आंदोलन की फसल काटने को बेताब नेता

दिसंबर अंत में रिलांयस ग्रुप ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में एक याचिका दायर किया और न्यायालय से गुहार लगाई कि हरियाणा-पंजाब में हमारे आउटलेट, टॉवर, व्यापार केंद्रों आदि पर हमले हो रहे हैं, नुकसान पहुंचाया जा रहा है। जिससे हमारे हजारों कर्मचारी परेशान हैं। हमारे इन केंद्रों की सुरक्षा के लिए सरकार व पुलिस को निर्देशित करने की हम याचना करते हैं। साथ ही हमारे ऊपर लग रहे आरोप कि हम कांट्रैक्ट फार्मिंग करते है और वर्तमान कृषि कानूनों से हम करार खेती शुरु कर देंगे, यह अफवाह है। हम शपथ पूर्वक कहते है कि रिलायंस से जुड़ी कोई भी संस्था जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज, रिलायंस इंफो, जीओ आदि देश में कहीं भी कांट्रैक्ट खेती नहीं करती ना हाल फिलहाल ऐसा करने की कोई योजना है। इस याचिका के तकरीबन सप्ताह भर पहले अडानी समूह ने देश के प्रमुख समाचार पत्रों में बड़े और साफ शब्दों में विज्ञापन देकर प्रकाशित कराया और कहा कि वर्तमान कृषि कानूनों को लेकर हमारे ऊपर लगने वाले आरोप निराधार है। इसका हम खंडन करते हैं। दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली को घेर कर दो माह से बैठे किसान कहे जाने वाले आंदोलनकारी लगातार यह माला जप रहे हैं कि खेती-किसानी को अंडानी अंबानी को दे रही है यह सरकार। कृषि कानूनों के विरोध में किसान तकरीब दो माह से आंदोलन कर रहे हैं। इस दौरान किसानों और सरकार के बीच अनेक दौर की वार्ता बेनतीजा हो चुकी है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंंच गया और कोर्ट ने एक कमेटी गठित कर दी। एक तरफ सरकार तो दूसरी तरफ दिल्ली, हरियाणा और उत्तरप्रदेश पुलिस भी किसानों का मानमनौव्वल कर रहे हैं। किसानों के समर्थन में कांग्रेस पार्टी खुलकर है तो अन्य विपक्षी दल भी उनके समर्थन में ही अपनी राजनैतिक फसल काटना चाहते हैं। आंदोलन के चलते दिल्ली के रास्ते बंद हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कृषि कानूनों की समीक्षा के लिए गठित कमेटी की पहली बैठक में किसान नेता नहीं पहुंचे। किसानों ने अब आंदोलन के साथ नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आजाद हिंद किसान फौज बनाने की घोषणा किया है। इसके अलवा किसान संसद का आयोजन करने की तैयारी है जिसमें तमाम गैर भाजपा दल शामिल होने जा रहे हैं। किसानों के इस नए प्रहसन को देखने के लिए सरकार नजरे टिकाए है। जनप्रतिनिधि संघर्ष मोर्चा की दलील है कि इस किसान संसद की जरूरत इसलिए महसूस की गई ताकि कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन का जल्दी हल निकल सके। इस संसद में तमाम विपक्षी दलों को जुटाने का बीड़ा उठाया गया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह संयुक्त किसान मोर्चा से इतर कोई नया समानांतर जमावड़ा है। भाकियू के गुरनाम सिंह चढूनी ने संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक से दूरी बनाकर किसान संसद की नई खिचड़ी की हांडी चढ़ा दी तो सभी ने सवाल खड़े किए कि क्या यह संयुक्त किसान मोर्चा में बिखराव का संकेत है और सरकार अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही है, लेकिन कहानी कुछ और है। राजनीतिक दलों से नाता नहीं होने का दावा जरूर किया जा रहा है, लेकिन संकेत तो यह भी है कि यदि किसान संसद के बहाने विपक्ष दलों-संयुक्त मोर्चा का यह कॉकटेल यदि देशव्यापी असरदार हुआ तो चढूनी की तरह एक-एक कर किसान संगठन इसमें भागीदारी बढ़ाते जाएंगे। दिल्ली की सीमाओं पर बैठै किसान तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। सरकार इसमें विवादास्पद हिस्सों में संशोधन को तैयार है लेकिन किसान कानून ही वापस लिए जाने पर आमादा है। सरकार का यह भी दावा है कि इन कानूनों से किसानों का भला ही होगा। तीन नए कृषि कानून क्या है? 1. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) कानून-2020 2. कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून-2020 3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020 इन कानूनों में प्रावधान है कि किसान अपने उत्पादों को सरकारी खरीद, या एपीएमसी मंडी से अलग खुले बाजार में भी बेच सकते हैं। किसानों को समझाने वाले बता रहे हैं कि यदि आप बाहर अपनी फसल बेचते हैं तो हो सकता है कि कुछ समय तक आपको मुनाफा हो इसके बाद एमएसपी की तरह निश्चित दर पर भुगतान की कोई गारंटी नहीं होगी। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाएगा। जबकि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर लिखित गारंटी देने की बात बार-बार कह रही है। किसान पूछ रहे हैं कि एपीएमसी मंडियों के नहीं रहने पर आढ़तियों और कमीशन एजेंटों का क्या होगा। दरअसल आरोप ही यही है कि इस आंदोलन को परदे के पीछे से आढ़ती संचालित कर रहे हैं। जिससे बार-बार यह सवाल खड़ा किया जा रहा है कि आढ़तियों का क्या होगा। नए कानूनों के तहत अनुबंधीय खेती की जा सकती है। यानी अब किसान थोक विक्रेताओं, प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज और प्राइवेट कंपनी से सीधे अनुबंध करके अनाज का उत्पादन कर सकते हैं। इसमें फसल की कीमत तय किया जाएगा। इससे बिचौलियों व आढ़तियों का कारोबार बंद होता दिखाई दे रहा है। आरोप है कि आंदोलन को यही वर्ग पर्दे के पीछे से संचालित कर रहा है। पिछले 20 और 22 सितंबर, 2020 को संसद ने कृषि संबंधी तीन विधेयकों को पारित किया था। 27 सितंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इन विधेयकों को मंजूरी दे दी, जिसके बाद ये तीनों क़ानून बन गए। इन कानूनों के प्रावधानों को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं। आरोप है कि इन कानूनों से मौजूदा एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) की मंडियों के साथ साथ निजी कंपनियों को भी किसानों के साथ अनुबंधीय खेती, खाद्यान्नों की खरीद फरोख्त और भंडारन के अलावा बिक्री करने का अधिकार मिल जाएगा। आंदोलनकारियों का कहना है कि हमें आशंका है कि सरकार किसानों से गेहूं और धान जैसी फसलों की खरीद को कम करते हुए बंद कर सकती है और उन्हें पूरी तरह से बाजार के भरोसे रहना होगा। इससे निजी कंपनियों को मुनाफा होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो जाएगा। जबकि यह कोरा अफवाह है, कारण कि इन कानूनों में कहीं भी एपीएमसी मंडियों को बंद करने या एमएसपी प्रक्रिया को खत्म करने की बात शामिल नहीं है। सरकार का तर्क नए कृषि कानूनों को लेकर सरकार का कहना है कि दलहन, तिलहन, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। इन उत्पादों के भंडारण पर कोई रोक नहीं होगी, इससे निजी निवेश आएगा और कीमते स्थिर होंगी साथ ही महंगाई पर नियंत्रण बना रहेगा। किसानों का कहना है कि इन प्रावधानों से निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर इन उत्पादों का भंडारण करने लगेंगी और अपने फायदे के लिए बाजार में इन उत्पादों की आपूर्ति में कृत्रिम कमी पैदा की जाएगी। सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि न्यूतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा और किसानों को घाटे के बजाए मुनाफा होगा। किसानों की मांग है कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर इन तीनों कानून को रदद कर दे। किसान संघ कृषि उत्पादों की एमएसपी से कम मूल्य पर खरीद को दंडनीय अपराध के दायरे में लाने की मांग भी कर रहे हैं। इसके अलावा वे धान-गेहूं की फसल की सरकारी खरीद को सुनिश्चित करने की मांग भी कर रहे हैं। सरकार एमएसपी बहाल रखने और एपीएमसी मंडियों को सशक्त करने के लिए लिखित आश्वासन भी देने को तैयार है। सरकार इस बात के लिए भी तैयार है कि किसान और निजी कंपनियों में किसी विवाद का फैसला सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के जरिए ही नहीं होगा, बल्कि किसानों के सामने अदालत जाने का विकल्प भी होगा। क्या है एपीएमसी राज्यों में स्थानीय नियमों के तहत सरकारी एजेंसी या आधिकारिक आढ़तियों के माध्यम से कृषि उत्पादों की खरीद बिक्री के लिए एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) का गठन किया जाता है। महाराष्ट्र में यह करीब 300 है तो बिहार में 2006 ऐसी कमेटियों को भंग कर दिया गया। एपीएमसी मंडियों के जरिए देश भर में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में मदद मिलती है। राज्य सरकारें इन मंडियों में होने वाली खरीद बिक्री पर कर वसूलती हैं। इसके अलावा इन मंडियों में आढ़तियों और कमीशन एजेंट्स के नेटवर्क को भी आमदनी होती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों के आर्थिक सुरक्षा के लिए लंबे समय से न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है। यदि बाजार में कीमतें गिरने लगती हैं तो भी सरकार को कृषि उत्पाद एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की गारंटी लेती है। कृषि उत्पाद का एमएसपी देश भर में एक समान होता है जोकि कृषि मंत्रालय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की आंकड़ों के हिसाब से एमएसपी निर्धारित करता है। इसमें यह भी देखा जाता है कि किसान हो घाटा ना हो, महंगाई, अर्थव्यवस्था की स्थिति आदि को देखते हुए लागत और मूल्य के आधार पर तय किया जाता है जिसमें उपभोक्ता का भी ध्यान रखा जाता है ताकी कीमतें बहुत अधिक नहीं होने पाए। पंजाब और हरियाणा के किसान क्यों सरकार एपीएमसी नेटवर्क के माध्यम से कुल उपज का महज 10 प्रतिशत हिस्सा ही खरीदती है। लेकिन अकेले पंजाब में कुल उपज का 90 प्रतिशत हिस्सा एपीएमसी की मंडियों में बेचा जाता है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कुल उपज का 90 प्रतिशत हिस्सा एपीएमसी मंडियों में पहुंचता है। जबकि इन तीनों राज्यों में महज दस फीसद उपज ही खुले बाज़ार में पहुंचता है। जब 1960 के दशक में भारत अनाज संकट उत्पन्न हुआ तब पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को अनुदानित दरों पर हाइब्रिड बीज, खाद, ट्यूबवेल के कर्ज और दूसरी सुविधाएं मुहैया कराईं गईं, ताकि भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो सके। शांता कुमार कमेटी के मुताबिक देश के महज छह प्रतिशत किसानों को एमएसपी मिलता है और इनमें ज़्यादातर किसान पंजाब-हरियाणा के है। यही कारण है कि इन दो राज्यों के किसान ही सबसे अधिक आंदोलित हैं। एनआईए ने भेजा नोटिस आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों की जांच करने वाली नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने पंजाब के दर्जन भर लोगों को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम एक्ट यानी यूएपीए की धाराओं के तहत नोटिस जारी किया है। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले पंजाब के 32 किसान संगठनों में से एक संगठन के नेता बलदेव सिंह सिरसा और किसान आंदोलन को पिछले कई महीनों से समर्थन करने वाले दीप सिद्धू का नाम उन लोगों में शामिल है। नोटिस के मुताबिक, सभी व्यक्तियों को 17 जनवरी को एनआईए के नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित मुख्यालय में पेश होने के लिए कहा गया है। किसान संगठनों ने एनआईए द्वारा भेजे जा रहे नोटिस को किसान आंदोलन को दबाने की केंद्र सरकार की साजिश कहा है। क्या कहते हैं अस्सी के दौर के किसान नेता कृषि कानून लागू हुए छह माह हो चुके हैं और इस साल हरियाणा में धान, बाजरा की खरीद अच्छे दामों पर हुई है। एमएसपी खत्म नहीं हुई तो फिर किस बात का आंदोलन चल रहा है। जब केंद्र सरकार कह रही है कि हम मंडियों को और अधिक आधुनिक करेंगे तो यह भ्रम कौन फैला रहा है कि मंडियों को खत्म किया जाएगा। पंजाब में पहले से ही नैस्ले किसानों से दूध खरीद रहा है, पैप्सी भी किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग कर रहा है तो फिर कांट्रैक्ट फार्मिंग के नाम पर किसानों को कौन डरा रहा है। यह कहना है भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा के प्रथम संयोजक रहे 76 किसान वर्षीय रामअवतार यादव का जो मानेसर के पूर्व सरपंच भी रहे हैं। खेती किसानी से जुड़े और पर्यावरण के मुददों पर लगातार सक्रिय रहने वाले किसान नेता कहते हैं कि 1981 में भारतीय किसान यूनियन की उत्तरी भारत में स्थापना की गई थी। जबकि इसी साल दक्षिण भारत में चैन्नई में सम्मेलन हुआ और इंडियन फार्मर एसोसिएशन की स्थापना की गई थी। हरियाणा में किसान आंदोलनों पर विस्तार से चर्चा करते हुए वह कहते हैं कि साल 1981 में हरियाणा के भारतीय किसान यूनियन में पंजाब का खेती-बाड़ी यूनियन और कंझावला अंादोलन जो कि 1980 से पहले चला था उसके भी सारे नेता और किसान यूनियन में शामिल हुए थे। बावल आंदोलन, दिल्ली के कंझावला गांव के आंदोलन और चौधरी देवीलाल के किसान आंदोलनों में हिस्सेदारी करने वाले रामअवतार यादव वर्तमान केंद्र सरकार की जमकर तरफदारी करते हैं और कहते हैं कि आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने किसानों के लिए इतना नहीं किया जितना प्रधानमंत्री मोदी ने किया है। मंडियों को आधुनिक बनाने के लिए सरकार कह रही है, न्यूनतम समर्थन मूल्य अर्थव्यवस्था का मापक होता है इसे खत्म करने का अफवाह उड़ाया जा रहा है। जमीन कारपोरेट ले लेगा यह कहकर किसानों को बरगलाया और बहकाया जा रहा है। किसान यूनियन के 38 साल पूर्व संयोजक रहे रामअवतार बताते हैं कि वोट क्लब पर इंदिरा गांधी ने किसानों की रैली किया था। इसके बाद गुडग़ांव में तकरीबन एक माह तक बिजली नहीं आई तो किसानों ने आंदोलन शुरु किया। वह आंदोलन महज डेढ़ हजार रुपए में ही किया था, जिसमें टै्रक्टर और बैलगाड़ी से गांव-गांव प्रचार किया गया था। पी मार्कण्डेय

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