दो हजार टन कूड़ा छोड़ गए भक्त


प्रयागराज में महामारी फैले इसके पहले हटा लें कूड़ा- एनजीटी 

आधुनिक भारत में अब तक का सबसे बड़ा मानवीय जुटान जो स्वच्छ और साफ सुथरा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज अर्धकुंभ के बाद स्वच्छता कर्मियों का स्वागत करते हुए कहा था। प्रधानमंत्री के इस दावे में कितनी सच्चाई है, यह शहर से महज दस किलोमीटर दूर बंसवार में खड़ा कूड़े का पहाड़ बताता है। 22 अप्रैल को नेशनल ग्रीन ट्रीव्यूनल ने कहा कि कुंभ का कूड़ा यदि समय रहते निस्तारित नहीं किया गया तो प्रयागराज के कई गांव और इलाके महामारी की चपेट में आ जाएंगे। यह दावा तब किया गया जब एनजीटी के ही आदेश पर एक सेवानिवृत न्यायाधीश के माध्यम से अर्धकुंभ में श्रद्घालुओं के छोड़े गए कूड़े की पड़ताल की गई तो चौकाने वाली रिर्पोट सामने आई।
जनवरी 4 से शुरु होकर 14 मार्च तक चले दुनियां के सबसे बड़े आयोजन में कुल 2 हजार टन कूड़ा इकटठा हुआ जो कि बांसवारा कूड़ा निस्तारण संयत्र पहुंचा दिया गया। इस पूरे आयोजन पर प्रदेश और केंद्र सरकार की ओर से 4200 करोड़ रुपए व्यय किया गया। मजे की बात यह कि जिस बांसवारा गांव के ट्रीटमेंट प्लांट पर यह कूड़ा पहुंचाया गया वह गत वर्ष सितंबर माह से ही बंद पड़ा है। जहां अर्धकुंभ के शुरु होने के पहले ही करीब 60,000 टन अनिस्तारित कूड़ा पहले ही पड़ा था। अर्धकुंभ के दौरान जो कूड़ा बांसवारा ट्रीटमेंट प्लांट पर ले जाया गया वह आज भी खुले में और बिना ढंके पड़ा हुआ है। जिससे रिसरिस कर लिचेट भूजल में जा रहा है जो कि अंडरग्राउंड वाटर को जहरीला बना देगा। ऐसा ही मामला दिल्ली के पास अरावली के बंधवाड़ी गांव में जहां रोजाना ही पंद्रह सौ टन कूड़ा पहुंचता है और कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया है। यहां भी लिचेट वाटर के कारण पेयजल मनुष्य तो क्या जानवरों के पीने के लायक भी नहीं रह गया है। यह खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से यहां के वाटर सेंपल की जांच के बाद पता चला। गत पांच सालों में  बंधवाड़ी गांव में हुई मौते में सबसे बड़ा कारण कैंसर रहा है, जो यहां के लोगों में महामारी की तरह फैलता जा रहा है।
बंसवारा गांव में जमा कूड़ा पास में ही बहती यमुना नदी में जा रहा है जो अंत में जाकर गंगा जी में मिल जाता है। लोगों का कहना है कि यह प्लांट तभी कार्य करता है जब कोई मंत्री या अधिकारी यहां का दौरा करता है। इस प्लांट की रोजाना की क्षमता महज 400 टन कूड़ा निस्तारण की है जबकि रोजाना ही 600 टन कूड़ा यहां पर लाकर डाल दिया जाता है। हालात यह है कि न केवला बांसवारी बल्कि पास के गांव ठाकुरपुरवा, बोंगी, सिमटा, मोहब्ब्तगंज में मक्खियों, मच्छरों की भनभनाहट रात तो रात दिन में लगी रहती है। लोगों का जिंदगी नर्क हो चुकी है जो किसी बड़े महामारी के इंतजार में हैं।
एसटीपी की कहानी 
सिवरेज गंगा को कर रहा है गंदा। प्रयागराज के ज्यादातर सिवरेज ओवरफ्लो हो रहे है और सफाई के अभाव में बजबजा रहे हैं। यह सिवरेज गंगा के पानी में मिलकर नमामि गंगे पर ही पानी फेर रहे है। राजापुर सिवरेज प्लांट का जब एनजीटी ने गत 11 जनवरी को निरीक्षण किया तो पाया कि यह क्षमता से अधिक भरा हुआ है। इसी तरह सलोरी में 29 एमएलडी प्लांट कार्य ही नहीं कर रहा है। गंगा प्रदूषण नियंत्रण यूनिट का कहना है कि प्रयागराज के सभी सिवरेज अर्धकुंभ में ओवरफ्लो हो रहे थे और गंगा में मिल रहे थे जिसमें कि एकमात्र संतोषजनक हालत में नैनी का सिवरेज था जो गंगा में योगदान नहीं कर रहा था। जनवरी में राजापुर एसटीपी में 86 मिलीयन लीटर सिवरेज रोजाना आता था जबकि फरवरी में यह 90 एमएलडी हो गया। हैरान करने वाली बात यह कि इसकी क्षमता महज 60 एमएलडी की है। सलोरी की क्षमता 29 एमएलडी की है जो कुंभ के दौरान 40 एमएलडी से अधिक हो गया था।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सीपीसीबी के अनुसार फेेकेल कोलीफार्म जिसे मलमूत्र कहा जाता है। यदि प्रति सौ एमएल पर ढाई हजार से अधिक है तो यह पानी नहाने के लिए भी उचित नहीं होगा। जबकि फरवरी में संगम नोज पर मलमूत्र के अंश 12,500 मिलियन प्रति 100 एमएल पानी में मौजूद था जो कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डाटा में दिखाया गया है। जबकि शास्त्री ब्रिज पर यह 10,150 मिलियन था।
पैसे की बर्बादी थी जीओटयूब तकनीकि
मनुष्य के मलमूत्र को ट्रीट करने के लिए जीओ टयूब तकनीकि का प्रयोग किया गया और सरकार की ओर से दावा किया गया कि इससे गंगा में गंदगी नहीं जा पाएगी। इस तकनीकि पर प्रति 50 एमएलडी सिवरेज पानी को ट्रीट करने के लिए 25 लाख रुपया रोजाना व्यय किया गया। यह पाली बैग या टयूब आदि के माध्यम से 25 से 50 मीटर गहराई में सिवरेज पानी को भेजता था और वहां से सालिड वेस्ट को छांटकर पानी को गंगा में डाल देता था। इस तकनीकि से सालिड वेस्ट का निस्तारण तो हो जाएगा लेकिन बायो डिफेक्शन का नहीं हो सकता ऐसा विशेषज्ञों का कहना है। यह तकनीकि सभी सभी सिवरेज के लिए नहीं लगाया गया बल्कि सिर्फ पांच जगहों पर कार्य कर रहा था, जबकि राजापुर सिवरेज प्लांट से 50 फीसदी गैर निस्पदित नॉन ट्रीटेड वाटर गंगा में बदस्तूर मिल रहा था। 

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