गांव की गायों का दूध भी नहीं पीते लोग



युवकों से विवाह नही करना चाहता कोई, रिश्तेदार भी आने से हिचकते हैं
प्लास्टिक और कचरा खाकर मर रही है गायें, पसरता जा रहा है कैंसर 
मार्कण्डेय पाण्डेय
अरावली की हरी-भरी गोद में बसे बंधवाड़ी गांव में रोजी रोटी का मुख्य साधन पशुपालन है। गांव के दर्जनों ऐसे लोग है जो पशुपालन करते हैं और शहरी क्षेत्रों में दूध बेचते हैं। जैसे ही शहरी लोगों को पता चलता है कि गांव का पानी जहरीला हो गया है, तब से उन्होंने दूध लेना बंद कर दिया है। कुछ समय पहले तक गांव के लोग दूध लेकर शहर जाते थे। महज दो-तीन पशुपालकों का ही करीब 125 किलो दूध बिना बिके वापस आ गया। शहर में लोगों ने उनका दूध लेने से साफ इनकार कर दिया। खत्ते की पॉलिथीन और कचरा खाने से गाय और भैंसें मर रही हैं। अब दूध की बिक्री बंद या कम होने से रोजी रोटी पर भी संकट आ गया है। गांव के बहुत से लोगों ने अब बीमारियों से बचने के लिए 25 रुपये में 20 लीटर पानी खरीदकर पी रहे हैं।
विकास और आधुनिकता बंधवाड़ी के लिए अभिशाप बन गया है, जहां दर्जनों लोग कैंसर से जूझ रहे हैं। तो वहीं दूसरी तरफ पशुधन कचरा खाकर मर रहा है। यहां तक कि बंधवाड़ी और इसके आसपास के गांवों की गायों का दूध भी पीने से लोग हिचक रहे हैं कारण कि यहां की गायें लगातार लीचेट का पानी पीकर बीमार हो रही हैं। यहां पर कूड़े का गगनचुंबी पहाड़ बना हुआ है जिसके लीचेट का पानी भूजल को जहरीला तो कर ही रहा है, बल्कि स्थानीय पशु इसे पी रहे हैं। यहां के आसपास की गायें कचरा और प्लास्टिक खाकर मरने को विवश हैं।  गुडग़ांव-फरीदाबाद रोड पर स्थित बंधवाड़ी गांव किसी शहरी कस्बे जैसा लगता है, जहां पर पक्के मकान, पक्की सडक़ें और सिवेज सिस्टम विकसित है। सामान्य तौर पर गांव को देखने के बाद मूलभूत सुविधाएं मौजूद दिखाई देती है लेकिन यहां पर मौजूद कूड़े का पहाड़ लोगों को भयभीत कर रहा है। गांव का हर व्यक्ति डर से साए में जी रहा है। इस डर की वजह है यहां पर फैली बीमारियां, खासकर जानलेवा कैंसर जिसकी जद में पूरा इलाका आ चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि कैंसर की वजह बन रहा है दूषित पानी और दूषित पानी की वजह है खत्ता या लैंडफिल साइट जो यहां पर मौजूद है।
आगजनी के बाद कचरा प्रोसेसिंग बंद हो गया 
बंधवाड़ी में साल 2009 में लैंडफिल और 2010 में ठोस कचरे की निस्तारण की प्रक्रिया शुरु हुई थी। महज दो साल बाद ही यहां पर आगजनी की घटना हुई जिसके बाद कचरे को निस्तारित करने की प्रक्रिया बंद पड़ी है। जिसके बाद से यहां पर कचरा डाला जा रहा है जो अब कूड़े का पहाड़ बन चुका है। हालात यह है कि इस पहाड़ से होकर जाने वाली हवाएं और निकलने वाली गैसें और लीचेट वाटर यहां के मनुष्य से लेकर जानवरों तक के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। गुडग़ांव और फरीदाबाद से रोजाना यहां पर करीब 1600 मिट्रिक टन कूड़ा रोज पहुंच रहा है।
सीपीसीबी ने पानी को बताया जहरीला 
हाल ही में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देश पर यहां के पानी का नमूने लिए गए हैं। हांलाकि इसके पहले साल 2016 में भी पानी के नमूने की जांच की गई थी और इसे मनुष्य तो क्या जानवरों के पीने के लायक भी नहीं पाया गया था। हानिकारण रसायन और पीने योग्य पानी नही होने के बावजूद अब तक कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सका है। पानी में कई रसायन तय मात्रा से ज्यादा पाए गए हैं।
200 से अधिक लोग कैंसर की चपेट में
लोगों का कहना है कि जब से बंधवाड़ी लैंडफिल की शुरुआत की गई है जब से साल 2018 तक करीब दो सौ से अधिक लोग कैंसर की चपेट में आ चुके हैं। यही कारण है कि बंधवाड़ी, मांगर, डेरा, ग्वाल पहाड़ी सहित दर्जनों गांव के लोग इस संयंत्र का विरोध कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी ने अरावली क्षेत्र को भूमिगत जल का रिचार्ज जोन माना है। पर्यावरण के लिहाज से यह अति संवेदनशील क्षेत्र है, जिसे नष्ट किया जा रहा है।
पैसा है नहीं तो छोडक़र कहां जाएं
हालात यह है कि यहां पर एक ही परिवार के दो से तीन लोग की मौत कैंसर से हो चुकी है या कैंसर से जूझ रहे हैं। जिनके पास पैसा है वें बीमारियों से बचने के लिए गांव छोडक़र शहर में बस गए हैं लेकिन जो गरीब हैं वे यहंा तिल-तिल मर रहे हैं। गांव के ही तीन सगे भाईयों हरिकिशन, बुद्धि और बलेश भी कैंसर की भेंट चढ़ चुके हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव में फैल रही बीमारियों और खत्ते की वजह से लोग अपनी लड़कियों की यहां के लडक़ों से शादी नहीं करना चाहते। लैंडफिल साइट से बंधवाड़ी के अलावा मांगर, बलियावास, डेरा, ग्वाल पहाडी, बास, भांडई, फतेहपुर,बैरमपुर, घाटा, कूलावास, कादरपुर आदि 20 गावों का पानी दूषित हो चुका है। लैंडफिल साइट अभी 18 एकड़ में है। इसे 32 एकड़ में और बढ़ाने की बात की जा रही है। अगर ऐसा हुआ तो गांव में रहना असंभव हो जाएगा।

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