निमिष में यात्रा करता है उसे नमस्‍कार है। निमिष अर्थात आदमी जितने समय में पलक झपकाता है या एक निमिष अर्थात सेकेंड का छठां भाग और अर्ध निमिष सेकेंड का बारहवां हिस्‍सा जिसमें प्रकाश अपनी दूरी तय करता है। अब इसतरह से जोड करें तो प्रकाश की गति लगभग दो लाख मील प्रति सेकेंड है। जो आज वैज्ञानिक मानते हैं वह वही है जो महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया।
इसीप्रकार पृथ्‍वी की आयु की गणना भी भारतीयों ने अपने अनुसार कर लिया था कि पृथ्‍वी की आयु दो सौ करोड वर्ष है। हांलाकि कैल्‍वीन की गणना से लेकर रेडियो एक्टिीवीटी की गणना के बाद वैज्ञानिक अब इस निष्‍कर्ष पर आ गये हैं कि पृथ्‍वी की आयु दो सौ करोड वर्ष ही है। भारतीयों ने कहा ब्रम्‍हा के एक हजार साल कलियुग है तो दो हजार वर्ष द्धापर, तीन हजार वर्ष त्रेता और चार हजार साल का सतयुग होता है। अब यदि हिसाब लगाये तो सतयुग के संधिकाल के दोनो ओर चार-चार सौ वर्ष और कलियुग के दोनो और सौ-सौ वर्ष का संधिकाल होता है पुराण के अनुसार तो एक महायुग बारह हजार साल का होगा। यह बारह हजार वर्ष ब्रम्‍हा जी का एक वर्ष है। मानव का एक वर्ष ब्रम्‍हा जी का ए‍क दिन होता है। ब्रम्‍हा जी का एक वर्ष मानव का 360 साल हुए तो संधिकाल जोडने पर ब्रम्‍हा के 1200 साल का कलियुग हुआ। तो कलियुग का समय निकालने के लिये 1200 में 360 का गुणा कर दें तो मानव के चार लाख बतीस हजार वर्ष आते हैं। इस हिसाब से पृथ्‍वी की आयु आज के वै‍ज्ञानिकों की खोज के समतुल्‍य हो जाती है।
पाईथागोरस से काफी पहले ही बौधायन ने यज्ञ वेदियों को लेकर समकोण त्रिभुज पर कार्य किया और अनेक बातें प्रगट की वहीं भाष्‍कराचार्य ने सरफेस आफ द स्‍फीयर का अध्‍ययन किया और कहा कि एक वृत का क्षेत्रफल 4 पाई आर स्‍कवायर होगा। पश्चिम के विद्धान कहते हैं यह तो बिना डिफरेंसियल कैलकुलस के निकल ही नहीं सकता तो यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि भाष्‍कराचार्य को डिफरेंसियल कैलकुलस का ज्ञान रहा होगा। मेडिकल साईंस में सुश्रुत और चरक ने काफी कार्य किया और शल्‍य चिकित्‍सा की प्रारंभिक जानकारी इनके ग्रंथो से मिलती है। शल्‍य क्रिया में कौन-कौन से उपकरण काम आते हैं इसका वर्णन सुश्रुत ने पहले ही कर दिया था। मोतियाबिंद से लेकर प्‍लास्टिक सर्जरी तक में पहल भारत ने हजारों साल पहले ही कर दिया था।
एक हजार साल पुराना दिल्‍ली का लौह स्‍तंभ भारत के स्‍टेनलेस स्‍टील की खोज को सिद्ध करने के लिये पर्याप्‍त है जिसकी खोज अब जाकर दुनियां ने की है। जब पुरु और सिकंदर की भेंट हुई तो सिकंदर ने पुरु से भेंट में भारत वर्ष का लोहा मांगा ताकी वह उनसे तलवार बना सके और जब वह दुनियां के कुछ देशों में लडने गया तो उसके सैनिक ललकार कर कहते थे सावधान मेरा तलवार भारत के इस्‍पात से बना है, मेरी यह शमशीर एक बार में सिर को अलग कर देगी। वस्‍त्रों के मामले में कहा जाता है कि भारतीय मलमल 200 काउंट से उपर का बनता था और आज कंम्‍यूटर भी 150 काउंट से अधिक का मलमल नही बना पाता।
महर्षि भारद्धाज ने सबसे पहले विमान शास्‍त्र की रचना की इसीतरह अगस्‍त संहिता में भी कई प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान की चर्चा की गई है। क्‍वांटम मेकेनिक और रिलेटिवीटी का सिद्धांत आने से काफी पहले ही हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि या पिण्‍डे सो ब्रम्‍हाण्‍डे अर्थात जो ब्रम्‍हाण्‍ड में है वही हमारे पिण्‍ड में है। दुर्भाग्‍य से प्राचीन भारत के इस ज्ञान-विज्ञान के बारे में जिसे जानना चाहिये वे संस्‍कृत नही जानते और जो संस्‍कृत जानते हैं वे विज्ञान के बारे में नही जानते जब तक इन दोनो का संगम नही होता अनेक तथ्‍य ऐसे ही दबे रह जायेगें।   
मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय
सम्‍पर्क- mpprayag@gmail.com  , उपनिषद किसने लिखे े नीचे आप