रविवार, 17 फ़रवरी 2013

10 लाख 65 हजार भूलेभटकों को मिला चुके हैं राजाराम मकरसंक्रांति से पौष पूर्णिमा तक भूले ग्याहर हजार लोग सर्वाधिक भूलेभटके लोग बिहार और झारखंड के


जब रोते-बिलखते लोगों को देखता था तो मै उनके परिजनांे को खोजना शुरु करता था। उस समय मेला इतना बड़ा नहीं होता था और मेरे पास लाउडस्पीकर भी नहीं था तो डुगडुग्गी बजाकर या टीन के भोपू से चिल्लाकर भूलेभटकों के परिजनों को ढूंढता था। उस समय से लेकर आज तक मैने दस लाख 65 हजार भूलेभटकों को उनके परिजनों से मिलवाया है। जबकि इस वर्ष वह साढे दस हजार लोगों को उनके परिजनों से मिलवा चुके हैं। जिनमे सिर्फ पौष पूर्णिमा को ही चार हजार लोगों का भटकना दर्ज हुआ। यह कहना है 87 वर्षीय राजाराम तिवारी का जो भूलेभटकों को मिलाने के लिये हर साल भूलभटका शिविर लगाते हैं।
प्रतापगढ के गौरा निवासी राजाराम तिवारी हर साल लगने वाले माघ मेले में त्रिवेणी के तट पर अपना आशियाना डाल देते हैं और कल्पवास के साथ ही भूलेभटकों को मिलाने को ही भगवत भजन मानते हैं। वर्ष 1946 से 2013 तक यह उनका पांचवा कुंभ है तो अब तक वे 7 अर्द्धकुंभ और 56 माघमेला में अपनी सेवायें दे चुके हैं। श्री तिवारी बताते हैं कि 1946 में लोगों को रोते-बिलखते देखकर वह और उनके अन्य 12 साथियों ने मिलकर भूलाभटका शिविर लगाना शुरु किया, जो आजतक अनवरत जारी है। यह बताते हुए वह अतीत की यादों में खो जाते हैं और दुखी होकर बताते हैं कि मेरे ज्यादातर साथी अब नहीं रहे।
अतीत की यादों में खोते हुए राजराम तिवारी कहते हैं कि 1954 से पहले पीपे का पुल नहीं होता था, उस समय इस पार से उस पार जाने के लिये नावों को जोड़कर पुल तैयार किया जाता था। 1954 के कुंभ में हुई दुर्घटना को याद करते हुए श्री तिवारी कहते हैं कि उस समय प्रधानमंत्री नेहरु जी का काफिला आ गया था और दूसरी ओर से शाही स्नान के लिये अखाड़े निकल रहे थे, जाम के कारण भगदड़ मच गई और हजारों लोग मारे गये। वे कहते हैं कि मरने वालों में ज्यादतर भीख मांगने वाले थे जिनको अरैल तट पर अंतिम संस्कार किया गया था। इसी दुर्घटना के बाद से यहां पर सरकार की नजर गई और यहां पर सरकारी इंतजाम होने लगे।
आपको कितनी सुविधायें मिलती हैं सवाल के जबाव में कहते हैं कि सरकार की ओर से मुझे वही सुविधाये मिलती है जो आम कल्पवासियों को प्राप्त होती है। जब उनसे सवाल किया गया कि किस उम्र और प्रदेश के लोग ज्यादातर भूलते-भटकते हैं तो श्री राजाराम तिवारी कहते हैं कि ज्यादातर बिहार और झाारखंड के लोग होते हैं उनमें भी महिलायें और बच्चे ही अधिक होते हैं। आजादी के समय के बीए, एलएलबी पास श्री तिवारी कहते हैं कि जिन बच्चों और महिलाओं के परिजन मेला खतम होने के बाद भी नहीं मिलते उनको हम बाल निकेतन भेज देते हैं। जबकि प्रत्येक साल हम सैकड़ों लोगों को उनके घर तक पहुंचाने की भी जिम्मेदारी पूरी करते हैं। उम्र के आठवे दशक को पूरा करने जा रहे श्री तिवारी की इस परंपरा को अब उनके सुपुत्र उमेश चंद्र तिवारी निभाने के लिये अब भूलभटका शिविर में मौजूद रहने लगे हैं।

संतो ने भरी हुंकार कहा राममंदिर बनाकर मानेंगे


राममंदिर के निर्माण तक हिंदू समाज शांत नही बैठेगा। अब संसद में जो भी होगा उसे राममंदिर बनाना ही होगा अथवा मंदिर बनाने वाले ही संसद जायेंगे। तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी तट पर विश्‍व हिंदू परिषद के तत्‍वाधान में आयोजित धर्म संसद में देश के जाने-माने साधु-संतो ने राममंदिर निर्माण को लेकर हुंकार भरी हांलाकि संत समाज ने गौ, गंगा, घुसपैठ और धर्मांतरण को लेकर भी आक्रोश प्रगट किया।
विश्‍व हिंदू परिषद ने धर्म संसद में नरेंद्र मोदी के बजाये अपना एजेंडा ही संतो के सामने रखा। ज्‍योतिष्‍पीठाधिश्‍वर बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरुपानंद के सेकटर 5 स्थित विशाल पांडाल में आयोजित धर्मसंसद में शंकराचार्य, दो दर्जन महामंडलेश्वर और देश भर के हजारो साधु संतो ने भाग ले‍ते हुए राममंदिर निर्माण को लेकर देश भर में जनजागरण किये जाने का ऐलान किया। तो वहीं गोहत्‍या, गंगा रक्षा, घुसपैठ और धर्मांतरण सहित विभिन्‍न मुददों को लेकर संगम की रेती पर सामूहिक संकल्‍प को अभिव्‍यक्‍त किया।
धर्मसंसद में विश्‍व हिंदू परिषद के अंतरराष्‍ट्रीय संरक्षक अशोक सिंहल, अंतरराष्‍ट्रीय कार्याध्‍यक्ष प्रवीण भाई तोगडिया सहित अंतरराष्‍ट्रीय महामंत्री चंपत राय और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में राममंदिर को लेकर देश के गांव-गांव में राम नाम के महामंत्र का दिव्‍यास्त्र प्रयोग कर जनजागरण का ऐलान किया। धर्मसंसद की अघ्‍यक्षता कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्‍वती ने करते हुए कहा कि राममंदिर के निर्माण के लिये मुसलमानों के साथ भी समन्‍वय बनाने का प्रयास किया जायेगा। पूरा देश राम के मंदिर को उनकी जन्‍म भूमि पर देखना चाहता है। वहीं विहिप प्रमुख अशोक सिंहल ने कहा कि राममंदिर के निर्माण को लेकर अब और इंतजार नही किया जायेगा और इस मुददे को संसद में कानून बनाकर हल किया जायेगा। उन्‍होंने कहा कि आज हिंदू समाज पर नियमित तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। देश की संसद हिंदू पर हो रहे हमलों के प्रति उदासीन है आज गौ, गंगा खतरे में है तो धर्मांतरण और घुसपैठ सहित जेहादी आतंक नियमित बढता जा रहा है।
पूर्व केंद्रीय गृहराज्‍य मंत्री महामंडलेश्‍वर चिन्‍मयानंद ने कहा कि मै राममंदिर आंदोलन से 1984 से जुडा हूं और राममंदिर निर्माण होने तक शांत नही बैठने वाला हूं। आंध्रप्रदेश से आये हुए संत जीएल स्‍वामी ने कहा कि रामंदिर का निर्माण होकर रहेगा यह पूरे देश का हिंदू समाज चाहता है। वहीं गोरक्षापीठाधीश्‍वर योगी आदित्‍यनाथ ने कहा कि भगवा आतंक का नाम लेने वाले हिंदू समाज को नहीं जानते। आज जो राम का नाम लेने वाले हैं उनको जेल में डाला जाता है और जेहादी लोगों को सरकार बिरयानी खिलाती है।
पूर्व सांसद डॉ रामविलास वेदांती ने कहा कि राममंदिर का निर्माण संसद में कानून बनाकर किया जा सकता है। विकलांग विश्‍वविघालय के संस्‍थापक रामभद्राचार्य ने कहा कि हिंदू समाज को जागृत करने की आवश्‍यक्‍ता है उसको उसकी शक्ति हनुमान की तरह याद दिलाने की आवश्‍यक्‍ता है। उन्‍होंने कहा कि जिस दिन 370 हिंदूत्‍व समर्थक सांसद ने देश की संसद में हो जायेंगे सभी समस्‍याओं का समाधान निकल आयेगा। धर्मसंसद में राजस्‍थान से पधारे  महामंडलेश्‍वर वासुदेव प्रपन्‍नाचार्य ने ज्‍योही प्रधानमंत्री पद के लिये नरेंद्र मोदी का नाम लिया पूरा पांडाल जय श्रीराम के नारों के साथ ही तालियों से गूंजता रहा। उन्‍होंने कहा कि न तो एनडीए ना ही यूपीए सिर्फ नरेंद्र मोदी की जरुरत है देश को जिस पर पांडाल में मौजूद लोंगो ने तालियों की गडगडाहट के साथ स्‍वागत किया।
धर्मसंसद में मौजूद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संत समाज जो भी निर्णय लेगा राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता उसका पालन करेंगे। उन्‍होंने प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी का नाम लिये जाने पर अपरोक्ष रुप से कहा कि यह राजनैतिक दलों का विषय है कि वह अपना प्रधानमंत्री किसे तय करती हैं। धर्म संसद में प्रमुख तौर पर शंकराचार्य वासुदेवानंद जी महाराज, जगत गुरु काशी सुमेरु पीठ के शंकराचार्य नरेंद्रानंद जी महाराज, जैन संत प्रगल्‍भ मुनी सागर जी महाराज, महामंडलेश्‍वर विश्‍वेसरानंद जी महाराज, महामंडलेश्‍वर सुश्री वेद भारती, महामंडलेश्‍वर डॉ रामेश्‍वर दास जी महाराज, श्रीमहंत नृत्‍य गोपाल दास जी महाराज, सच्‍चा बाबा आश्रम के गोविंद देव जी महाराज, साध्‍वी पूर्ण प्रज्ञा माता, महामंडलेश्‍वर ज्ञानानंद जी महाराज सहित हजारो साधु-संत उपस्थित रहे।  

पंडो के झंडे कराते हैं उनके परंपराओं से रुबरु


गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती के संगम पर आयोजित कुम्भ मेले ने भले ही वैश्विक रुप ले लिया हो लेकिन यहां कुछ परंपराएं ऐसी हैं जो प्राचीनकाल से चली आ रही हैं। कुछ ऐसी ही परंपराओं का साक्षी यहां के पंडों और उनके झंडो का इतिहास है जिन्हें प्रयागवाल के नाम से भी जाना जाता है।
इतिहास में प्रसिद्ध तीर्थराज प्रयाग की प्राचीनतम के साथ ही साथ प्रयागवालों का भी निकट का सम्बन्ध है। आर्य मुनियों, भारद्वाज, अत्रिं, दुर्वासा के साथ-साथ जाति के प्राचीन नगर निवासी होने के कारण इनका नाम प्रयागवाल पड़ा। प्रयागवाल उच्चकोटि के ब्राह्मण जाति के हैं जिसमें सरयूपारी एवं कान्यकुब्ज दानों समुदाय के लोग है। त्रेता युग में भगवान राम ने लंका विजय के पश्चात प्रयाग के जिस तीर्थ पुरोहित को अपने रघुकुल का पुरोहित माना, उसके वंश के लोग आज भी है  जो कविरापुर व बट्टूपुर जिला अयोध्या के रहने वाले हैं। उनकी वंश परम्परा में आज भी मिश्रकुल के तीर्थ पुरोहित यहाँ विराजमान है, जो रघुवंशी तीर्थ पुरोहित क्षत्रियों के तीर्थ गुरू है।
तीर्थ गुरू प्रयागवाल पंडा जाति शब्द एक ही जाति प्रयागवाल के प्रर्यायवाची है। प्रयागवालों के यजमान क्षेत्र तथा स्नानदान के आधार पर चलते है और यह अपने यजमानों की बंशावली सुरक्षित रखते है। यजमान उनकी मोटी बहियों में अपने पुरखों के हस्ताक्षर आदि देखकर प्रसन्न होते हैं। यह अपने क्षेत्र के यजमानों की वंशावली तत्काल खोज लेते हैं।
प्रयागवाल तख्तों की संख्या निश्चित है। प्रयागवाल अपने तख्त पर बड़ा सा बहियों का बक्सा रखते है तथा एक ऊंचे बॉस पर अपने निशान का झण्डे के स्थान पर टोकरी आदि भी लगाते है। प्रत्येक प्रयागवाल का एक निश्चित झण्डा या निशान होता है और उसे ही देखकर तीर्थयात्री अपने प्रयागवाल के पास पहुंचने का प्रयास करते हैं ये प्रयागवाल अपने पास कुछ गुमास्ते भी रखते है जिनका कार्य वस्तुत: "टूरिस्ट गाइड" का होता है। यह गुमास्ते रेलवे तथा बस स्टेशनों से यात्रियों को प्रयागवालों के घर तक या मेले में लगे उनके शिविर तक पहुँचाते है। प्रयागवाल सभा के परामर्श से प्रत्येक प्रयागवाल को फोटोयुक्त परिचय पत्र रखना अनिवार्य किया गया, जिसका उन्होंने कड़ाई से पालन किया जिसमें यात्रियों को अपने निर्धारित पण्डे के पास पहुँचने में भी सहायता मिली।
प्रयागवाल दो प्रकार के होते है- पीढ़िया एवं परदेशी। पीढ़िया मूल प्रयागवाल है और परदेसी उनके सम्बन्‍धी जो कालान्तर में आकर बस गये। प्रयागवालों को अपने यजमान टिकाने के लिए मामूली किराये पर भूमि दी जाती है। तथा संगम के निकट प्रसार क्षेत्र में कर्मकाण्ड व दान-पूर्ण करने के लिए गंगा पट्टी व यमुना पट्टी में तख्त रखने के लिए स्थान दिया जाता है। यजमानों को टिकाने के लिए भूमि तथा संगम के निकट प्रयागवाल हेतु भूमि का आवंटन प्रयागवाल सभा के माध्यम से होता है और वही स्थान तथा क्रम निर्धारित करते है। प्रशासन द्वारा भूमि निर्धारित कर आवंटित कर दी जाती है और किसे कहाँ कितनी भूमि मिलेगी इसका निर्णय प्रयागवाल सभा स्वयं ही करती है।
प्रयाग में तीर्थ यात्री का एक विशिष्ट तीर्थपुरोहित होता है। तीर्थयात्री और पुरोहित का सम्बन्ध गुरू--शिष्य परम्परा का द्योतक है। यात्री के धार्मिक गुरू रूप माने जाने वाले इन प्रयागवालों को ही त्रिवेणी क्षेत्र में दान लेने का एक मात्र अधिकार है। समस्त प्रकार के दान उपदान प्रयागवाल द्वारा ही कराये जाते है। यात्रियों के लेख उनके परिवार की बंशावली उसी तीर्थ पुरोहित की बही में मिलता है। लाखों की संख्या में आने वाले इन तीर्थयात्री/कल्पावासियों के ठहरने की व्यवस्था प्रयागवाल ही करता है, प्रयागवाल प्रशासन से शुल्क पर भूमि प्राप्त करता है, उस पर टेन्ट या कुटिया की व्यवस्था करता है। इसमें अपने यात्रियों को ठहराता है और इससे दान स्वरूप जो लेता है उसी से अपनी जीविका निर्वाह करता है।

अनेक रोगों का सार्वभौमिक टीकाकरण है कल्‍पवास


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