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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

2:50 am

कुरान, इस्‍लाम और जेहाद का वैश्विक चरित्र

इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए कि इस्लामिक जेहाद की खूनी घटनाएं किसी एक देश तक सीमित हैं। इसका चरित्र वैश्विक है। यह जेहादी आतंकवाद लगातार बढ़ रहा है। इसके चरित्र का गहराई से अध्‍ययन करें तो भारत गत हजार साल से इस इस्‍लामिक जेहाद के निशाने पर है। हां अमेरिका के लिए 9 नवंबर को विश्व व्यापार केन्द्र को ध्वस्त करने की घटना, इस्लामिक आतंकवाद की पहली घटना अवश्‍य हो सकती है। भारत में तो इसका लम्बा इतिहास एक गत हजार सालों का हैं। विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार 'विल डूरन्ट' ने लिखा है− भारतीय इतिहास का मुस्लिम काल, विश्व इतिहास का सर्वाधिक खूनी अध्याय रहा है।
हम आतंक की घटनाओं से सबक नहीं लेते। हम इतिहास से भी सबक नहीं लेते। हमारा पक्का विश्वास है कि सभी धर्म एक तरह के हैं। इंसानियत का सबक सिखाते हैं। लेकिन ऐसा है क्या? इस्लामिक धर्मग्रंथ कुरान, अल्लाह पर ईमान नहीं रखने वाले को अविश्वासी मानता है। ईसाई, जीसस के प्रति निष्ठा नहीं रखने वालों को अविश्वासी मानता है। यह दोनों विश्वासियों और अविश्वासियों में फर्क करते हैं। ईसाई मानते हैं कि गैर−ईसाइयों को नर्क में जाना पड़ेगा। कुरान के अनुसार अविश्वासियों को अल्लाह पर ईमान लाने के लिए हर तरफ से पूरा प्रयास करना चाहिए। और ऐसे प्रयासों में तलवार से मौत के घाट उतार देना भी शामिल है। विश्वासियों और अविश्वासियों में कहीं कोई बराबरी नहीं हो सकती।


आज दुनिया भर मे जो है, इन्हीं दोनों धर्मों के अपने−अपने अविश्वासियों के साथ हिंसाचार के कारण है। यहां कुरान को मानने वाले जेहादी आतंकवादियों की चर्चा हो रही है। जो हिंसक जेहाद में विश्वास नहीं करता, जेहादी उसे पक्का मुसलमान नहीं मानते। वैसे कुरान में कुल मिलाकर 6000 से ऊपर आयतें हैं। इसमें अनेक परस्पर विरोधी बातें भी हैं। इस्लामिक धर्मशास्त्र भी है। खण्डन−मण्डन भी है। जीवन−मृत्यु और फैसले का दिन, कानून, युद्ध का आह्वान वगैरह भी है। इसके अलावा पैगम्बर मोहम्मद साहब की जीवनी भी है। हिंसाचार के प्रोत्साहन वाले कुरान सम्मत आदेशों को जेहादी अविश्वासियों के खिलाफ सबसे अधिक तरजीह देते हैं। इसके लिए जान को कुर्बान कर देना अपना पवित्र कर्तव्य मानते हैं। कुरान में इस तरह के बलिदान की बड़ी महिमा है। ऐसे जेहादियों की संख्या, 100 करोड़ से अधिक मुसलमानों में मुश्किल से कुछ लाख होगी। यह सारे संसार को इस्लाम के झंडे तले लाने के लिए समर्पित हैं। फिदायीन हमले करने वाले ऐसे ही जेहादी होते हैं।

वैसे आमतौर पर मनुष्य शांति चाहने वाला प्राणी होता है। मुसलमानों में भी अधिकतर लोग शांति चाहने वाले ही होते हैं। जेहादियों में भले ही कुर्बानी का जज्बा हो, मगर कुरान के बहुत से आदेशों के वह उल्लंघन करने के दोषी होते हैं। हिंसक रास्ते के कारण उनका प्रभाव ज्यादा पड़ता है। अपनी हिंसक क्षमता के कारण वह अपनी बातें बहुत से मुसलमानों से मनवा लेते हैं। इसीलिए हम देखते हैं कि जेहादी निशाने पर कई बार बड़ी संख्या में मुसलमान स्वयं होते हैं। पाकिस्तान में तो मुस्लिम आबादी ही है। दूसरे धर्मों के नाम मात्र के लोग हैं। लेकिन वहां जेहादी हिंसा कम नहीं है, बल्कि पाकिस्तान तो आज विश्व भर के इस्लामिक आतंकवादी की जन्म−भूमि और पनाह−भूमि मानी जाती है। जहां तक भारत का सवाल है, यहां एक प्रतिशत मुसलमान भी अतिवादी इस्लामिक मत के नहीं हैं। लेकिन आतंकवाद की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए मुट्ठी भर लोग और कुछ स्थानीय सहायक काफी होते हैं। आज इस्लामिक आतंकवादियों ने सिर्फ जम्मू−कश्मीर और मुम्बई वगैरह में ही नहीं, करीब−करीब सारे देश में अपना एक व्यापक तंत्र बना लिया है। इनके पनाहगार भी हैं और समर्थक भी।
भारत में अनेक मुसलमानों है जो संसार की हालत को अपनी यात्राओं के कारण जानते हैं और यह मानते हैं कि भारत के मुसलमान दुनिया में सबसे अधिक शांति और सम्मान से जी रहे हैं। तर्क इस जेहाद को परास्त कर देगा, अगर भारत में वोट बैंक की राजनीति करने वाले दल उन्हें अनुकूल वातावरण बनाने दें। मगर ये राजनैतिक दल तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति का रास्ता छोड़ने वाले नहीं हैं।



गुरुवार, 31 जुलाई 2014

8:28 pm

आतंक की सियासत मजबूरी या विरासत ?



एक फ्रांसिसी फोटोग्राफर मेरे मित्र हैं। महीनों बाद आज लगभग एक घंटा से अधिक समय तक चैट हुआ। बातचीत की शुरुआत वेनिस शहर को लेकर हुई, जहां वह सपरिवार गया था। अचानक उसने पूछा तुम इजरायल के बारे में क्‍या सोचते हो ? मैने पूछा तुम मेरे विचार एक दोस्‍त के नाते जानना चाहते हो या एक भारतीय के नाते ?  उसने तपाक से कहा एक भारतीय के नाते और मैने फौरन कहा कि जो मेरी सरकार सोचती है वही, हवाटएवर इंडिया गर्वमेंट थिंकस। (हांलाकि भारत सरकार ने संयुक्‍त राष्‍ट्र में जो प्रस्‍ताव का समर्थन किया है उसका मै विरोधी हूं। मै इजरायल का समर्थक हूं। लेकिन एक विदेशी को अपना घरेलू अंर्तकलह क्‍यों बताउं ?) फ्रांसिसी मित्र ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में कई ऐसी बातें बताई जो सुनकर चौक गया। उसने कहा कि दो साल पहले भारत (महाकुंभ इलाहाबाद) से आने के बाद मै दुबई, वेनिस, इजरायल, पाकिस्‍तान जा चुका हूं, हांलाकि अप्रैल में फिर भारत आना चाहता था क्‍यों कि मुझे तिब्‍बत में बौद्ध लोगों के उत्‍सव की फोटो लेनी थी। खैर उसने कुछ आतंकी संगठनों के बारे में जो देखा है वह बताया जो कम से कम मेरे लिये नई जानकारी थी। 

उसके अनुसार दुनियां का सबसे क्रूर आतंकी संगठन है लार्डस रेजिस्‍टेंस आर्मी जो उत्‍तरी यूगांडा में सक्रिय हैं। यह संगठन उन युवकों की भर्ती करता है जो अपने सगे भाई या बहन का अपहरण करके हत्‍या कर दें और प्रमाणित करें कि वह पक्‍के आतंकी बन चुके हैं। सन 1986 में उत्‍तरी यूगांडा के अचोली जाति के लोगों ने इसकी स्‍थापना की थी। मैने पूछा क्‍यों ? तो उसने बताया दरअसल शुरुआत में कोई भी आंतकी संगठन असमानता, भेदभाव, अन्‍याय के खिलाफ ही पैदा होते हैं। यही कारण है लार्डस रेजिस्‍टेंट आर्मी के जन्‍म का भी। लेकिन बाद में यह अफ्रीका में बाईबिल पर आधारित कटटरपंथी राष्‍ट्र का पैरोकार हो गया। दरअसल मुसेविनी यूगांडा के राष्‍ट्रपति बने और उन्‍होंने अचोलियों पर बहुत कहर बरपाया था। शुरुआत में ये लोग 14-15 साल के बच्‍चों का अपहरण करेंगे फिर उसे अपनी छोटी बहन, भाई या मां की हत्‍या कर देने तक प्रशिक्षित करते हैं। इतना क्रूर तो अलकायदा भी नहीं है।
अरब क्षेत्र के अनेक देशों में लोकतंत्र है ही नहीं और नाही विपक्ष की कोई कल्‍पना है। जनता की आवाज शासकों के सामने उठाने वाला और सरकार या शासन सत्‍ता की गलत नीतियों का विरोध करने वाला कोई नहीं है। निरंकुश सत्‍ता अपने विरोधियों की हत्‍या कर देगी या उन्‍हें अपना जरखरीद गुलाम बना लेगी। यही कारण है कि अनेक बार आपको अफ्रीकन महा‍द्धीप के अनेक देशों में तख्‍ता पलट, तरह-तरह के रिवोल्‍यूशन, सैनिक शासन दिखाई देगा। तहरीर चौक याद है ?  
यहां के गरीब लोग सहायता के लिये मस्जिदों में जाते हैं। मिस्र में मुस्लिम ब्रदर हुड, फिलीस्‍तीन के हमास और लेबनान के हेजबुल्‍ला जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती हो जाना वहां के युवकों में एक फैशन है। ये आतंकी संगठन बकायदा छात्रों के लिये कोचिंग क्‍लासेज, रोजगार, मेडिकल सेवा और वाद-विवाद में न्‍यायालय जैसा कार्य भी जनता के लिये करते हैं। युवको को भर्ती करने के लिये ये तरह-तरह का संपादित वीडियों दिखाते हैं जैसे इजरायल अपने वेस्‍ट बैंक वालें इलाके में फिलीस्‍तीनीयों की चेकिंग करता है, क्‍यों कि इजरायल के दोनो ओर फिलीस्‍तीन है। इस चेकिंग के दौरान कई गर्भवती महिलायें घंटो खडी रहती हैं और बच्‍चा भी हो जाता है। इजरायल का यहूदी समुदाय फिलीस्‍तीनीयों की जमीन कब्‍जा कर लेते हैं, उनको खेती नहीं करने देते आदि। फिर मजहब और राष्‍ट्रीयता के नाम पर उनको भडकाया जायेगा। इजरायल के सिनेमा हाल से लेकर स्‍कूल, हास्‍पीटल पर हमले करने को शबाव का काम बताया जायेगा।
पाकिस्‍तान में जैश ए मुहम्‍मद इस्‍लामाबाद के अपने हेड क्‍वार्टर से संचालित है। इस्‍लामाबाद में इसका हेडक्‍वार्टर अनेक एकड जमीन पर फैला है। लश्‍करे तोयबा का हेडक्‍वार्टर लाहौर में हैं जो 140 एकड में है। इन हेडक्‍वार्टरों में स्‍वीमिंग पुल, चमडा उद्योग, नकली करेंसी के कारखाने, घोडों के तबेले, मोटर मै‍कैनिक वर्कशाप वगैरह के साथ मदरसे, जिम, फायरिंग, बमप्रशिक्षण आदि के अनेक क्‍लासेज है। लगभग 200 स्‍कूल-कॉलेज और यहां तक की चैनल और बडे अखबार प्रकाशन संस्‍थान भी है। भारत में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो उसके पाकिस्‍तानी प्रतिनिधी को पहले से निश्चित रकम दी जाती है, जिसमें से 35 प्रतिशत रकम आतंकी के परिजन तक पहुंचेगा बाकी रकम दलाल खा जायेगें।
लश्‍करे तोयबा, जैश ए मुहम्‍मद, हिजबुल मुजाहिदीन अपनी गतिविधियां एक दूसरे से सलाह मशविरा के बाद तय करते हैं। कुछ साल पहले इन्होंने एक संयुक्‍त मोर्चा बनाकर हरकत उल जेहाद को बांग्‍लादेश अपनी गतिविधियों के लिये भेजा था। नेपाल में ये अपने दोस्‍तों की तलाश में हैं। माओवादियों, उल्‍फा, तमिल आतंकी, नक्‍सलीयों के साथ इनकी भरपूर सहानुभूति है ताकी भारत को चारों ओर से घेरा जा सके।
दुनियां भर में फैल रहा आतंकवाद नया नहीं है। उन्‍नीसवी शताब्‍दी के अंत में यूरोप में आतंकवाद की बडी लहर आई। इसमें इटली का राजा, आस्‍ट्रीया की रानी, जर्मनी का राजा, रशिया का जार, और अमेरिकी राष्‍ट्रपति तक पर आंतकी हमले हुए। फ्रांस की संसद और वहां के काफी हाउस में बम विष्‍फोट हुए। अमेरिका में गोरे युवकों ने काले युवकों को मारने के लिये ‘’क्रू क्‍लस क्‍लन’’ बनाया, एशिया में तमिल चीतों ने आत्‍मघाती बम का आविष्‍कार कर डाला। हांलाकि एकबार इन सबको पश्चिमी राष्‍ट्रों ने खतम तो किया लेकिन आतंक का आइडिया पूरे विश्‍व में फैल गया। इजरायल-फिलीसतीन संघर्ष के कारण मध्‍यपूर्व देशों से लेकर पूरी दुनियां में आतंक को फैलने में मदद मिली। 1948 में इजरायल के जन्‍म के बाद से ही मध्‍यपूर्व सतत राजनैतिक ज्‍वालामुखी पर धधकता रहा है। पिछले 25 सालों में दोनों पक्षों ने तकरीबन 15 हजार मानव हत्‍याएं की हैं।
इतिहास में इजरायल के यहूदी समुदाय पर जो बेपनाह जुल्‍म हुए, लाखों यहूदियों का कत्‍लेआम हुआ और वह अपनी मातृभूमि से अलग कर दिये गये। पूरी दुनियां के उन देशों में शरण उन्‍होंने ली जहां उन पर वह जिंदा रह सके। भारत भी एक ऐसा ही देश था जहां इजरायलियों ने शरण प्राप्‍त किया। बाद में इजरायल के इतिहासकारों ने लिखा कि भारत ही एक ऐसा देश है, जिसने हमें अपने बराबर बैठाया और हमारे साईनागास (यहूदी मंदिरों) पर कभी हमले नहीं किये। खैर, मै उस इतिहास में नहीं जाना चाहता लेकिन आज जिस तरह इजरायल अपने अस्तित्‍व के लिये बेहद आक्रामक है उसके पीछे उसके ऐतिहासिक कटु अनुभव है।
इजरायल के दोनों ओर फिलिस्‍तीनी प्रदेश है। पश्चिम में‍ स्थि‍त गाजा पटटी अतिशय गरीबी, अन्‍याय और दरिद्रता से ग्रस्‍त है। कुछ साल पहले इजरायल ने उस पर से अपना कब्‍जा छोड दिया लेकिन उसकी बाहरी नाकेबंदी भी की। इजरायली सेना गाजा पटटी में अनाज, दवाएं, और जीवन के लिये जरुरी सामानों की आपूर्ति रोक देती है। इसलिये गाजा के लोग मिशाईलों से हमला करते हैं। इन मिशाईलों में बहुत से तो लोहार भटिटयों में तैयार होते हैं तो कुछ ईरान से चोरी छिपे आते हैं। फिलीस्‍तीन का दूसरा भाग वेस्‍ट बैंक हांलाकि नाम से वेस्‍ट है लेकिन वह इजरायल का पूर्वी भाग है। इस भाग में इजरायल के यहूदी जमीनों पर कब्‍जा कर लेंगे, खेती नहीं होने देंगे। वेस्‍ट बैंक में इजरायल की तकरीबन 600 से ज्‍यादे ही सुरक्षा चौकियां हैं। वहां से निकलने वाले फिलीस्‍तिनियों को वह रोकते हैं, घंटो तक लाईन में खडा करके सुरक्षा जांच करते हैं, इस दौरान कोई गर्भवती महिला का गर्भपात हो जाये तो उनको कोई फर्क नहीं पडता।
इसका परिणाम होता है कि युवकों को धर्म और राष्‍ट्रीयता के नाम से बरगलाया जायेगा, उनको संपादित वीडियो दिखाकर उत्‍तेजित किया जायेगा और आतंक की जमीन तैयार होगी। इन युवकों को हमास, आईसीआइएस तलाश करते हैं और उनको प्रशिक्षण देकर इजरायल के सार्वजनिक स्‍थानों होटलों, सिनेमा घरों और सार्वजनिका प्रतिष्‍ठानों पर हमले के लिये तैयार करते हैं। ज्‍यादातर आतंकियों के नेता चालाक हैं, धूर्त हैं और धनाढय है जो धन का लालच देकर भी युवकों को फंसाते हैं। सामान्‍य युवक इनके जाल आसानी से फंस जाता है।
इन समस्‍त कारणों का लेना-देना सिर्फ गरीबी, बेरोगारी और भूखमरी ही नहीं है। राजनैतिक कारण कहीं ज्‍यादे जिम्‍मेदार है। आज भी लोकतंत्र के नाम पर छदम और दिखावा वाले लोकतंत्र कायम है। ज्‍यादातर में सैनिक सत्‍ता है, राजतंत्र है तो कहीं पर बिलकुल कबीलाई शासन व्‍यवस्‍था है। विपक्ष, अभिव्‍यक्ति की आजादी, विरोध, असहमति के लिये कोई जगह है ही नहीं। सरकार का पूरा ध्‍यान शहरी वर्ग की ओर, मध्‍यमवर्गीय लोगों पर, विदेशी संबंधों ओर बडे उद्योगपतियों पर टिका रहता है। इसबात का फायदा अलकायदा, हमास, हेजबुल्‍ला, मुस्लिम ब्रदर हुड जैसे आतंकी संगठन उठाते हैं। अनेक बार अमेरिका जैसी ताकतों का सत्‍ता पिपासु सहयोग भी इनको मिलने लगता है। अमेरिका अपने फायदे के लिये कभी इनका संहारक तो कभी सहयोगी बन जायेगा।
याद है अमेरिका कभी ईरान के शाह का समर्थक था तो वहीं इजिप्‍ट और अफगानिस्‍तान की साम्‍यवाद समर्थक सरकारों का विरोधी भी था। बाद में रुस ने अफगानिस्‍तान पर हमला करके उसे एक बहाना दे दिया। इजिप्‍ट के राष्‍ट्रपति अनवर सादात ने साम्‍यवाद का विरोध करने के लिये मुस्लिम ब्रदरहुड को पालापोसा जिसका अमेरिका ने भी समर्थन किया। बाद में यही ब्रदरहुड राष्‍ट्रपति सादात के लिये जब खतरा बन गया तो उसके सदस्‍यों की धरपकड  शुरु हो गई। इनके अधिकांश सदस्‍य सउदी अरेबिया, मिस्र और पाकिस्‍तान की ओर पलायन कर गये।
मध्‍यपूर्व में अमेरिकी समर्थक शासकों के सहयोग के लिये, अफगानिस्‍तान में रुस को शह देने के लिये अमेरिका ऐसे ही धर्मांध युवको की तलाश में था जिसमें से एक ओसामा बिन लादेन निकला। इन युवकों को आतंकी अडडा, प्रशिक्षण आदि के लिये जगह अमेरिका ने अपने सरपरस्‍त शासकों के माध्‍यम से उपलब्‍ध करायें जिसमें पाकिस्‍तान के पूर्व राष्‍ट्रपति जियाउल हक ने पूरा सहयोग किया। ओसामा बिन लादेन ने जब खुद अमेरिका के उपर ही हमलें शुरु कर दिये तो अमेरिका इनका विरोधी हो गया। हांलाकि ओसामा की मौत के बाद अलकायदा उतना प्रभावी नहीं रहा जितना लश्‍करें तोयबा, जैस ए मुहम्‍मद हो चुका है। इनका उददेश्‍य सिर्फ कश्‍मीर तक सीमित नहीं है, वास्‍तव में ये कश्‍मीर को दान में लेना नहीं चाहते। सतत युद्ध ही इनका मकसद है। ये जानते हैं कि प्रत्‍यक्ष लडाई में हम कभी भारत के साथ टिकने वाले नहीं है। इसलिये छिपो, मारो और भागो की इनकी रणनीति है। ये भारत को उभरती आर्थिक महाशक्ति के बारे में सोचते हैं तो इनकी रातों की नीद गायब हो जाती है। पाकिस्‍तान आर्थिक ताकत के रुप में भारत का मुकाबला तो नहीं कर सकता लेकिन टांग पीछे खीचने की हर संभव कोशिश करता रहेगा। फिलहाल इतना ही बातें और भी है .....

-मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय
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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

11:44 pm

प्राचीन भारत के गर्भनाल से जुडा है पूर्वोत्‍तर



आज भी हमें पूर्वोतर के चेहरे अपने चेहरे नहीं लगते। यही कारण है कि आज भी उनको ‘’चिंकी’’ कहकर अपमानित किया जाता है। कुछ दिनों पूर्व आसाम दंगों के दौरान देश में जगह-जगह इनको योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया गया। जिसतरह दिल्‍ली में पूर्वोत्‍तर के एक छात्र को बेरहमी से पीटा गया उसमें नस्‍लवाल की श्रेष्‍ठता और हीनता की बजबजाती मानसिकता ही थी। हममें से अधिकांश लोग नहीं जानते पूर्वोतर के जनजीवन को जहां हजारों सालों बाद भी, ब्रिटीश कालखंड में ईसायईत के तमाम हथकंडो के झेलने के बाद भी, बडे गर्व के साथ वहां के लोग रामायण और महाभारत से अपने रिश्‍ते जोडते हैं। वह कहते हैं कि उनके ही पूर्वज थे रामायण और महाभारत के लोग जिनकी परंपरायें आज भी हम जीवित किये हैं। सूर्यदेव को सबसे पहले प्रणाम करने वाली अरुणांचल प्रदेश की 54 जनजातियों में से मीजो मिश्‍मी जनजाति खुद को भगवान कृष्‍ण की पटारानी रुक्मिणी का वंशज मानती है। रुक्मिणी आज के अरुणांचल के भीष्‍मकनगर की राजकुमारी थी। उनके पिता का नाम भीष्‍मक और भाई रुकमंद था। इस जनजाति के सिर के बाल आधुनिक हेयर कट सदियों से चले आये हैं, वे कारण बताते हैं कि भगवान कृष्‍ण ने सुदर्शन से यह आधा बाल रुकमंद के साथ युद्ध में मुंडन कर दिया था। 12 लाख की आबादी वाली मेघालय की खासी जयंतिया अपने तीरंदाजी सेना को लेकर आज भी अलग पहचान रखती है। आज भी यह जनजाति तीरंदाजी में अंगूठे का प्रयोग नहीं करते। उनको नहीं मालूम एकलब्‍य कौन थे। सिर्फ इतना मालूम है कि उनके किसी पुरखे ने अपना अंगूठा गुरुदेव को दान किया था इसलिये हम अंगूठा का प्रयोग करना पाप मानते हैं। नागालैंड का दीमापुर कभी हिंडींबापुर नाम से जाना जाता था यहां आज भी दीमाशा जनजाति है जो भीम की पत्‍नी हिडीम्‍बा से उत्‍पन्‍न घटोत्‍कच को अपना पूर्वज मानती है। असम के बोडो खुद को ब्रम्‍हा के पुत्र मानते हैं तो असम के ही कार्बी-आबलांग जनजाति के लोग रामायण के सुग्रीव को अपना पूर्वज मानते हैं। म्‍यामार अर्थात बर्मा से जुडने वाले जनपद उखरुल का पहले का नाम उलूपी रहा जो अर्जुन की पत्‍नी हुआ करती थी। यहां पर ताखुंल जनजाति हैं जो उलूपी को ही अपना पूर्वज मानती है, यह जनजाति मार्शल आर्ट में सिद्धहस्‍त है और अलगाववादी गुट एनएससीएन में कुछ युवक भी शामिल हैं। अर्जुन की दूसरी पत्‍नी चित्रांगदा मणिपुर के मैतेई समाज की है। यही कारण है आज भी पूर्वोत्‍तर में अधिकांश जनजातियां मातृसत्‍तात्‍मक समाज की गौरवशाली परंपरा में है। हजारों सालों की मुगल और ब्रिटीश कालखंड की काली परछाई आज भी उनका पीछा नहीं छोड रही, नहीं तो क्‍यों होता जानलेवा हमला दिल्‍ली में ?  







11:19 am

अंग्रेजी कानून से आजादी कब ?

पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ एपीजे अब्‍दुल कलाम वाराणसी में छात्रों के साथ थे और उन्‍होंने छात्रों से  निवेदन किया कि आपको डिग्री देते समय जो काला चोगा पहनाया जाता है वह हमें गुलामी की याद दिलाता है इसे मत पहने। इसके बाद बीएचयू ने कहा है कि जल्‍दी ही हम विवि के तौर तरीकों में संशोधन करके ब्रिटीश काल की अनेक पंरपराओं का अंत करेंगे। मै स्‍वागत करता हूं उनके इस सराहनीय संकल्‍प का। आज भी कंपनी शासन और ब्रिटीश शासन के दौरान के 34 हजार कानून और विभाग चलाये जा रहे हैं। 1813 में ब्रिटीश हाउस आफ कामंस की डीबेट में विल्‍वर फोर्स कहता है कि ’अगर कम्पनी का माल भारत के गांव-गांव में पहुंचाना है तो हमें ‘’फ्री ट्रेड’’ करना होगा और भारतीय अर्थव्‍यस्‍था को नष्‍ट करना होगा। इसी के बाद 1813 में ही कंपनी का चार्टर फार फ्री ट्रेड नाम का चार्टर आ जाता है। इसमें ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की सरकार पहली पालिसी यह बनाती है कि ब्रिटीश माल पर हिंदुस्‍थान में कोई टैक्‍स नहीं लगेगा। भारतीय वस्‍तुओं पर टैक्‍स लगाने और महंगा करने के लिये इसी चार्टर के अंतर्गत सबसे पहला टैक्‍स सेंट्रल इक्‍साइज टैक्‍स, फिर सेल्‍स टैक्‍स, उत्‍पादन और बिक्री के बाद इनकम टैक्‍स, इसके बाद वस्‍तुओं के आवागमन पर आक्‍ट्राय टैक्‍स और टोल टैक्‍स। इसप्रकार 1813 के चार्टर से भारत पर शोषण के लिये ये पांच टैक्‍स लगाने के लिये बकायदा पांच डिपार्टमेंट भी खोल दिये गये जो आज भी बदस्‍तूर जारी है। बीस-बीस साल के चार्टर के बाद जब फिर से ब्रिटीश पार्लियामेंट में डीबेट होता है तो एक सांसद कहता है-अरे आपने भारतीयों पर सौ रुपये की आमदनी पर 97 रुपये टैक्‍स लगा दिया है इसतरह तो वे मर जायेगें। तो जबाब मिलता है यही तो हम चाहते हैं या तो वे मर जाये या टैक्‍स चोरी शुरु कर दें, जब वे चोरी करेंगे तो भ्रष्‍ट हो जायेगें और हमारी सत्‍ता हमेशा कायम रहेगी। आपको निवेदन करुंगा टैक्‍सेसन का यह सिस्‍टम आजादी के बाद 1972 तक चलता रहा अर्थात सौ रुपये की इनकम पर 97 रुपये का टैक्‍स देना होता था। बहरहाल विलियम एडम 1840 में एक सर्वे कराता है भारत के रिवेन्‍यू अधिकारियों से कि पता करो भारत का कुल ट्रेड दुनियां के कुल व्‍यापार में कितना है तो पता चलता है भारत का पूरे विश्‍व में व्‍यापार में हिस्‍सेदारी 33 फीसदी है जबकि आजादी के इतने सालों बाद हमारा कुल व्‍यापार एक फीसदी के आसपास अटका हुआ है। 
इतना ही नहीं इस सर्वे में यह बात भी लिखी जा रही है कि भारत में स्‍टील बनाने की दस हजार फैक्‍ट्रीया है जिसमें बनी हुई स्‍टील में कभी जंग लग ही नही सकता। इसका एक उदाहरण मेहौरौली का लौह स्‍तंभ है जो आज भी है। ब्रिटीश पार्लियामेंट में बाकायदा सात दिन तक इस बात को लेकर हायतौबा मचता है कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी के सारे जहाज भारतीय लोहे से ही बनाया जाये डेनिश स्‍टील से नहीं बनाये जाये। उस जमाने में भारतीय स्‍टील के बाद डेनमार्क का स्‍टील बनाने में स्‍थान रहा है। क्‍या यह बिना किसी हाईटैक के भारत कर सकता था ? कौन बनाता था यह स्‍टील हमारे सरगुजा से लेकर आसाम, मध्‍यप्रदेश, बिहार और उत्‍तरप्रदेश के आदिवासी ही अपनी फैक्‍ट्रीयों में स्‍टील बनाते थे, जो न तो बीटेक थे नाही आज के तथाकथित हाइटेक थे। अब वही आदिवासी अगर लौह अयस्‍क अपनी खदानों से लेना चाहे तो कानून उनको चोर मानते हुए जेल भेज देता है, जो अंग्रेजों का बनाया हुआ कानून आज भी चल रहा है। 1890 में ब्रिटेन में वेजीटेरियन काउंसिल की एक पत्रिका में गांधी जी लिखते हैं- ‘’ये अंग्रेज कितने क्रूर हैं इन्‍होंने तो भारतीय नमक पर भी टैक्‍स लगा दिया, मुझे लगता है जिन जहाजों से ये भारतीय माल अपने देश में ले जाते हैं उन जहाजों को खाली ले जाने पर डूबने का भय है इसलिये ये नमक लाद कर ले जाते हैं, लेकिन मै चुप नहीं बैठूंगा और नमक कानून तोडूंगा’’। भारतीय संसाधनों के दोहन के लिये 1865 में अंग्रेजों ने इंडियन फारेस्‍ट कानून बनाया ताकी भारतीय जंगलों का सफाया हो सके और आईएफएस अधिकारी को नियुक्‍त कर दिया। इस कानून के मुताबिक कोई भी आदिवासी या भारतीय पेड से लकडी नही काट सकता जबकि अंग्रेजों के ठेकेदार ही इस काम को कर सकते हैं। 1860 का पुलिस एक्‍ट से 1857 के विद्रोह के परिपेक्ष्‍य में समझने का प्रयास किया जाये तो इंडियन पुलिस एक्‍ट जिसमें अंग्रेज सिपाही भारतीयों और क्रातिकारियों पर लाठी चार्ज का अधिकार होता था हर अंग्रेज को राईट टू आफेंस तो होता था लेकिन मार खाने वाले को राईट टू डिफेंस नही था। यह आज भी चल रहा है कानून-व्‍यस्‍था मेंटेन करने के नाम पर कल का छात्रों पर किया गया लाठी चार्ज उसी का नतीजा है। यही कानून आधार बना था 13 अप्रैल्‍ 1919 को जलियावाला बांग कांड का आधार बना । निर्लज्‍ज सरकारी लीपापोती वाले कमीशन के सामने डायर कहता है कि 18 मिनट तक लगातार फायरिंग के बाद मेरे पास कारतूस खतम हो गये थे लेकिन मुझे संतोष इस बात का है कि काफी लोग तो भगदड में मर गये और कुछ कूंए में कूद गये जो डूबकर मर गये और हमारा कारतूस बच गया। जरा याद किजीये उस कुर्बानी को और आईये हम अपने जनप्रतिनियों से कहें कि हमें सौ फीसदी आजाद हिंदुस्‍तान चहिये।