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संसाधन पर बोझ है जेएनयू

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अपने जेएनयू में फिर डफली बजने लगी। जो भी हो ये डफली बहुत रिदम के साथ मस्त बजाते हैं। थोड़ा सर टेढ़ा करके हाथ खास तरीके से ऊपर करके नारा ऐसे लगाते है जैसे गाना गा रहे हों। सुनकर मन तृप्त हो जाता है। आइसा के संस्थापक लालबहादुर सिंह के समय से गत 25 या 30 साल में नारा सिस्टम में बदलाव नहीं कर पाए। एक बार लालबहादुर सर प्रयाग यूनिवर्सिटी में हॉस्टल में मेरे कमरे पर आए थे। चाय पानी के बाद थोड़ी बहस हो गई। वह विद्वान जरूर है लेकिन सवालों के  सटीक उत्तर की जगह कुतर्क करते है। सवाल फीस बढ़ोत्तरी का हो तो उत्तर ग्लोबल वार्मिंग में खोजते हैं। खैर, यूनिवर्सिटी सीनियर है तो सम्मान करता हूं। कई बार सोचता हूं जेएनयू की उपलब्धि क्या है ? अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तो हिंदुओ की दान की गई जमीन पर बना। सर सैयद अहमद भावुक अपील करते है हिंदू मुस्लिम भारत माता की आंखे हैं। जब जमीन मिल गई तो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पाकिस्तान निर्माण का अघोषित कार्यालय बन गया और सर सैयद पाकिस्तान चले गए। इस यूनिवर्सिटी की उपलब्धि क्या है ? बीएचयू वाले तो कुछ न कुछ खुडपेंच करते रहते हैं। अभी कोई डीएनए या आरएनए पर असरकारक

तकनीकी आधारित जॉब में बूम का इंतजार

ऑनलाइन कंपनीज, सॉफ्टवेयर में शिफ्ट होगी इकोनॉमी पढ़ाई और कोर्सेज में भी होगा व्यापक बदलाव दुनिया में लाखों नौकरियों पर कोरोना का ग्रहण लगा हुआ है, इसकी काली छाया दूर होते ही आईटी सेक्टर से लेकर ऑनलाइन बिजनेस करने वाली कंपनियों में रोजगार का बूम आने वाला है. इतना ही नहीं एजुकेशन सिस्टम में भी क्रांतिकारी परिवर्तन अगले कुछ वर्षों में देखने को मिलेंगे. प्रोफेशनल कोर्सेज सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से लेकर वेबसाइट डेवलपमेंट, इक्विपमेंट डेवलपमेंट जोकि हेल्थ, एजुकेशन से लेकर फार्मा और आईटी बेस्ड होंगें जैसे एवेन्यूज पर हमारा एजुकेशन सिस्टम आगे बढ़ेगा. किन क्षेत्रों में बढ़ेगा एजुकेशन ऑनलाइन शॉर्ट टर्म कोर्सेज स्किल बेस्ड ट्रेनिंग ऑनलाइन प्रोग्राम इवेंट मैनेजर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट हेल्थ फार्मा आईटी बेस्ड जॉब्स तकनीकी आधारित जॉब लॉक डाउन के दौरान जब वर्चुअल माध्यम से एजुकेशन सिस्टम चलाने की कोशिश की जा रही थी यह भी देखा गया कि यूनिवर्सिटी यूट्यूब चैनल वेबसाइट विजिट करने वालों बाढ़ आ गई. महज सवा साल में ही लखनऊ यूनिवर्सिटी की वेबसाइट को तीन करोड़ लोगों ने विजिट किया जिसमें फॉरेनर्स की भी अच्छी खासी

लाइफ स्टाइल में चेंज से भी बढ़ती है इम्यूनिटी दूब घास और अश्वगंधा है सबसे बड़ा एंटी ऑक्सीडेंट

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साल भर से अधिक समय से लोगों ने काढ़ा, हल्दी, गिलोय और तुलसी आदि का प्रयोग शुरू कर दिया है ताकि वह अपनी इम्यूनिटी बढ़ा सकें और कोरोना महामारी का सामना कर सके. इम्यूनिटी बढ़ने से ना केवल कोरोना महामारी से लड़ने में मदद मिलती है बल्कि शरीर को अन्य बीमारियों से भी सुरक्षित रखने में सहारा मिलता है. इम्यूनिटी के बारे में कहा जाता है कि यह बच्चों और बुजुर्गों में कम होता है जबकि युवा लोगों में इम्यूनिटी अधिक होता है. जिसके कारण वह रोगों की चपेट में आने से बच जाते हैं. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए जहां देशी मसाले जिनमें अजवाइन, लौंग, हल्दी, काली मिर्च, अदरक आदि का लोग प्रयोग कर रहे हैं, तो वही जानकारों का कहना है कि उचित आहार-विहार करके अपने लाइफ स्टाइल में परिवर्तन करके भी इम्यूनिटी को बढ़ाया जा सकता है. आधुनिक मेडिकल विज्ञान सिर्फ शारीरिक इम्युनिटी बढ़ाने की बात करता है. जबकि आयुर्वेद में तीन प्रकार के इम्यूनिटी की बात की गई है जिसमें पहली इम्यूनिटी शारीरिक होती है. दूसरी मानसिक होती है जबकि तीसरी आध्यात्मिक इम्यूनिटी होती है. यदि हम भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार उचित आहार-विहार करें तो यह तीन

कीट किसान के दुश्मन नहीं -खरीफ फसलों में हानिकारक कीड़ों को मारने से पहले मित्र कीटों को पहचान

सीसीएस हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के पूर्व निदेशक, मानव संसाधन प्रबंधन और कीट विज्ञान विभाग के प्रमुख रहे प्रख्यात कीट विज्ञानी प्रोफेसर राम सिंह ने किसानों और प्रकृति के हित में अपने अनुभव साझा किए। मनुष्य ने कीटों को या तो उनके मित्रों या शत्रुओं में विभाजित किया, जबकि प्रकृति माँ की दृष्टि में सभी जीवों को समान मूल्य के साथ जीने का समान अधिकार है। कुछ कीट जैसे मधुमक्खियां, रेशम कीट, लाख कीट या परागणक उपयोगी कीट कहलाते हैं क्योंकि उनके उत्पाद मनुष्य के लिए लाभकारी होते हैं । लेकिन साथ ही जब कोई मधुमक्खी कॉलोनी किसी व्यक्ति के घर के आसपास बसने की कोशिश करती है, तो वह व्यक्ति या तो व्यवस्था करेगा इस कॉलोनी को खदेड़ दें या काटे जाने या उपद्रव के डर से कीटनाशक स्प्रे से नष्ट करवा देगा । उसके पास विकल्प है कि जरूरत पड़ी तो बाजार से शहद खरीद लेंगे । लेकिन उसे इस बात की जानकारी नहीं है कि अगर मधु मक्खियों जैसे परागणकर्ता विलुप्त हो जाते हैं तो इस ग्रह पर मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। मनुष्य के छोटे बच्चे टिड्डे, भृंग, तितलियों जैसे कीड़ों के साथ खेलते हैं क्योंकि उन्हें ऐ

बचपन में गाँव की पाठशाला

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बचपन में गाँव की पाठशाला में पढ़ते समय छुट्टी के पहने मुहानी होती थी। एक विद्यार्थी खड़ा होकर गिनती और पहाड़े कहता था और शेष सब दोहराते थे। उस समय 16×9 ही हमको सबसे प्रिय लगता था तथा उसको हम लोग बड़े लहजे के साथ कहते थे 'सोलह नम्मा चलारे चवाल सौ'। शेष सब संख्याओं को उनके साधारण नाम से, क्यों कहा जाता था इसका रहस्य जानने की हमने कभी चिंता नहीं की। किंतु यह सत्य है कि इसको दोहराने में आनंद खूब आता था। एक कारण तो यह हो सकता है कि इसमें छुट्टी के आनंद की कल्पना छिपी हो क्योंकि सोलह नम्मा के बाद ही सोलह दहाई एक सौ साठ कहते ही मुहानी समाप्त हो जाती थी और हम सब अपना-अपना बस्ता, जिसको कि पहले से ही बाँधकर सँभालकर रख दिया जाता था, उठा घर की ओर दौड़ पड़ते थे, फिर चाहे स्कूल से निकल रास्ते खेलते-खाते (आम की अमिया) घर रात होते-होते ही पहुँचते। 'सोलह नम्मा चलारे चवाल सौ' को धीरे-धीरे मस्ती से कहकर दिन भर की थकान भी निकल जाती थी। किंतु इसमें एक खराबी थी, इसकी लंबाई तथा शेष सब संख्याओं की भिन्नता के कारण पंडित जी का, जोकि हमारी मुहानी के समय या तो सीधा बाँधते रहते थे या गाँव के किसी व्यक्त

यात्रा से पूर्व

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15 अगस्त भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण दिन है। उस दिन संपूर्ण भारत में स्वतंत्रतोत्सव मनाए गए। सहस्रों वर्षों की दासता के बंधन से मुक्ति का अनुभव किसको आनंदकारी नहीं होता। किंतु आनंद के क्षण थोड़े ही रहते हैं। आनंदोत्सव में मनुष्य एकबारगी अपने आपको भूल जाता है, वास्तविकता की कठोर धरती से उठकर कल्पनाकाश में सहज विचरण करने लगता है। हमने भी इस प्रकार आनंद मनाया और अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार उसकी अनुभूति रही। हरेक की अपनी-अपनी अवधि थी। किंतु अंत में सबको वास्तविकता की कठोर भूमिका स्पर्श करना ही पड़ा। आज भी अनेकों व्यक्ति कटु दु:खद और उत्तरदायित्वपूर्ण वास्तविकता से मुँह छिपाना चाहते हैं। वे कल्पना के मधुमय संसार का ही आस्वाद लेने में मस्त हैं। यदि उनको कोई झकझोरकर सत्य संसार में लाने का प्रयत्न करता है तो उन्हें झुंझलाहट आ जाती है, यदि वास्तविक जगत् की कठिनाइयाँ उनके सामने कही जाती है तो वे समझते हैं कि स्वातंत्र्यानुभूति का महत्त्व कम करने का प्रयत्न किया जाता है अथवा स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाले योद्धाओं की महत्ता को जनता की दृष्टि में नीचे गिराने का प्रयत्न किया जाता है। यह सत्य

सब को काम ही भारतीय अर्थनीति का एकमेव मूलाधार

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बेकारी की समस्या यद्यपि आज अपनी भीषणता के कारण अभिशाप बनकर हमारे सम्मुख खड़ी है किंतु उसका मूल हमारी आज की समाज, अर्थ और नीति व्यवस्था में छिपा हुआ है। वास्तव में जो पैदा हुआ है तथा जिसे प्रकृति ने अशक्त नहीं कर दिया है, काम पाने का अधिकारी है। हमारे उपनिषद्कार ने जब यह घोषणा की कि 'काम करते' हुए हम सौ वर्ष जीएँ (कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् समा:।) तो वे यही धारणा लेकर चले कि प्रत्येक को काम मिलेगा इसीलिए शास्त्रकारों ने प्रत्येक के लिए कर्म की व्यवस्था की। यहाँ तक कि इस आशंका से कि कोई कर्महीन रहकर केवल भोग की ही ओर प्रवृत्त न हो जाए उन्होंने यह धारणा प्रचलित की कि यह भारतभूमि 'कर्मभूमि' है। स्वर्ग के देवता भी अपने कर्म फल क्षय हो जाने पर यही इच्छा करते हैं कि वे भारत में जन्म लें एवं पुन: सुकृत संचय करें। तात्पर्य यह कि हमने किसी भी व्यक्ति के संबंध में बेकारी अथवा कर्म विहीनता की कल्पना नहीं की। अत: भारतीय अर्थनीति का आधार 'सबको काम' ही हो सकता है। बेकारी अभारतीय है। भारतीय शासन का कर्तव्य है कि वह इस आधार को लेकर चले। बेकारी के कारण लोगों को काम न मिल