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अक्तूबर 7, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कोरबा जनजाति की महिला लड रही है मातृत्‍व के अधिकार की लडाई

।   राजधानी दिल्‍ली में एकतरफ खाने के मौलिक अधिकार को लेकर प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालय जेएनयू मे घमासान मचा है तो दूसरी तरफ छतिसगढ की एक आदिवासी महिला मातृत्‍व के मौलिक अधिकार की लड़ाई लड़ने सड़कों पर उतर आई है। छतिसगढ के आदिवासी ईलाके की एक महिला रायपुर से अपनी लड़ाई लेकर राजधानी नई दिल्‍ली पहुंच गई है। महिला का आरोप वहां के डाक्‍टरों पर है जिन्‍होंने पैसे के लालच में उसके मां बन पाने की संभावना को समाप्‍त कर दिया है। अब यह महिला राजधानी दिल्‍ली की सड़कों पर मातृत्‍व की लड़ाई लड़ने पहुंच गई है। छतिसगढ के रायपुर में पिछले दिनों सरकार की एक योजना को लेकर काफी बवाल मचा था जिसमें सरकार ने गरीबों को ईलाज के लिये चालिस हजार रुपये देने का ऐलान किया था। राज्‍य के डाक्‍टरों ने गरीब आदिवासी महिलाओं को ईलाज के नाम पर गंभीर गैरजरुरी आपरेशन कर सरकार से पैसे की वसूली शुरु कर दी थी। उत्‍तरी छतिसगढ के सरगुजा की फूलसुंदरी पहाड़ी कोरवा कहती है कि मेरे कुल छह बच्‍चे हैं और मै अब नही चा‍हती। सरकार ने कहा था कि परिवार का सीमित रखने पर सुविधायें मिलेगी हमे ग्रामीण हेल्‍थ वर्कर ने कहा कि एक छोटा सा आपरेशन कि

राईट टू एजुकेशन कानून की भ्रूण्‍ा हत्‍या

राईट टू एजुकेशन के मूल अधिकार को जिसे संसद ने बनाया माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने वैध करार दिया। यह कानून देश भर में समान रुप से लागू होगा और इसके तहत देश के सभी सरकारी स्‍कूलों और निजी स्‍कूलों में गरीब बच्‍चों को पच्‍चीस फीसदी निश्‍श्‍ुल्‍क सीटें समान रुप से प्राप्‍त होंगी। बहुमत से दिये गये फैसले में माननीय न्‍यायालय ने कहा कि सरकारी और गैर सरकारी सहायता प्राप्‍त सभी स्‍कूलों में यह कानून प्रभावी होगा। सरकारी सहायता नहीं लेने वाले निजी या अल्‍पसंख्‍यक स्‍कूलों में यह लागू नहीं होगा। सवान यह है कि क्‍या शिक्षा के इस अधिकार की दशा भी मनरेगा सौ दिन के रोजगार गारंटी जैसा नही हो गया है ? क्‍या यह कानून सही रुप से लागू हो पाया है ?   क्‍या इसके पालन करने हेतु कोई निगरानी कमेटी का निर्माण किया गया है ? अब तक के तमाम कानूनों को देखने के बाद ऐसा लगता है यह भी अपनी अकाल मौत मर रहा है। इस कानून की भी भ्रुण हत्‍या हो रही है। बाल श्रम को कानूनन जुर्म बना दिया गया लेकिन राजधानी दिल्‍ली में लाखों की संख्‍या ऐसे बच्‍चों की है जो होटल, ढाबों के अतिरिक्‍त जूते पालिस से लेकर गर्मी के मौसम में

वैश्विक स्तरर पर एफडीआई की हकीकत

यूपीए और मनमोहन सिंह सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर घोटालों और भ्रष्टाचार के गंभीर मामलें हैं तो दूसरी ओर सरकार की गिरती साख, महंगाई, अर्थव्यवस्था और उसके प्रबंधन में उसकी नाकामी के कारण यूपीए के सहयोगी दल मौजूदा सरकार पर से अपना भरोसा खो रहे हैं। इसके अलावा  देशी-विदेशी बड़ी पूंजी, कारपोरेट समूह, वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और मीडिया सरकार पर कड़े आर्थिक फैसले लेने और नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहे हैं। सरकार देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों खासकर अमेरिका को खुश करना चाह रही रही है और ये भी साबित करना चाह रही है की वो अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने की लिए बड़े और नीतिगत फैसलें भी ले सकती है। डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि और रसोई गैस के सब्सिडीकृत सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने से लेकर मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( एफडीआई ), नागरिक उड्डयन क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई के साथ विदेशी एयरलाइंस को भी निवेश की इजाजत , ब्राडकास्टिंग क्षेत्र में डीटीएच आदि में 74 फीसदी एफडीआई और पावर ट्रेडिंग में 49 फीसदी एफड