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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

1:14 pm

चरित्र की चुनौति



मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है और जो मनुष्‍य समाज से बाहर रह सकता हो वह भगवान होगा या शैतान होगा - अरस्‍तु के इसी चिंतन को आगे बढाते हुए रोमन राजनैतिक विचारक प्रोटागोरस कहता है कि मनुष्य ही सभी चीजों का मापदंड है। मनुष्‍य का चरित्र कैसा है यह उस मनुष्‍य के चरित्र के साथ ही उसके पारिवारिक संस्‍कार और सामाजिक पृष्‍ठभूमि के साथ ही उस समाज और राष्‍ट्र के चरित्र का भी परिचय दे देता है।
समाज और राष्‍ट्र की सबसे छोटी ईकाई पवार ही होती है और परिवार ऐसी संस्‍था है जो मानव जीवन को सर्वाधिक न केवल प्रभावित करती है बल्कि उसके चेतन-अचेतन मन को भी अपने रंग से रंग देती है। परिवार पहली पाठशाला है जहां मनुष्‍य समाज और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों के प्रति अपने व्‍यवहार को सीखता और समझता है। यही कारण है कि पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ राधाकृष्‍णन कहते हैं कि एक पुरुष यदि शिक्षित होता है तो सिर्फ एक पुरुष ही शिक्षित होता है जबकि एक महिला यदि शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। चरित्र गठन में शिक्षा की महत्‍वपूर्ण भूमिका है लेकिन प्रश्‍न है कि शिक्षा कैसी हो और उसकी दशा और दिशा क्‍या हो। परिवार शिशु की प्रथम पाठशाला होती है और मां को प्रथम शिक्षक कहा गया है। लेकिन भूमंडलीकरण और वैश्‍वीकरण ने हमारी परिवार व्‍यवस्‍था को भी विकृत किया है। परिवार जिसे लेकर हमारे प्राचीन शास्‍त्रों ने कल्‍पना करते हुए कहा कि वसुधैव कुटुंबकम वह धारणा आज क्षतिग्रस्‍त हो गई है। परिवार को भूमंडलीकरण उदारीकरण की व्‍यवस्‍था ने बाजार बना दिया है। जिसके कारण मूल्‍यों और प्राथमिकताओं में जबरजस्‍त परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
समाज की सबसे छोटी ईकाई परिवार का चिंतन भी समाजबोध और राष्‍ट्रबोध से अलग अर्थ आधरित हो गया है। ऐसे में संस्‍कारक्षम शिक्षा के बजाये प्रोफेशलन इजूकेशन को तरजीह दी जा रही है जहां पर ड्रग ड्रिंक डिस्‍को का कल्‍चर युवा पीढी को आर्थिक प्राणी या मैकेनिकल मैन बनाता जा रहा है, यही कारण है कि पारिवारिक संरचना में भी लगातार बिखराव होता जा रहा है।   
आज रोजगारपरक शिक्षा ने मूल्‍यों, संस्‍कारों को अलग कर दिया है जिसका परिणाम लगातार हताश और निराश हो रही युवा पीढी, हिंसा, अपराध, भष्‍ट्राचार सहित बलात्‍कार में लिप्‍त हो रहा युवा देश के राष्‍ट्रीय चरित्र को कलंकित कर रहा है। राष्‍ट्रीय चरित्र के अभाव में जिस दिशा में समाज बढ रहा है वह न केवल व्‍यक्ति को बल्कि पारिवारिक जीवन से लेकर सामाजिक जीवन में असंतोष, हिंसा, कुण्‍ठा आदि को ही बढावा देगा। यदि हम और हमारे समाज की सर्वागिण प्रगति होनी चाहिये ऐसा हम चाहते हैं तो अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना होगा। हमें नये सिरे से सोचना होगा कि हमारी अस्मिता क्‍या है ? हमारी प्रगति का पैमाना क्‍या है ? हमारे सफल होने और असफल होने का मापदंड क्‍या है? यह चर्चा सामाजिक स्‍तर पर होनी चाहिये। मुक्‍त वातावरण में खुले दिल और दिमाग से सोचना होगा कि हमें श्रवण कुमार चाहिये या पैसा के पीछे दिनरात भागने वाला, थकान को नशे से उतारने वाला पश्चिमपरस्‍त अगली पीढी ?  जो मां-बाप को अनावश्‍यक समझ ‘ओल्‍ड एज हाउस’ में डाल देता है और अपने फलैट का नंबर से लेकर फोन नंबर तक बदल लेता है। अपने मूल्‍यों मान्‍यताओं पर विचार करने के बाद हमें देखना होगा कि कौन सी बातें ग्रहण करने वाली है और कौन सी बातें त्‍यागने लायक हैं। ‘सास भी कभी बहू थी’ और ‘बूगी-बूगी’ को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर लेना होगा। अन्‍यथा इस कार्यक्रम में अपनी बेटी को नाचते देखकर पुलकित हो जाने से हम वैश्‍वीकरण की बाजी नही जीत जाते ना ही इससे कोई बहुत अच्‍छे संस्‍कार और चरित्र पैदा हो जाता है। 
बचपन में विज्ञान की कक्षा में हम सभी ने बर्फ जमाने की प्रक्रिया सीखी होगी जिसमें पहले पानी का एक कण बर्फ बनता है फिर दूसरा कण बनता है धीरे-धीरे पानी के कण बर्फ में बदलते जाते हैं और पूरा पानी बर्फ बन जाता है। इसी तरह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपने आप से शुरु करना होगा, सबसे पहले खुद के परिवार से ही चरित्र निर्माण के साधनों, विचारों और मूल्‍यों पर सोचना होगा। हांलाकि दुनियां का कोई भी समाज हो चरित्र का मूलभूत आधार सत्‍य, सदाचार, सहयोग, सहकारिता की भावना हर एक समाज में एक जैसी ही होती है और भारतीय समाज की पहचान चरित्रहीन सोने की लंका के बजाये चरित्रवान अयोध्‍या के रामराज से अधिक होती है। हमारे महाकाव्‍य गीता, रामायण अब हमारे घरो से लुप्‍त होते जा रहें हैं और दादा-दादी की कहानियों के बजाये किस चैनल पर क्‍या प्रोग्राम परोसा जा रहा है यह महत्‍वपूर्ण होता जा रहा है। कार्टून नेटवर्क देखने वाले बच्‍चों से किस संस्‍कार और चरित्र की आप उम्‍मीद कर सकते हैं ? माता जो शिशु की प्रथम शिक्षक थी जिसके आंचल में बालक की दुनियां होती थी वह आंचल भी अब नये फैशन में गायब होता जा रहा है। आवश्‍यक्‍ता पश्चिमपरस्‍त आधुनिकता के बजाये अपने भारतीय मूल्‍यों और जीवन पद्धति पर आधुनिक दृष्टिकोण से विचार करने की है।