गुरुवार, 2 मई 2013

सोमनाथ चटर्जी का रास्ता खुला था आजम साहब


हाल ही में एक फोटो देखने में आई जिसमें इग्‍लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन को ट्रेन में सीट नही मिली तो वह खडे-खडे ही अखबार पढते हुए अपनी यात्रा कर रहे थे। मेरे संपर्क में एक सज्‍जन हैं जिनका अक्‍सर विदेशों में भ्रमण हुआ करता है। उनके एक स्‍वीज मित्र को डूयरिक हवाई अडडे से ट्रेन द्धारा राजधानी बर्न ले जाने की जिम्‍मेदारी एक महिला को दी गई थी। उसके पास 3-4 बैग थे। सौजन्‍यतावश उनके मित्र ने दो बैग अपने हाथ में उठाये और दोनों ट्रेन के दूसरे दर्जे के डिब्‍बे में चढ गये। उस महिला को दरवाजे के पास एक आरक्षित खाली सीट मिली जिस पर वह बैठ गई। उनका मित्र सीट न होने के कारण पास में ही खडा था। थोडी देर में टिकट निरीक्षक आया। टीटी ने उस महिला से कहा यह विकलांगों के लिये आरक्षित सीट है आप गलत जगह पर बैठी है। वह महिला तत्‍काल मांफी मांगते हुए खडी हो गई और भीड में दूसरे यात्रियों के साथ खडी हो गई। उस महिला को डिब्‍बे के लगभग सभी यात्री पहचानते थे उसका नाम था मिशेलिन काल्‍मी रे। वह स्‍वीटजलैण्‍ड की तत्‍कालिन राष्‍ट्रपति और विदेश मंत्री थी। भारत में यह सब कपोल कल्‍पना ही है। इसलिये अमेरिका के बोस्‍टन में चेकिंग होती है तो वहां भी लखनउ और रामपुर के चौधराहट को तलाशा जाता है।
यदि आपका इतना ही अपमान हुआ तो पूर्व लोकसभाध्‍क्ष सोमनाथ चटर्जी का रास्‍ता पकड लेते, सीधे हवाई अडडे से नई दिल्‍ली रवाना हो जाते। लेकिन यह कैसा विरोध कि अमेरिकी डीनर तो स्‍वीकार है लेकिन लेक्‍चर का विरोध कर दिया गया। दूसरे हावर्ड में लेक्‍चर के बाद प्रश्‍नोत्‍र का जो खुला सेशन होना था जिसमें वहां के शोध छात्र से लेकर बुद्धिजीवी होते ऐसे में लगता यही है कि प्रश्‍नोत्‍तर में कहीं पोल न खुल जाये इसलिये पहले ही नया आईडिया तलाश लिया गया हो। कहा यह भी गया कि उनके पास डिप्‍लोमेटिक वीजा था इसलिये चेकिंग गलत हुई तो ऐसा कहने वालों को पहले यह पता कर लेना चाहिये कि यूनाइ्रटेड स्‍टेट के कानून में किस पन्‍ने पर लिखा है कि डिप्‍लोमेटिक वीजा रखने वालों की सामान्‍य तलाशी नहीं ली जायेगी।
तलाशी तो पूर्व राष्‍ट्रपति कलाम की भी ली गई, समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडीज और अमेरिका में भारत की राजदूत रही मीरा शंकर को भी तलाशी से गुजरना पडा लेकिन इन लोगों ने इसे मुददा न बनाते हुए सामान्‍य तौर पर उस देश के नियमों के तहत लिया। यदि जाना पहचाना चेहरा होने के बावजूद फिल्‍म अभिनेता शाहरुख खान की तलाशी ली जाती है तो अमेरिका में आजम खान को पहचानने वाले कितने होंगे ? उत्‍तर प्रदेश को छोड दें तो उनको पहचानने वाले भारत में ही कितने लोग होंगे ? फिर अमेरी‍की नियमों को लेकर इतनी मुज्‍जमत क्‍यों है ?  दरअसल भारतीय भूभाग पर सामान्‍य नागरिक से अलग स्‍पेशल ट्रीटमेंट लेने के आदी हो चुके इन चंद नेताओ को जब कभी सामान्‍य नियमों से गुजरना पडता है तो तिलमिला उठते हैं। आजम खान जैसे लोग आज भी मुगलिया सल्‍तनत की अपनी सोच से बाहर नही निकले जिसके कारण ये पैन इस्‍लामिक मूवमेंट से खुद को अलग नही कर पाते, यही कारण है कि अमेरिकी युद्ध में मारे गये मुसलमानों के लिये मातम दिवस भारत में मनाना चाहते हैं। दुर्भाग्‍य से मुस्लिम समाज भी वास्‍तविक तरक्‍की के बजाये छदम नारों और तात्‍कालिक तुष्‍टीकरण से संतुष्‍ट होता रहा है जिनकी नब्‍ज आजम खान जैसे नेता बखूबी पहचानते हैं। बाकी सब ठीक है।