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बुधवार, 7 सितंबर 2011

7:18 am

रामलीला मैदान ने दुहराया इतिहास

रामलीला मैदान एक बार फिर ऐतिहासिक घटनाक्रमों का गवाह बना । बारह दिनों तक गाँधीवादी अन्ना के अनशन के कारण पूरे देश कि निगाहें रामलीला मैदान कि तरफ लगी रही । एक तरफ सारा देश अन्ना के साथ तिरंगा लहरा रहा था वही वही देश कि सियासत का तापमान रोज चढ़ता जा रहा था । आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा और इस जुबानी जंग में किसी ने अन्ना को ही भ्रष्ट साबित करने कि बचकानी हरकत कि तो किसी ने अन्ना के आन्दोलन को संसदीय प्रजातंत्र के लिए ही खतरनाक बताया । तो क्या अन्ना और देशवासियों कि मांगे वास्तव में संसदीय व्यवस्था के खिलाफ हैं ? इस विषय में अन्ना स्पस्ट कर चुके है कि वह सत्ता या सरकार के खिलाफ नही बल्कि भ्रष्टाचार और भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ हैं । फिर भी यदि यह मान भी ले तो क्या देश कि जनता से बड़ी है देश कि संसद ? जिस पाश्चात्य राजनितिक चिंतन कि उपज है देश कि संसदीय व्यवस्था वह शुरू ही होती है प्राकृतिक समाज से नागरिक समाज कि तरफ। हाब्ब्स, लाक, रूसो का नागरिक समाज एक अनुबंध से आरम्भ होता है जिसमे समाज अपने समस्त अधिकार संप्रभु को सोप देता है इस आधार पर कि प्राकृतिक अवस्था में जो आराजकता का शासन था वह समाप्त होगा सब कुछ लेवियाथन के हाथों में देने का एकमात्र उद्देश्य था आराजकता का अंत लेकिन आज का लेवियाथन काफी मजबूत हो चुका है जो पूरी व्यवस्था को ही लील जाना चाहता है।
जनतंत्र जनता के लिए जनता से जनता द्वारा है फिर क्या कारण है यदि देश कि जनता तय कर ले कि हम इस शासन प्रणाली को बदलना चाहते हैं तो वह बदला नही जा सकता ? क्या संसद देश से बड़ा है ? क्या संसद देश कि जनता से बड़ी है ? संविधान है किसके लिए ? संबिधान को बनाया किसने ?भारत का संबिधान शुरू ही होता है हम भारत के लोग से जिसका अर्थ है कि हम भारत के लोंगो द्वारा यह संबिधान निर्मित और आत्मार्पित व स्वीकृत है ।
रही दूसरी बात क्या जन लोकपाल से रातो रात देश कि भ्रष्ट नौकरशाही और भ्रष्ट नेताओं का ह्रदय परिवर्तन हो जायेगा ? क्या सारे देश के भ्रस्ताचार में यही लोग व्याप्त है तो फिर हर्षद मेहता, निरा रादिया , हसन अली जैसे लोग किस श्रेणी में आयेंगे ?क्या जन लोकपाल भर्स्ट नही होगा ? क्या हर बात में जरुरी है देशवासियों को कानून का हथियार दिखाना ? वसत में यह लडाई ना तो अन्ना कि है नही किसी अन्ना टीम कि बल्कि यह पिछले ६२ वर्षो से उत्पन्न उस कुशासन कि प्रतिक्रिया है जिसमे संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के बीज निहित हैं । यदि महात्मा गांधीजी के संपूर्ण आन्दोलन का अध्ययन करें तो यह ना केवल स्वराज्य प्राप्ति का आन्दोलन था बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों कि पुनर्स्थापना का भी आन्दोलन था । भ्रस्ताचार के खिलाफ देशवासियों का यह आन्दोलन उसी आकांछा का प्रकटीकरण था जिसके बिना भारत अपनी श्रेष्ठ नियति नही प्राप्त कर सकता । आजादी के बाद नेहरूवियन समाजवादी माडल के कारण देशवासी उस कोटा परमिट और बाबु राज कि तरफ बढ़ते गए जिसमे भारत कि नैतिकता सुचिता कि हत्या होती रही बहुसंख्यक ग्रामीण समाज हर मोड़ पर छला जाता रहा जल जंगल जमीन खतरे में है तो शहरी समाज फोन बिजली पानी के संकट से ही नही उबर पा रहा। यह आन्दोलन बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के द्वारा देशवासियों के उसी गुस्से का प्रकटीकरण है जो वह वर्षों से दबाये था । वास्तव में यह आन्दोलन भ्रसताचार से आगे संपूर्ण व्यवस्था कि परिवर्तन कि लडाई में तब्दील हो जा जय तो कोई आश्चर्य नही ।
_ मार्कन्डेय पाण्डेय

गुरुवार, 16 जून 2011

2:41 pm

निगमानंद का असली हत्यारा कोन

स्वामी निगमानंद जी के ब्रम्हालीन होने पर मैंने सुना और पढ़ा की कुछ कांग्रेस नेता और पत्रकार यह लिख रहे है की निशंक ने उनकी जन ले ली. भाजपा की सरकार है और उसने मार डाला. यदि यह सत्य है तो दूसरा सत्य यह भी है की ऐसा कहने और लिखने वाले भी उतने ही बड़े हत्यारे है .. सबसे पहले तो निगमानंद के हत्यारों को भारत के संविधान में तलास करना होगा, संविधान के अनुसूचीयों नदी, जल विवाद , बांध इत्यादी केंद्र के जिम्मे आते है इस विषय में राज्य सरकार क्या कर सकती है? स्वामी निगमानंद जी ने गंगा को लेकर आमरण अनशन किया इसमें केंद्र की सरकार को ही हस्तछेप करना चाहिए था. जहाँ तक भाजपा की वहां पर सरकार का सवाल है या निशंक जी का तो निश्चित रूप से उनकों इस विषय में चुप नहीं रहना चाहिए था. चुप रहना जितना बड़ा अपराध है उतना बड़ा अपराध पुरे देश ने किया है.

इसका एक पहलु यह भी है की मिडिया अनहोनी को, नकारात्मक को खोजता है निगमानंद जी स्टार नहीं थे , मिडिया में नहीं थे , बाबा रामदेव जी की तरह मिडिया फ्रेंडली नहीं थे, मिडिया वालों विशेस कर चैनल वालो की खुसामद या अपने अनशन को फेसबुक तक नहीं ला पाए , प्रायोजित नहीं कर पाए, मार्केटिंग न करके वास्तव में एक संत की तरह प्राण त्याग दिए . यही गलती हुए मिडिया को भी अपने गिरेबान में झाकना चाहिए... नए नए चिकने चिकने लड़के लड्किया जो सस्ते में कमरा लेकर भागने के लिए दिहाड़ी करने के लिए उपलब्ध है , जो अनेक बार विषय की गंभीरता नहीं समझ पाते . उनको सिर्फ ग्लिमर दीखता वही सबकुछ है ... उनके लिए मुठ्टी भर नेता के सिवा देश में और कुछ नहीं दिखाई देता .

जो लोग जल और पानी का फर्क नहीं जानते , उन्हें गंगा और गड्डे में भी फर्क दिखाई नहीं देता. भारत और इंडिया उनके लिए सिर्फ अनुवाद है और कुछ नहीं. ..

मैं इन्ही शब्दों के साथ गत आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हूँ और अपनी विनम्र श्रधांजलि देता हूँ .

मार्कंडेय पाण्डेय

शनिवार, 4 जून 2011

12:46 am

स्वामी अग्निवेश का दिवालियापन

कभी किसी ने कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह जी को कहा था कि यह नाटो दिग है नही विजयी , वैसे ही स्वामी अग्निवेश नही स्वामी है नही अग्निवेश, आज कल दोनों एक साथ जुगलबंदी कर रहे है । कभी कन्या भरुद हत्या के खिलाफ अभियान चलने वाले स्वामी अग्निवेश को अमर नाथ यात्रा दोंग लगाती है और कुछ कठमुल्लों को साथ लेकर वन्देमातरम ना गए जाने का अभियान चलाये हुए है। लोकपाल बिल पर अनाप शनाप बकने के बाद यह तथाकथित स्वामी पागल हो गया है। जिस आर्य समाज का यह स्वामी है काश कि आज स्वामी दयानंद होते तो इसकी कारगुजारियों से आहात होते । स्वामी दयानंद के दर्शन और स्वामी अग्निवेश के राजनीत प्रेरित बयानों में कोई साम्य नही है। अब बात करे दिग्विजय सिंह जी कि तो कुछ दिनों पूर्व जाब ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में मारा गया तो डेल्ही में एक प्रेस कान्फरेन्स में दिग्विजय सिंह ने कहा ओसामा जी पाकिस्तान में रह रहे थे , एक मोस्ट वांटेड आतंकी को जी कहना , जो दुनिया और मानवता का दुश्मन है यह वोट बैंक कि गिरावट और चाटुकारिता कि हद है। उनके बगल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय कि मध्य कालीन विभाग कि प्रोफ़ेसर और उत्तर परदेश कांग्रेस कि अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भी चाटुकारिता में सर हिला रही थी । जिसे मिडिया के द्वारा सारे देश ने देखा। राष्ट्रवादियो को गाली देना और भारत द्रोहियों को जी कहाँ यह कांग्रेस नेताओ का संस्कार है।
मार्कन्डेय पाण्डेय

शनिवार, 12 मार्च 2011

1:33 pm

कैसे आती है सुनामी ?




जापान के उत्तर पूर्वी इलाकों में भूकंप के बाद जबरजस्त सुनामी आई है। इससे पहले २००४ में साऊथ ईस्ट एशियाई देशों में भी भूकंप के बाद सुनामी या समुद्री हलचल से बड़ी तबाही हुई थी। समुद्र में उठी कई मीटर ऊँची लहरों को सुनामी कहा जाता है वास्तव में सु यानि समुद्र तट और नामी मतलब लहरें यह जापानी भाषा का ही शब्द है।
समुद्र के भीतर अचानक बड़ी तेज हलचल होने लगे उफान उठने लगे ,लम्बी ऊँची लहरों का रेला उठाने लगे, जबरजस्त आवेग के साथ आगे बढने लगे तो इसको सुनामी कहा जाता है। पहले सुनामी को समुद्र के अन्दर उठने वाले ज्वार के रूप में लिया जाता था। लेकिन हकीकत में ऐसा नही है। दरअसल समुद्र में लहरे चाँद सूरज और ग्रहों के प्रभाव के कारण उनके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण उठती है। लेकिन सुनामी लहरें इन आम लहरों से अलग होती हैं। इसके पीछे कई कारण होते है लेकिन सबसे ज्यादा असरदार कारण है भूकंप । जमीन धसने, ज्वालामुखी विस्फोट, उल्कापात से भी सुनामी आ सकती है।
सुनामी लहरें समुद्र तटीय इलाकों पर भीषण तरीके से हमला करती है जिसमे जान मॉल का भारी नुकसान होता है। भूकंप या सुनामी कि कोई सटीक भविष्यवाणी नही हो सकती, लेकिन सुनामी के अब तक के रिकार्ड और महाद्वीपों कीस्थिति के आधार पर धरती कि जो प्लेट या परतें जहाँ जहाँ मिलती है वहा के आस पास के समुद्र तट में सुनामी का खतरा ज्यादा रहता है। जैसे आस्ट्रेलियाई परत और युरेसियाई परत जहाँ मिलती है वहां इस्थित है सुमात्रा जो कि दूसरी तरफ फिलिपीन परत से जुड़ा हुआ है। सुनामी लहरों का कहर वहां भयंकर रूप से देखा जाता है।
किसी भीषण भूकंप कि वजह से समुद्र कि उपरी परत अचानक खिसक कर आगे सरक जाती है तो समुद्र अपनी समान्तर स्थिति में आगे बढने लगता है। जो लहरें उस वक्त बनती है वो सुनामी लहरें होती हैं। धरती कि उपरी परत फुटबाल कि तरह आपस में जुडी हुई है या एक अंडे कि तरह जिसमे दरारे हो । अंडे का खोल सख्त होता है,लेकिन उसके भीतर का पदार्थ लिजलिजा होता है। भूकंप के असर से ये दरारे चौड़ी होकर अन्दर के पदार्थ में इतनी हलचल पैदा करती है कि वो तेजी से ऊपर कि तरफ का रुख कर लेता है.धरती कि परतें जाब भी किसी असर से चौड़ी होती हैं तो वो खिसकती है जिसके कारण महाद्वीप बनते है तो इस तरह सुनामी लहरें बनती है। लेकिन ये भी जरुरी नही कि हर भूकंप से सुनामी लहरें बने ही, इसके लिए भूकंप का केंद्र समुद्र के आसपास या भीतर होना चाहिए । जब ये सुनामी लहरें किसी भी महाद्वीप कि उस परत के उथले पानी तक पहुंचती है जहाँ से वो दुसरे महाद्वीप से जुड़ा है और जो कि एक दरार के रूप में देखा जा सकता है वहां सुनामी लहर कि तेजी कम हो जाती है।
वह इसलिए क्योकि उस जगह दूसरा महाद्वीप भी जुड़ा रहता है और वहां धरती कि जुडी हुई परत कि वजह से दरार जैसी जो जगह होती है वो पानी को अपने अन्दर रास्ता दे देती है , लेकिन उसके बाद भीतर के पानी के साथ मिलकर जब सुनामी किनारे कि तरफ बढती है तो उसमे इतनी तेजी होती है कि वो ३० मीटर तक ऊपर उठ सकती है और अपने रास्ते में पेड़, जंगल या इमारते कुछ भी हो सबका सफाया कर देती है।

markandey pandey

गुरुवार, 10 मार्च 2011

11:20 pm

कैसे तैयार होता है बजट

केंद्र सरकार कि आर्थिक नीतियों को तय करने का काम बजट के द्वारा सरकार का एक कोर ग्रुप तय करता है। इस कोर ग्रुप में प्रधानमंत्री के अलावा वित्त मंत्री और वित्तमंत्रालय के अधिकारी होते है । साथ ही योजना आयोग भी शामिल होता है। वित्त मंत्रालय प्रशासनिक स्तर पर वित्त सचिव, राजस्वा सचिव, व्यय सचिव, यह कोर ग्रुप सदैव वित्त मंत्रालय के सलाहकारों के नियमित संपर्क में रहते है। वैसे इस कोर ग्रुप का दांचा सरकारों के साथ बदलता भी रहता है।

बजट पर नियमित बैठकों में वित्त सचिव, राजस्वा सचिव, व्यय सचिव, बैंकिंग सचिव, संयुक्त सचिव बजट के अलावा केंद्रीय सीमा एवम उत्पाद शुल्क बोर्ड के चेयरमैन हिस्सा लेते है। वित्त मंत्री को बजट पर मिलने वाले योजनाओं और खर्चों के सुझाव वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को भेज दिए जाते है , जबकि टैक्स से जुड़े सारे सुझाव वित्त मंत्रालय कि टैक्स रिसर्च यूनिट को भेज दिया जाता है।

इस यूनिट का प्रमुख एक संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी होता है। प्रस्ताओं और सुझावों के अध्ययन के बाद ये यूनिट कोर ग्रुप को अपनी अनुशंसा भेजते है। पूरी बजट निर्माण प्रक्रिया का समन्वय का कार्य वित्त मंत्रालय का संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी करता है। बजट के निर्माण से लेकर बैठकों के समय तय करने और बजट कि छपाई तक सारे कार्य इसी अधिकारी के जरिये होते है।

बजट निर्माण कि प्रक्रिया को इतना गोपनीय रखा जाता है कि संसद में पेश होने तक इसकी भनक किसी को ना लगे। इस गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के नार्थ ब्लाक स्थित दफ्तर को बजट पेश होने के कुछ दिन पहले एक अघोषित कैद खाने में तब्दील कर दिया जाता है। बजट कि छपाई से जुड़े लोगों को दिनरात पुलिस और सिक्योरिटी एजेंसियों के कड़े पहरे में रहना पड़ता है। बजट के दो दिन पहले नार्थ ब्लाक में वित्त मंत्रालय के हिस्सा पूरी तरह सिल कर दिया जाता है। यह सब वित्त मंत्री के बजट भाषण के पूरा होने तक और वित्त विधेयक रखे जाने तक चलता है।

मार्कन्डेय पाण्डेय

बुधवार, 9 मार्च 2011

10:17 pm

बजट कि कुछ अच्छी बातें

विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाने कि चुनौतियों के बीच वित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी ने देश का ८० वां बजट प्रस्तुत किया , ऐस तो बजट चाहे कितना अच्छा रहता हो विरोधी पार्टी हमेशा आलोचना ही करती रही है, लेकिन प्रतेक बजट में कुछ अच्छी बाते भी होती है। कुलमिलाकर ८० वां बजट कुछ खास तो नही लेकिन हर साल का बजट अच्छा ही हो यह देश के दीर्घकालीन हित के लिए जरुरी हो भी सकता है नही भी हो सकता है।
इस बजट में जो खास बाते मुझे दिखाई देती है वह यह कि इनकम टैक्स में छुट दिया गया और एक्साईज ड्यूटी बडाई गई जिससे निवेश बढेगा और खपत काम होगी। पर्यावरण को ध्यान में रखा गया है और हाई ब्रिड करोण और सिएफेल को ध्यान में रख कर सस्ता किया गया। शेयर बाजार में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन दिया गया है मुचुअल फंड में विदेशी निवेसकों को धन लगाने कि छुट दी गई है इससे देश के आर्थिक विकास को गति मिलेगी। वेतनभोगियों को कर छुट १ लाख ६० हजार से बदकार १ लाख ८० हजार किया गया है।
ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह द्वारा मिलाने वाले कर्ज को बढाया गया है । डायरेक्ट टैक्स कोड को लागु करने कि योजना है और एक्साईज और कस्टम ड्यूटी में भी सुधर किया जा रहा है। काले धन के खिलाफ पहले सरकारी विभागों कि स्वातंत्र आडिट हो ऐसा कदम उठाने के संकेत मिले है।
घर के लिए कर्ज देने वाली संस्थान को टैक्स फ्री बांड जारी करने कि छुट दी गयी है । कृषि पर व्याज कि सब्सिडी ज्यादा कि गयी है कोल्ड स्टोरेज के लियर भी कर्ज को आसान किया गया है। रक्षा बजट को ११ फीसदी बढाया गया है जो महंगाई को देखते हुए वास्तविक वृद्धि नही है ।
बजट कि सबसे खास विशेषता है रसोई गैस और किरोसिन तेल पर सरकार कि सब्सिडी निति अब यह सरकार नगद देने जा रही है , समाजवादी राज्य के उलट उदारीकरण के बाद सरकार कि सब्सिडी निति में यह एक क्रांतिकरी परिवर्तन के संकेत है ।
मार्कन्डेय पाण्डेय
०९ मार्च २०११

गुरुवार, 3 मार्च 2011

11:13 pm
कुछ समय पहले तक पत्थर बाजी को लेकर सुर्खिया बने कश्मीर के

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

11:43 am

२जी महाघोटाला


कांग्रेस कि सरकारों का और घोटालों का चोली दामन का सम्बन्ध रहा है।वर्तमान के २जी स्पेक्ट्रम घोटालो के सामने बोफोर्स, हर्षद मेहता,केतन पारीख सभी घोटाले शरमा गए है। वर्ष २०१० शायद आजादी के बाद ऐसा प्रथम वर्ष है जब एक ही सप्ताह में तीन तीन मंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ा। आम आदमी कि नज़र में केंद्र कि सरकार घोटालेबाजो का गिरोह बन गई है।

केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों जिनको त्याग करना पड़ा उनमे सर्व श्री सुरेश कलमाड़ीजी जो कि कामनवेल्थ खेल में ७०,००० हजार करोड़ का खेल किये। दुसरे महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हद जिनको कारगिल शहीदों के लिए बने आवास में ही उलटफेर किया । तीसरे राजा साहब जिन्होंने १ लाख ७६ हजार करोड़ का वारा न्यारा किया। इसप्रकार राजा द्वारा किया गया घोटाला स्वातंत्र भारत का महाघोटाला होने का कीर्तिमान स्थापित किया।

किसी भी विभाग या संगठन में कार्य का एक विशेस ढांचा निर्धारित होता है,टेलीकाम मंत्रालय इसका अपवाद हो गया है। विभाग ने सीएजी कि रिपोर्ट के अनुसार नियमो कि अनदेखी के साथ साथ अनेक उलटफेर किये। २००३ में मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत नीतियों के अनुसार वित्त मंत्रालय को स्पेक्ट्रम के आबंटन और मूल्य निर्धारण में शामिल किया जाना चाहिए । टेलीकाम मंत्रालय ने मंत्रिमंडल के इस फैसले को नजरंदाज तो किया ही आईटी ,वाणिज्य मंत्रालयों सहित योजना आयोग के परामर्शो को कूड़ेदान में डाल दिया । प्रधानमंत्री के सुझावों को हवा कर दिया गया। यह मामला २००८ से चलता चला आ रहा है, जब ९ टेलीकाम कंपनियों ने पूरे भारत में आप्रेसन के लिए १६५८ करोड़ रूपये पर २जी मोबाईल सेवाओं के एयरवेज और लाईसेंस जारी किये थे । लगभग १२२ सर्कलों के लिए लाईसेंस जारी किये गए इतने सस्ते एयरवेज पर जिससे अरबों डालर का नुकसान देश को उठाना पड़ा । स्वान टेलीकाम ने १३ सर्कलों के लाईसेंस आवश्यक स्पेक्ट्रम ३४० मिलियन डालर में ख़रीदे किन्तु ४५ % स्टेक ९०० मिलियन डालर में अरब कि एक कंपनी अतिस्लास को बेच दिया। एक और आवेदक यूनिटेक लाईसेंस फीस ३६५ मिलियन डालर दिए और ६०% स्टेक पर १.३६ बिलियन डालर पर नार्वे कि एक कम्पनी तेल्नेतर को बेच दिया।

इतना ही नहीं सीएजी ने पाया कि स्पेक्ट्रम आबंटन में ७०% से भी अधिक कंपनिया हैं जो नाटो पात्रता कि कसौटी पर खरी उतरती है नही टेलीकाम मंत्रालय के नियम व शर्ते पूरी करती है । रिपोर्ट के अनुसार यूनिटेक अर्थात युनिनार ,स्वान याने अतिस्लत अलएंज जो बाद में अतिस्लत के साथ विलय कर लिया । इन सभी को लाईसेंस प्रदान करने के १२ महीने के अन्दर सभी महानगरो,नगरों और जिला केन्द्रों पर अपनी सेवाएँ शुरू कर देनी थी। जो इन्होंने नहीं किया ,इस कारण ६७९ करोड़ के नुकसान को टेलीकाम विभाग ने वसूला ही नहीं ।

इस पूरे सौदेबाजी में देश के खजाने को १७६,००० हजार करोड़ कि हानि हुई । जब २००१ से अब तक २जी स्पेक्ट्रम कि कीमतों में २० गुना से भी अधिक कि बढ़ोत्तरी हुई है तो आखिर किस आधार पर इसे २००१ कि कीमतों पर नीलामी कि गई? देश के ईमानदार अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते रहे कि हमारे कमुनिकेसन मंत्री राजा ने किसी भी नियम का अतिक्रमण नही किया और भ्रष्ट मंत्री के दोष छिपाते रहे क्यों ? कहीं प्रधानमंत्री कि मज़बूरी यह तो नहीं कि राजा एक ऐसी राजनितिक पार्टी से सम्बंधित है जिसके समर्थन के बिना मनमोहन सरकार गिर जाएगी और सत्ता कि मलाई से बंचित होना पड़ेगा ? तो फिर सत्ता कि मलाई चखते रहने के लिए ईमानदार बिद्वान अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री इतना भ्रष्ट इतना कमजोर हो गए कि देशहित से समझौता करना पड़ा ..... मार्कन्डेय पाण्डेय