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नींद में खलल पड़ी तो ईराकी ने आठवीं मंजिल से फेंका दो माह के पालतू

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 ईराकी नागरिक ने आठवीं मंजिल की बालकनी से फेंका   वन्यजीव कार्यकर्ता ने एफआईआर के लिए विभिन्न सरकारी महकमों से लगाई गुहार   दो से तीन माह के पप्पीज (कुत्ते के बच्चों) को एक ईराकी नागरिक ने सिर्फ इस लिए आठवीं मंजिल की बालकनी से नीचे फैंक दिया क्यों कि उसके नींद में खलल पड़ रही थी। मामला सेक्टर 65 के एमार एमराल्ड बिल्डिंग का है जहां टॉवर डी के आठवी मंजिल पर ईराकी नागरिक सैफ अजहर अब्दुल हुसैन अल नाजी रहता है। उक्त व्यक्ति दो से तीन माह की उम्र के दो कुत्ते के बच्चों को पाल रखा था, आज सुबह सात बजे जब वह सो रहा था तो उन छोटे कुत्तों ने भौंकना शुरु कर दिया। कुत्ते के बच्चों के भौकनें के कारण ईराकी नागरिक के नींद में खलल पड़ा और उसने बेरहमी से बिल्डिंग के आठवीं मंजिल से उन मासूमों उठा कर फैंक दिया। सुबह करीब सात बजे यह घटना घटी जिसके बाद जब उक्त बिल्डिंग लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई तो ईराकी नागरिक दरवाजा बंद करके सो गया। इस बारें में जब वन्य जीवों को लेकर कार्य करने वाली कार्यकर्ता संगीता डोगरा को पता चला तो वह संबंधित थाने में जीवजंतु क्रूरता अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने की गुहार लगाने

बाबा रामदेव को अरावली की जमीन देना चाहती है सरकार?

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कांग्रेस के जयराम रमेश ने शून्य काल के दौरान उठाया मुददा  फरीदाबाद के कोट गांव की सामलात भूमि बेचने का आरोप  मार्कण्डेय पाण्डेय  अरावली की चार सौ एकड़ जमीन को अवैध तरीके से बेचने का मामला संसद में गरमा गया है। कांग्रेस के जयराम रमेश ने शून्य काल के दौरान इस मुददे को मीडिया रिर्पोट के हवाले से उठाते हुए कहा है कि साल 2014 से 2016 के बीच राजनैतिक रसूख के बल पर एक प्राईवेट इंटरप्राईज ने अरावली के कॉमन लैंड को खरीद लिया है। रमेश ने कहा कि जो जमीन बेची गई है वह सुप्रीम कोर्ट के 1996 के आदेश के मुताबिक वन भूमि है जिसे बेचा अथवा खरीदा नहीं जा सकता। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2011 के आदेश के मुताबिक सभी ग्राम समाज की सम्मिलित भूमि जिन पर किसी प्रकार का अतिक्रमण किया गया है उसे खाली कराकर उसे ग्राम पंचायत को सौंपा जाना चाहिए। जिससे उक्त जमीनों का सार्वजनिक तौर पर ग्राम समाज उपयोग कर सके। यदि सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों को देखा जाए तो अरावली की जमीन खरीदने वाले ने न्यायालय की अवहेलना की है। संसद में शून्य काल में हरियाणा सरकार के पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट में संशोधन के मुददें

गांव की गायों का दूध भी नहीं पीते लोग

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युवकों से विवाह नही करना चाहता कोई, रिश्तेदार भी आने से हिचकते हैं प्लास्टिक और कचरा खाकर मर रही है गायें, पसरता जा रहा है कैंसर  मार्कण्डेय पाण्डेय अरावली की हरी-भरी गोद में बसे बंधवाड़ी गांव में रोजी रोटी का मुख्य साधन पशुपालन है। गांव के दर्जनों ऐसे लोग है जो पशुपालन करते हैं और शहरी क्षेत्रों में दूध बेचते हैं। जैसे ही शहरी लोगों को पता चलता है कि गांव का पानी जहरीला हो गया है, तब से उन्होंने दूध लेना बंद कर दिया है। कुछ समय पहले तक गांव के लोग दूध लेकर शहर जाते थे। महज दो-तीन पशुपालकों का ही करीब 125 किलो दूध बिना बिके वापस आ गया। शहर में लोगों ने उनका दूध लेने से साफ इनकार कर दिया। खत्ते की पॉलिथीन और कचरा खाने से गाय और भैंसें मर रही हैं। अब दूध की बिक्री बंद या कम होने से रोजी रोटी पर भी संकट आ गया है। गांव के बहुत से लोगों ने अब बीमारियों से बचने के लिए 25 रुपये में 20 लीटर पानी खरीदकर पी रहे हैं। विकास और आधुनिकता बंधवाड़ी के लिए अभिशाप बन गया है, जहां दर्जनों लोग कैंसर से जूझ रहे हैं। तो वहीं दूसरी तरफ पशुधन कचरा खाकर मर रहा है। यहां तक कि बंधवाड़ी और इसके आसपास क

मैकेनिकल कूलिंग सिस्टम और खराब कर रहा है पर्यावरण

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गर्मी और उमस में बढ़ रही है 30 से 50 फीसद बिजली की मांग  सेंटर फॉर साईंस इंवायरमेंट ने मांग किया थर्मल बिल्डिंग नियम बनाएं सरकार   प्रचंड गर्मी से बचने के लिए एनसीआर सहित गुडग़ांव में एयर कंडिशनर मशीनों की मांग में तेजी आई है, तो वहीं बिजली की खपत जून माह में ही 30 से 50 फीसदी तक बढ़ गई है। सामान्य दिनों के अनुपात में डेढ़ से दो गुना तक बढ़ी बिजली खपत, और वातानुकूलित मशीनों के प्रयोग से निकलने वाली गर्म हवाएं पर्यावरण को और भी बदतर कर रही है। सेंटर फॉर साईंस एंड इंवायरमेंट ने इसे लेकर सरकार से मांग किया है कि बिल्डिंग कोड के नियमों में परिवर्तन करके मैकेनिकल कूलिंग सिस्टम की जगह थर्मल कूलिंग का प्रावधान किया जाए। जून माह में जिस तरह बिजली की मांग में तेजी आई है यदि इसके मूल कारणों को नहीं बदला गया तो आने वाले समय में पर्यावरण से लेकर भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र सरकार की ओर से गठित की गई नेशनल कूलिंग एक्शन प्लान में मांग की गई है कि थर्मल कम्फर्ट स्टैंडर्ड को सभी भवन निर्माणों में लागू किया जाए यहां तक कि इसे किफायती श्रेणी के आवासों सहित प्रधानमंत्री आव

दो हजार टन कूड़ा छोड़ गए भक्त

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प्रयागराज में महामारी फैले इसके पहले हटा लें कूड़ा- एनजीटी  आधुनिक भारत में अब तक का सबसे बड़ा मानवीय जुटान जो स्वच्छ और साफ सुथरा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज अर्धकुंभ के बाद स्वच्छता कर्मियों का स्वागत करते हुए कहा था। प्रधानमंत्री के इस दावे में कितनी सच्चाई है, यह शहर से महज दस किलोमीटर दूर बंसवार में खड़ा कूड़े का पहाड़ बताता है। 22 अप्रैल को नेशनल ग्रीन ट्रीव्यूनल ने कहा कि कुंभ का कूड़ा यदि समय रहते निस्तारित नहीं किया गया तो प्रयागराज के कई गांव और इलाके महामारी की चपेट में आ जाएंगे। यह दावा तब किया गया जब एनजीटी के ही आदेश पर एक सेवानिवृत न्यायाधीश के माध्यम से अर्धकुंभ में श्रद्घालुओं के छोड़े गए कूड़े की पड़ताल की गई तो चौकाने वाली रिर्पोट सामने आई। जनवरी 4 से शुरु होकर 14 मार्च तक चले दुनियां के सबसे बड़े आयोजन में कुल 2 हजार टन कूड़ा इकटठा हुआ जो कि बांसवारा कूड़ा निस्तारण संयत्र पहुंचा दिया गया। इस पूरे आयोजन पर प्रदेश और केंद्र सरकार की ओर से 4200 करोड़ रुपए व्यय किया गया। मजे की बात यह कि जिस बांसवारा गांव के ट्रीटमेंट प्लांट पर यह कूड़ा पहुंच

बोतल का 90 फीसदी हिस्सा 27-28 वीं सदी में नष्ट होगा

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मान लीजिये आज आपने 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदी, और पीकर फेंक दिया। तो इस बोतल का 90 फीसदी हिस्सा 27-28 वीं सदी में नष्ट होगा। करीब 450 से 500 साल लगेंगे। यानी अकबर टोटरमल (हालांकि उस समय बोतल नही थी) जिस बोतल में पानी पिया होगा वह आज भी मौजूद है। हर 60 मिनट में 6 करोड़ बोतल बेची जा रही है, अरबो खरबो का व्यापार है। हिन्द महासागर में करीब 28 पैच (प्लास्टिक पहाड़) का बन चुका है। जानवर मर रहे है, मछलियां समुद्री जीव मर रहे हैं। अगला नम्बर आपका है।   फाइव स्टार और अन्य होटल में भा रत मे रोज करीब 4 लाख पानी की बोतल का कूड़ा निकलता है। शादी विवाह में अब कुल्हड़ में पानी पीना, तांबे पीतल के जग से पानी पिलाना फैशन वाह्य है, बेल, कच्चे आम, पुदीना या लस्सी के शर्बत की जगह पेप्सी कोक की बोतल देना चाहिए नही तो लोग गंवार समझेंगे। विज्ञान के अनुसार सोडा प्यास बुझता नही, बढ़ाता है। फिर भी ठंढा मतलब ठंढा, प्यास लगे तो पेप्सी यह टीवी में दिखाता है।   यूरोप के बहुत देशों ने अपने प्रदूषण पर काबू पाया है, अब उनके नल का पानी पीने योग्य हो गया। लेकिन गंगा यमुना सहित सैकड़ों नदियों, लाखो कुंव

प्यास से तड़पकर मरने लगे अरावली के वन्यजीव

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नीलगाय, जंगली सुअर की लाशें मिलने लगी सूखे जलस्रोतों के पास  अरावली की बदहाली का कहर यहां पर रहने वाले वन्यजीवों पर दिखने लगा है। गर्मी के मौसम की शुरुआत होते ही अरावली के भीतर मौजूद छोटे-बड़े जलस्रोत सूखने लगे हैं और वन्यजीव प्यास से तड़पकर मरने लगे हैं। हांलाकि वन्य जीवों के मौत का सिलसिला पिछले साल की गर्मियों में भी हुआ था और वन्य विभाग ने कहा था कि वह अरावली के भीतर मौजूद जल गर्तिकाओं को जलापूर्ति करेगा। मई जून के महीने में यहां पर मौजूद ज्यादातर जलाशय सूख जाते हैं और इसमें पानी डालने का कार्य वन विभाग का होता है। सूखते जलस्रोतो के कारण ही जंगली जानवर खासकर तेंदूआ अक्सर रिहायशी इलाकों का रुख करते हैं। अरावली के अंदर 10 से 15 किलोमीटर की औसत दूरी पर मौजूद जलस्रोतों से पानी पीने के लिए जानवर दूर से दूर से आते हैं, आखिरकार जब पानी नहीं मिलता है तो प्यास से तड़पकर मर जाते हैं। दूसरी तरफ अरावली के बीच में स्थित बंधवाड़ी गांव और आसपास के इलाकों में भूजल पूरी तरह प्रदूषित और जहरीला हो चुका है। हांलाकि इसकी पुष्टि गत वर्ष केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से भी कर दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के बाद एनजीटी ने भी दिया सरकार को झटका

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अरावली में भारती एयरटेल और इरोस ग्रुप ने 52 एकड़ जमीन खरीदा था, सात हजार से अधिक पेड़ काटे अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद प्रदेश सरकार को अब एनजीटी ने झटका दिया है। अरावली के सराय ख्वाजा में भारती एयरटेल ने लक्जीरियस अर्पाटमेंट के निर्माण के लिए सरकार से 52 एकड़ जमीन खरीदी थी जिसे एनजीटी ने डीम्ड फारेस्ट कहते हुए गैरकानूनी करार दिया है। इतना ही नहीं इस जमीन पर छह हजार से अधिक पेड़ों को काटे जाने के लिए एनजीटी ने प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। गत दिनों इस मामले को लेकर एक सेवा निवृत सेना अधिकारी ने न्यायालय में मामला दायर किया था। जिसके बाद राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने वन विभाग सहित पर्यावरण व वनमंत्रालय को नोटिस जारी किया था। उल्लेखनीय है कि गत चार दशकों में ही एनसीआर में अरावली 40 फीसद से अधिक विभिन्न कारणों से खत्म की जा चुकी है। हरियाणा में करीब 50 हजार एकड़ अरावली भूमि को ऐसा माना जाता है कि यह फारेस्ट नोटिफिकेशन में नहीं आने के कारण अरावली से अलग माना जाता है। एनजीटी के इस आदेश के बाद उम्मीद की जा रही है कि अब इस क्षेत्र को भी डीम्ड फारेस्ट क्षेत्र घोषित किय

अगले साल तक 20 साल पुराने वाहन हो जाएंगे कबाड़

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जल्द ही लागू करने जा रही है योजना  दुनियां भर में प्रदूषण की राजधानी बने एनसीआर से सबक लेते हुए सरकार 20 साल से अधिक पुराने व्यावसायिक वाहनों को चलन से बाहर करने जा रही है। यह वाहन प्राइवेट चालकों के हो अथवा कंपनियों के ट्राले सभी को कबाड़ घोषित कर दिया जाएगा। कारण कि इन वाहनों से एनजीटी के निर्धारित मानकों के विपरीत प्रदूषण के तत्व घोल रहे हैं। इसी के साथ व्यावसायिक वाहनों की उम्र को सरकार की ओर से 20 साल निर्धारित किया जाएगा। सरकार के इस निर्णय से गुडग़ांव, मानेसर, बादशाहपुर सहित उद्योग विहार के लाखों वाहनों के कबाड़ हो जाने की संभावना बताई जा रही है। तो वहीं गुडग़ांव में चलने वाले 40 हजार के आसपास डीजल वाहन भी चलन से बाहर हो जाएंगे। इंटरनैशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटीव टेक्रालाजी नामक संस्था की ओर से किए गए सर्वे में पाया गया है कि एक एसयूवी डीजल कार उतना ही नाईट्रोजन के आक्साईड का उत्सर्जन करती है जितना कि 25 पेट्रोल चालित कारें करती हैं। हांलाकि गुडग़ांव की बात करें तो यहां पर तकरीबन 40,000 से 60,000 डीजल चालित ऑटो अब भी सडक़ों पर भाग रहे हैं जो गुडग़ांव सहित पूरे एनसीआर के ही प्रदूषण मे

पेट्रोल से 25 गुना अधिक प्रदूषण छोड़ती हैं डीजल कारें

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 गुड़गांव सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगातार बढ़ते प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान डीजल वाहनों का है। यह खुलासा एक संस्था के शोध में हुआ है जिसने हवा में जहरीले तत्वों का अध्ययन किया है। इंटरनैशनल सेंटर फॉर आॅटोमोटीव टेक्नालाजी नामक संस्था की ओर से किए गए सर्वे में पाया गया है कि एक एसयूवी डीजल कार उतना ही नाईट्रोजन के आक्साईड का उत्सर्जन करती है जितना कि 25 पेट्रोल चालित कारें करती हैं। हांलाकि गुड़गांव की बात करें तो यहां पर तकरीबन 40,000 से 60,000 डीजल चालित ऑटो अबभी सड़कों पर जहर उगल  रहे हैं जो गुड़गांव सहित पूरे एनसीआर के ही प्रदूषण में योगदान दे रहे हैं। देश की साईबर सिटी कहे जाने वाले शहर का दम प्रदूषण से घूंटता रहा है। लोगों में न केवल सांस की तकलीफ बल्कि मनोरोग की शिकायते  समाने आने लगी हैं। समय के साथ वाहनों की संख्या में जहां लगातार बढोत्तरी हुई है तो वहीं ट्रैफिक जाम, वाहनों से निकलने वाले धुंए ने साईबर सिटी का दम घोंट दिया है। प्रदूषण को रोकने के लिए किया जा रहा प्रशासन की कोशिशें •ाी नाकाफी हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की ओर से जारी दिशा निर्देशों के अनुपालन में जगह-

जेनरेटर उगलने लगे धूंवा

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10,000 डीजल जनरेटर तो 40,000 डीजल आटो शहर की फिजा को करेंगे जहरीला   देश की साईबर सिटी और मिलेनियम शहर का तमगा हासिल करने वाले शहर की जमीनी हकीकत कुछ अलग ही कहानी बयां करती है। विकास की बहुमंजिली इमारतों की चकाचौंध, मल्टीनैशन का हब कहे जाने वाला लटकों-झटकों का शहर प्रदूषण का हब बनता जा रहा है। तकरीबन 10,000 से अधिक डीजल जेनरेटर, 40 हजार से अधिक डीजल वाहनों और डीजल संयत्रों से लगातार बढता प्रदूषण साइबर शहर को नारकीय बनाते जा रहे हैं।  व्यावसायिक और घरेलू प्रयोग को लेकर सरकारी स्तर पर जो आंकड़ें हैं उनके अनुसार शहर में डीजल से चलने वाले 10,500 जनरेटर हैं तो वहीं तकरीबन 40,000 आॅटो वाहन डीजल से •ााग रहे हैं। इन मशीनी इंजिनों से निकलने वाला धूंआ न केवल गुड़गांव शहर की हवा को विषाक्त कर रहा है बल्कि पूरे एनसीआर की आबादी के लिए ही खतरा बनता जा रहा है। मजे की बात यह कि गुड़गांव से सटे दिल्ली में दशक •ार पहले ही जहां डीजल वाहनों पर रोक लगा दिया गया और सीएनजी की शुरुआत कर दी गई थी तो मिलेनियम शहर कहे जाने वाले गुड़गांव में आज •ाी पुराने ढर्रे और कानून ही चलाए जा रहे हैं। यहां न तो डीजल वाहनों

प्रदूषण से मौत की राजधानी बन रहा है एनसीआर

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बुजुर्ग और बच्चों सहित गर्भवती माताएं आ रही चपेट में  धूल, धूवें के कारण 112 ग्राम से कम वजन के बच्चे पैदा हो रहे हैं सीएसई ने अपने वार्षिक रपट में किया खुलासा   गुलाबी सर्दियों की शुरुआत जब हो रही थी तभी सर गंगाराम अस्पताल के बाहर कृत्रिम फेफड़ा प्रयोग के लिए लगाया गया। नवंबर 2018 के हल्की सर्दी के दौरान ही यह महज 48 घंटे में ही सफेद से काला हो गया। सिर्फ फेफड़ा ही नहीं, प्रदूषण और जहरीली हवाओं से मानव के कई अंग घायल हो रहे हैं और एनसीआर प्रदूषण से मौत के मामले में दुनियां की राजधानी बनता जा रहा है। जहरीली हवा, वाहनों के शोर, कूंड़े के पहाड़ और लगातार प्रदूषित होते भूजल के कारण प्रदूषण जनित बीमारियां लोगों की जिंदगी लील रही है। दूसरी तरफ प्रदूषण से बचाव के सरकारी प्रयास राजधानी दिल्ली में तो किए गए है लेकिन प्रदूषण के उत्सर्जन करने वाले कारकों में कोई कमी नहीं आई बल्कि वे एनसीआर के दूसरे हिस्से गुडग़ांव, फरीदाबाद, नोयडा सहित बल्लभगढ़ में शिफ्ट हो गए हैं। जिसके कारण राजधानी दिल्ली समेत पूरा एनसीआर एक त्रासदी की ओर आगे बढ़ रहा है। पर्यावरण, प्रदूषण और वन्यजीवों पर शोध करने वाली सं

भूमाफियाओं और बिल्डरों का चारागाह बन जाएगी अरावली

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पंजाब भूमि संरक्षण कानून में संशोधन से पसर जाएंगे बिल्डर खत्म हो जाएगा एनसीआर के भूजल रिचार्ज का सबसे बड़ा स्रोत   60 हजार एकड़ अरावली खतरे में, 16 हजार एकड़ गुडग़ांव में तो 10 हजार एकड़ फरीदाबाद में इसी माह संशोधित के लिए पीएलपीए को रखा गया है विधानसभा में देशभर में जितनी हरियाली है उसकी तुलना में हरियाणा में 4 फीसद से भी कम बची है। बावजूद इसके राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को आक्सीजन देने और भूमिगत जल को रिचार्ज करने वाली अरावली पर बिल्डरों की नजर है तो सरकार भी इसे लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती। पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट 1900 जिससे अरावली अपनी प्राणवायु हासिल कर जिंदा रही है उसे ही संशोधित करने के लिए सरकार ने विधानसभा में रख दिया है। इस एक्ट के तहत और सुप्रीम कोर्ट के 2002 और 2004 के निर्णय के अनुसार नोटिफाईड एरिया को फारेस्ट एरिया माना जाता है। कोर्ट ने एमसी मेहता केस में भी 2008 व 2009 में इसी बात को दोहराया है। गुडग़ांव जिले में अरावली के 16930 एकड़ भूमि जो कि 38 गांवों के अंतर्गत आती है इसी पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट के नोटिफिकेश के अंर्तगत तहत आता है। इसीतरह फरीदाबाद जिले में 1

बीते दशक में एनसीआर दुनियां की प्रदूषण राजधानी बनी

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साल 2008-2018 के दौरान लगातार जहरीली हुई एनसीआर की हवा   साल 2008 से लेकर 20018 के दौरान राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर की हवा जहरीली होती गई है और यह दुनियां में प्रदूषण की राजधानी बनकर उभरी है। इतना ही नहीं यहां पर प्रदूषण से मौत के मामले भी देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले अब्बल है। प्रदूषण की सबसे बड़ी मार जहां बुजुर्गो पर पड़ रही है तो वहीं पांच साल से छोटे बच्चों से लेकर गर्भवती महिलाएं भी इससे अछूती नहीं है। केंद्रीय भूविज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली संस्था सफर इंडिया के सालाना रिर्पोट में प्रदूषण के इन आंकड़ों का खुलासा हुआ है। सेंटर फॉर साईंस एंड एंवायरमेंट (सीएसई)की वार्षिक मीडिया कांक्लेव में दिल्ली-एनसीआर सहित देश के विभिन्न शहरों में वायु गुणवत्ता, प्रदूषण के विभिन्न स्तर व प्रकार, स्वच्छता, सहित भूजल और वन्यजीवों पर आंकड़ों को जारी किया गया है। हांलाकि जारी किए गए रिर्पोट में यह भी कहा गया है कि सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर किए गए प्रयासों के कारण पीएम 2.5 स्तर में मामूली स्तर भी हुआ है। वर्ष 2008 से लेकर बीते साल 2018 के दौरान दिल्ली और एनसीआर के दूसरे

हवा में जहर घोल रहे डीजल ऑटो

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पंद्रह से बीस साल पुराने ऑटो दौड़ रहे हैं गुड़गांव में   शहर में डीजल से चलने वाले 4० हजार से अधिक ऑटो दिनरात हवा में जहर घोल रहे हैं और प्रदूषण रोकने के तमाम कवायदों पर पानी फेर रहे हैं। शहर में वायु प्रदूषण का स्तर 4०० पीएम 2.5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच चुका है। तो वहीं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लगातार तीन साल से गुड़गांव को देश का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर घोषित कर रखा है। प्रदूषण के कारणों में बड़ा कारण किसानों की ओर से जलाई जाने वाली पराली को बताया जा रहा है जबकि पराली जलाने से महज 5 फीसद प्रदूषण में इजाफा होता है। जबकि हवा में जहरीले तत्वों की मात्रा में इजाफा करने के लिए यातायात जाम और हजारों की तादात में कंडम डीजल ऑटो का बड़ा योगदान है। उल्लेखनीय है कि गत दो वर्ष पूर्व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने डीजल ऑटो बंद करने की सिफारिश सरकार के पास भेजी थी। यहां तक कि वर्ष 2०17 में सरकार की ओर से घोषणा भी की गई थी कि एनसीआर से सटे हरियाणा के शहरों में डीजल से चलने वाले ऑटो बंद कर दिए जाएंगे। जिन वाहनों में सीएनजी नहीं होगा उनको नहीं चलने दिया जाएगा। लेकिन सरकार

दो दशक में ही डार्क जोन बन जाएगा गुड़गांव

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गुड़गांव पहले ही घोषित है डार्क जोन, जोहड़ और तालाब हुए विलुप्त  अतिक्रमण से लेकर रियल एस्टेट लील गए जलश्रोतों को   मानसून की दस्तक सुनने को सभी बेताब हैं लेकिन अब यहां ताल-तलैया और जोहड़ों के लबालब भरे होने का नजारा नहीं दिखता। मेढकों की टर्राहट, झिंगुर और दादुर की आवाज नई पीढ़ी को नहीं पता चलेगा। साईबर सिटी होने की दौड़ ने गुड़गांव की धरती को तो डार्क जोन बना ही दिया है साथ ही यहां पर मौजूद 4० से अधिक जोहड़,तालाब भी विकास की रफ्तार ने कुचल दिया है। कहीं अतिक्रमण की भ्ोंट चढ़ गए तो कहीं रियल एस्टेट के बहुमंजिला इमारतों में दफन हो गए। गुड़गांव जिले में और आसपास की जगहों पर छोटे-बड़े जलश्रोतों की अनुमानित संख्या 5०० के आसपास हुआ करती थी। लेकिन अब इन जलश्रोतों को खोजना दुर्लभ हो गया है कारण कि आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने की होड़ में प्राकृतिक संसाधन नष्ट कर दिए गए। प्रशासन के अनुसार अब महज चंद जोहड़ और तालाब ही निशानी के तौर पर बचे हैं। गुड़गांव तहसील के कुल 81 गांवों के अपने तालाब हुआ करते थ्ो लेकिन अब न वे गांव बचे हैं ना ही तालाब दिखाई देते हैं। दूसरी तरफ शहर में पेयजल को लेकर नए और आधु

विस्फोटक शहरीकरण मिलेनियम जिंदगी को बना देगा दूभर

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धारणीय विकास के बिना चौपट हो जाएंगे विकास के दावे  प्रदूषण, जैवविविधता, जलस्तर हर स्तर पर हो रही है छेड़खानी  विस्फोटक दर से बढ़ रहे शहरीकरण के साथ जल, जंगल, जमीन अपने वजूद को खोते जा रहे हैं। गुड़गांव की हालत दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। जननांकिकी विश्ोषज्ञों, समाजशास्त्रियों की माने तो यह जनसंख्या विस्फोट की तरह ही तीव्र शहरीकरण का विस्फोट है। तेज आर्थिक विकास, शहरीकरण के साथ पर्यावरण का विनाश और मानवीय संवेदनाओं का अंत होना समाज वैज्ञानिकों के अनुसार आवश्यक शर्त है। साईबर सिटी पर जहां पूरे देश की निगाहें टिकी रहती हंै, वहां की हालत अंधाधुंध विकास के कारण दिनोंदिन नारकीय होता जा रहा है। विकास के लिए जिम्मेदार एजेंसियों के लिए धारणीय विकास की अवधारणा बेमानी हो चुकी है। पहल बार एनजीटी के आदेश पर गुड़गांव में हरियाणा स्टेट पाल्यूशन कंटàोल बोर्ड अर्थात एचएसपीसीबी ने शहर में प्रदूषण की हालत का जायजा लिया। शहर में चार जगह लिए गए नमूने में हालत चिंताजनक है। धीरे-धीरे हालात नारकीय होेते जा रहे हैं, हवा में जहर की मात्रा दिनोंदिन घुलती जा रही है। दूसरी तरफ पर्यावरण नष्ट हो रहे हैं, शहर और

सरकारी दीमक निगल गए अरावलीेकी हरियाली

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गत दिनों सरकारी नुमाईदें ने एनजीटी को दिया था जबाव  हर गांव पेड़ की छांव, घर-घर हरियाली सिर्फ नारा न रह जाए मानूसन की आवक के साथ ही भाजपा की सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में वृक्षारोपण का कार्यक्रम शुरु किया है। इसी क्रम में हरियाणा में भी सरकार और पार्टी के कार्यकताã वृक्षारोपण कार्यक्रम कर रहे हैं। गत वर्ष भी मेगा वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया गया था लेकिन वह अभियान बरसात खत्म होते ही मुरझा गया। गत स’ाह एनसीआर का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली की हरियाली को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि अरावली के पेड़ रातों-रात कहां गायब हो जाते हैं? तो सरकार की ओर से दाखिल जबाव में कहा गया कि दीमक ही पेड़ों को नष्ट कर रहे हैं। गुड़गांव और फरीदाबाद के अरावली प्रेमी सवाल करते हैं कि हरियाली के नाम पर लगाए गए पौध्ो आखिर कहां गायब हो जाते हैं? गत डेढ़ दशक पहले तकरीबन 175 करोड़ रुपए खर्च करके लगाए गए पौध्ो कहां गुम हो गए? राज्य में लगातार घटते वनक्ष्ोत्र को लेकर एनजीटी भी लगातार चिंता प्रगट करता रहता है। सिर्फ गुड़गांव में पौधारोपड़, हरियाली, ग्रीन कारिडोर, ग्रीन लंग्स आदि के जुमलों से

आह अरावली!! कौन सुने तेरी कराह अरावली !!

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कुदरत की डकैती है जनाब अरावली का सीना कौन छलनी कर रहा है ? शाम ढलते ही खनन माफिया हो जाते हैं सक्रिय ? अरावली ही नहीं, एनसीआर के अस्तित्व पर है संकट ?  आह अरावली!! कौन सुने तेरी कराह अरावली !! एनसीआर सहित समूचे उत्तरी भारत का श्वसन तंत्र कहे जाने वाले अरावली का दम घूटने लगा है। राष्ट्र की प्राचीन धरोहर अरावली पर खनन माफिया का बुलडोजर लगातार चल रहा है। अतिक्रमण से लेकर शिकार, पेड़ों की अंधाधूंध कटाई और अवैध खनन इस कुदरती सौगात को खत्म कर रहा है। दूसरी तरफ हरियाली का दायरा सिमट रहा है तो सर्वोच्च अदालत के आदेश को ही बौना साबित करके सैकड़ों बैंक्वेट हॉल, फार्म हाउस और गगनचुंबी इमारतें अरावली क्ष्ोत्र में उगती जा रही है। अरावली की वादियां जहां मोरों और विभिन्न वन्य जीवों के विचरण के लिए जाना जाती थी वहीं शिकारियों की गिद्ध नजर उन पर लग गई है। रायसीना, गैरतपुर बास, मानेसर सहित कई इलाकों में गैर वानिकी कार्य जारी है। एनजीटी ने जब सवाल किया कि पेड़ कहां गायब होते जा रहे हैं तो वन विभाग ने कहा दीमक ही पेड़ों को चट कर जा रहे हैं। संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 48ए के अनुस

प्राकृतिक जलस्रोतों पर रोजाना डाल रहे 15 सौ टन कूड़ा

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पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट का नासमझी भरा दिया हवाला राष्ट्रीय पक्षी मोर, नीलगाय सहित वन्यजीव कूड़ा खाकर मरने को विवश घायल हो रही है अरावली, और वन्यजीव मर रहे हैं। लेकिन वन विभाग को इससे कोई लेना-देना नहीं है। जहरीला कूड़ा खाकर मूक और निर्दोष वन्य जीव मरने को विवश है। जलस्रोतों का खत्म किया जा रहा है लेकिन सरकारी महकमों के शर्म का पानी सूख गया है। वन विभाग अरावली को अपने क्ष्ोत्राधिकार में नहीं मानता और पल्ला झाड़ लेता है तो वहीं क्ष्ोत्रीय प्रदूषण नियंत्रण विभाग कूड़ा डालने वाले नगर निगम को रश्मी कार्रवाई के लिए नोटिस भ्ोज देने की बात कहता है। दूसरी तरफ रोजाना अरावली की वादियों में 15,०० टन कूड़ा डंप किया जा रहा है जहां प्राकृतिक जलस्रोत बने हुए हैं, उसे भी खत्म किया जा रहा है। आखिर वन्य जीव कहां जाएं, वह दाना-पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में आते हैं और मॉब लिचिंग की मौत मरते हैं। गत दिनों सोहना इलाकें में कई बार तेदूंओं के आने की खबरें आई है, जो मौत के घाट उतार दिए गए। अरावली क्ष्ोत्र में पहाड़ी गर्तो में प्राकृतिक जल स्रोत बने हुए है जो बरसात के मौसम में भरते हैं, जिनसे वन्यजीव

अरावली में लौट रही हरियाल

अवैध खनन पर न्यायालय की पैनी नजर ने रोका खनन और पेड़ों कटाई राष्ट्रीय राजधानी का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली पर्वत श्रृंखला में अवैध खनन और पेड़ों की कटाई रुकने से अब फिर से हरियाली दिखने लगी है। इसकारण गत तीन दशक के बाद वन्यजीवों की आवक बढ़ गई है। इतना ही नहीं हरियाली बढने के साथ ही एनसीआर के प्रदूषण स्तर में भी तेजी से गिरावट आने के संकेत मिलने लगे हैं। हांलाकि एनसीआर में गुरुग्राम अब भी सर्वाधिक प्रदूषित शहर बना हुआ है। गत दिनों अरावली क्ष्ोत्र के ग्रामीण इलाकों में लगातार तेदुंआ के पाए जाने के पीछे वन्यजीवों के प्राकृतिक संवासों का फिर से निर्माण होना कारण बताया जाता है। राजधानी से सटे इस क्ष्ोत्र में गत चार दशकों से अवैध खनन, निर्माण आदि और मानवीय चहलकदमी के कारण न केवल क्ष्ोत्र की प्राकृतिक व्यवस्था को क्षति पहुंची बल्कि वन्य जीवों ने भी पलायन शुरु कर दिया था।  क्ष्ोत्र में अवैध खनन के कारण तेजी से नष्ट होते हरियाली पर सर्वोच्च न्यायालय से लेकर कई गैर सरकारी संगठन और पर्यावरण कार्यकताã लगातार चिंता प्रगट करते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व तक यह माना जाता था कि यदि अरावली की पहाडिèयों

नहीं रुक रही अरावली में खुदाई

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद चोरी-छिपे चल रही है खुदाई सर्वाधिक शिकायतें भोंडसी से आती हैं। राजधानी दिल्ली का फेफड़ा कहे जाने वाले अरावली  में प्रकृति और वन्य  के साथ खिलवाड़ रुक नहीं रहा है। सबसे प्राचीन समय का कहे जाने वाले अरावली पहाड़ों में खुदाई का काम जारी है। चाहे वह चोरी-छिपे किया जा रहा हो या जिम्मेदार तंत्र की मिलीभगत से किया जा रहा होे लेकिन अरावली को बदस्तूर घायल किया जा रहा है। सबसे अधिक खनन माफिया पत्थरों के व्यावसायिक उपयोग को लेकर इस क्ष्ोत्र में सक्रिय हैं। अवैध खनन के लिए भोंडसी, खेड़कीदौला, फरखनगर और बादशाहपुर से सर्वाधिक शिकायते आ रही है, जिन पर रोक लगा पाने में सक्षम तंत्र विफल साबित हो रहा है। हांलाकि वर्ष 2००2 में ही सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्ष्ोत्र में खनन को अवैध घोषित कर दिया था। लेकिन पत्थर तोड़ने वाले स्टोन क्रसर आज भी पत्थर को तोड़ रहे हैं। खासकर गुड़गांव-फरीदाबाद क्ष्ोत्र में पत्थर व्यवसायी करोड़ों का घालमेल करके अरावली पहाड़ियों को चुराते जा रहे हैं। सर्वाधिक मामले भोंडसी क्ष्ोत्र से अवैध खनन का हो रहा है। अरावली क्ष्ोत्र में हो रहे खनन का सर्वाधिक नुक