यात्रा से पूर्व

15 अगस्त भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण दिन है। उस दिन संपूर्ण भारत में स्वतंत्रतोत्सव मनाए गए। सहस्रों वर्षों की दासता के बंधन से मुक्ति का अनुभव किसको आनंदकारी नहीं होता। किंतु आनंद के क्षण थोड़े ही रहते हैं। आनंदोत्सव में मनुष्य एकबारगी अपने आपको भूल जाता है, वास्तविकता की कठोर धरती से उठकर कल्पनाकाश में सहज विचरण करने लगता है। हमने भी इस प्रकार आनंद मनाया और अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार उसकी अनुभूति रही। हरेक की अपनी-अपनी अवधि थी। किंतु अंत में सबको वास्तविकता की कठोर भूमिका स्पर्श करना ही पड़ा। आज भी अनेकों व्यक्ति कटु दु:खद और उत्तरदायित्वपूर्ण वास्तविकता से मुँह छिपाना चाहते हैं। वे कल्पना के मधुमय संसार का ही आस्वाद लेने में मस्त हैं। यदि उनको कोई झकझोरकर सत्य संसार में लाने का प्रयत्न करता है तो उन्हें झुंझलाहट आ जाती है, यदि वास्तविक जगत् की कठिनाइयाँ उनके सामने कही जाती है तो वे समझते हैं कि स्वातंत्र्यानुभूति का महत्त्व कम करने का प्रयत्न किया जाता है अथवा स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाले योद्धाओं की महत्ता को जनता की दृष्टि में नीचे गिराने का प्रयत्न किया जाता है। यह सत्य नहीं है। हाँ, अपनी वीरता और युद्धकौशल के लिए अप्रतिम ख्याति प्राप्त करनेवाले शूरमा भी यदि मधुभुक् की भाँति कर्मचेतनाहीन हो आलस्यस्त हो जाएँ तो किसी न किसी येलिससको उन्हों घसीटकर कर्ममय जगत् में लाना ही पड़ेगा। देश सेवा का व्रत लेकर अनेकों कष्ट सहनेवाले और देश के लिए महान् बलिदान करनेवाले देशभक्तों के प्रति इससे बड़ी और कौन सी श्रद्धांजलि हो सकती है कि उनकी कर्तव्य-भावना को जीवित रखा जाए? जिस चाटुकारिता को उन्होंने अपने जीवन में स्थान नहीं दिया, आज वे नई पीढ़ी से उसकी कैसे अपेक्षा कर सकते हैं? अत: भारतीय जीवन की यथार्थ स्थिति का जब हम मार्ग-दर्शन करते हैं तो भारतीय स्वातंत्र्य के लिए युद्धधस्त वीरों के त्याग और बलिदान की परंपरा के प्रति हमारे मन में पूर्ण सम्मान का भाव है, उनकी भावनाओं के प्रति श्रद्धा है और उनकी देशभक्ति में विश्वास है, उनके अनुभव-पूत विचारों का मूल्य है और उनको हम सहज से दृष्टि से ओझल नहीं होने देंगे। किंतु साठ वर्ष तक बराबर देखने का अभ्यास करते हुए अनुभवपूर्ण ऑंखें भी जब जाले के कारण स्पष्ट न देख सकें तो उस समय अच्छी दृष्टि वाले किसी भी युवक का यथास्थिति वर्णन वृध्द के प्रति धृष्टता नहीं अपितु सेवा और पूजा का ही भाव है। 15 अगस्त को अंग्रेज भारत छोड़कर गए हैं। उनका और हमारा दो सौ वर्षों से भी ऊपर का साथ रहा है। इस बीच में उन्होंने हमारा बहुत कुछ बिगाड़ा बनाया है, हमारे राष्ट्र जीवन में अनेकों विष बोए हैं। उनमें से अनेकों फले और फूले हैं। आज हमारा राष्ट्र जीवन उनके कारण विषाक्त हो गया है। उन्होंने अपनी सत्ता की जड़ें मजबूत करने के लिए हमारा सांस्कृतिक, शारीरिक और आर्थिक ह्रास किया। हमारे शरीर और मन दोनों को दास बनाने के लिए अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाई और उनको कार्यान्वित किया। आज अचानक वे हमको छोड़कर चले गए हैं। अपने जीवन को बनाने-बिगाड़ने की जिम्मेदारी अब हमारे ही ऊपर आ पड़ी है। इस जिम्मेदारी को हमें सँभालना होगा। हमें आज स्वयं अपने विकास की योजनाएँ बनानी होंगी और उनको संपूर्ण शक्ति लगाकर कार्यान्वित भी करना होगा। योजनाएँ बनाना अत्यंत सरल मालूम देता है। कोई भी व्यक्ति तनिक भी कल्पनाशक्ति का सहारा लेकर योजना बना सकता है। ऐसी अनेकों योजनाएँ बनी हैं और दो-चार दिन समाचार-पत्रों में स्थान पाकर वे विस्मृति के गर्त में समा गई है। अनेकों को उनके निर्माताओं के हाथ में शक्ति होने के कारण कार्य रूप में परिणत करने का प्रयत्न किया जाता है, उनके पीछे जन और धन की शक्ति लगाई जाती है किंतु उनकी सफलता के कोई चिह्न नहीं दिखाई देते, कोटि-कोटि जन उत्साह और उमंग के साथ उनको व्यवहार में लाने के लिए उत्सुक नहीं दिखाई देते। अत: योजनाएँ बनाते समय हमको कुछ बातों को ध्यान में रखना होगा। अपनी योजना के पीछे हम अपने देशवासियों की संपूर्ण कार्यशक्ति को खड़ा कर सके, इसके लिए आवश्यक है कि उस योजना की जड़ उनके हृदयों में हो, उसका संबंध उनके जीवन के सारभूत तत्त्वों से हो। उनको वह अपनी मालूम हो और उसको कार्यान्वित करना उनको हितावह प्रतीत हो। हमारी आज की अधिकांश योजनाओं में कल्पनाशक्ति रहती है, अर्थनीति के गहन सिध्दांतों का समावेश रहता है किंतु दुर्भाग्यवश उनमें भारतीयता नहीं रहती और इसीलिए वे भारत की भूमि में, भारत की कोटि-कोटि जनता के हृदय में पनप नहीं पातीं। वे पाश्चात्य-द्यि-विभूषित कुछ विद्वानों की चर्चा का विषय मात्र बनकर समाप्त हो जाती है। अत: भारतीयता हमारी योजनाओं का सबसे प्रमुख गुण होना चाहिए। उसीसे आत्मविकास संभव है और उसीके पीछे आत्मप्रेरणा से संपूर्ण देश खड़ा हो सकता है। हमको आज भारतीयता की पूजा करनी है, किंतु भारतीय जीवन शून्य में तो अवस्थित है नहीं। वह मानव-जीवन का ही एक अंग है अत: विश्व में होनेवाली घटनाओं और चलनेवाली विचार क्रांतियों से वह अपने आपको कैसे अछूता रख सकता है? उनका उसपर परिणाम होगा ही। अत: भारतीय जीवन का विचार करते समय हमको संसार-सागर को उद्वेलित करनेवाली विचार-वीवियों को दृष्टिगत रखना ही होगा, अपनी तरी हमको सागर की अवस्था का विचार करके ही निर्माण करनी होगी। आज तो यातायात के साधनों ने दुनिया के देशों को एक-दूसरे के निकट ला ही दिया है, अत: एक दूसरे पर परिणाम हुए बिना नहीं रहता, किंतु अंत में भी भिन्न-भिन्न देशों का इस प्रकार का संबंध रहा है। भारत का भी दुनिया के दूसरे देशों के साथ संबंध बहुत पुराने काल से रहा है। इस संबंध में जहाँ भौतिक जगत् की वस्तुओं के आदान-प्रदान से व्यापार वृद्धि हुई वहाँ विचार जगत् में भी आदान-प्रदान हुए। हमने दुनिया को बहुत कुछ दिया और उससे बहुत कुछ लिया। जहाँ विश्वगुरु के नाते हमने दुनिया को शिक्षा दी, वहाँ एक जिज्ञासु के नाते हमने छोटे-बड़े किसी से भी ज्ञान प्राप्त करने में संकोच नहीं किया। हाँ, जो कुछ हमने सीखा उसको अपना बना लिया। यह स्वाभाविक परंपरा चलती रही, इसमें भारतवर्ष किसी भी प्रकार का अपवाद नहीं था। पिछले एक हजार वर्ष में हमारे और दुनिया के इस संबंध में विकृति आ गई। हम गुलाम हो गए। हमारा संबंध बाहर के देशों से समानता का नहीं रहा। दासता ने हमारी शक्ति क्षीण कर दी। अब दुनिया के अन्य देशों के साथ सम्मानपूर्वक आदान-प्रदान नहीं रहा, अपितु उन्होंने जबरदस्ती हमको लूटा और बदले में दया के दानस्वरूप जूठन और भिक्षा दी। हमने लूट को रोकने के लिए शक्ति भर प्रयत्न किया और दया के दान को हमारे आत्मसम्मान ने ठुकराया। भिक्षा में भी कई बार विष ही दिया गया, अत: एक अविश्वास ने भी हमारे मन में जड़ जमा ली। हमने भारतीय की रक्षा के लिए सर्वबाह्य विचारों का विरोध किया। किंतु हमारा संबंध तो बाह्य सत्ताओं से आया ही था, दुनिया में होनेवाली विचारक्रांतियों का परिणाम हमारे ऊपर होना ही चाहिए, वह हुआ। शासन वर्ग ने भी हमारे अपनेपन को समाप्त करने के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता का बोझ हमारे ऊपर लादा और वह हमको अनिच्छा से ही कयों न हो, करना ही पड़ा। इसी एक हजार वर्ष का विकृत अवस्था का परिणाम आज का भारतवर्ष है। इस भारतवर्ष को आज हमें स्वरूप देना है। आज उसके स्वको जागृत करना है। जो विकृति आ गई है उसको दूर निकालकर फेंकना है। आज अपनेपन को पहचानकर दुनिया के साथ कंधे के साथ कंधा मिलाकर हमको आगे बढ़ना है। जबसे हम अपने जीवन के स्वामी स्वयं न रहे तब से संसार बहुत बढ़ चुका है। आज न तो हम लौटकर अपने पुराने स्थान से यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं और न आज की विकृत अवस्था को ही प्रकृत अवस्था मानकर चल सकते हैं। हमारा सौभाग्य है कि दास्ता की लंबी अवधि में भी अपनी प्रकृति को व्यक्त करनेवाले महापुरुष हुए है, फलत: आज हमारे जीवन में कितने ही विकार क्यों न आ गए हों, हमारी प्रकृति पूर्णत: आक्रांत होकर मरी नहीं है। हम अपनी इस प्रकृति की अखंडधारा को पहचानें। उसको शक्तिशाली करके विकृति की अस्वच्छता को प्रकृति की प्रवाहजन्य स्वच्छता से धो डालें और इस प्रकार शक्ति संपन्न हो संसार के साथ आगे बढ़ें। एक बात और। अपने इस विकास में आज भी हम पूर्ण स्वतंत्र नहीं हैं। संसार के अनेक देशों की वक्र दृष्टि हमारी और लगी हुई है। अत: हमको सावधानी रखनी होगी कि हम अपने जर्जर शरीर को रोगमुक्त करके जब तक स्वस्थ होकर खड़े हों तब तक बीच में ही कोई हमारे ऊपर हावी न हो जाए। साथ ही संसार के अनेक देशों के साथ हमारे संबंध रहे हैं। हमें अनेकों पुराने अप्राकृतिक संबंध तोड़ने पड़ेंगे, नवीन निर्माण करने होंगे। इसमें भी हम ध्यान रखें कि कहीं संबंध तोड़ते हुए हम किसी जीवन-तंतु को आघात न लगा लें और नवीन निर्माण करने में फिर से बंधन में न बंध जाएँ। चारों ओर की उत्तालतरंगों और युद्ध पोतों के बीच से अपनी जर्जर नौका से संसार सागर पार करना है। कार्य कठिन है किंतु करना ही होगा। इसकी सफलता, योग्यता और नेतृत्व की कसौटी है और उसी पर भावी भारत का भाग्य निर्भर है। 15 अगस्त भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण दिन है। उस दिन संपूर्ण भारत में स्वतंत्रतोत्सव मनाए गए। सहस्रों वर्षों की दासता के बंधन से मुक्ति का अनुभव किसको आनंदकारी नहीं होता। किंतु आनंद के क्षण थोड़े ही रहते हैं। आनंदोत्सव में मनुष्य एकबारगी अपने आपको भूल जाता है, वास्तविकता की कठोर धरती से उठकर कल्पनाकाश में सहज विचरण करने लगता है। हमने भी इस प्रकार आनंद मनाया और अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार उसकी अनुभूति रही। हरेक की अपनी-अपनी अवधि थी। किंतु अंत में सबको वास्तविकता की कठोर भूमिका स्पर्श करना ही पड़ा। आज भी अनेकों व्यक्ति कटु दु:खद और उत्तरदायित्वपूर्ण वास्तविकता से मुँह छिपाना चाहते हैं। वे कल्पना के मधुमय संसार का ही आस्वाद लेने में मस्त हैं। यदि उनको कोई झकझोरकर सत्य संसार में लाने का प्रयत्न करता है तो उन्हें झुंझलाहट आ जाती है, यदि वास्तविक जगत् की कठिनाइयाँ उनके सामने कही जाती है तो वे समझते हैं कि स्वातंत्र्यानुभूति का महत्त्व कम करने का प्रयत्न किया जाता है अथवा स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाले योद्धाओं की महत्ता को जनता की दृष्टि में नीचे गिराने का प्रयत्न किया जाता है। यह सत्य नहीं है। हाँ, अपनी वीरता और युद्धकौशल के लिए अप्रतिम ख्याति प्राप्त करनेवाले शूरमा भी यदि मधुभुक् की भाँति कर्मचेतनाहीन हो आलस्यस्त हो जाएँ तो किसी न किसी येलिससको उन्हों घसीटकर कर्ममय जगत् में लाना ही पड़ेगा। देश सेवा का व्रत लेकर अनेकों कष्ट सहनेवाले और देश के लिए महान् बलिदान करनेवाले देशभक्तों के प्रति इससे बड़ी और कौन सी श्रद्धांजलि हो सकती है कि उनकी कर्तव्य-भावना को जीवित रखा जाए? जिस चाटुकारिता को उन्होंने अपने जीवन में स्थान नहीं दिया, आज वे नई पीढ़ी से उसकी कैसे अपेक्षा कर सकते हैं? अत: भारतीय जीवन की यथार्थ स्थिति का जब हम मार्ग-दर्शन करते हैं तो भारतीय स्वातंत्र्य के लिए युद्धधस्त वीरों के त्याग और बलिदान की परंपरा के प्रति हमारे मन में पूर्ण सम्मान का भाव है, उनकी भावनाओं के प्रति श्रद्धा है और उनकी देशभक्ति में विश्वास है, उनके अनुभव-पूत विचारों का मूल्य है और उनको हम सहज से दृष्टि से ओझल नहीं होने देंगे। किंतु साठ वर्ष तक बराबर देखने का अभ्यास करते हुए अनुभवपूर्ण ऑंखें भी जब जाले के कारण स्पष्ट न देख सकें तो उस समय अच्छी दृष्टि वाले किसी भी युवक का यथास्थिति वर्णन वृध्द के प्रति धृष्टता नहीं अपितु सेवा और पूजा का ही भाव है। 15 अगस्त को अंग्रेज भारत छोड़कर गए हैं। उनका और हमारा दो सौ वर्षों से भी ऊपर का साथ रहा है। इस बीच में उन्होंने हमारा बहुत कुछ बिगाड़ा बनाया है, हमारे राष्ट्र जीवन में अनेकों विष बोए हैं। उनमें से अनेकों फले और फूले हैं। आज हमारा राष्ट्र जीवन उनके कारण विषाक्त हो गया है। उन्होंने अपनी सत्ता की जड़ें मजबूत करने के लिए हमारा सांस्कृतिक, शारीरिक और आर्थिक ह्रास किया। हमारे शरीर और मन दोनों को दास बनाने के लिए अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाई और उनको कार्यान्वित किया। आज अचानक वे हमको छोड़कर चले गए हैं। अपने जीवन को बनाने-बिगाड़ने की जिम्मेदारी अब हमारे ही ऊपर आ पड़ी है। इस जिम्मेदारी को हमें सँभालना होगा। हमें आज स्वयं अपने विकास की योजनाएँ बनानी होंगी और उनको संपूर्ण शक्ति लगाकर कार्यान्वित भी करना होगा। योजनाएँ बनाना अत्यंत सरल मालूम देता है। कोई भी व्यक्ति तनिक भी कल्पनाशक्ति का सहारा लेकर योजना बना सकता है। ऐसी अनेकों योजनाएँ बनी हैं और दो-चार दिन समाचार-पत्रों में स्थान पाकर वे विस्मृति के गर्त में समा गई है। अनेकों को उनके निर्माताओं के हाथ में शक्ति होने के कारण कार्य रूप में परिणत करने का प्रयत्न किया जाता है, उनके पीछे जन और धन की शक्ति लगाई जाती है किंतु उनकी सफलता के कोई चिह्न नहीं दिखाई देते, कोटि-कोटि जन उत्साह और उमंग के साथ उनको व्यवहार में लाने के लिए उत्सुक नहीं दिखाई देते। अत: योजनाएँ बनाते समय हमको कुछ बातों को ध्यान में रखना होगा। अपनी योजना के पीछे हम अपने देशवासियों की संपूर्ण कार्यशक्ति को खड़ा कर सके, इसके लिए आवश्यक है कि उस योजना की जड़ उनके हृदयों में हो, उसका संबंध उनके जीवन के सारभूत तत्त्वों से हो। उनको वह अपनी मालूम हो और उसको कार्यान्वित करना उनको हितावह प्रतीत हो। हमारी आज की अधिकांश योजनाओं में कल्पनाशक्ति रहती है, अर्थनीति के गहन सिध्दांतों का समावेश रहता है किंतु दुर्भाग्यवश उनमें भारतीयता नहीं रहती और इसीलिए वे भारत की भूमि में, भारत की कोटि-कोटि जनता के हृदय में पनप नहीं पातीं। वे पाश्चात्य-द्यि-विभूषित कुछ विद्वानों की चर्चा का विषय मात्र बनकर समाप्त हो जाती है। अत: भारतीयता हमारी योजनाओं का सबसे प्रमुख गुण होना चाहिए। उसीसे आत्मविकास संभव है और उसीके पीछे आत्मप्रेरणा से संपूर्ण देश खड़ा हो सकता है। हमको आज भारतीयता की पूजा करनी है, किंतु भारतीय जीवन शून्य में तो अवस्थित है नहीं। वह मानव-जीवन का ही एक अंग है अत: विश्व में होनेवाली घटनाओं और चलनेवाली विचार क्रांतियों से वह अपने आपको कैसे अछूता रख सकता है? उनका उसपर परिणाम होगा ही। अत: भारतीय जीवन का विचार करते समय हमको संसार-सागर को उद्वेलित करनेवाली विचार-वीवियों को दृष्टिगत रखना ही होगा, अपनी तरी हमको सागर की अवस्था का विचार करके ही निर्माण करनी होगी। आज तो यातायात के साधनों ने दुनिया के देशों को एक-दूसरे के निकट ला ही दिया है, अत: एक दूसरे पर परिणाम हुए बिना नहीं रहता, किंतु अंत में भी भिन्न-भिन्न देशों का इस प्रकार का संबंध रहा है। भारत का भी दुनिया के दूसरे देशों के साथ संबंध बहुत पुराने काल से रहा है। इस संबंध में जहाँ भौतिक जगत् की वस्तुओं के आदान-प्रदान से व्यापार वृद्धि हुई वहाँ विचार जगत् में भी आदान-प्रदान हुए। हमने दुनिया को बहुत कुछ दिया और उससे बहुत कुछ लिया। जहाँ विश्वगुरु के नाते हमने दुनिया को शिक्षा दी, वहाँ एक जिज्ञासु के नाते हमने छोटे-बड़े किसी से भी ज्ञान प्राप्त करने में संकोच नहीं किया। हाँ, जो कुछ हमने सीखा उसको अपना बना लिया। यह स्वाभाविक परंपरा चलती रही, इसमें भारतवर्ष किसी भी प्रकार का अपवाद नहीं था। पिछले एक हजार वर्ष में हमारे और दुनिया के इस संबंध में विकृति आ गई। हम गुलाम हो गए। हमारा संबंध बाहर के देशों से समानता का नहीं रहा। दासता ने हमारी शक्ति क्षीण कर दी। अब दुनिया के अन्य देशों के साथ सम्मानपूर्वक आदान-प्रदान नहीं रहा, अपितु उन्होंने जबरदस्ती हमको लूटा और बदले में दया के दानस्वरूप जूठन और भिक्षा दी। हमने लूट को रोकने के लिए शक्ति भर प्रयत्न किया और दया के दान को हमारे आत्मसम्मान ने ठुकराया। भिक्षा में भी कई बार विष ही दिया गया, अत: एक अविश्वास ने भी हमारे मन में जड़ जमा ली। हमने भारतीय की रक्षा के लिए सर्वबाह्य विचारों का विरोध किया। किंतु हमारा संबंध तो बाह्य सत्ताओं से आया ही था, दुनिया में होनेवाली विचारक्रांतियों का परिणाम हमारे ऊपर होना ही चाहिए, वह हुआ। शासन वर्ग ने भी हमारे अपनेपन को समाप्त करने के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता का बोझ हमारे ऊपर लादा और वह हमको अनिच्छा से ही कयों न हो, करना ही पड़ा। इसी एक हजार वर्ष का विकृत अवस्था का परिणाम आज का भारतवर्ष है। इस भारतवर्ष को आज हमें स्वरूप देना है। आज उसके स्वको जागृत करना है। जो विकृति आ गई है उसको दूर निकालकर फेंकना है। आज अपनेपन को पहचानकर दुनिया के साथ कंधे के साथ कंधा मिलाकर हमको आगे बढ़ना है। जबसे हम अपने जीवन के स्वामी स्वयं न रहे तब से संसार बहुत बढ़ चुका है। आज न तो हम लौटकर अपने पुराने स्थान से यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं और न आज की विकृत अवस्था को ही प्रकृत अवस्था मानकर चल सकते हैं। हमारा सौभाग्य है कि दास्ता की लंबी अवधि में भी अपनी प्रकृति को व्यक्त करनेवाले महापुरुष हुए है, फलत: आज हमारे जीवन में कितने ही विकार क्यों न आ गए हों, हमारी प्रकृति पूर्णत: आक्रांत होकर मरी नहीं है। हम अपनी इस प्रकृति की अखंडधारा को पहचानें। उसको शक्तिशाली करके विकृति की अस्वच्छता को प्रकृति की प्रवाहजन्य स्वच्छता से धो डालें और इस प्रकार शक्ति संपन्न हो संसार के साथ आगे बढ़ें। एक बात और। अपने इस विकास में आज भी हम पूर्ण स्वतंत्र नहीं हैं। संसार के अनेक देशों की वक्र दृष्टि हमारी और लगी हुई है। अत: हमको सावधानी रखनी होगी कि हम अपने जर्जर शरीर को रोगमुक्त करके जब तक स्वस्थ होकर खड़े हों तब तक बीच में ही कोई हमारे ऊपर हावी न हो जाए। साथ ही संसार के अनेक देशों के साथ हमारे संबंध रहे हैं। हमें अनेकों पुराने अप्राकृतिक संबंध तोड़ने पड़ेंगे, नवीन निर्माण करने होंगे। इसमें भी हम ध्यान रखें कि कहीं संबंध तोड़ते हुए हम किसी जीवन-तंतु को आघात न लगा लें और नवीन निर्माण करने में फिर से बंधन में न बंध जाएँ। चारों ओर की उत्तालतरंगों और युद्ध पोतों के बीच से अपनी जर्जर नौका से संसार सागर पार करना है। कार्य कठिन है किंतु करना ही होगा। इसकी सफलता, योग्यता और नेतृत्व की कसौटी है और उसी पर भावी भारत का भाग्य निर्भर है। - दीनदयाल उपाध्याय (पांचजन्य पृष्ठ 9, श्रावण शुक्ल 15, वि.सं. 2005, जुलाई-अगस्त 1948)

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