रविवार, 26 मार्च 2017

यूपी सरकार का डàीम प्रोजेक्ट: संस्थाओं का यादवीकरण


पी मार्कण्डेय
आपने मार्कोस का नाम सुना है? इतिहास में यह व्यक्ति सबसे भ्रष्ट नेता के रुप में दर्ज है। मार्कोस ने अपने व्यक्तिगत लाभ और सत्ता में बने रहने के लिए एकप्रकार से अपने देश को गिरवी ही रख दिया। इस कड़ी में उसने सबसे पहले भर्ती संस्थाओं को खत्म किया और अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक पद रेवड़ियों की तरह बांटे। बाद में यह परंपरा रुढ हो गई और आज भी उनके पटवारी, तहसीलदार से लेकर विदेशी राजदूत तक सत्ताधारी दल के कार्यकताã बनाए जाते हैं।
खैर, जब सईया भए कोतवाल तो डर काहे का? कहावत तो सुनी होगी आपने, अब यह पूरी तरह उत्तरप्रदेश में भर्ती संस्थाओं पर सटीक बैठने लगा है। पहले पश्चिम बंगाल की सरकार पर यह आरोप लगता था कि वामपंथी कैडर को शासन और प्रशासन से लेकर नौकरियों के अंतिम पायदान तक भर दिया गया है। यदि आपको सरकारी मुलाजिम होना है तो उसके लिए जरुरी योग्यता यह है कि आपने लाल झंडा और लालसलाम बोलना सीख लिया है। बात यहां तक होती तो भी गनीमत था, लेकिन उत्तरप्रदेश की समाजवादी सरकार ने तो और भी ''प्रगतिशील’’ रुख अख्तियार किया हुआ है। लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फटकार लगने के बाद भी सरकार को कोई खास फर्क नहीं पड़ता और उत्तम प्रदेश में नौकरियों की भर्ती संस्थाएं समाजवादी कार्यालय का रुप ले चुकी है।
हांलाकि अखिलेश राज में उप्र लोकसेवा आयोग यादवों को नौकरी देने का 'ठेकेदार’ तो बन ही गया है। लेकिन अब ताजा मामले में हाईकोर्ट इलाहाबाद ने सिविल पुलिस में दरोगा और प्लाटून कमांडर के पदों पर भर्ती के लिए वर्ष 2०11 में जारी चयन प्रक्रिया रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने दोबारा से लिखित परीक्षा कराकर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने का फैसला सुनाया है। दरोगा के 4०1० पदों के लिए 2०15 में चयनित अभ्यर्थियों की ट्रेनिग चल रही है। कोर्ट ने चयन के लिए पहले कराई गई लिखित परीक्षा और बाद की पूरी प्रक्रिया ही रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति राजन रॉय ने अभिषेक कुमार सिह व अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
याचियों के अधिवक्ता विधु भूषण कालिया के मुताबिक याचिका में आरोप लगाया गया था कि उक्त चयन में पात्र अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। हालांकि, राज्य सरकार ने कोर्ट में इस याचिका का विरोध किया लेकिन हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दोबारा से लिखित परीक्षा कराने का फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश पुलिस उपनिरीक्षक व प्लाटून कमांडर भर्ती 2०11 में उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार व उत्तर प्रदेश पुलिस प्रोन्नति व भर्ती बोर्ड द्बारा जमकर अनियमितता, भ्रष्टाचार व नियम विरूद्ध कार्य किए गए हैं जिसके कारण योग्य अभ्यर्थी चयन से वंचित हैं और अयोग्य अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया है, इस भर्ती में निम्न प्रकार से नियम विरुद्ध कृत्य व भ्रष्टाचार किया गया है
1-यह भर्ती प्रकिया मई 2०11 में बसपा सरकार के कार्यकाल में प्रारम्भ हुई थी। प्रारम्भिक परीक्षा से एक माह पूर्व बोर्ड ने परीक्षा के लिए अनुदेश जारी किये, जिसके अनुसार प्रत्येक पेपर में में 4०% तथा कुल 5०% अंक लाने वाले अभ्यर्थी ही सफल घोषित किये जायेंगे, कुल पेपर तीन था एक सामान्य अध्ययन का , दूसरा सामान्य हिदी का और तीसरा सामान्य गणित का । इसी आधार पर 11दिसम्बर 2०11 को प्रारम्भिक परीक्षा सम्पन्न हुई। प्रारम्भिक लिखित परीक्षा का परिणाम 1 जनवरी2०13 को घोषित किया गया।
2- प्रारम्भिक परीक्षा के विरूद्ध हर विषय में 4०% अंक लाने में विफल परन्तु कुल5०% अंक लाने वाले अभ्यार्थियों ने माननीय उच्च न्यायालय उत्तर प्रदेश की लखनऊ खण्डपीठ में याचिका संख्या 91/2०13 दायर की, जिस पर माननीय न्यायधीश ने 23/1/13 को निर्णय दिया कि आपको पूर्व ही सूचित किया जा चुका था कि 4०% प्रत्येक खंड में प्राप्त करना अनिवार्य है और आपने परिणाम घोषित होने के पश्चात याचिका दायर की है इसलिए आपकी अपील खारिज की जाती है। यह अपील समाजवादी सरकार द्बारा कराई गई थी क्योंकि बसपा सरकार में धांधली न कर पाने वाले छात्र फेल हो चुके थे ।

3-इस भर्ती प्रकिया के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा हेतु मानक 1० किलोमीटर एक घण्टा माना गया था । दक्षता परीक्षा 5 फरवरी 2०13 को शुरू हुई, परन्तु 18 फरवरी को दौड़ लगते समय एक अभ्यार्थी की मृत्यु हो जाने से इसे रोक दिया गया। हालांकि मृत्यु का कारण लखनऊ में चल रहे दौड़ में प्रतिभागियों हेतु डॉक्टर की व्यवस्था न होना था।

4- इस भर्ती प्रकिया में सरकार के कहने पर भर्ती बोर्ड द्बारा शारीरिक दक्षता परीक्षा में संसोधन कर 1०किमी० की दौड़ को 4.8 किमी० आधे घण्टे में कर दिया गया और प्रकिया पुन: 5 जुलाई 2०13 को प्रारम्भ गयी जिस पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद द्बारा रोक लगाये जाने के कारण दिनांक 7 जुलाई 2०13 को प्रकिया रोक दी गयी । माननीय उच्च न्यायालय का कहना था की खेल के नियम में खेल के बिच में परिवर्तन सम्भव नहीं है क्योंकि कई छात्र 1० किलोमीटर की दौड़ पास कर चुके हैं , प्रतिभागी छात्रों को दौड़ स्थल पर उचित चिकित्सा सुविधा दिया जाय ।

5- इसके पश्चात न्यायालय के फैसले को दरकिनार करने हेतु शासन ने भर्ती को रद्द कर दिया था जिसके विरूद्ध अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद में याचिका संख्या 5576/2०13 दायर की जिस पर न्यायाधीश ने दिनांक 9/12/2०13 को मूल विज्ञप्ति के अनुसार भर्ती प्रक्रिया को शुरू करने का आदेश दिया। यह समाजवादी सरकार के लिए करारा झटका था ।

6-इस भर्ती प्रकिया में दिनांक 25/०7/13 को उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ ने याचिका संख्या 1476/2०13 व 62 अन्य में आदेश दिया कि प्रारम्भिक लिखित परीक्षा में कुल5०% अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी सफल घोषित किये जाये और प्रत्येक विषय में न्यूनतम 4०% प्राप्त करने की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया जबकि यह मुद्दा याचिका संख्या 91 /2०13 द्बारा निस्तारित किया जा चुका था। दोनों ही याचिका पर सुनवाई माननीय न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ द्बारा ही की गयी।

7- याचिका संख्या 1476/2०13 के निर्णय के अनुपालन में 497०2 अभ्यार्थियों को भर्ती बोर्ड द्बारा सफल घोषित किया गया, इस आदेश के अनुपालन में भर्ती बोर्ड द्बारा उन अभ्यार्थियों को भी चयन किया गया जिन्होंने कुल 5०% अंक प्राप्त नही किये।
8- प्रारम्भिक लिखित परीक्षा में घोषित (सफल)497०2 अभ्यार्थियों के सापेक्ष 46578 अभ्यार्थियों के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा हेतु बुलावा पत्र भेजा गया। 2524 अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण होते हुए भी बुलावा नही भेजा गया जिससे वे अपने रोजगार के अधिकार से वंचित हो गये।

9- याचिका संख्या 57576/2०13 के अनुपालन में शारीरिक दक्षता परीक्षा 1० किमी० की बाध्यता के साथ दिनांक ०4/०8/2०14 को शुरू हुई और 3/०9/2०14 समाप्त हुई जबकि उपनिरीक्षक भर्ती नियमावली के अनुसार शारीरिक दक्षता परीक्षा अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में पूरी की जानी थी।

1०- शारीरिक दक्षता परीक्षा में आईएसआई प्रमाणित उपकरण का प्रयोग नहीं किया गया जबकि उपनिरीक्षक भर्ती नियमावली 2००8 के अनुसार उपकरण केवल आईएसआई प्रमाणित ही प्रयोग किये जाने थे, इस संबंध में माननीय उच्च न्यायालय में याचिका संख्या 613/2०15 व अन्य 47 याचिकाएं लंबित है और भर्ती बोर्ड बारबार इस मुद्दे पर न्यायालय को उचित जबाव नहीं दे पा रहा है।

11- शारीरिक दक्षता परीक्षा में 15777 अभ्यर्थी सफल घोषित किये गये जिनकी मुख्य लिखित परीक्षा 14 सितम्बर 2०14 को संपन्न हुई
12- मुख्य लिखित परीक्षा में 14256 अभ्यार्थी सफल घोषित किये गये।
13-भर्ती प्रकिया के अगले चरण समूह परिसंवाद के लिये विज्ञप्ति के अनुसार 4०1० रिक्तियों के सापेक्ष तीन गुना अभ्यार्थियों को अर्थात 12०3० अभ्यार्थियों को बुलाया जाना था परन्तु भर्ती बोर्ड द्बारा सभी सफल अभ्यार्थियों अर्थात 14256 अभ्यार्थियों को बुलाया गया।

14- शारीरिक दक्षता परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षामें जमकर नकल व व्हाइटनर का प्रयोग किया गया जिसके विरूद्ध याचिका संख्या 67782/2०14 व 2० अन्य माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दायर की गयी परन्तु इस याचिका पर निर्णय होने के पूर्व ही दिनांक 16/०3/2०15 को परीक्षा परिणाम घोषित कर दिया गया।

15- याचिका संख्या 67782/2०14 व 2० अन्य में न्यायधीश महोदय ने दिनांक 29/०5/2०15 को आदेश दिया कि व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग करने वाले अभ्यार्थी नियमावली अनुसार अयोग्य घोषित किये जाते है।

 16- याचिका संख्य 67782/2०14 व 2०अन्य के आदेश के अनुपालन में भर्ती बोर्ड ने संसोधित परीक्षा परिणाम घोषित किया परन्तु इस याचिका में भर्ती बोर्ड द्बारा माननीय उच्च न्यायालय को बताया कि 3०38 अभ्यार्थियों ने व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग किया परन्तु संशोधित परीक्षा परिणाम में ऐसे अभ्यार्थियों का भी चयन किया गया जिन्होंने माननीय उच्च न्यायालय में स्वीकार किया था कि हमने व्हाइटनर, ब्लेड आदि का प्रयोग किया है और हमारा अभ्यर्थन निरस्त न किया जाये। भर्ती बोर्ड द्बारा माननीय उच्च न्यायलय के सम्मुख बतायी गयी संख्या 3०38 के सापेक्ष 288० अभ्यार्थियों को ही सूची प्रस्तुत की।
उपरोक्त कारणों के अलावा भी अनेक कारण है जो सरकार की लीपापोती को उजागर करते हैं।

छात्रों का आरोप है कि समाजवादी सरकार ने दौड़ से ही प्रतियोगियों के साथ सौतेला व्यवहार शुरू कर दिया था। छात्रों को अलग-अलग स्थानों पर दौड़ के लिए बुलाया जाता था किन्तु दौड़ के लिए नियमानुकूल कोई इंतजाम नहीं किया जाता था । मसलन यदि शाम 5 बजे दौड़ के लिए बुलाया गया है तो अंधेरा होने तक इंतजाम करने का हवाला देकर प्रतिभागियों को इंतजार कराया जाता था और अंधेरे में प्रकाश तक की कोई व्यवस्था नहीं रहती थी । कई बार दौड़ समाप्त होने के बाद दौड़ को रद्द कर छात्रों को पुन: दौड़ के लिए बुलाया जाता था। भर्ती बोर्ड ने दौड़ के लिए किसी छात्र को गर्मी में तो किसी को बरसात में ही दौड़ा दिया । दौड़ में अपने मनचहों को पास करने हेतु भर्ती बोर्ड ने मनमानी करने हुए दौड़ चेस्ट नम्बर जो इलेक्टो मैग्नेटिक चिप था तथा जिससे दौड़ की गणना होनी थी में ही व्यापक धांधली की , जिन्हें पास करना था उन्हें कुछ इस प्रकार का चीप दिया गया जो 6 किलोमीटर में ही दौड़ की 1० किमी की रीडिग कर देता था बाकि को मार्का का चीप दिया गया ।
फिर भी कुछ होनहार सफल हुए। वास्तव में सफेदा के प्रयोग को लेकर जो मुकदमा किया गया उसने भर्ती बोर्ड ने उन छात्रों की बलि चढ़ाने का प्रयास किया जो किसी कारणवश अनुक्रमांक आदि सही करने हेतु सफेदा का प्रयोग किये थे। उन छात्रों का बायोडाटा छिपा लिया गया जिनको भर्ती बोर्ड द्बारा खुद सफेदा लगाकर पास कराया गया था ।
छात्रों का कहना है कि यह समाजवादी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था की पूरी भर्ती का यादवीकरण किया जाय। जिसमे हर स्तर पर मनमानी की है यही कारण है की परीक्षा के प्रत्येक चरण पर छात्रों को माननीय उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में बारबार जाना पड़ा । दिलचस्प यह है की सुप्रीम कोर्ट में भर्ती बोर्ड ने जिस समायोजन की बात कही थी उनमे कुछ चुनिदा छात्रों को ही बुलावा पत्र आया बाकि छात्र कई बार भर्ती बोर्ड का घेराव कर चुके हैं तथा शासन की लाठियों का सामना कर चुके हैं ।
अभी भी दौड़ की अनियमितता, मुख्य परीक्षा में धांधली, आरक्षण नियमावली का उल्लंघन को लेकर कई याचिकाएं लम्बित हैं। अब देखना है आगे क्या होता है।

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