वैश्विक स्तरर पर एफडीआई की हकीकत



यूपीए और मनमोहन सिंह सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर घोटालों और भ्रष्टाचार के गंभीर मामलें हैं तो दूसरी ओर सरकार की गिरती साख, महंगाई, अर्थव्यवस्था और उसके प्रबंधन में उसकी नाकामी के कारण यूपीए के सहयोगी दल मौजूदा सरकार पर से अपना भरोसा खो रहे हैं। इसके अलावा  देशी-विदेशी बड़ी पूंजी, कारपोरेट समूह, वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और मीडिया सरकार पर कड़े आर्थिक फैसले लेने और नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहे हैं। सरकार देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों खासकर अमेरिका को खुश करना चाह रही रही है और ये भी साबित करना चाह रही है की वो अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने की लिए बड़े और नीतिगत फैसलें भी ले सकती है। डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि और रसोई गैस के सब्सिडीकृत सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने से लेकर मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), नागरिक उड्डयन क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई के साथ विदेशी एयरलाइंस को भी निवेश की इजाजत, ब्राडकास्टिंग क्षेत्र में डीटीएच आदि में 74 फीसदी एफडीआई और पावर ट्रेडिंग में 49 फीसदी एफडीआई के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की चार प्रमुख कंपनियों में विनिवेश का एलान ये सब सरकार की इसी कोशिश की कड़ियाँ हैं। बहरहालआर्थिक सुधारों में पिछड़ने के कारण जो अमेरिकी मीडिया मनमोहन सिंह को अंडर एचिवरकह रहा था। रातोंरात उसकी नजर में भारतीय प्रधानमंत्री का कायाकल्प हो हो गया है।
अमेरिकी मीडिया एक तरफ तो मनमोहन की तारीफों का पुल बांधने लगा है, दूसरी ओर उनकी सरकार की सेहत के लिए फिक्रमंद भी है. मजे की बात है कि विदेशी मीडिया के मर्जी मुताबिक सरकार और अर्थ व्यवस्था चलाने में अभ्यस्त कांग्रेस  सरकार को सोशल मीडिया मे अपनी आलोचना नागवार गुजरती है। अमेरिका की बात करें तो,  अरब स्पिरिंग के कारण  वैसे भी अमेरिका इस समय बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहा हैं।  दुनियाभर में अपने आर्थिक हितों की सुऱक्षा के लिए उसने अपनी और नाटो की सेना तैनात कर रखी है। अरब और बाकी दुनिया में इजराइल को कुछ भी करने की छूट दे रखी है पर ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पहली बार अल कायदा का भूत अमेरिका को बेहद डराने लगा है। अब सिर्फ आर्थिक सुधारों के जरिए अमेरिकी कंपनियों के हितों की रक्षा की गरज से ही नहीं, बल्कि आतंक के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की भागेदारी भी अमेरिका के लिए अहम है।
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के जरिये लगातार सुधारों के लिए दबाव बनाने वाले अमेरिकी नीति निर्धारकों ने मनमोहन की लगाम अपने और भारतीय मीडिया के जरिए थाम ली है। भारत सरकार को अमेरिकी मीडिया की आलोचना के लिए सरकार, संसद, नीति निर्धारण और कानून बनाने, बदलने की प्रक्रिया में रातोंरात तब्दीली करने में गर्व महसूस हो रहा है। वॉल मार्ट जैसी कंपनिया अपने पक्ष में नीति बनाने के लिए लॉबिंग करती हैं। खुदरा व्यापार के लिए वालमार्ट ने अब तक 650 करोड़ रुपये लॉबिंग पर खर्च किए हैं। एफडीआइ देश के 4.40 करोड़ खुदरा व्यापारियों, 17 करोड़ किसानों और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत जनता को तबाह करने वाली नीति है।
सरकार कहती है कि एफडीआइ से 30 प्रतिशत लघु उद्योगों को फायदा होगा, एक करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा, महंगाई कम होगी, किसानों को फायदा मिलेगा, किसानों के बीच से बिचौलिए गायब हो जाएंगे। लेकिन यह कोरी बयानबाजी है एक वालमार्ट करीब चालीस दुकानों को प्रभावित करेगा। देश में खाद्यान्न के मूल्य और नीति निर्धारण 24 से 26 फीसदी व्यापारियों के हाथ में हैं। किसान अपनी मेहनत, पराक्रम से पूरे देश का पेट भर रहे हैं. रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन हो रहा है, लेकिन वायदा बाजार के कारण महंगाई कम नहीं हो रही। 
सरकार अपने निर्णय के पक्ष में सुनहरी तस्वीर और उजला पक्ष ही रखेगी ये बात लाजिमी है। दुनियां के सबसे बड़े बाजारों में शुमार भारत में खुदरा व्यापार देश की अर्थव्यवथा की रीढ़ की हड्डी है जिस पर सरकार ने हथौड़ा चलाया है। देश में खुदरा व्यापार से जुड़े लाखों व्यापारी बरसों से कम मुनाफे में आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते आ रहे हैं।
थोक व्यापार में एफडीआई की मंजूरी सरकार पहले ही दे चुकी है। खुदरा बाजार में देसी कंपनियों के स्टोर ने खुदरा बाजार और व्यापारियों पर सीधे असर डाला है। आकर्षक ऑफर और कम दाम के कारण इन स्टोर में जुटने लगी है, जिसका सीधा असर गली, मोहल्ले की किराना और सब्जी की दुकानों पर दिखने लगा है। वहीं फेरी वाले और गांव-देहात से कस्बों और गांवों में सब्जी, फल और अनाज बेचने वाले छोटे व्यापारी पर तो इसका सबसे अधिक असर हुआ है।

मल्टी ब्रांड की देसी कंपनियों के सैंकड़ों स्टोर देशभर में खुले हैं जिनमें शहरी इलाके की आबादी का छोटा हिस्सा ही खरीददारी करता है। छोटे शहरों, कस्बों और गांव में बसने वाली आबादी जो देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है अभी भी परंपरागत हाट, बाजार से ही रोजमर्रा की खरीददारी करती है। स्थानीय बाजार और आस-पास के इलाकों से थोक माल खरीदकर खुदरा व्यापार करने वाले कारोबारी स्थानीय जरूरतों और मांग के अनुसार माल खरीदते-बेचते हैं जिससे कीमते कंट्रोल में रहती हैं और लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से मनमाफिक उत्पाद भी उपलब्ध हो जाते हैं। 

आजादी के 65 वर्षों में सत्ता चाहे जिस भी दल के हाथ में रही लेकिन किसान, छोटे व्यापारी और खुदरा कारोबारियों के बारे में किसी ने भी गंभीरता से नहीं सोचा और उदारवादी नीतियों के नाम पर देसी उद्योग धंधों को नाश करने का काम किया। सत्तासीन दलों ने हमेशा विदेशी कंपनियों और शक्तिशाली देशों के समक्ष घुटने टेकते हुए उदारवादी नीतियों, विदेशी मुद्रा और अंतर्राष्ट्रीय बाजार के दबाव के तमाम बहाने बनाकर देश के आम आदमी को तो ठगा ही वहीं देसी उद्योग-धंधे और हाट-बाजार को तबाह करने का कुचक्र रचने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

विपक्षी दल, व्यापारी संगठन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि खुदरा बाजार में एफडीआई की मंजूरी से छोटे व्यापारियों और किसानों को भारी नुकसान होगा लेकिन सरकार मुद्दे की गंभीरता और व्यापकता पर विचार करने की बजाए हठ और कुतर्क पर उतारू है।

विदेशी कंपनियां बेहतर रणनीति, प्रबंधन और संग्रहण क्षमता के चलते देसी व्यापार और कारोबारियों पर बीस साबित होगी ये बात साफ है। विदेशी उत्पादों के प्रति देशवासियों की मानसिकता भी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में यह तय हो गया है कि आने वाले समय में विदेशी कंपनियां देसी हाट और बाजार पर कब्जा जमा लेंगी और देसी उद्योग-धंधे, किसान और खुदरा कारोबारियों के लिए बाजार में कोई जगह नहीं बचेगी।
पिछले कुछ सप्ताहों में यूपीए सरकार का राजनीतिक संकट जिस तरह से बढ़ा है और 2014 के बजाय 2013 में ही आम चुनाव होने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है, उसे देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों का जबरदस्त दबाव बढ गया है। इसी दबाव, जल्दबाजी और घबराहट में कांग्रेस नेतृत्व ने यह दाँव चला है। दरअसल, लगभग चार सौ अरब डालर के भारत के रीटेल कारोबार में कॉरपोरेट हिस्सेदारी केवल पांच प्रतिशत है। रेहड़ी-पटरी पर अपनी दूकान सजा कर गुज़ारा करनेवालों को जोड़ लिया जाए तो देश में फिलहाल कुल पांच करोड़ खुदरा विक्रेता हैं। यानि सीधे सीधे कहा जाए तो प्रत्येक आठ हिदुस्तानियों पर एक रिटेलर है। चीन में यह संख्या 100 चीनियों पर एक की है। फिक्की की दी हुर्इ सूचना के मुताबिक रीटेल कारोबार में खाने-पीने का हिस्सा 63 फीसदी है।
सरकार का यह दावा कि वालमार्ट जैसी कंपनियों के आने से छोटे दुकानदारों की दुकानें बंद नहीं होंगी, जान-बूझ कर दिया गया गलत बयान है।
अमेरिका की आयोवा स्टेट युनिवर्सिटी का अध्ययन दिखाता है कि आयोवा में वालमार्ट के आने के शुरुआती एक दशक में यहां 555 गल्ले की दुकानें, 298 हार्डवेयर की दुकानें, 293 निर्माण सामग्री बेचने वाली दुकानें, 161 अलग-अलग किस् के सामान बेचने वाली दुकानें, 158 महिला परिधान की दुकानें, 153 जूते की दुकानें, 116 दवा की दुकानें और 111 पुरुष वस्त्र की दुकानें बंद हो गर्इं। भारत में, जहां छोटे दुकानदारों द्वारा प्रतिरोध करने की क्षमता और कम है, इससे कुछ भी अलग क्यों होगा?
तथ्य यह है कि बाज़ार में वालमार्ट के आने के 15 वर्षों के दौरान 31 सुपरमार्केट श्रृंखलाएं दिवालिया हो गर्इं। वालमार्ट के 16 लाख कर्मचारियों में सिर्फ 1.2 फीसदी ही गरीबी रेखा से ऊपर जीते हैं। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स कहता है कि एक परिवार के साप्ताहिक खरीद के आंकड़ों को देखें तो वालमार्ट की कीमतें दूसरों के मुकाबले कम नहीं हैं।
थाइलैंड में सुपरमार्केट के चलते पड़ोस की पारंपरिक दुकानों में 14 फीसदी की कमी सिर्फ शुरुआती चार साल के भीतर गर्इ।
भारत में बेंगलुरु, अहमदाबाद और चंडीगढ़ के 33-60 फीसदी सब्ज़ी और फल विक्रेताओं ने ग्राहकों की संख्या में 15-30 फीसदी कमी, बिक्री में 10-30 फीसदी की कमी और आय में 20-30 फीसदी कमी की बात कही है, जिनमें सबसे ज्यादा असर बेंगलुरु में देखा गया है जहां देश के सबसे ज्यादा सुपरमार्केट मौजूद हैं।
अमेरिका में वालमार्ट की दुकानों का औसत आकार 10,800 वर्ग फुट है जिनमें सिर्फ 225 लोग नौकरी करते हैं। इस लिहाज से देखें तो रोज़गार पैदा होने का सरकारी दावा धोखा नहीं लगता?
सरकार ने अपनी आलोचना को नरम करने के लिए इस बात पर जोर दिया है कि वालमार्ट को 100 मिलियन डॉलर तक के निवेश पर सिर्फ 51 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। एकबारगी तो यह बात आकर्षक जान पड़ती है लेकिन क्या वालमार्ट का प्रबंधन इतना मूर्ख है कि जब उसका मौजूदा रीटेल कारोबार 400 अरब डॉलर हो तो वह इतने से संतोष कर लेगा ? वालमार्ट दरअसल एक तम्बू में सिर घुसाने वाले ऊंट की चाल चल रहा है जो बाद में उसमें बैठे लोगों को भगाकर तम्बू पर कब्ज़ा कर लेता है। आप ऊंट की जगह वालमार्ट को रख कर देखिए कि हमारे करोड़ों खुदरा दुकानदारों के सामने कितना भयानक खतरा है।
सरकार बार-बार जो दलील दे रही है कि वालमार्ट को भारत में कारोबार लगाने देने से कीमतें कम होंगी और रोज़गार बढ़ेंगे, यह अब तक दुनिया में कहीं भी साबित नहीं हुआ है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की एक कमेटी की 2004 में आर्इ रिपोर्ट कहती है किवालमार्ट की कामयाबी से वेतन-भत्तों पर दबाव पड़ा है, कामगारों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और देश भर में समुदायों के जीने के तौर-तरीके को खतरा पैदा हुआ है। आखिर किस तर्क से सरकार यह कहती है कि भारत में इसका असर उलटा होगा? इसकी सिर्फ एक वजह है और वो यह कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मदद पहुंचाने के लिए जान-बूझ कर झूठ बोल रही है।
संडे टाइम्स ने एक अध्ययन किया था जो दिखाता है कि ब्रिटेन के 108 तटीय क्षेत्रों यानी देश के 7.4 फीसदी हिस्से में खाद्य बाजार पर टेस्को का पूरा नियंत्रण है। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में सेंटर फॉर फूड चेन रिसर्च में एग्री बिज़नेस के प्रोफेसर डेविड होग्स के मुताबिक वालमार्ट और टेस्को जैसे सुपरमार्केटों की बाध्यता है कि वे अपने मूल क्षेत्र यानी अमेरिका और ब्रिटेन से कारोबार को बाहर ले जाएं क्योंकि उनके अपने बाज़ार अब परिपक्व हो चुके हैं इसलिए वे ज्यादा आबादी और कम सुपरमार्केट वाले देशों की खोज में हैं।
थाइलैंड में टेस्को के सुपरमार्केट का आधे से ज्यादा खुदरा बाज़ार पर कब्ज़ा है। टेस्को जब थाइलैंड में आया था तो इसने स्थानीय लोगों से रोजगार का वादा किया था लेकिन अब इस पर खुले तौर पर लोग गलत तरीके से व्यापार करने और स्थानीय कारोबारियों से उलझने के आरोप लगाते हैं। जहां तक यह दावा है कि ये सुपरमार्केट स्थानीय उत्पादकों से खरीदेंगे, इसका झूठ तब पकड़ा गया जब टेस्को के खिलाफ जुलार्इ 2002 में दर्ज एक मुकदमे में कोर्ट ने पाया कि टेस्को उत्पादकों के उत्पाद ले जाने के लिए स्लॉटिंग शुल्क लेती है और आपूर्तिकर्ताओं से प्रवेश शुल्क लेती है। बैंकॉक में चार साल पहले खुले टेस्को के स्टोर के कारण स्थानीय गल्ले की दुकानों की बिक्री आधे से भी कम रह गई है।

मलेशिया में टेस्को 2002 में गर्इ थी। जनवरी 2004 में पाया गया कि टेस्को से काफी नुकसान हुआ है इसलिए सरकार ने तभी से किसी भी नए सुपरमार्केट के निर्माण पर तीन प्रमुख शहरों में रोक लगा दी।
यह जानना दिलचस्प होगा कि वालमार्ट जो कुछ बेचती है, उसका 92 फीसदी चीनी कंपनियों से आता है। भारत का बाज़ार पहले ही चीन के सस्ते माल से पटा पड़ा है और हमारे व्यापारी चीन द्वारा अपनाए जा रहे गलत श्रम नियमों पर चीख-चिल्ला रहे हैं। सरकार पूरी ईमानदारी से एक बार बताए कि क्या वह अब भी विदेशी उद्यमों के लिए खुदरा बाज़ार को खोल कर हमारे देश के करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीनने को तैयार है। आखिर सरकार की मजबूरी क्‍या है ?
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