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फ़रवरी 10, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दो दशक में ही डार्क जोन बन जाएगा गुड़गांव

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गुड़गांव पहले ही घोषित है डार्क जोन, जोहड़ और तालाब हुए विलुप्त  अतिक्रमण से लेकर रियल एस्टेट लील गए जलश्रोतों को   मानसून की दस्तक सुनने को सभी बेताब हैं लेकिन अब यहां ताल-तलैया और जोहड़ों के लबालब भरे होने का नजारा नहीं दिखता। मेढकों की टर्राहट, झिंगुर और दादुर की आवाज नई पीढ़ी को नहीं पता चलेगा। साईबर सिटी होने की दौड़ ने गुड़गांव की धरती को तो डार्क जोन बना ही दिया है साथ ही यहां पर मौजूद 4० से अधिक जोहड़,तालाब भी विकास की रफ्तार ने कुचल दिया है। कहीं अतिक्रमण की भ्ोंट चढ़ गए तो कहीं रियल एस्टेट के बहुमंजिला इमारतों में दफन हो गए। गुड़गांव जिले में और आसपास की जगहों पर छोटे-बड़े जलश्रोतों की अनुमानित संख्या 5०० के आसपास हुआ करती थी। लेकिन अब इन जलश्रोतों को खोजना दुर्लभ हो गया है कारण कि आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने की होड़ में प्राकृतिक संसाधन नष्ट कर दिए गए। प्रशासन के अनुसार अब महज चंद जोहड़ और तालाब ही निशानी के तौर पर बचे हैं। गुड़गांव तहसील के कुल 81 गांवों के अपने तालाब हुआ करते थ्ो लेकिन अब न वे गांव बचे हैं ना ही तालाब दिखाई देते हैं। दूसरी तरफ शहर में पेयजल को लेकर नए और आधु

विस्फोटक शहरीकरण मिलेनियम जिंदगी को बना देगा दूभर

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धारणीय विकास के बिना चौपट हो जाएंगे विकास के दावे  प्रदूषण, जैवविविधता, जलस्तर हर स्तर पर हो रही है छेड़खानी  विस्फोटक दर से बढ़ रहे शहरीकरण के साथ जल, जंगल, जमीन अपने वजूद को खोते जा रहे हैं। गुड़गांव की हालत दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। जननांकिकी विश्ोषज्ञों, समाजशास्त्रियों की माने तो यह जनसंख्या विस्फोट की तरह ही तीव्र शहरीकरण का विस्फोट है। तेज आर्थिक विकास, शहरीकरण के साथ पर्यावरण का विनाश और मानवीय संवेदनाओं का अंत होना समाज वैज्ञानिकों के अनुसार आवश्यक शर्त है। साईबर सिटी पर जहां पूरे देश की निगाहें टिकी रहती हंै, वहां की हालत अंधाधुंध विकास के कारण दिनोंदिन नारकीय होता जा रहा है। विकास के लिए जिम्मेदार एजेंसियों के लिए धारणीय विकास की अवधारणा बेमानी हो चुकी है। पहल बार एनजीटी के आदेश पर गुड़गांव में हरियाणा स्टेट पाल्यूशन कंटàोल बोर्ड अर्थात एचएसपीसीबी ने शहर में प्रदूषण की हालत का जायजा लिया। शहर में चार जगह लिए गए नमूने में हालत चिंताजनक है। धीरे-धीरे हालात नारकीय होेते जा रहे हैं, हवा में जहर की मात्रा दिनोंदिन घुलती जा रही है। दूसरी तरफ पर्यावरण नष्ट हो रहे हैं, शहर और

सरकारी दीमक निगल गए अरावलीेकी हरियाली

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गत दिनों सरकारी नुमाईदें ने एनजीटी को दिया था जबाव  हर गांव पेड़ की छांव, घर-घर हरियाली सिर्फ नारा न रह जाए मानूसन की आवक के साथ ही भाजपा की सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में वृक्षारोपण का कार्यक्रम शुरु किया है। इसी क्रम में हरियाणा में भी सरकार और पार्टी के कार्यकताã वृक्षारोपण कार्यक्रम कर रहे हैं। गत वर्ष भी मेगा वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया गया था लेकिन वह अभियान बरसात खत्म होते ही मुरझा गया। गत स’ाह एनसीआर का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली की हरियाली को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि अरावली के पेड़ रातों-रात कहां गायब हो जाते हैं? तो सरकार की ओर से दाखिल जबाव में कहा गया कि दीमक ही पेड़ों को नष्ट कर रहे हैं। गुड़गांव और फरीदाबाद के अरावली प्रेमी सवाल करते हैं कि हरियाली के नाम पर लगाए गए पौध्ो आखिर कहां गायब हो जाते हैं? गत डेढ़ दशक पहले तकरीबन 175 करोड़ रुपए खर्च करके लगाए गए पौध्ो कहां गुम हो गए? राज्य में लगातार घटते वनक्ष्ोत्र को लेकर एनजीटी भी लगातार चिंता प्रगट करता रहता है। सिर्फ गुड़गांव में पौधारोपड़, हरियाली, ग्रीन कारिडोर, ग्रीन लंग्स आदि के जुमलों से

आह अरावली!! कौन सुने तेरी कराह अरावली !!

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कुदरत की डकैती है जनाब अरावली का सीना कौन छलनी कर रहा है ? शाम ढलते ही खनन माफिया हो जाते हैं सक्रिय ? अरावली ही नहीं, एनसीआर के अस्तित्व पर है संकट ?  आह अरावली!! कौन सुने तेरी कराह अरावली !! एनसीआर सहित समूचे उत्तरी भारत का श्वसन तंत्र कहे जाने वाले अरावली का दम घूटने लगा है। राष्ट्र की प्राचीन धरोहर अरावली पर खनन माफिया का बुलडोजर लगातार चल रहा है। अतिक्रमण से लेकर शिकार, पेड़ों की अंधाधूंध कटाई और अवैध खनन इस कुदरती सौगात को खत्म कर रहा है। दूसरी तरफ हरियाली का दायरा सिमट रहा है तो सर्वोच्च अदालत के आदेश को ही बौना साबित करके सैकड़ों बैंक्वेट हॉल, फार्म हाउस और गगनचुंबी इमारतें अरावली क्ष्ोत्र में उगती जा रही है। अरावली की वादियां जहां मोरों और विभिन्न वन्य जीवों के विचरण के लिए जाना जाती थी वहीं शिकारियों की गिद्ध नजर उन पर लग गई है। रायसीना, गैरतपुर बास, मानेसर सहित कई इलाकों में गैर वानिकी कार्य जारी है। एनजीटी ने जब सवाल किया कि पेड़ कहां गायब होते जा रहे हैं तो वन विभाग ने कहा दीमक ही पेड़ों को चट कर जा रहे हैं। संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 48ए के अनुस

प्राकृतिक जलस्रोतों पर रोजाना डाल रहे 15 सौ टन कूड़ा

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पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट का नासमझी भरा दिया हवाला राष्ट्रीय पक्षी मोर, नीलगाय सहित वन्यजीव कूड़ा खाकर मरने को विवश घायल हो रही है अरावली, और वन्यजीव मर रहे हैं। लेकिन वन विभाग को इससे कोई लेना-देना नहीं है। जहरीला कूड़ा खाकर मूक और निर्दोष वन्य जीव मरने को विवश है। जलस्रोतों का खत्म किया जा रहा है लेकिन सरकारी महकमों के शर्म का पानी सूख गया है। वन विभाग अरावली को अपने क्ष्ोत्राधिकार में नहीं मानता और पल्ला झाड़ लेता है तो वहीं क्ष्ोत्रीय प्रदूषण नियंत्रण विभाग कूड़ा डालने वाले नगर निगम को रश्मी कार्रवाई के लिए नोटिस भ्ोज देने की बात कहता है। दूसरी तरफ रोजाना अरावली की वादियों में 15,०० टन कूड़ा डंप किया जा रहा है जहां प्राकृतिक जलस्रोत बने हुए हैं, उसे भी खत्म किया जा रहा है। आखिर वन्य जीव कहां जाएं, वह दाना-पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में आते हैं और मॉब लिचिंग की मौत मरते हैं। गत दिनों सोहना इलाकें में कई बार तेदूंओं के आने की खबरें आई है, जो मौत के घाट उतार दिए गए। अरावली क्ष्ोत्र में पहाड़ी गर्तो में प्राकृतिक जल स्रोत बने हुए है जो बरसात के मौसम में भरते हैं, जिनसे वन्यजीव

अरावली में लौट रही हरियाल

अवैध खनन पर न्यायालय की पैनी नजर ने रोका खनन और पेड़ों कटाई राष्ट्रीय राजधानी का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली पर्वत श्रृंखला में अवैध खनन और पेड़ों की कटाई रुकने से अब फिर से हरियाली दिखने लगी है। इसकारण गत तीन दशक के बाद वन्यजीवों की आवक बढ़ गई है। इतना ही नहीं हरियाली बढने के साथ ही एनसीआर के प्रदूषण स्तर में भी तेजी से गिरावट आने के संकेत मिलने लगे हैं। हांलाकि एनसीआर में गुरुग्राम अब भी सर्वाधिक प्रदूषित शहर बना हुआ है। गत दिनों अरावली क्ष्ोत्र के ग्रामीण इलाकों में लगातार तेदुंआ के पाए जाने के पीछे वन्यजीवों के प्राकृतिक संवासों का फिर से निर्माण होना कारण बताया जाता है। राजधानी से सटे इस क्ष्ोत्र में गत चार दशकों से अवैध खनन, निर्माण आदि और मानवीय चहलकदमी के कारण न केवल क्ष्ोत्र की प्राकृतिक व्यवस्था को क्षति पहुंची बल्कि वन्य जीवों ने भी पलायन शुरु कर दिया था।  क्ष्ोत्र में अवैध खनन के कारण तेजी से नष्ट होते हरियाली पर सर्वोच्च न्यायालय से लेकर कई गैर सरकारी संगठन और पर्यावरण कार्यकताã लगातार चिंता प्रगट करते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व तक यह माना जाता था कि यदि अरावली की पहाडिèयों

नहीं रुक रही अरावली में खुदाई

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद चोरी-छिपे चल रही है खुदाई सर्वाधिक शिकायतें भोंडसी से आती हैं। राजधानी दिल्ली का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली  में प्रकृति और वन्य  के साथ खिलवाड़ रुक नहीं रहा है। सबसे प्राचीन समय का कहे जाने वाले अरावली पहाड़ों में खुदाई का काम जारी है। चाहे वह चोरी-छिपे किया जा रहा हो या जिम्मेदार तंत्र की मिलीभगत से किया जा रहा होे लेकिन अरावली को बदस्तूर घायल किया जा रहा है। सबसे अधिक खनन माफिया पत्थरों के व्यावसायिक उपयोग को लेकर इस क्ष्ोत्र में सक्रिय हैं। अवैध खनन के लिए भोंडसी, खेड़कीदौला, फरखनगर और बादशाहपुर से सर्वाधिक शिकायते आ रही है, जिन पर रोक लगा पाने में सक्षम तंत्र विफल साबित हो रहा है। हांलाकि वर्ष 2००2 में ही सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्ष्ोत्र में खनन को अवैध घोषित कर दिया था। लेकिन पत्थर तोड़ने वाले स्टोन क्रसर आज भी पत्थर को तोड़ रहे हैं। खासकर गुड़गांव-फरीदाबाद क्ष्ोत्र में पत्थर व्यवसायी करोड़ों का घालमेल करके अरावली पहाड़ियों को चुराते जा रहे हैं। सर्वाधिक मामले भोंडसी क्ष्ोत्र से अवैध खनन का हो रहा है। अरावली क्ष्ोत्र में हो रहे खनन का सर्वाधिक नुक

1० हजार पेड़ काटे गए तो कैसे थमेगा प्रदूषण

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सड़क चौड़ीकरण के नाम पर रातोंरात काटे गए थ्ो 4०० पेड़ इफको चौक, सिग्नेचर टॉवर, राजीव चौक पर काटे गए तकरीबन 5 हजार वृक्ष  किंबदंतियों में आज भी ब्रम्ह राक्षस पेड़ों पर ही रहता है, इसी भय से पेड़ के पत्ते तोड़ने में भी लोग भयभीत रहते थ्ो। आखिर वह कौन है ब्रम्हराक्षस? पर्यावरण को लेकर काम करने वाले कार्यकताã कहते हैं कि यह और कोई नहीं प्रदूषण का राक्षस ही था जिसे पेड़ अपने से बांध कर रखते थ्ो। लेकिन जब साईबर सिटी की सड़कों, चौराहों को अपडेट करने के नाम पर रातोंरात हजारों पेड़ काट दिए जाएंगे तो प्रदूषण का प्रेत सड़कों पर ही बसेरा बनाएगा। गत साल भर के आंकड़े पर गौर किया जाए तो गुड़गांव क्ष्ोत्र में तकरीबन दस हजार पेड़ काट दिए गए जबकि अरावली क्ष्ोत्र में रातोंरात सरकारी दीमकों के चाटने से गायब हो रहे पेड़ों की गणना इसमें नहीं है। इफको चौक, सिग्नेचर टॉवर और राजीव चौक को अपग्रेड करने और यहां पर फ्लाईओवर, अंडरपास निर्माण को लेकर रातोंरात ही 47०3 वृक्ष काटे गए। इन पेड़ों को काटने के बजाए वैज्ञानिक तरीके से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किए जाने को लेकर पर्यावरणवादियों ने जब संबंधित विभागों से गुहार लगाया त

कब शुरु होगी शहरी वन योजना

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2०19 से 2० तक पूरा करने का था लक्ष्य 1०9 हैक्टेयर में विकसित होना था शहरी वन  साईबर सिटी में पर्यावरण प्रदूषण की अदृश्य समस्या जिस तरह विकराल होती जा रही है उसे रोकने और हरियाली को बढाने के लिए सरकार की योजनाएं भी मुरझाती जा रही हैं। साईबर सिटी में लगातार बढती आबादी, वाहनों का प्रदूषण, औद्योगिक वेस्टेज आदि के प्रदूषण से तो जूझ ही रहा है लगातार रियल स्टेट के बढèते कारोबार के कारण भी हरियाली नष्ट होती जा रही है। जिले में वन विभाग की ओर से लगभग 19० हैक्टेयर भूमि पर अरावली पर्वत श्रृंखला में 'शहरी वन’ विकसित करने की योजना थी जिसके प्रथम चरण में लगभग 58 हैक्टेयर भूमि पर गांव सिकंदरपुर घोसी में शहरी वन विकसित किया जाना था। लेकिन तकरीबन दो साल बीत जाने के बाद यह योजना फाईलों में ही मुरझा रही है। वन विभाग द्बारा गुड़गांव जिला में अरावली पर्वत श्रृंखला में शहरी वन विकसित करने की योजना तैयार करके सरकार को भेजा गया था। गुड़गांव में सिटी फोरेस्ट अर्थात शहरी वन पिछले वित्त वर्ष से शुरू करके अगले चार वर्षो में चरणबद्ध तरीके से विकसित करने की योजना थी। यह परियोजना सन 2०19-2० तक पूरा करने का

अरावली की निगहबानी के लिए बनेगा स्पेशल टॉस्क फोर्स

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अवैध निर्माण, खनन और शिकार से निपटने को मंत्री लगाएंगे सभी अफसरों की क्लास गत दिनों मोर के पंख और जानवरों की हडिडयों को अरावली में बिखरा पाया गया था  अब अरावली की वादियों की निगरानी किसी एक विभाग के जिम्मे नहीं होगी बल्कि सबकी जिम्मेदारी होगी। इसके लिए जल्दी ही प्रदेश सरकार के वन व पर्यावरण मंत्री गुड़गांव, फरीदाबाद के संबंधित विभागों को मिलाकर ज्वाईट एक्शन टीम का गठन करेंगे। यह टीम अरावली में अवैध निर्माण, खनन, और शिकारियों पर शिकंजा कसेगी। उल्लेखनीय है कि दिल्ली-एनसीआर के जैविक ढांचे का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली में गत दिनों राष्ट्रीय पक्षी मोर और अन्य जानवरों के अवैध शिकार की शिकायतें मिली थी। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय हरित न्यायालय के निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए यहां पेड़ों की अवैध कटाई और निर्माण चोरी-छीपे चलता रहा है। अरावली को लेकर अधिकारियों के आपसी समन्वय और कारगर रोकथाम के लिए अब खुद वन व पर्यावरण मंत्री राव नरवीर संबंधित जिले के अधिकारियों के साथ बैठक करके संयुक्त टास्क फोर्स का गठन करेंगे। अरावली का अध्ययन करने वाली एक संस्था के साथ मुलाकात में मंत्री ने अपने एक्शन प्

नब्बे के दशक में आरोपित अमेरिकी पौधे बन गए हैं पर्यावरण आतंकी

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दिनोंदिन नष्ट होते वनक्ष्ोत्र को बचाने के लिए अरावली क्ष्ोत्र में वनारोपड़ का कार्यक्रम चलाए जाने की तैयारी है जिसमें 25 हजार देशी पौध्ो रोपे जाएंगे। पहले चरण में तकरीबन सौ हेक्टेयर भूमि पर अरावली क्ष्ोत्र में पायलट प्रोजेक्ट के तहत 25 हजार पौध्ों लगाए जाएंगे। इन देशी पौधों में ज्यादातर पौ वहीं होंगे जो अरावली में परंपरागत रुप मे पाए जाते रहे हैं जिनमें ढाक, रोंज, गूगल, करोंदा, नीम, पाकड़, पीपल आदि के होंगे। अरावली में पौधारोपड़ के प्रथम चरण रायसीना, राज का गुज्जर, दमदमा आदि गांवों में इन पौधों का रोपड़ किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि अरावली क्ष्ो त्र में नब्बे के दशक में ही मेसकाईट नाम के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपड़ किया गया था। यह एक प्रकार का फलीदार झाड़ी होती है जो मूल रुप से उत्तरी अमेरिकी पौधा है। अब इन पौधों को खत्म करने के लिए वन विभाग प्रयासरत है और अनुमान किया जा रहा है कि देशी पेड़-पौधों की बड़ी तादात से झाड़ीदार पौध्ो खत्म हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि नब्ब्ो के दशक में बड़ी मात्रा में आरोपित इन पौधों का पर्यावरण संरक्षण से लेकर वन्यजीवों के संरक्षण में कोई योगदान नहीं है। नाही ये प