अब्दुल्ला द्वारा जुलाई समझौते का उल्लंघन स्वतंत्र कश्मीर की रूपरेखा तैयार

अलग निशान और अलग प्रधान का निर्माण कर जम्मू और कश्मीर के नेता अपनी पृथकतावादी मनोवृत्ति का परिचय पहले ही दे चुके हैं किंतु जो अलग विधान इस राज्य के लिए उन्होंने बनाने का प्रस्ताव किया है। वह इस मनोवृत्ति का व्यापक स्पष्टीकरण करता है। सच में तो भारत के लिए जम्मू और कश्मीर भी उसी प्रकार सम्मिलित है जिस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के पूर्व स्वतंत्र की हुई शेष पाँच सौ चव्वन रियासतें हैं। एक विधान बन चुका है। वह विधान सब पर लागू है और आशा थी कि जम्मू और कश्मीर पर भी यह विधान लागू होगा। किंतु न मालूम किस घड़ी में हमारे प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के मुँह से जनमत संग्रह की बात निकल गई और तब से शेख अब्दुल्ला तथा उनके साथी उसका आधार लेकर स्वतंत्र कश्मीर के मंसूबे पूरे कर रहे हैं। कश्मीर में लड़ाई की स्थिति होने के कारण उस रियासत का भारत के साथ अन्य रियासतों के समान पूरी तरह से विलीनीकरण नहीं हो सका और इसीलिए संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर भारत कश्मीर के उस समय के संबंधों का दिग्दर्शन कराया गया तथा भावी की दिशा इंगित की गई।
अस्थायी और अंतरिम प्राविधानों के अंतर्गत अनुच्छेद 370 में यह स्पष्ट दिया है कि भारत और कश्मीर के संबंध तीन मामलों तक सीमित रहेंगे। किंतु उसी अनुच्छेद की धारा 3 में यह भी कहा है कि कश्मीर की संविधान सभा के अभिस्ताव पर भारत के प्रधान यह घोषणा कर सकते हैं कि अनुच्छेद 370 पूरी तरह समाप्त हो गया अथवा उसमें कुछ परिवर्तन कर लिया गया। विधान निर्माताओं की यह अपेक्षा थी कि उस समय चाहे कश्मीर को अन्य 'ख' श्रेणी राज्यों के समकक्ष न रखा जाए किंतु वह दिन अवश्य आएगा जब अनुच्छेद 370 समाप्त हो जाएगा और कश्मीर भी पूर्णतया 'ख' श्रेणी का राज्य होकर भारत में मिल जाएगा। स्वर्गीय श्रीयुत गोपालास्वामी आयंगर ने, जिन्होंने अनुच्छेद 370 का प्रस्ताव किया था, संविधान सभा में यह आशा भी व्यक्त की थी किंतु वह आशा दुराशा ही सिद्ध हुई। शेख अब्दुल्ला और उनके साथी, जिन्हें हमने भारतीय समझा था, भारतीय नहीं बन पाए। वे स्वत: को कश्मीरी ही समझते हैं और उससे ऊपर उठने को तैयार नहीं। धीरे-धीरे जब यह प्रकट होने लगा कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत में पूरी तरह नहीं मिलाना चाहते हैं तो भारत में उनके विरुद्ध जनमत ने जोर पकड़ा। यहाँ तक कि रणवीर सिंह पुरा में स्वतंत्र कश्मीर का प्रस्ताव करते हुए जो भाषण शेख अब्दुल्ला ने दिया, उसकी निंदा पं. नेहरू ने भी की। उनके मंसूबों के इस प्रकार साफ प्रकट होने पर भारत सरकार ने उन्हें बुलाया और यह जानना चाहा कि आखिर वे कश्मीर का कौन सा अंतिम स्वरूप रखना चाहते हैं। छोटे-छोटे मामलों में चाहे कश्मीर में भिन्न प्रकार का शासन हो, किंतु भारतीय संविधान के कुछ भाग जैसे नागरिकता, मौलिक अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय, वित्तीय एकीकरण, निर्वाचन, प्रधान के संकटकालीन अधिकार आदि तो सभी जगह पर समान रूप से लागू होने चाहिए। फलत: जुलाई 1952 में नेहरूजी तथा शेख अब्दुल्ला के बीच बातचीत हुई जिसके अनुसार उपर्युक्त सभी विषयों को किसी-न-किसी अंश में कश्मीर पर लागू करने का निर्णय हुआ। इस जुलाई समझौते को उस समय नेहरूजी ने बहुत संतोषजनक बताया था क्योंकि उन्होंने सोचा था कि इस प्रकार भारत का संविधान पूरी तरह नहीं तो कम-से-कम कुछ अंशों में तो कश्मीर पर अवश्य लागू हो जाएगा। किंतु राजनीतिक दृष्टि से यह समझौता भारी भूल हुई क्योंकि इसमें कश्मीर की एक स्वतंत्र सत्ता किसी-न-किसी रूप में मान ली गई। अभी तक जो अनिश्चित थी वह निश्चित हो गई। और उसका लाभ शेख अब्दुल्ला ने अंगुली के बाद पहुंचा पकड़ने की नीति के अनुसार उठाया है। अब्दुल्ला की इस नीति को समझने के पूर्व हमें कश्मीर राज्य के लिए वहाँ की संविधान समिति द्वारा प्रस्तुत संविधान के प्रारूप का थोड़ा सा दिग्दर्शन करना पड़ेगा 1. प्रारूप के अनुसार जम्मू और कश्मीर राज्य भारत की एक स्वायत्त संबद्ध इकाई ((Autonomous Federated Unit) होगा और वह सर्वप्रभुता संपन्न राज्य रहेगा। उसकी वैधानिक, प्रशासनिक तथा न्यायिक शक्तियों का स्रोत न तो भारत की जनता या संविधान है बल्कि कश्मीर की जनता और उसका अपना संविधान है। 2. प्रारूप का भाग 2 नागरिकता से संबंध रखता है जिसके अनुसार स्थायी निवासी की संज्ञा देकर कश्मीरवासियों को भारत के नागरिकों से भिन्न नागरिकता प्रदान की गई है। 3. भाग 3 मूलभूत अधिकारों से संबंध रखता है जिसमें भारतीय संविधान के भाग 3 के सभी मूलभूत अधिकार सम्मिलित कर लिए गए हैं। किंतु भूमि सुधारों के लिए मुआवजे आदि से बचत का मार्ग भी निकाल लिया है। कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने अथवा नौकरियों में स्थान प्राप्त करने का अधिकार केवल कश्मीर के स्थायी निवासियों को ही दिया गया है। मौलिक अधिकारों के साथ भारतीय संविधान से भिन्न और संभवतया किसी भी संविधान की दृष्टि से नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का समावेश भी किया है जिसके अनुसार एक सेकुलर प्रजातंत्रीय राज्य का निर्माण करने के लिए प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि (क) वह जातीय तथा सांप्रदायिक एकता स्थापित करें, (ख) सभी सार्वजनिक कार्यों में प्रामाणिकता का परिचय दें, (ग) अपने व्यवहार में गौरव, शालीनता और उत्तरदायित्व को प्रकट करें, (घ) किसी भी सार्वजनिक संस्था में सोच समझकर तथा ईमानदारी से वोट दें, (च) सांप्रदायिक विद्वेष का प्रचार न करें, (छ) चोर-बाजारी और मुनाफाखोरी या इसी प्रकार के समाज विरोधी काम न करें। उपर्युक्त कर्तव्यों का पालन न करनेवालों को मताधिकार से वंचित किया जा सकेगा। 4. भाग 4 जम्मू और कश्मीर राज्य के प्रमुख, जो सदरे रियासत कहलाएगा के निर्वाचन, कर्तव्य आदि का वर्णन करता है। केवल स्थायी नागरिक ही सदरे रियासत चुने जा सकेंगे। सदरे रियासत को 'खुदा' का नाम लेकर, चाहे वह नास्तिक ही क्यों न हो, शपथ ग्रहण करनी पड़ेगी। सदरे रियासत भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा और उनकी प्रसादावधि तक पदारूढ़ रहेगा किंतु उसकी नियुक्ति कश्मीर की राष्ट्रीय सभा दोषारोपण (Impeachment) कर उसे हटा भी सकती है। भारत के राष्ट्रपति को तो राष्ट्रीय सभा के निर्णयों पर मुहर लगाने मात्र का अधिकार है। यदि मुहर नहीं लगाई तो क्या परिणाम होगा, यह भविष्य के लिए छोड़ दिया गया है। 5. कश्मीर का शासन-कार्य एक मंत्री परिषद् के द्वारा होगा जो सामूहिक रूप से राष्ट्रीय सभा के प्रति उत्तरदायी होगी। मंत्री परिषद् प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुसार सदरे रियासत द्वारा नियुक्त की जाएगी और उसकी इच्छा के अनुसार ही एक या अधिक मंत्री हटाए भी जा सकते हैं। 6. राष्ट्रीय महासभा कश्मीर की विधान परिषद् होगी जोकि प्रति चालीस हजार निवासियों के ऊपर एक सदस्य के आधार पर चुनी जाएगी। केवल जम्मू प्रांत में हरिजनों के लिए पाँच वर्ष के लिए चार स्थान सुरक्षित रहेंगे। कश्मीर के नागरिक भारत के नागरिकों से अधिक समझदार है इसलिए उन्हें उठारह वर्ष की उम्र में ही मताधिकार प्राप्त हो जाएगा। मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार (Recall) दिया है। महासभा का सब कार्य उर्दू में होगा। अध्यक्ष यदि चाहे तो किसी भी सदस्य को अंग्रेजी में और यदि वह अंग्रेजी भी नहीं बोल सकता तो मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता है। 7. भाग 6 न्याय विधान से संबद्ध है। इसके अनुसार कश्मीर राज्य का अंतिम और सर्वोच्च न्यायालय दीवानी, फौजदारी आदि सभी मामलों के लिए एक न्याय मंडल (Judicial Board) होगा। यह न्याय मंडल सदरे रियासत के द्वारा प्रधानमंत्री की सहमति से नियुक्त किया जाएगा। न्याय मंडल के अतिरिक्त एक हाई कोर्ट भी होगा, जिसकी बैठके जम्मू और श्रीनगर में होंगी। मूलभूत अधिकारों के संबंध में आदेश आदि देने का अधिकार दोनों न्यायालयों को होगा। मौलिक अधिकारों के संबंध में कोई भी नागरिक भारत सुप्रीम कोर्ट में भी आवेदन कर सकता है किंतु सुप्रीम कोर्ट में कश्मीर के और किसी भी विषय पर अपील नहीं की जा सकेगी। 8. भाग 7 प्रधानाकेक्षक की नियुक्ति के संबंध में है। भारत के प्रधानाकेक्षक को कश्मीर में कोई अधिकार नहीं रहेंगे। 9. भाग 8 भारत और कश्मीर के संबंधों की विवेचना करता है। यह संबंध तीन अनुसूचियों में वर्णित है जिसमें प्रथम अनुसूची वे विषय सम्मिलित हैं, जिनका संबंध रक्षा, विदेश नीति और यातायात से है। इन विषयों पर विधान बनाने का अधिकार भारतीय संसद को होगा। इसके साथ ही एक और अनुसूची दी गई है जिसमें वे विषय सम्मिलित हैं जो सम्मिलिन पत्र के अनुसार तो भारतीय संसद के अधिकार क्षेत्र में हैं किंतु जिनमें परिवर्तनों की माँग की गई है। इसमें ध्यान देने योग्य यह है (क) भारतीय संसद में कश्मीर के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने हुए नहीं होंगे वरन् वहाँ की सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होंगे। (ख) कोई भी संधि जो भारत का विदेशमंत्री दूसरे देशों के साथ करे और जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य का किसी भी प्रकार संबंध आए, वह कश्मीर की सरकार की सहमति के बिना नहीं हो सकेगी और भारतीय संसद को उस संधि को व्यावहारिक रूप देने के संबंध में कोई भी कानून बनाने का अधिकार न होगा। (ग) भारतीय संसद के अध्यक्ष कश्मीर के किसी भी संसदीय सदस्य को उसकी मातृभाषा में भाषण करने की अनुमति नहीं दे सकेंगे। वह भाषण वहाँ की राजकीय भाषा अर्थात् उर्दू में ही हो सकता है। (घ) भारत के सुप्रीम कोर्ट को विभिन्न राज्यों एवं राज्य और संघ सरकार के बीच उत्पन्न सभी विवादों के लिए मूल न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं किंतु वह न तो कश्मीर के संविधान के संबंध में और न उन विषयों के संबंध में, जिनके लिए भारतीय संसद को कश्मीर के लिए कानून बनाने का अधिकार नहीं, अपने अधिकारों का उपयोग कर सकेगा। (च) यदि किसी विषय पर भारत और कश्मीर दोनों ने नियम बनाए हैं और वे परस्पर विरोधी हैं तो जहाँ अन्य राज्यों में राज्य के नियम के ऊपर संघीय नियम को मान्यता होती है, वहाँ कश्मीर में राज्य के अपने नियम को ही मान्यता रहेगी। (छ) भारत को यद्यपि यातायात में सभी अधिकार प्राप्त हैं किंतु भारत का राष्ट्रपति किसी भी मार्ग को कश्मीर सरकार की सम्मति के बिना राष्ट्रीय या सैनिक महत्त्व का घोषित नहीं कर सकता। (ज) कश्मीर राज्य चाहे तो राज्य की पुरानी सेनाओं को रख तथा बढ़ा सकता है। यदि उनका भारतीय सेनाओं के साथ किसी भी प्रकार से एकीकरण किया जाए तो वह कश्मीर सरकार की सम्मति से ही हो सकेगा। कोई भी सेना का अंग, जो भारतीय सेना के साथ अभी तक संबद्ध नहीं हुआ है, भारतीय सेना का अंग नहीं समझा जाएगा और उनपर राज्य का ही अधिकार रहेगा। (झ) भारत यदि नागरिकता के संबंध में कोई कानून बनाता है तो वह कश्मीर की विधानसभा की सहमति के बिना उस राज्य पर लागू नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार वे सब लोग जो जम्मू और कश्मीर राज्य से सन् 1947 के झगड़ों के कारण पाकिस्तान (भारत नहीं) चले गए हैं, वे सब वापस आने पर नागरिक माने जाएँगे। (त) भारत यदि राज्य कर्मचारियों के लिए कोई संयुक्त जनसेवा आयोग बनाना चाहे तो उसे कश्मीर सरकार की पूर्व सम्मति प्राप्त करना आवश्यक होगा। (थ) भारत के राष्ट्रपति को जम्मू और कश्मीर राज्य में आंतरिक दुर्व्यवस्था होने पर तब तक संकटकालीन स्थिति की घोषणा करने का अधिकार प्राप्त नहीं जब तक वहाँ की सरकार प्रार्थना न करे। युद्ध जन्य संकटकालीन स्थिति की घोषणा करने पर भी संघ सरकार जम्मू और कश्मीर राज्य को वही निर्देश दे सकती है, जो राज्य के प्रशासनिक मामलों में किसी प्रकार का दखल न दे। इसी प्रकार भारतीय संसद ऐसे समय में भी बिना कश्मीर की विधानसभा अथवा वहाँ की सरकार की सहमति के कोई कानून नहीं बना सकती। कश्मीर सरकार ने अपने व्यापारी प्रतिनिधि देश-विदेशों में रखने और किसी भी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में, जिनमें व्यापार आदि की बातें हों, भाग लेने का अधिकार सुरक्षित रखा है। भारत की सुरक्षा के लिए तैयारी करने संबंधी नियम बनाने का अधिकार यद्यपि संघीय अनुसूची की प्रथम सूची के अनुसार भारत को स्वत: प्राप्त है, किंतु कश्मीर में उसके लिए कश्मीरी विधानसभा की स्वीकृति आवश्यक है। संघीय सूची में से विषय क्रमांक 7 (संसद द्वारा सुरक्षा अथवा युद्ध के लिए आवश्यक घोषित उद्योग), क्रमांक 8 (केंद्रीय सूचना तथा चर विभाग), क्रमांक 9 (सुरक्षा, वैदेशिक मामले और भारत की सुस्थिति से संबंधित निवारक निरोध अधिनियिम) को कश्मीर राज्य ने भारतीय संसद के अधिकार क्षेत्र से निकाल लिया है। रेल पथ यद्यपि संघीय विषय है किंतु यदि कश्मीर सरकार राज्य में कोई रेल बनाए या किसी कंपनी से बनवाएँ तो वह केंद्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर होगी। मुद्रा, बैंकिंग, पोस्ट आफिस आदि में केंद्र को कोई अधिकार नहीं रहेगा। जनगणना के लिए कश्मीर राज्य भारत की जनगणना से संबंध नहीं रखेगा और न उसका किसी प्रकार सर्वेक्षण विभाग से कोई संबंध रहेगा। चुनाव आयोग का अधिकार-क्षेत्र केवल राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन तक ही रहेगा। 10. भारत का कश्मीर के साथ किसी भी प्रकार वित्तीय एकीकरण नहीं होगा। वहाँ भारत कोई कर नहीं लगा सकता। 11. भाग 9 के अनुसार प्रधानमंत्री की सलाह से सदरे रियासत एक जनसेवा आयोग नियुक्त करेगा। चुनाव कमीशन सदरे रियासत द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त होगा। भाग 11 उर्दू को राजभाषा स्वीकार करता है। प्रारंभिक शिक्षा के लिए कोई भी जिला कौंसिल किसी भी अनुसूचित भाषा को स्वीकार कर सकती है। भाग 12 में विविध प्राविधान दिए हैं जिनमें संकटकालीन स्थिति की अवस्था में प्रधानमंत्री की सलाह से सदरे रियासत घोषणा कर सकता है कि किसी भी न्यायालय को मौलिक अधिकारों के संबंध में विचार करने का अधिकार नहीं रहेगा। 12. राज्य का झंडा तीन सफेद खड़ी पहियों और हल के साथ लाल रंग का रहेगा। 13. भाग 13 के अनुसार कश्मीर एक संघ राज्य माना गया है जिसके पाँच अंग होंगे(क) कश्मीर : अनंतनाग, श्रीनगर, बारामूला जिलों सहित, (ख) पूंछ : मीरपुर, पूंछ, रजौरी और मुजफ्फराबाद जिलों सहित, (ग) जम्मू : जम्मू, कठुआ, ऊधमपुर और डोडा जिलों सहित, (घ) लद्दाख : लेह, कारगिल और अस्कारदू सहित, (च) गिलगित : गिलगित तहसील और दुंजी सहित। कश्मीर, पूंछ और जम्मू प्रांत का शासन एक चीफ कमिश्नर के अधीन होगा जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह से सदरे रियासत करेंगे। चीफ कमिश्नर प्रांत के प्रशासन का प्रमुख रहेगा और वह राज्य सरकार के प्रति उत्तरदायी होगा। प्रत्येक चीफ कमिश्नर के अधीन मंत्री परिषद् होगी जो प्रांतीय अनुसूची में वर्णित विषयों के संबंध में उसे सलाह देगी। मंत्री परिषद् प्रांतीय विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। विधानसभा का निर्वाचन प्रति साठ हजार निवासियों पर एक सदस्य के हिसाब से होगा। मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार होगा। प्रांतीय विधानसभा को प्रांत का बजट स्वीकार करने का भी अधिकार है जो बाद में राज्य के बजट के साथ सम्मिलित कर लिया जाएगा। लद्दाख और गिलगित के प्रदेशों के लिए एक रीजनल कमिश्नर नियुक्त होगा। उसको सलाह देने के प्रति दस हजार निवासियों पर एक सदस्य के हिसाब से एक प्रादेशिक समिति निर्वाचित होगी। यह समिति सलाहकार समिति के रूप में काम करेगी। कश्मीर, पूंछ और जम्मू प्रांत के प्रत्येक जिले की एक जिला समिति होगी जिसका निर्वाचन बीस हजार निवासियों पर एक सदस्य के हिसाब से होगा। जिला समिति डिप्टी कमिश्नर की सलाहकार समिति के रूप में काम करेगी तथा जो प्रस्ताव वह चाहे पास करके राज्य या प्रांतीय सरकार के पास सिफारिश के रूप में भेज सकती है। राज्य विधानसभा नया जिला या प्रांत बना सकती है, उन्हें घटा-बढ़ा सकती है। उनकी सीमाएँ बदल सकती है। गिलगित और मीरपुर, मुजफ्फराबाद, कश्मीर में मिलने तक राज्य संघ की केवल तीन ही इकाइयाँ होंगी -कश्मीर और जम्मू प्रांत तथा लद्दाख का जिला। तब तक सभी जिला कौंसिल में एक तिहाई सदस्य सरकार द्वारा नामजद रहेंगे। प्रत्येक जिला कौंसिल अपनी कार्यपालिका निर्वाचित करेगी जो सलाहकार समिति के रूप में काम करेगी। कोई भी जिला एक प्रस्ताव द्वारा तीन वर्ष के बाद निर्णय कर सकता है कि वह एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाएगा अथवा सीधा राज्य सरकार से प्रशासित हों। राज्य सरकार भी एक आयोग की रिपोर्ट के बाद किसी भी जिले या प्रांत की सीमाएँ बदल सकती हैं। 14. भाग 16 के अनुसार संविधान में संशोधन राष्ट्रीय महासभा के दो तिहाई बहुमत से किया जा सकता है किंतु प्रांतीय विधानसभाओं के अधिकार और कार्यों से संबंधित संशोधन उन विधानसभाओं के दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित होने पर ही स्वीकृत होंगे। यह विधान भारतीय संविधान से पृथक् होने के कारण भारत की मौलिक एकता के लिए घातक तो है ही, किंतु स्वयं भी अनेक दृष्टियों से आपत्तिजनक है। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों को कश्मीर पर लागू करने के बजाय कश्मीर के संविधान में ही मौलिक अधिकारों का भाग जोड़ना प्रकट करता है कि कश्मीर-राज्य भारत का अविभाज्य अंग नहीं बल्कि एक नए पाकिस्तान के रूप में बना हुआ है। अंतर यही है कि उसकी रक्षा की जिम्मेदारी हमारी है और शेख अब्दुल्ला लियाकत अली के समान भारत को घूंसा न दिखाकर मुहम्मद अली के समान नेहरूजी को बड़ा भाई कह देते हैं। चाहिए तो यह था कि भारतीय संविधान के वे सभी भाग जिनके संबंध में जुलाई 1952 में विचार हो चुका है, जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू कर दिए जाते और उस राज्य के लिए यदि कोई विशेष प्रबंध करने की आवश्यकता है तो भारतीय संसद में तत्संबंधी संवैधानिक संशोधन पारित कर दिया जाता किंतु शेख साहब ने तो जुलाई समझौते को भी ठुकरा दिया है। हाँ, इस प्रारूप से जम्मू प्रजा परिषद् की माँगों को स्वीकार करने का दिखावा अवश्य किया गया है। क्योंकि (क) जम्मू को प्रांतीय स्वायत्त सत्ता दी गई है, यद्यपि उस सत्ता का अधिकार क्षेत्र भारत की किसी नगरपालिका से भी गया बीता है। (ख) डोडा जिले को जम्मू से अलग नहीं किया गया, यद्यपि भविष्य में उसको अलग करने के बीज जरूर बो दिए गए हैं। हम समझते हैं कि चालीस लाख लोगों के एक छोटे से राज्य का संघीय विधान बनाना और फिर उसका भारत संघ के साथ केवल तीन मामलों में संबंध करना एक ऐसा प्रयोग है जो दुनिया के अन्य किसी भाग में देखने को नहीं मिलता। भारत की आत्मा को एकता चाहती है और इसीलिए अंग्रेजों की तमाम कोशिशों के बाद भी हमने सन् 1935 के संविधान के फैडरेशन वाले भाग को स्वीकार नहीं किया तथा स्वतंत्र होने के बाद भी जो विधान बनाया उसके ऊपर यद्यपि फैडरेशन की कुछ छाप रही परंतु हमने तो भी उसे एकत्व का जामा पहनाने का प्रयत्न किया और भारत को एक फैडरेशन ऑफ स्टेट्स के स्थान पर यूनियन ऑफ स्टेट्स बनाया। हमारे संविधान के अनुसार हमारी संपूर्ण जनता की शक्ति हमारी केंद्र सरकार में निहित है। प्रांतों को वही शक्ति प्राप्त है जो केंद्र देता है और अवशेष प्रभुता केंद्र को प्राप्त है किंतु कश्मीर में चक्र उलटा चला जा रहा है। क्या इसके बाद भी हम यह समझें कि शेख अब्दुल्ला ने राष्ट्रवादी मनोवृत्ति का परिचय दिया है। सच तो यह है कि लौह पुरुष सरदार पटेल के निधन, नेहरूजी की संतुष्टीकरण की नीति और संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर के प्रश्न की उपस्थिति से उत्पन्न परिस्थिति का अनुचित लाभ उठाकर, जो कभी भी राष्ट्र भक्तिपूर्ण नहीं हो सकता, शेख अब्दुल्ला एक तीसरे राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं। सत्य प्रकट हो गया है, अब यह भारत की जनता को निर्णय करना है कि वह उस सत्य का मुकाबला करती है अथवा ऑंखें बंद कर सत्य को देखने से इनकार करती है। - दीनदयाल उपाध्याय (पांचजन्य, 11 मई, 1953)

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