रविवार, 26 मार्च 2017

जाट आरक्षण कल से आज तक


पी मार्कण्डेय
कालिका रंजन अपनी किताब में लिखते हैं कि जाट मरते वक्त अपने उत्तराधिकारी को यह बता कर मरता है कि किस-किसका कितना कर्जा चुकाना है। जाटों की उत्पत्ति और इतिहास पर कालिका रंजन कानूनगो, उपेंद्र नाथ शर्मा, जदुनाथ सरकार, नत्थन सिह और कुंवर नटवर सिह ने भी लिखा है और जाटों के गौरवशाली इतिहास का वर्णन किया है। भारत पर विदेशी हमले होते रहे हैं। अपनी जमीन की लड़ाई जाटों ने अपनी जान की बाजी लगाकर लड़ी है। इस लड़ाई में जाट महिलाओं का योगदान भी कम नहीं रहा है। हरियाणा पंजाब सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यदि गर्भवती मां खेत में काम करते हुए दिखे या देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लोहा लेता हुए कोई जवान दिखे तो समझ जाईये वह जाट होगा। साहस और शारीरिक श्रम करना जाट का सहज गुण है, इसलिए जाटों को लेकर ही कभी लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था जय जवान जय किसान। मदन मोहन मालवीय ने कहा था भारत की रीढ़ जाट ही हैं।
जाटों में अभिव्यक्ति की भारी कमी है कारण अपनी बात को कैसे कहना-रखना है, यह जाट के लिए काफी मुश्किल है। जाटों से जुड़ी एक कहावत मशहूर है कि आगे सोचे दुनिया और पीछे सोचे जाट यानी दुनिया के दूसरे लोग तो करने से पहले सोचते हैं लेकिन जाट करने के बाद सोचता है। यह जाटों की सबसे बड़ी खामियों में से एक है, जिसे अब दूर करना चाहिए।
औरंगजेब की धर्म विरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह के बारे में ठाकुर सुरजनसिह शेखावत अपनी पुस्तक गिरधर वंश प्रकाश जो राजस्थान के तत्कालीन खंडेला ठिकाने का वृहद् इतिहास है में लिखते है कि मेवात प्रांत के बृजमंडल के निवासी जाट हांलाकि खेतिहर किसान थे लेकिन वे जन्मजात लड़ाकू वीर योद्धा भी थे। अन्याय और अत्याचार के प्रतिकार हेतु शक्तिशाली सत्ताबल से टकराने के लिए भी वे सदैव कटिबद्ध रहते थे। औरंगजेब की हिन्दू धर्म विरोधी नीति व मथुरा व वृन्दावन के देवमन्दिरों को ध्वस्त करने के चलते उत्तेजित जाटों ने गोकुला के नेतृत्व में संगठित होकर स्थानीय मुगल सेनाधिकारियों से डटकर मुकाबला किया था। उनसे लड़ते हुए अनेक मुगल मनसबदार मारे गए। जाटों ने गांवों का लगान देना बंद कर दिया मुगल सेना से लड़ते हुए गोकुला के मारे जाने पर सिनसिनी गांव के चौधरी भज्जाराम के पुत्र राजाराम जो अप्रतिम वीर और योद्धा था ने उस विद्रोह का नेतृत्व संभाला।

राजाराम ने बादशाह के खालसा गांव में जमकर लूटपाट की एवं दिल्ली आगरा के बीच आवागमन के प्रमुख मार्गों को असुरक्षित बना दिया जो भी मुगल सेनापति उसे दबाने व दंडित करने के लिए भेजे गए वे सब पराजित होकर भाग छूटे। राजाराम ने आगरा के समीप निर्मित सम्राट अकबर के भव्य और विशाल मकबरे को तोड़फोड़ कर वहां पर सुसज्जित बहुमूल्य साजसामान लुट लिया व कब्रों को खोदकर सम्राट अकबर व जहाँगीर के अस्ति-पंजरों को निकालकर अग्नि को समर्पित कर दिया। केसरीसिह समर के अनुसार-
ढाही मसती बसती करी, खोद कबर करि खड्ड
अकबर अरु जहाँगीर के , गाडे कढि हड्ड
प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहास लेखक विन्सेंट स्मिथ ने भी अपनी पुस्तक अकबर दी ग्रेट मुगल में निकोलो मनूची के उल्लेख की पुष्टि करते लिखा है कि औरंगजेब जब दक्षिण में मराठा युद्ध में सलंग्न था मथुरा क्षेत्र के उपद्रवी जाटों ने सम्राट अकबर का मकबरा तोड़ डाला। उसकी कब्र खोदकर उसके अवशेष अग्नि में जला डाले। इस प्रकार अकबर की अंतिम आंतरिक इच्छा की पूर्ति हुई। आगरा सूबा में नियुक्त मुगल सेनाधिकारियों से राजाराम का दमन नहीं किया जा सका, तो बादशाह ने आंबेर के राजा बिशनसिह को,जिसका पिता राजा रामसिह उन्ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हुए थे मथुरा का फौजदार बनाकर जाटों के विरुद्ध भेजा। राजा बिशनसिह उस समय नाबालिग था सो लांबा का ठाकुर हरिसिह उसका अभिभावक होने के नाते सभी कार्य संचालित करता था। ठाकुर हरीसिह ने ही खंडेला के राजा केसरी सिह जो खुद भी बाद में औरंगजेब का विद्रोही बना और शाही सेना से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था।

अटल जी ने दिया था सबसे पहले आरक्षण
1998 में पूर्व प्रधानमंत्री इन्दर कुमार गुजराल की सरकार के वक्त पिछड़ी जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में जाटों को शामिल किए जाने की सिफारिश की थी। लेकिन गुजराल सरकार ने इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया। अगस्त 1999 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ओबीसी श्रेणी के तहत जाटों को आरक्षण देने, राजस्थान के जाटों को पिछड़े वर्ग का दर्जा देने का वादा किया। भाजपा ने राज्य में 25 सीटों में से 16 जीती। इस प्रकार जाट आरक्षण के राजनीतिकरण की शुरुआत हुई। अक्टूबर 1999 में बाजपेयी सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में राजस्थान के जाटों को आरक्षण देने के अपने वादे को पूरा दिया। इसके बाद, अन्य राज्यों में भी जाटों को आरक्षण की मांग शुरू हो गई। 2००4 के लोकसभा चुनावों के दौरान, जाटों के लिए आरक्षण के वादे को एक बार फिर राजनीतिक दलों ने हवा दी। चुनावों के बाद आरक्षण की मांगों को बल नही मिला, तब छोटे आंदोलन और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
9 मार्च 2००7 को दिल्ली में अखिल भारतीय जाट महासभा के सम्मेलन में जाट आरक्षण की मांग उठाई गई। इस बार सम्मलेन में कई केंद्रीय और राज्य के मंत्रियों और सांसदों ने भाग लिया, जिसके कारण यह सम्मलेन अधिक महत्वपूर्ण था। चौधरी यशपाल मलिक ने जाट आरक्षण की मांग के लिए लड़ने के के लिए अखिल भारतीय जाट महासभा से अलग अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति का गठन किया। अपनी स्थापना के बाद से ही संगठन ने कई विरोध प्रदर्शनों और रैलियों का आयोजन किया है। जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने हिसार से 15 किलोमीटर दिल्ली हाइवे पर मय्यड़ गांव में जाम लगाया। देश भर में 62 जगहों पर रेलवे व हाइवे पर प्रदर्शन हुए।
देश भर के 15 रेलवे ट्रैक के पास धरने पर बैठे थे जाट समुदाय के लोग
पुलिस ने भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारियों को उठाया गया। लोगों ने इसका विरोध किया। लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले, पथराव। मय्यड़ गांव के संदीप कड़वासरा की गोली लगने से मौत। शव को रेलवे ट्रैक पर रख कर जाट समुदाय ने आंदोलन किया।

हरियाणा में सरकार ने जाटों को 1० प्रतिशत अलग से आरक्षण में शामिल किया
संसद के बजट सत्र के दौरान जंतर-मंतर पर देश भर में 55 जगहों पर धरने की शुरूआत 31 मार्च तक 55 जगहों पर धरना व जंतर-मंतर पर लगातार 1० मई 2०13 तक संसद के बजट सत्र की समाप्ति तक धरना जारी रहा। बाद में आंदोलन के दौरान जिनकी मौत हुई उनके नाम पर शहादत दिवस का आयोजन करके राष्ट्रीय स्तर की रैली का आयोजन हुआ और 3० अक्टूबर तक आरक्षण ना मिलने पर दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश में जाटों से कांग्रेस को वोट ना देने का संकल्प का आहवान। केंद्रीय मंत्रीमंडल की ओर से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 9 राज्यों के जाटों की आरक्षण की मांग पर राज्यों के आधार पर दी सुनवाई शुरू करने का निर्देश दिया गया। मार्च 2०14 को राष्ट्रीय चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने से एक दिन पहले यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने जाट समुदाय के लिए आरक्षण को मंजूरी दे दी। अप्रैल 2०14 में जाटों को दिया गया अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कोटा देने से केंद्र को रोकने के लिए मना कर दिया। 17 मार्च 2०15 को सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी में जाटों को शामिल करने के केंद्र सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया और कहा कि सिर्फ जाति ही आरक्षण का आधार नहीं हो सकती। हांलाकि बाद में नरेंद्र मोदी सरकार ने भी सिद्धांत रुप से जाट आरक्षण का समर्थन किया है और अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।







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