रविवार, 26 मार्च 2017

आतंक और कालाधन पर देशभर में मोदी की छापेमारी



पी मार्कण्डेय
गत दिनों संसद में विपक्ष की ओर से कटाक्ष किया था कि प्रधानमंत्री ने चीन में जी-2० की बैठक में 'काला धन’ के ऊपर टिप्पणी की है, वो नाकाफी है और हमें शीघ्र परिणाम चाहिए। हम उनसे ये जानना चाहते हैं कि चुनाव से पहले जब वो पूरे देश में बखान कर रहे थे कि कालाधन 1०० दिन के भीतर वापस लाएंगे तो अब देर किस बात की है? क्या उनको इस बात का ज्ञान नहीं था कि अंतर्राष्ट्रीय मनी लांड्रर्स भी हैं? क्या इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि जो अंतर्राष्ट्रीय कानून हैं वो इस मामले में बड़े पेचीदा हैं और कई मुल्कों में कई ऐसे बैंक हैं जो वहाँ के कानून के तहत गोपनीयता मैन्टेन करते हैं?

कांग्रेस पार्टी ने जोर देकर कहा कि हम साफ तौर से ये कहना चाहते हैं कि पिछले दो साल में जो काला धन देश में वापस आया भी है, उसकी सारी बुनियाद यूपीए सरकार के समय में रखी गई थी। 1०० से ज्यादा टैक्स इनफर्मेशन एक्सचेंज एग्रीमेंट साईन किए गए थे, ड्यूल टैक्स अवॉयडेंस ट्रीटी साईन की गई थी और एक जो ढांचा आर्थिक महामंदी के बाद, 2००8 के बाद यूपीए की सरकार ने तय किया था, या फिर उसकी बुनियाद रखी थी, उसके कारण पिछले दो वर्ष में ये कुछ काला धन वापस लेकर आ सके। आगे कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया कि पनामा पेपर्स के माध्यम से जिन लोगों के नाम का खुलासा हुआ क्या सरकार ने उन नामों को सार्वजनिक किया? क्या सरकार ने उन लोगों को गिरफ्तार किया ?

लेकिन विपक्ष सहित कांग्रेस को इस बात का इलहाम नहीं था कि प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी देशभर में एक साथ इनकम टैक्स की रेड मार देंगे। काला धन सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं है बल्कि इसके वृहत्तर आयाम हैं जो न केवल सामान्य आपराधिक कृत्यों से संबद्ध है अपितु आतंकवाद से भी जुड़ जाता है। काले धन के मामले में सरकार ने क्रांतिकारी कदम उठाते हुए 5०० और 1००० रुपए के नोट को गत आठ नवंबर की रात 12 बजे से बंद कर दिया।

लंबे समय से यह देखा जा रहा है कि 5०० एवं 1००० के जाली नोट से आतंकवादियों को भी फंडिग होती थी। इस तरह से इस कदम से आतंकवाद व काला धन दोनों पर चोट होगा क्योंकि दोनों आपस में अंतर्संबंधित हैं। काले धन से तात्पर्य अघोषित आय अथवा कर अपवंचित आय से है अर्थात जिस पर आय कर और अन्य कर नहीं चुकाए जाते हैं। सामान्यत: अवैध खनन करके, सरकारी विकास योजनाओं के धन की चोरी करके, रिश्वतखोरी व टैक्स चोरी करके जो धन देश व विदेश में जमा किया जाता है, वह धन कालाधन है। जिस धन पर एक महत्वपूर्ण भाग सरकार को करों के रुप में प्राप्त होता है और अंतत: देश की समृद्धि एवं सामाजिक आर्थिक विकास में समायोजित होता है, वह काले धन के रूप में कुछ विशेष वर्गों के पास ही रह जाता है। ऐसे में सरकार के इस कदम के महत्व को समझा जा सकता है।
सरकार के इस कदम से देश की राजनीति और चुनाव प्रक्रिया को भी कालेधन से मुक्त किया जा सकेगा। ठेके उपलब्ध कराने, कारोबार में छूट देने, लाइसेंस देने, गोपनीय सूचनाएं देने तथा ऐसे कानून बनवाने, जिनमें बचने के रास्ते हों, के नाम पर प्रभावशाली राजनीतिज्ञ जमकर काला धन कमाते हैं। इसमें नौकरशाही की संलिप्तता रहती थी। काला धन देश की अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्र की सामुदायिक विकास योजनाओं पर घातक प्रभाव डालकर गतिरोध पैदा करता है। काले धन के कारण उत्पादन दर, स्फीति दर, बेरोजगारी एवं निर्धनता आदि की सही दरों को मापने में भी बाधा पहुंचती है। इससे एकओर सामाजिक असमानता बढ़ती है, वहीं ईमानदार नागरिकों में निराशा और हताशा बढ़ती है। अधिकांशत: काले धन का उपयोग अवैध कार्यों एवं आतंकवाद को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाता है।

इन नोटों के बाहर होने से संपूर्ण अर्थव्यवस्था कैशलैस बनेगी। ब्लैकमनी, भ्रष्टाचार, अन्य अपराधों को नियंत्रित करने के अतिरिक्त यह संपूर्ण बैंकिग व्यवस्था को मजबूत करेगा, जो पुन: संपूर्ण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त रियल स्टेट जो ब्लैकमनी का हब हुआ करता था में काफी सुधार होगा। इससे उनके मूल्य तर्कसंगत होंगे तथा सामान्य लोग भी अपने घर के सपनों को पूरा कर सकेंगे। चिकित्सा, इंजीनियरिग इत्यादि व्यावसायिक शिक्षा में भी काले धन की संबद्धता थी तथा ये काफी हद तक विशिष्ट वर्ग के लिए संबंधित हो गई थी, परंतु अब ब्लैक मनी के सफाये के बाद चीजें काफी बदलेंगी। सरकार के उपरोक्त कदम से ऑफिसियल ट्रांजिक्शन में वृद्धि होगी। इससे केन्द्र एवं राज्य सरकारों के राजस्व में जबरदस्त लाभ होगा क्योंकि ब्लैकमनी की समानान्तर अर्थव्यवस्था खत्म होगी। अधिकृत ट्रांजिकशन से लंबी अवधि में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों पर भी प्रभाव बढ़ेगा।

हांलाकि पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने काले धन की जांच हेतु पूर्व जज की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया था। विदेशों में जमा काले धन हेतु 2०15 में भारत सरकार द्बारा मजबूत कानून बनाया गया और विभिन्न देशों के साथ टैक्स समझौते में परिवर्तन किया गया। अमेरिका सहित विभिन्न देशों के साथ सूचना आदान प्रदान करने का प्रावधान किया गया ताकि बेनामी संपत्ति को रोका जा सके। 2०15 के इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत अवैध धन रखने पर 1० वर्ष की सख्त सजा एवं जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इसके साथ ही लोगों को डिसक्लोजर विडो बनाकर ब्लैक मनी घोषित करने के लिए कहा गया। इस स्कीम के तहत 65,००० करोड़ रुपये बाहर आए। इसके बाद सरकार का यह चौंकाने वाला दूरगामी निर्णय सामने आया।

काले धन और काले नोटों में लिपटे देश विरोधी तत्वों के पास मौजूदा 5०० व 1००० के नोट मात्र कागज के टुकड़े के समान रह जाएंगे। इन पहलों के और भी अच्छे परिणाम मिल सकेंगे, जब काले धन के विरुद्ध लड़ाई में जन सहभागिता बढ़े तथा देशवासी समस्या के प्रति जागरूकता का परिचय दें। वैसे, सरकार के इस कदम से जागरूकता बढ़ी है और माहौल काफी अच्छा बनता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के इस ऐतिहासिक फैसले से कालाधन व आतंकवाद चारो खाने चित हो गए है।
कैसे निपटेगा आतंकवाद और कालाधन से
नकली नोटों के धंधे में शामिल लोग ज्यादातर बड़े नोटों का ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें इस्तेमाल में लाना बेहद आसान होता है। कालाधन पैदा करने वाले और इस्तेमाल में लाने वाले ज्यादातर अपराधी बड़े नोटों का ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि उन्हें लाना और ले जाना काफी आसान होता है। 5०० और 1००० के नोटों पर रोक लगाने से ऐसे सभी अपराधों पर लगाम लगाई जा सकेगी। गौरतलब है कि फिलहाल पूरे देश में चल रही करेंसी में 5०० और 1००० रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 86 फीसदी है, जबकि 2००7 में यह आंकड़ा 69 फीसदी था।
ज्यादातर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए भी नकली नोट, हवाला का पैसा और काला धन का ही इस्तेमाल किया जाता है। बड़े करेंसी नोटों पर लगाम कसने के चलते आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने की संभावना अधिक होगी। विश्व बैंक ने जुलाई, 2०1० में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2००7 में भ्रष्टाचार की अर्थव्यवस्था देश की इकॉनमी के 23.2 फीसदी के बराबर थी, जबकि 1999 में यह आंकड़ा 2०.7 फीसदी के बराबर थी। इसके अलावा भारत समेत कई एजेंसियों ने भी इसी तरह के अनुमान जताए थे। हार्वर्ड की स्टडी के मुताबिक बड़े करेंसी नोटों को बंद करने से टैक्स से बचने वालों, वित्तीय अपराधियों, आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी। 5०० रुपए के 165० करोड़ नोट चलन में हैं। यानी कुल करेंसी का 47.85% है। 1००० रुपए के 67० करोड़ नोट चलन में हैं। मूल्य 6.3 लाख करोड़ रुपए। यानी कुल करेंसी का 38.54% है।

कम होंगी प्रॉपर्टी की कीमत, घर का सपना होगा साकार
हालांकि ये फैसला अप्रत्याशित रूप से अचानक ले लिया गया है लेकिन उसके बावजूद जानकारों की माने तो ये फैसला गरीब, मिडिल क्लास और नौकरी पेशा लोगों के लिए बेहद फायदेमंद रहने वाला है। इसके जो दो सबसे बड़े फायदे बताए जा रहे हैं वो हैं रियल एस्टेट की कीमतों में गिरावट आएगी और जो लोग उच्च शिक्षा लेने से वंचित रह जाते हैं उन्हें परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
हार्वर्ड की एक स्टडी के मुताबिक भारत समेत विकासशील देशों में सबसे ज्यादा काला धन का इस्तेमाल रियल एस्टेट के कारोबार में ही किया जाता है। फिलहाल भ्रष्टाचार में लिप्त लोग अपनी अघोषित आय को रीयल एस्टेट सेक्टर में निवेश करके खुद को साफ-सुथरा साबित करने की कोशिश करते हैं। इस फैसले से ऐसे लोग नकद भुगतान नहीं कर सकेंगे। ऐसे में प्रॉपर्टी की कीमतें कम होंगी और गरीबों के लिए मकान का सपना आसान हो सकेगा।

सरकार के रेवेन्यू में होगा इजाफा होगा
इस फैसले के चलते एक तरफ सरकार के रेवेन्यू में इजाफा होगा। वहीं, ब्लैक मनी को वाइट इकॉनमी के दायरे में लाने में भी मदद मिलेगी। यही नहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी इसे अहम माना जा रहा है। इसके अलावा हायर एजुकेशन ऐसा सेक्टर है, जहां भ्रष्टाचार में लिप्त लोग अपनी पूंजी लगाते हैं। कैपिटेशन फीस के चलते उच्च शिक्षा आम लोगों की पहुंच से दूर हो चुकी है। इस फैसले से उच्च शिक्षा के मामले में भी समानता की स्थिति आ सकेगी क्योंकि अवैध कैश लेनदेन संभव नहीं होगा। यही नहीं इससे महंगाई पर भी लगाम लग सकेगी।

25 देशों में बैन हैं बड़े नोट
चीन, ब्रिटेन, अमेरिका, सिगापुर जैसे 25 से ज्यादा बड़े देशों में बड़े नोटों पर पूरी तरह से बैन है। चीन में 1०० युआन, अमेरिका में 1०० डॉलर और ब्रिटेन में 5० पाउंड से बड़ा नोट चलन में नहीं रहता। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने बड़े नोटों को भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह बताया था।


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