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सोमवार, 1 अगस्त 2016

4:32 am

केजरीवाल टांय टांय फिस्स


...मुझे चाहिए स्वराज की सफेद टोपी लगाकर अगर आप दिल्ली में बीच सड़क पर ही लघुशंका करते हैं तो पुलिस रोकेगी ही, फिर? केजरीवाल यह आरोप लगा सकते हैं कि मोदी जी स्वच्छता अभियान हमारे कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए चला रहे हैं। यह मजेदार टिप्पणी करते हैं आशुतोष तिवारी जो पेश्ो से इंजिनियर हैं। एक समय वह अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे और किरण बेदी में भगत सिंह का अक्श देखकर रातभर रामलीला मैदान में लोकपाल-लोकपाल की पश्चिमी धुन पर थिरकते रहते थ्ो। मालवीय नगर निवासी कुलदीप कहते हैं- उस दौरान हमसबके उपर भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने और पारदर्शी शासन व्यवस्था बनवाने का जूनून था लेकिन केजरीवाल ने देशभक्ति का वह आंदोलन अपने राजनैतिक महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ा दिया। ऐसे एक नहीं अब हजारों की तादात में वालंटियर आपको मिलेगें जो निराश हैं, और उन्होंनें देश को नियति के भरोसे मान लिया है।
बेशक, उस दौरान कांग्रेस की कड़ाही में लगातार उबलते भ्रष्टचार ने केजरीवाल, अन्ना और किरण बेदी को जनता के बीच क्रांतिकारी, जननायक, उद्धारक आदि की छवि गढè दी थी। यह कोई साधारण दौर नहीं था, इस आंदोलन का संबंध भी मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार तक सिमित नहीं था। जनलोकपाल के इस सुरुर में पूरी भारतीय राजनैतिक व्यवस्था, संविधान और लोकतंत्र को निशाने पर लेने की कोशिश थी। उस समय 2०11 का वैश्विक परिदृश्य देखें तो बात काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी। आपको याद होगा तहरीर चौक और आरेंज क्रांति, ब्लू क्रांति और इंद्रधनुषी क्रांति। इन दर्जन भर क्रांतियों का सुनहला ख्वाब दिखाकर अफ्रीका के कई देशों में लिबरल कम्युनिज्म की वापसी पिछले चोर दरवाज्ो से करने की पुरजोर कोशिश हो रही थी। लोकतंत्र की प्यास से तड़पता आम आदमी सड़कों पर उतरा था, कहीं सफलता मिली तो कहीं विफल भी होना पड़ा था। यही वह दौर था, जब भारत म्ों अन्ना आंदोलन भी अपने चरम पर था। लेकिन उसका हस्र क्या हुआ? आंदोलन सियासी महात्वाकांक्षा के आगे बलि का बकरा बना दिया गया। जो बनना ही था। कारण? जब अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि मै अराजकतावादी हूं तो वह उसी अल्टàा लेफ्ट या लिबरल लेफ्ट की तरफ ईशारा करते हैं। अराजकतावाद के बारे में राजनैतिक विचारक कहते हैं कि यह वामपंथ के अंदर का वामपंथ है। जिसका लक्ष्य था सत्ता हासिल करना, जबकि आंदोलन तो उसकी सीढ़ी थी।
बहरहाल, अब देश की राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल सत्त्ता में हैं। तमाम वायदो, इरादों और सपनों की मखमली कार्पेट पर चलकर वह सत्ता के सिंहासन पर आरुढè हुए हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली की जनता केजरीवाल के वायदों, ईरादों को भूलकर समझौतावादी हो चुकी है और अब उसे कठोर धरातल का अहसास भी होने लगा है। जो युवा कल तक मै आम आदमी हूं की टोपी पहने मेटàो में बड़े शान से चला करता था अब वही केजरीवाल के रोज नए-नए होने वाले पैतरेंबाजी का मजा लेने लगा है। वोडाफोन कंपनी में काम करने वाली रुचिका बाधवा कहती हैं कि अब हम जान गए हैं कि केजरीवाल का फ्री वाईफाई नहीं मिलने वाला तो हम भी रोज-रोज केंद्र सरकार पर दोषारोपण का मजा लेने लगे हैं। अब वास्तव में केजरीवाल सरकार के कामकाज की बातें नहीं होतीं। अब बात होती है तो उनके रोजाना मोदी सरकार पर दोषारोपण का मजा लिया जाता है।
विकास के वायदे अब केजरीवाल तक ही सीमित होकर रह गए हैं। उनको खुद अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए प्रचार पर सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे ज्यादा अचंभे की बात और क्या हो सकती है कि जिन बातों पर हल्ला बोलकर केजरीवाल ने सत्ता कब्जाने का माहौल बनाया था वे सारी बातें आज उनके कामकाज के तरीकों से गायब हैं। एक लाइन में कहें तो मार्केटिंग की चमत्कारी विधियों से केजरीवाल ने अपना जो ब्रांड बनाया था उसके विस्तार के लिए वे अपनी नई शाखा पंजाब में खोलने का प्लान बना रहे हैं।
केजरीवाल को सत्ता विस्तार के लिए क्या दांव पर लगाना पड़ सकता है? दिल्ली में विकास की पर्याय बन चुकीं शीला दीक्षित को उखाड़ना आसान नहीं था। अन्ना के आंदोलन के जरिए केंद्र की यूपीए को उखाड़ने के लिए जो आंदोलन चलाया गया था उसने यूपीए को येनकेन सत्ता से बेदखल तो कर दिया लेकिन केजरीवाल भी बेपर्दा होते जा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल इस सबके बीच बड़ी चालाकी से और अपने सभी विश्वसनीय साथियों को दगा देकर, केवल अपनी निजी हैसियत बनाकर, दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने में सफल हो ही गए। सारी दिल्ली ठगी गयी। वरिष्ठ पत्रकार अनुराग श्रीवास्तव कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं हैं दिल्ली शुरु से ही अभिश’ है बारबार उजड़ने और बसने को।
दिल्ली को दांव पर लगाकर पंजाब जाने की जुगत में केजरीवाल को सबसे बड़ी दिक्कत आ रही है कि वह पंजाब में अपने काम का हिसाब क्या दें? वे लगातार दिल्ली के अखबारों में भारी विज्ञापन करवाने में लगे रहे कि पुल और सड़कों के काम सस्ते में करवा कर उन्होंने सरकारी खजाने का कितना पैसा बचवा दिया। लेकिन उनकी पोल तब खुली जब छह माह के अंदर ही निर्मित ओवर ब्रीज में दरारें देखी गई और सफाई कर्मियों ने वेतन न मिलने के कारण हड़ताल कर दिया। दिल्ली में ऑड-ईवन की कवायद के बावजूद बढ़ते प्रदूषण ने सरकार की पोल खोल दी। मीडिया मैनेजमेंट और मार्केटिंग से तब तक कुछ हासिल नहीं किया जा सकता जबतक धरातल पर आप नफा-नुकसान का हिसाब न दे दें। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इसलिए पंजाब में साम्राज्य विस्तार सिर्फ टेस्ट म्ौच खेलने जैसा साबित होगा। यही वजह है कि पंजाब में नशे का शोर मचाकर चुनाव में नया मुद्दा पेश करने की कोशिश में वह हाथ पांव मार रहे हैं। अंदरखाने से जो खबरें मिल रही है उसके मुताबिक केजरीवाल अगर जीत गए तो एलानिया तरीके से दिल्ली को अपने किसी विश्वसनीय दोस्त को सौंपकर पंजाब जाने का फैसला कर सकते हैं। सवाल उठता है कि उन्हें इतनी जल्दी पैर पसारने की जरूरत क्यों पड़ रही है? दिल्ली में जो शहीदी आभामंडल उन्होंने तैयार किया था वह अब क्षीण हो चुका है, केजरीवाल के सामने पलायन का रास्ता यही हैं कि एक तरफ तो वह अपनी नाकामियों के लिए मोदी-मोदी करते रहें दूसरी ओर दिल्ली की सल्तनत छोड़ कहीं दूर निकल जाएं। जो अब मुमकीन नहीं।
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नौटंकी के भी कुछ नियम हैं-
केजरीवाल का दावा था कि वे 48 घंटे में शासन को जनता की शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बना देंगे। जबकि हालत यह है कि वे शिकायतियों की भीड़ को संभालने की भी व्यवस्था नहीं बना पाए। अब सबकुछ पुराने ढर्रे पर है। केजरीवाल ने राजकाज का अर्थ यह समझा है कि अपनी हर नाकामी का तोहमत केंद्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मढè दिया जाए। इसलिए कभी वह दिल्ली पुलिस को अपने अधीन लाए जाने की मांग करते हैं तो कभी पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात करते हैं। उनके विधायक अयोग्यता अथवा आपराधिक मामलों को लेकर न्यायपालिका से दुत्कारे जाते है तो वह इसके लिए मोदी पर हमलावार हो जाते हैं। उपराज्यपाल नजीब जंग से उनकी कब्बडडी मोदी-मोदी करते हुए चलती ही रहती है। हाल में उन्होंने जनमत संग्रह का नया राग अलापा है। ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह ने सीएम केजरीवाल के सियासी अरमान जगा दिए हैं और उन्होंने ट्वीट करके कहा, यूके रेफरेंडम के बाद जल्द ही दिल्ली में भी पूर्ण राज्य को लेकर जनमत संग्रह किया जाएगा। लेकिन इसमें पेंच हैं यदि केजरीवाल की बात मानकर जनमत संग्रह होता है तो कल को यह मांग दूसरे राज्य भी अपने-अपने सियासी नफा-नुकसान से उठा सकते हैं। गौरतलब है कि कश्मीर घाटी में भी जनमत संग्रह की मांग काफी अरसे से उठती रही है। यदि दिल्ली में जनमत संग्रह हो सकता है तो कश्मीर और नागालैंड में क्यों नहीं?
केजरीवाल के इस बयान को लेकर भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी उनपर कानून नहीं मानने का आरोप लगा रही है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू कहते हैं कि लगता है केजरीवाल को ब्रिटेन का नशा चढ़ गया है। रिजिजू ने कहा कि केजरीवाल संविधान से बाहर गए तो केंद्र को दखल देना पड़ेगा। इसलिए उन्हें चाहिए कि संविधान के दायरे में काम करें।

श्रम और ठेका कानूनों पर मुकर गई सरकार -
दिल्ली के असंगठित मजदूर सरकार पर वायदा पूरा करने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। जो केजरीवाल ने विधान सभा चुनाव के दौरान किए थ्ो। श्रममन्त्री गिरीश सोनी ने ठेका मजदूरी उन्मूलन कानून लाने से साफ इंकार कर दिया और मजदूरों के प्रतिनिधियों से कहा कि उन्हें ठेकेदारों-मालिकों के हितों को भी देखना है। इसीतरह डीटीसी ठेका कर्मचारियों के बीच भाषण देने आए केजरीवाल को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। हजारों ठेका शिक्षकों ने कई दिनों तक सचिवालय को घेरे रखा और अन्त में केजरीवाल सरकार ने जबरन उन्हें सचिवालय से हटाया। केजरीवाल सरकार ने न्यूनतम मजदूरी व अन्य श्रम कानूनों को लागू करवाने के लिए श्रम विभाग में भ्रष्टाचार खत्म कर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के वायदे पर अमल के लिए 49 दिनों में एक कदम भी नहीं उठाया।

मुफ्त पानी बिजली
कच्ची व झुग्गी बस्तियों में चुनावों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पानी-टैंकर माफिया से मुक्ति मिलेगी और हर घर को 7०० लीटर मुफ्त पानी दिया जायेगा। हकीकत में मध्यवर्ग तक को ही 667 लीटर मुफ्त पानी दिया गया क्योंकि यह सिर्फ मीटर्ड कनेक्शन वालों को मिल पाया। बिजली के बिल को आधा करने का वायदा भी खटाई में पड़ गया। बिल पर पहले से 25 फीसदी सब्सिडी मिल रही थी। केजरीवाल सरकार ने 25 फीसदी सब्सिडी देकर दावा किया कि उसने पूरी 5० फीसदी सब्सिडी दे दी है। सरकार ने 5० फीसदी सब्सिडी को जारी रखने के लिए यह शर्त भी लगा दी कि बिजली कम्पनियों के ऑडिट पूरे होने के बाद इस सब्सिडी को जारी रखने या न रखने पर फैसला लिया जायेगा।
शीला दीक्षित के खिलाफ भ्रष्टाचार का हौवा खड़ा करने वाले केजरीवाल ने आज तक कोई प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की है। चुनाव से पहले केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ 37० पेज की रपट तैयार की थी लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही वह रपट ठंढे बस्ते में चली गई।

मंत्रियों की कारगुजारी
राखी बिड़लान-
केजरीवाल सरकार के मंत्री भी एक से बढकर एक निकले। जैसे कि राखी बिड़लान जिसने एक बच्चे की क्रिकेट बाल उनकी कार पर लग जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज करा दी कि उस पर जानलेवा हमला किया गया।
सोमनाथ भारती- निर्दोष महिलाओं पर वेश्यावृत्ति व ड्रग्स का आरोप लगाकर उन्हें सरेआम अपमानित किया और नस्लभेदी टिप्पणी की। इतना ही नहीं फर्जी डिग्री सहित पत्नी के साथ मारपीट के मामले में कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते रहे।
मनीष सिसोदिया- दिल्ली के कॉलेजों में दिल्ली के स्कूलों से बारहवीं करने वालों के लिए आरक्षण देने को कहा। बाद में अपने बयान से पलट गए। अरविंद केजरीवाल के बाद नंबर दो कहे जा रहे सिसोदिया के तमाम झूठ पकड़े गये जैसे कि उन्हें जबरन सरकारी बंगला दिया गया जबकि मुख्यमन्त्री बनने के अगले ही दिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिखकर खुद ही बंगलों की माँग की थी।

लाभ के पद
कोर्ट की फटकार पर 24 विधायकों को लेकर केजरीवाल अजीब असमंजस में फंसे हैं। न उगलते बनता है न निगलते ही। आनन फानन में अपने उन विधायकों को कानून की जद से बाहर लाने के लिए उन्होंने कानून भी बना दिया लेकिन जब राष्ट्रपति ने दस्तखत से इंकार कर दिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हो गए।
हालिया मामला
अभी जब आआपा के एक विधायक को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया तो वह प्रधानमंत्री मोदी पर देश में आपातकाल लागू करने का आरोप मढ दिए। जबकि हकीकत में उस विधायक के खिलाफ उसके ही विधानसभा क्ष्ोत्र के एक बुजुर्ग मतदाता ने मारपीट करने का आरोप लगा कर एफआईआर दर्ज कराई थी।
 -पी. मार्कण्डेय
4:22 am

गले और मुंह का कैंसर: गुटका और पान मसालों पर प्रतिबंध कितना प्रभावी


-प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी आ रहे सामने
-स्मोकिंग फैशन आईकान बनने से मुंह के रोगियों की सख्यां अधिक
-मुंह और गले के कैंसर रोगी दुनियां में सबसे अधिक भारत में
 देशभर में प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी सामने आ रहे है, और जिनमें से 5० प्रतिशत की मौत बीमारी की पहचान के अंतराल में ही हो जाती है। इसमें युवा अवस्था में होने वाली मौतों का कारण भी मुंह व गले का कैंसर मुख्य है। हालांकि पूरी दुनिया में विश्व गला व सिर कैंसर दिवस मनाए जाने और जागरुकता के तमाम कवायद के बाद भी कैंसर की महामारी रुकने का नाम नहीं ले रही है। पिछले 16 सालों में मुख और गले के कैंसर रोगियों की संख्या पुरुषों और महिलाओं में तीव्र गति से बढ़ती जा रही है। इसका खुलासा एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन में जारी रिपोर्ट में हुआ है।
वायसॅ ऑफ टोबेको विक्टिमस और गुड़गांव के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ वेदांत काबरा कहते हैं कि देशभर में लाखों लोगों में देरी से इस बीमारी की पहचान, अपर्याप्त इलाज व अनुपयुक्त पुनर्वास सहित सुविधाओं का भारी अभाव है। करीब 3० साल पहले तक 6० से 7० साल की उम्र में मुंह और गले का कैंसर होता था लेकिन अब यह उम्र कम होकर 3० से 5० साल तक पहुंच गई। वही आजकल 2० से 25 वर्ष के कम उम्र के युवाओं में मुंह व गले का कैंसर देखा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी सभ्यता का पश्चिमीकरण साथ ही युवाअेां में स्मोकिग को फैशन व स्टाइल आइकान मानना है। मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में है।
भारत में पूरे विश्व की तुलाना में धूम्ररहित चबाने वाले तंबाकू उत्पाद (जर्दा,गुटखा,खैनी,) का सेवन सबसे अधिक होता है। यह सस्ता और आसानी से मिलने वाला नशा है। पिछले दो दशकों में इसका प्रयोग अत्यधिक रुप से बढ़ा है, जिस कारण भी हैड नेक कैंसर के रोगी बढ़े है। डा.काबरा बतातें है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिर्सच द्बारा वर्ष 2००8 में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक भारत में हैड नेक कैंसर के मामलों में वृद्बि देखी जा रही है। कैंसर में इन मामलों में नब्बे फीसदी तम्बाकू, मदिरा व सुपारी के सेवन से होतें है और इस प्रकार के कैंसर की रोकथाम की जा सकती है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान (आईसीएमआर) की रिपोर्ट मंे भी इस बात का खुलासा किया गया है कि पुरुषों में 5० फीसदी और महिलाओं में 25 फीसदी कैंसर की वजह तम्बाकू है। इनमें से 6० फीसदी मुंह के कैंसर हैं। धुआं रहित तम्बाकू में 3००० से अधिक रासायनिक यौगिक हैं, इनमें से 29 रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं।
उन्होने कहा कि हैड नेक कैंसर के मामले राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं, वंचित लोगों, परिवारों व समुदायों पर भार बढ़ा रहे हैं। भाग्यवश हैड नेक कैंसर से जुडे अधिकांश, मामलों में यदि बीमारी का पता पहले लग जाये तो इसे रोका जा सकता है और ईलाज भी किया जा सकता है। लेकिन लाखों लाखों लोग रोग की देरी से पहचान, अपर्याप्त ईलाज व अनुपयुक्त पुनवर्वास सुविधाओं के शिकार हो जाते है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्राचार्य और सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी जो इस अभियान की अगुवाई वैश्विक स्तर पर कर रहे है। वह बताते हैं कि हैड नेक कैंसर के नियंत्रण के लिये सरकारों, एनजीओ, चिकित्सा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षा व उद्योग संस्थानों सहित बहु क्षेत्रिय सहयोग की आवश्यकता है। हैड नेक कैंसर पर प्रभावी नियंत्रण और ईलाज की और वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिये अंतरर्राटàीय फेडरेशन ऑफ हेड एण्ड नेक ऑनोलोजिक सोसाईटिज आईएफएचएनओएस ने जुलाई 27 को विश्व सिर, गला कैंसर दिवस -डब्ल्यु एचएनसीडी- के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव रखा है। फेडरेशन को इसके लिये अनेक सरकारी संस्थानों, एनजीओ, 55 से अधिक सिर व गला कैंसर संस्थानों व 51 देशों का समर्थन प्राप्त है।
डा.पंकज चतुर्वेदी बतातें है कि एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन 2००8 व 2०16 में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार 2००1 में पुरुषों में मंुंह का कैंसर के 42725 मामले वहीं 2०16 में 652०5 मामले, महिलाअेां में 22०8० व 35०88, गले और श्वास नली के कैंसर के मामले 49331, 759०1, महिलाअेां में 9251, 1455०, भोजन नली 24936 व 38536 महिलाओं में 17511व 28165, अमाशय में 2०537 व 31538, महिलाओं में 11162 व 17699, फैंफड़े 39262 व 6०73०, महिलाओं में 9525 व 15191, स्तन कैंसर महिलाओं में 89914 व 14०975, गर्भाश्य महिलाओं में 79827 व 125821 तथा अन्य तरह के 214967 व 31584० तथा महिलाअेां में 166629 व 25241० रोगी पाए गए।
देश में अनेक परेशानियों के बावजूद, हालांकि गुटखे पर, जो की एक धुंआ रहित औद्योगिक उत्पाद है, पर लगभग पूरे भारत पर प्रतिबंध लग गया है। गुटखे के अलावा, 13 राज्यों ने अब उत्पादित सुगंधयुक्त चबाने वाले तम्बाकु को भी निषेध कर दिया है। तम्बाकु पीडिèतों की आवाज नामक तम्बाकू पीडिèतों के स्वयं के द्बारा चलाये गये निरंतर आंदोलन के परिणामस्वरूप यह प्रतिबंध प्रभाव में आया। इस आंदोलन से देश के नामी कैंसर विशेषज्ञ भी जुड़ गये।
वर्ष 2०14 में जॉन हॉपकिस यूनिर्वसिटी ब्लूूमबर्ज स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुटखा प्रतिबंध के प्रभावों पर एक अध्ययन करवाया। अध्ययन के दौरान देश के सात राज्यों असम, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट, उड़ीसा और दिल्ली में 1,००1 वर्तमान व पूर्व गुटखा उपभोक्ताओं और 458 खुदरा तम्बाकु उत्पाद विक्रेताओं पर सर्वे किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि 9० फीसदी रिस्पोडेंन्ट्स ने इच्छा जताई कि सरकार को धुंआ रहित तम्बाकु के सभी प्रकार के उत्पादों की बिक्री और डिस्टिब्यूशन पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। इस पर 92 फीसदी लोगों ने प्रतिबंध का समर्थन किया। 99 फीसदी लोगों ने कहा कि भारतीय युवाओं के स्वाथ्य के लिये प्रतिबंध अच्छा है। जो लोग प्रतिबंध के बावजूद गैरकानूनी ढंग से पैकेज्ड तम्बाकु का सेवन करते है उनमें से आधे लोगों ने कहा कि प्रतिबंध के बाद उनके गुटखा सेवन में कमी आई है। 8० फीसदी लोगो ने विश्वास जताया कि प्रतिबंध ने उन्हें गुटखा छोडने के लिये प्रेरित किया है और इनमें से आधे लोगों ने कहा उन्होंने वास्तव में छोड़ने की कोशिश भी की है। इंडेक्स ऑफ इंडिस्टरियल प्रोडक्शन आईआईपी के आंकडो पर गौर करे तो सिगरेट, बीड़ी व चबाने वाले तम्बाकू उत्पादों को उत्पाद मार्च 2०15 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 12.1 फीसदी गिर गया।
चबाने वाले तम्बाकु उत्पाद पर प्रतिबंध के प्रभाव यूरोमोनिटर इंटरनेशनल की रिपोर्ट दर्शाती है जिसके मुताबिक धंुआरहित तम्बाकु उत्पाद में निम्न गिरावट देखी गई है - वर्ष 2०11: 2 प्रतिशत 2०12: 26 प्रतिशत 2०13 य 8०: प्रतिशत पूर्वानुमान के मुताबिक यह दर 2०14 मे 4० फीसदी तक और 2०15 में करीब 35 प्रतिशत तक गिर गई। 2०16 तक 3० व 2०18 में 25 फीसदी तक गिर जायेगी।
-मार्कण्डेय पाण्डेय

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

2:31 am

मदर टेरेसा का असली चमत्कार क्या था


मार्कण्डेय पाण्डेय
गरीबों की सेवा में पूरा जीवन समर्पित करने वाली नोबेल शांति पुरस्कार प्रा’ ईसाई प्रचारिका एग्नेस उर्फ टेरेसा को अब रोमन कैथोलिक चर्च के संत की उपाधि से नवाजा जाएगा। वेटिकन के पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार को मान्यता दी है। क्या था चमत्कार ? उन्होंने ब्रेन टयूमर से पीड़ित ब्राजील के एक युवक को ठीक कर दिया था। एक समय टेरेसा से पत्रकारों ने पूछा था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है, ऐसा बाईबिल में लिखा है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, आप क्या मानती हैं? टेरेसा ने कहा जो बाईबिल में कहा गया है वह ठीक है। गत दो साल पहले ईसाई समुदाय ने इलाहाबाद में चंगाई महोत्सव किया। गांव-देहात के गरीब, अनपढè और अभावग्रस्त लोंगो को लाया गया। भूत-प्रेत की झाड़-फंू क कनाडा से आये एक अंग्रेज पादरी मिस्टर यंग्रीन ने शुरु किया। ये यूरोप के वे लोग हैं जो खुद को आधुनिक विज्ञान की विरासत का एकमेव वारिस होने का दावा करते हैं। खैर, कुछ साल पूर्व क्रिस्टोफर हिचेंस ने फिल्म बनाई नर्क का फरिश्ता तो देश के सेकुलरों को सांप सूंघ गया। कारण कि क्रिस्टोफर ने मदर टेरेसा के ऐसे ही तथाकथित सेवा और चमत्कारों की पोल खोल दी। नार्थ-ईस्ट के आदिवासी गरीब जो ईसाई बने। उनके लिये आरक्षण की मांग करते हुए वह नई दिल्ली में धरने पर बैठ गई। जब सवाल किया गया कि यदि हिंदू धर्म में छूआछूत है जिसके कारण आरक्षण दिया जाता है तो आपके धरने पर बैठने से यह स्वत:सिद्ध नहीं होता कि ईसाई मत में भी भ्ोदभाव है?
क्रिस्टोफर हिचेंस अपनी फिल्म में साफ कहते हैं कि अखबारों का बेहतरीन उपयोग करके टेरेसा को करुणा की देवी जैसी छवि बनाई गई है। आस्ट्रàेलिया की विख्यात लेखिका ग्राहम ग्रीन ने कहा कि वे करुणा की कारोबारी हैं। हिच्ोंस की फिल्म में टेरेसा के मरणासन्न रोगियों के केंद्र की हालत को दिखाया गया है। इस फिल्म में मैरी लुडन कहती हैं-हे भगवान यह क्या? एक कमरे में 5० से 6० रोगी कोई कुर्सी तक नहीं, नाही पर्या’ आक्सीजन या ग्लूकोज के बोतल, कैंसर जैसे भयंकर रोग में एसप्रीन या ब्रूफेन दिया जा रहा है। फिल्म में मदर टेरेसा बोलती है कि बहुत पहले से मैने गरीबों की सेवा करने का निश्चय किया था। जो धनी लोग अपने पैसे से प्रा’ करते हैं, उसे मै ईश्वर के प्रति प्रेम से गरीबों को देती हूं। कोलकाता से आगे नार्थ-ईस्ट के राज्य जनजातियों वाले हैं। गरीबी, असहायता, अभाव ने आज भी उनका साथ नहीं छोड़ा है। ऐसे में सेवा का के्रद्र वहां न बनाया जाता तो कहां बनता? आज भी नार्थ-ईस्ट सिसक रहा है, अरुणांचल में चीन घुस आता है, अलगाववादी अपने पैर पसार रहे हैं। क्यों ? क्यों कि देश से जोड़ने वाली जो धारा थी उसको चमत्कार करके सूखा दिया गया।

2:29 am

मरने से पहले अपनी कहानी बताना चाहता था


मार्कण्डेय पाण्डेय
मै पहले एक सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर कार्यरत था। अच्छा खिलाड़ी भी था इसलिये भारत सरकार ने राष्ट्रीय क्रीड़ा प्रशिक्षण के लिये मेरा चयन किया। लेकिन मेरे वरिष्ठ इसकारण मेरे से ईष्याã करने लगे और कुछ ही दिन में मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। मैने बार-बार निवेदन किया लेकिन वे नहीं माने और मै बेरोजगार हो गया। कुछ दिन बाद मेरे कुछ मित्रों ने एक आदमी से परिचय कराते हुए कहा कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और उसका बदला लेने में यह चच्चा तुम्हारी मदद करेंगे। मै उनकी बातों में बह गया और उनके साथ चल पड़ा। तीन दिन तक सफर करने के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से मुझे सीमापार कराया और मै पाकिस्तान आ गया। वहां पाकिस्तानी सेना के जवानों ने मेरा तहेदिल से स्वागत किया, हमारे खाने-पीने आदि की आलीशान व्यवस्था की और मुझे समझाया कि अपने विभाग के किसी वरिष्ठ अधिकारी को मारकर तुम्हे कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि तुम्हे ऐसे अधिकारियों को बनाने वाले भारत सरकार से बदला लेना है।
इसके बाद उन्होंने मुझे बंदूके और अन्य शस्त्र दिये और पाक जासूसों की सहायता से नियंत्रण रेखा के पार लाकर छोड़ दिया। मैने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों पर हमले किये और पकड़ा न जाउं इसलिये भागकर नियंत्रण रेखा के पार पहुंच जाता था। पाकिस्तान में मेरा इज्जत बढ़ने लगी और मुझे तंजिम का उपप्रमुख बना दिया गया। सेना के अधिकारियों ने बताया कि तुम्हारी प्रसिद्धी रावलपिंडी तक पहुंच गई। फिर बताया गया कि आपको श्रीनगर विश्वविद्यालय और शूरा मेडिकल कॉलेज को बम से उड़ाना है। मैने सोचा कि इन शिक्षा संस्थानों को खतम करके क्या हासिल होगा और मेरी समझ में आने लगा कि पाकिस्तान केवल भारत का अपमान और विभाजन चाहता है। मैने इस वारदात को अंजाम देने से इंकार कर दिया। अब मै जानता हूं कि मेरी हत्या वे कर देंगे लेकिन मरने से पूर्व अपनी कहानी किसी को बताना चाहता था जो आज पूरी हो गई। यह साक्षात्कार वर्ड फोरसाईट ग्रुप के निदेशक संजीव वासलेकर ने अपनी पुस्तक में लिखी है। वह लिखते हैं कि इसके कुछ दिन बाद ही उसकी हत्या हो गई।
अभी दो दिन पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नए साल के जश्न के मौके पर धमाका करने आये अलकायदा के आतंकी मोहम्मद आसिफ को गिरफ्तार किया है। 41 साल का आसिफ उत्तरप्रदेश के संभल का रहने वाला है। वहीं कटक से गिरफ्तार अब्दुल रहमान भी अलकायदा के लिये काम करता है जब कि रहमान मूलरुप से कटक का ही निवासी है। अलकायदा बहुत योजनाबद्ध तरीके से भारत के अंदर अपने पांव पसार रहा है। हांलाकि अलकायदा, जैश ए मोहम्मद और लश्करे तोयबा का आपस में ही प्रतिस्पर्धा है कि कौन सबसे अधिक जनसंहार करता है। जैश ए मोहम्मद का मुख्यालय इस्लामाबाद शहर में अनेक एकड़ जमीन पर फैला है। जबकि लश्करे तोयबा का लाहौर के पास मुदीर गांव में 14० एकड़ में है। वहां स्वीमींग पुल, चमड़ा उद्योग, घोड़ो के तबेले, मदरसे आदि हैं। लश्करे तोयबा के पूरे पाकिस्तान में 15० मदरसे, बड़े समाचार पत्र समूह, और दस हजार कमीशन एजेंट कार्यरत हैं। इन मदरसों में गरीब और अभावग्रस्त परिवार के बच्चों को लाकर जेहादी मानसिकता तैयार कराया जाता है। भारत में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो पाकिस्तान गु’चर एजेंसी से निश्चित रकम प्रा’ करके 35 फीसदी रकम उसके घर पहुंचा दी जाती है बाकी पैसा गोलमाल हो जाता है। पाकिस्तान सरकार को सब पता है और गहराई में जाये तो यह सरकार प्रायोजित आतंकवाद है। पाकिस्तान जानता है कि वह सीधी लड़ाई में भारत से पार नहीं पा सकता तो इस गैर सरकारी कुटिल सेनाओं को भरपूर मदद मुहैया भी कराता है।

2:28 am

वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जिस तरह छात्रों के एक गुट ने भारत विरोधी नारेबाजी की और उसके बाद कुछ राजनेताओं ने अपने-अपने चश्में से वोटब्ौंक तलाश करना शुरु किया वह निदंनीय है। इस तरह के राष्ट्रविरोधी मानसिकता के छात्रों का समर्थन सिर्फ वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये ही नहीं किया जा रहा बल्कि इसके पीछे मोदी सरकार के विरोध की मानसिकता गहराई तक बैठी हुई है। विरोध का कोई मुददा न होने पर विपक्ष इस समय भ्रम और याचक की भूमिका में टकटकी लगाए तलाश रहा है कि क्या घटना हो जिसपर मोदी सरकार को निशाने पर लिया जा सके।
गौर करने वाली बात जो है कि राष्ट्रविरोधी नारे लगाने और आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने वाले छात्र वामपंथी गुट के हैं। जो वामपंथ पूरी शिददत से अपने जन्मकाल से ही मानता आया है कि राज्य विलु’ हो जाएगा अर्थात स्टेट विदरर्स अवे। स्टेटलेस और कास्टलेस सोसाईटी के निर्माण का यूटोपिया अर्थात स्वप्न कार्ल मार्क्स ने देखा और दुनियां को दिखाया। उसी विचारधारा के छात्र नारे लगाते रहे कि भारत तेरे टुकड़े होंगे। यदि देश के टुकड़े होंगे तो यह कैसी विचारधारा? टुकड़े से सीमाएं और बढ़ ही जाएंगी। लेकिन वाममार्गियों को इसकी परवाह नहीं है। इतिहास में देखे तो दुनिया में जितने वामपंथी विचार को माानने वाले देश रहे सबसे अधिक सीमा विवाद को लेकर वहीं आपस में उलझे रहे। मार्क्सवाद पूरी तरह इस सिद्धांत पर ही फेल नहीं हुआ बल्कि रुस में जब पहला संविधान बना तो उसमें सेकुलर देश होने का दावा किया गया। इससे पूर्व कहा गया कि गॉड विल वी एक्पेल्ड फ्राम रसिया अर्थात ईश्वर को रुस से निष्कासित कर दिया जाएगा। सभी चर्च पर ताला बंद कर दिया जाएगा। क्यों कि धर्म अफीम की गोली है।
इतना ही नहीं पूंजीवाद के खिलाफ मार्क्स ने जो अनुमान किए वह पूरी तरह फेल साबित हुए। आज तक न तो किसी सर्वहारा ने क्रांति की नहीं पूंजीवाद खत्म हुआ। उल्टे वक्त के साथ पूंजीवाद का चेहरा और अधिक मानवीय होता गया। पूंजीवादियों ने मजदूर वर्ग के हित में काम करना और सोचना शुरू किया। सरकारों ने मजदूरों के हित में तरह-तरह के कानून बनाने आरंभ कर दिए। हेल्थ बीमा, बोनस, पीएफ आदि के माध्यम से मजदूरों को पूंजीवाद ने साध लिया। आज की दुनियां में वामपंथ पूरी तरह भ्रम की अवस्था में है। मुददा विहीन और विचारधारा के लगातार फेल होते जाने से वह अनाप-शनाप की हरकतों पर उतर आया है। उसे समझ नही आता कि फेसबुक, गूगल, अमेजान, श्नैपडील जैसी कंपनियां बिना किसी फैक्टàी बिना किसी मजदूर के करोड़ों की आमदनी कैसे कर रही है? आखिर हम कहां पर बैठकर हड़ताल करें ? कहां पर तालाबंदी करें? ऑनलाईन होती जा रही दुनिया और लगातार बदलते जा रहे बाजार के दर्शन ने मार्क्सवाद के दर्शन को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। ऐसे में कुछ युवाओं को गुमराह करके, छात्रों के एक सीमित गुट तक ही लालदुर्ग बाकी रह गया है।


2:27 am

ब्लूचिस्तान और पाक कब्जे वाले कश्मीर की छटपटाहट


मार्कण्डेय पाण्डेय
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इनदिनों भारी मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। एक के बाद एक जिसतरह की घटनाएं पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में घट रही है उससे नहीं लगता कि अधिक दिनों तक पाकिस्तान उसे अपने कब्जे में जबरन रख पायेगा। जैसे ही ब्लूच मुददे पर नवाज हटाओ अभियान वहां चला विश्ोषज्ञों को यह आशंका सताने लगी कि क्या फिर से पाकिस्तान मिलेटàी शासन की ओर बढ रहा है? हांलाकि सेना और नवाज के बीच समझौता हो गया लेकिन सबकुछ ठीकठाक नहीं है। नवाज शरीफ एक माह में दो बार अमेरिका अपना दर्द सुनाकर आये। नवाज आंतरिक मजबूरियों से निपटने और लोगों का ध्यान भटकाने के लिये पूरजोर कोशिश करते रहे कि भारत की तरह ही अमेरिका से पाकिस्तान परमाणु समझौता कर ले किंतु कामयाब नहीं हुए। कारण अमेरिका जानता है कि आज के वैश्विक हालात में भारत पाकिस्तान से बहुत लंबी लकीर खीच चुका है और पूर्ववर्तियों की तरह वह दोनो देशों को एक तराजू में नहीं रखना चाहता। दूसरा कारण यह कि भारत सैन्य मामलों में हमेशा ही जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाता है। भारत की परमाणु नीति भी नो फस्र्ट यूज की है जबकि पाकिस्तान को परमाणु आयुध संम्पन्न करने का मतलब कि हथियार कब आतंकियों के हाथ लगे कुछ नहीं कहा जा सकता।
इस समय पाकिस्तान के सामने दो बड़ी और चुनौतियां उभर आई है। पहला ब्लूचिस्तान और दूसरा पाक अधिकृत कश्मीर। ये दोनों हिस्से पाकिस्तान में कब तक रहेंगे पाकिस्तान भी नहीं जानता। पाकिस्तान कब्जे वाला कश्मीर किसी भी कीमत पर पाकिस्तानी हिस्सा नहीं होना चाहता अब वहां की जनता छटपटाने लगी है कि कम से कम भारतीय हिस्से वाले कश्मीर से ही हमलोग एकजुट हो जाएं। इसके भी कारण है। पहला पाक कश्मीर की बदतर हालत दूसरा भारतीय कश्मीर में मिल रही तमाम सरकारी सुविधाएं और तीसरा अपनी मूल प्रकृति को प्रा’ करना। मजे की बात यह कि जब-जब नवाज शरीफ अमेरिकी राष्ट्रपति और संबंधित मंचों पर गये इसबात का हायतौबा जरुर किये कि ब्लूचिस्तान को पाकिस्तान से भारत ही अलग करवा रहा है। इसलिये अमेरिका हमारे साथ परमाणु संधि कर ले। यदि ब्लूचिस्तान और पाक कश्मीर पाकिस्तान से अलग हो जाते हैं तो पाकिस्तान का इश्लामिक देश होने का मुलम्मा खतम हो जायेगा। उसकी सीमाएं घटेगीं, कटेंगी और सामरिक नजारा ही कुछ और हो जायेगा। आमीन ।।।

2:25 am

आरक्षण की समीक्षा आरक्षित वर्ग के लिये लाभप्रद



मार्कण्डेय पाण्डेय
भारत में आरक्षण का आधार सांस्कृतिक है न कि आर्थिक। क्योंकि अभी भारत में आर्थिक वर्गीय अवधारणा विकसित नही हो पाई है इसलिए जातीय आधार को पूरी तरह खारीज नही किया जा सकता। आरक्षण का विरोध सिर्फ आरक्षण के कारण करना न्यायसंगत नहीं होगा। वास्तव में यह अनारक्षित जातियों के ही दीर्घकालीक हित में है। क्योंकि इतनी बड़ी अविकसित जनसंख्या विकास के लाभों को यदि उच्च जातियों तक पहुंचने देना है तो उनके पदसोपान को आगे लाना ही होगा। यह न केवल सामाजिक न्याय की पश्चिमी अवधारणा को विकसित करेगा बल्कि भारत ज्ौसे देश में सामाजिक समरसता को भी मजबूत करेगा। लेकिन ज्वलंत सवाल यह है कि क्या वास्तव में आरक्षण उनको ही मिल रहा है जिनको इसकी वास्तव में जरुरत है? समाज शास्त के विचारक मानते हैं कि आरक्षण का लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ राज्यों की अनुसूचित जातियों का जब अध्ययन किया गया तो जो परिणाम सामने आए उसके अनुसार अनुसूचित वर्ग का एक हिस्सा आरक्षण का लाभ उठाकर मध्यवर्गीय जीवन जी रहा है और अपनी सामाजिक स्थिति भी मजबूत कर चुका है। विख्यात समाजशास्त्री पीके रॉय वर्मन कहते है कि आरक्षण का वस्तुनिष्ठ लाभ कम पर व्यक्तिनिष्ठ लाभ अधिक हुआ है।
आरक्षण के कारण अनुसूचित जातियो का समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की प्रति सकारात्मक विचार आया है। इसके अलावा तथा आरक्षण प्रा’ जातियो में सामाजिक मॉडल भी उभरे हैं। जैसे रेड्डी, पनियांन, पटेल (महाराष्ट्र व गुजरात), शिन्दे, गुर्जर, भील, मीणा, हरिजन, पासवान, यादव, कुर्मी, लोधी, जाट, कोइरी आदि जातियां अपने को सामाजिक व राजनितिक रूप से सशक्त महसूस करने लगी है। कुछ और सामाजिक चिंतक जैसे आंद्रे बेते, श्रीनिवास, सुरजीत सिन्हा, मजूमदार आदि मानते हैं कि आरक्षण के कारण जो जातियां विकसित हो चुकी है वह आज भी अपने को निम्न जातियों में गिनती करवाती है। जिससे उनको आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ मिलता रहे। अनुसूचित जाति 542 में लगभग 34 जातियों की आबादी तकरीबन 75 फीसदी है। तो इनमे 7 जातियां ऐसी है जो कुल अनुसूचित जाति की अकेले ही 9० फीसदी हैं। इसी तरह अनुसूचित जनजाति में मीणा ,गुर्जर, भील, टोडा कोटा आदि आरक्षण का 8० फीसदी लाभ लेकर अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर चुकी हैं और अपने ही कमजोर वर्ग का शोषण भी कर रही हैं। इसलिए अब आरक्षण की समीक्षा बेहद जरुरी कदम है ताकी जो परिवार एक बार क्लास वन या टू की नौकरी प्रा’ कर लेता है वह अपने ही स्वजातियों के हित में खुद ही पहल करके आरक्षण का लाभ लेना बंद कर दे।


2:23 am

रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत, खाओ चिड़िया भरपेट


मार्कण्डेय पाण्डेय
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने फिर से एक बार राम मंदिर का राग अलापा है। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव नजदीक आते जायेगें संघपरिवार और भाजपा मंदिर मुद्दे को फिर एक बार मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे। लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखकर नहीं लगता कि अब जनता राम मंदिर के नाम पर इनके झांसे में आएगी। राम मंदिर निर्माण के लिये बलिदान देने वाले रामभक्तों को समझ में आने लगा है कि 'भूखे भजन ना होत गोपाला।’ जबकि यह बात न तो भाजपा की केंद्र सरकार समझने को तैयार है ना ही संघ परिवार। यह भी समझने को तैयार नहीं कि सरयू में गत दो दशकों में काफी पानी बह चुका है। राम मंदिर निर्माण का मसला अदालत में जब तक विचाराधीन है, तब तक इस तरह की बातें सिर्फ जनभावनाएं भड़काकर वोट में बदलने की कोशिश ही दिखाई देते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि दरिद्र नारायण ही हमारे आराध्य हैं। स्वामी जी ने तत्कालीन समाज का आह्वान करते हुए कहा था कि राष्ट्र निर्माण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। फुटबाल खेलने से गीता का संदेश अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकता है। इसलिये उन्होंन्ो कहा कि लोहे की मांसपेशिया और फौलाद के स्नायु वाले युवा निर्माण की प्रथम आवश्यकता है। आज देश में आधी आबादी जब मौसमी या आंशिक बेरोजगारी से जूझ रही है, देश का युवा नौकरियों में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लालफिताशाही से मुक्त नहीं हो पाया है। देश में सवा सौ करोड़ की आबादी में 8० करोड़ लोग दरिद्रता, अभाव और बेबसी का जीवन जी रहे हैं। विभिन्न सर्वेक्षण संस्थाओं की मानव विकास सूचकांक संबंधी रिपोर्ट निराश करने वाली होती है, ऐसे में मंदिर-मस्जिद के बजाये राष्ट्र निर्माण हमारी पहली जरुरत दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषणों में बार-बार इस बात को दोहराया है कि हम सभी को मिलकर गरीबी के खिलाफ जंग छेड़नी है। उनका ईशारा निश्चित ही राम मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दे को कुछ दिनों के लिये ठंडे बस्ते में डालकर देश के विकास पर पूरा ध्यान देने का रहा है। किंतु बीच-बीच में भाजपा-संघ नेताओं का राम मंदिर राग अलापने का अर्थ है सबका साथ-सबका विकास जैसे लक्ष्य से भटकाव पैदा करना और जनता का ध्यान उसकी मूल रोजी-रोटी की समस्या से भटकाते रहने का है। भगवान राम देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्य हैं, लेकिन राममंदिर के निर्माण को लेकर दो-दो बार केंद्र में सरकार होने के बावजूद कोई भी ईमानदार कोशिश सरकारी स्तर पर अब तक नहीं की गई। ऐसे में विरोधियों का यह कहना ही ठीक लगा कि जब-जब चुनाव आता है तो भाजपा-संघ परिवार को राम मंदिर याद आने लगता है। इस अवसरवाद पर यह सटीक लगता है कि 'रामजी की चिडिèया रामजी का खेत, खाओं चिड़िया भर-भर पेट।’

2:22 am

लोकतंत्र के ये वंशवादी, धंध्ोबाज राजा-महाराजा


मार्कण्डेय पाण्डेय
सांसदों का वेतन बहुत जल्द दोगुना होने जा रहा है। संसदीय मामलों के मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय को भ्ोजा है। मंत्रालय की मंजूरी मिलते ही आगामी बजट में इसे लागू कर दिया जाएगा। कहीं कोई असहमति, बहस या सैद्धांतिक मतभ्ोद इस प्रस्ताव में पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह लागू होते ही सांसदों का वेतन 5० हजार से बढकर एक लाख रुपया महीना हो जाएगा और इसके अतिरिक्त सांसदों के कार्यालय का खर्च 45 हजार से बढाकर 9० हजार कर दिया जाएगा। कुलमिलाकर सबकुछ जोड़ देने पर हर माह एक सांसद को तकरीबन तीन लाख रुपये प्रा’ होंगे। अच्छा अगर अगला आमचुनाव हार भी गये तो पेंशन के नाते आजीवन 35 हजार रुपये मिलते रहेंगे। ज्यादातार सांसद चाहते हैं कि यह पैसा उनके वेतन के रुप में न बढाया जाए क्यों कि इससे वह आयकर के दायरे में फंस जाते हैं। पैसा दो लेकिन उसको भत्ते के रुप में मिल जाता तो आयकर के झंझट में नहीं फंसना पड़ता। जैसा कि अभी साल 2०1० में सांसदों का वेतन-भत्ता बढाया गया था लेकिन महंगाई देखते हुए फिर से बढाया जाना जरुरी नहीं है क्या?
वर्तमान लोकसभा का जब गठन हुआ तो सांसदों के दिल्ली आते ही उनको पंच सितारा होटल भ्ोज दिया गया जबतक आवास आबंटित नहीं होता। कई तो उसी में पड़े रहे आवास आबंटित न ही हो तो अच्छा। पहली बार चुनकर आए सांसद स्टेशनरी लेकर संसद से आए जिसमें रेलयात्रा कूपन, हवाई यात्राओं का टिकट, लेटरपैड, अनलिमिटेड देश-विदेश कॉल करने के लिये सिम आदि। वे काफी भौचक थ्ो, लगातार यह ही पता कर रहे थ्ो और क्या-क्या सुविधाएं हैं? एक ने कह भी दिया कि सरकार बहुत सुविधाएं देती है। यही कारण है कि गांव-गांव में आज एमपी, एमएलए के उम्मीदवार उत्पन्न हो रहे हैं। भारत में राजनीति एक नया सर्विस सेक्टर बन चुका है जो दोनों केंद्रीय सदनों से लेकर विधान सभा और परिषद तक तकरीबन सात हजार लोगों को राजा-महाराजा जैसी जिंदगी प्रदान करता है। इसलिये इस पेश्ो में आने के लिये प्रत्येक नेता अपने वंशजों को प्रेरित तो करता ही है, बल्कि राजनीति में स्थापित करने के लिये प्रत्येक प्रकार का दांव-पेंच भी इस्तेमाल करता है।
यह भारतीय राजनैतिक व्यवस्था की जागीरदारी प्रथा है। करना सिर्फ इतना है कि चुनावी खर्च का जुगाड़, सत्ता की लहर पर सवार नेताओं की परिक्रमा कर टिकट प्रा’ करना, पांच साल में एक बार मतदाताओं के आगे हाथ जोड़ना। जीत गए तो दोंनो हाथ में लडडू नहीं तो सामाजिक रुतवा तो बढना तय माना जाता है। बाद में लोकतंत्र के नाम पर अपने बच्चों, परिवारीजनों, रिश्तेदारों को लाभ दिलाना अथवा उनको पूरी तरह सेटल कर देना। बहरहाल इस नवजागीरदारी अथवा पोलिटीकल सर्विस सैक्टर का भर्ती आयोग आपके पास है लेकिन आपको भी तो अपने रिश्तेदार का तबादला करवाना है, आपके जो शुभचितक रिश्वत लेते धराए हैं उनकी पैरवी करवानी है, पुलिया बनवाने का ठेका लेना है, आदि अनेक कार्य है भाई। इसके अलावा विद्यालय का उदघाटन, साहित्य सम्म्ोलन के मुख्यअतिथि आदि भी नेता जी को ही बनाना है। दुनिया के जितने आज विकसित देश हैं वहां जनप्रतिनिधियों का निर्माण के ठेके देना, नियुक्ति-तबादला करवाना आदि कार्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में रख दिया गया है। राईट टू इंफार्मेशन का प्रयोग कर जनप्रतिनिधी से जवाब मांगना, पत्र लिखना, ईमेल या उनका घ्ोराव कर अपने वायदों को पूरा करवाना टेढा काम है। गोस्वामी समिति, इंद्रजीत गुप्ता समिति, विधि आयोग आदि कब लागू होगा यह सोचना भर्ती आयोग का काम थोड़े है?



2:21 am

समान नागरिकता संहिता ही एकमात्र समाधान है


मार्कण्डेय पाण्डेय
शाहबानों के बाद अब शायरा बानो अपने अधिकारों को लेकर चर्चा में हैं। शायरा बानो उत्तराखंड की हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर अपने याचिका के कारण शायरा बानो इस समय चर्चा में हैं। उनकी याचिका को गंभीरता से लेते हुए माननीय न्यायालय ने केंद्र सरकार, महिला और बाल विकास मंत्रालय से इस बारे में जबाव भी मांगा है। शायरा ने याचिका के माध्यम से दावा किया था कि तलाक ए बिददत अर्थात तीन बार तलाक कहकर रिश्ता तोड़ लेना साथ ही निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है। याचिका में शायरा कहती हैं कि धर्म और लिंग के आधार पर भारतीय संविधान किसी प्रकार के भ्ोदभाव की इजाजत नहीं देता इसलिये माननीय न्यायाल को मुस्लिम पर्सनल कानून 1937 के सैक्सन दो को तत्काल निरस्त कर देना चाहिए।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक अन्य याचिका में भी मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार और न्याय दिए जाने पर सुनवाई चल रही है। इस सुनवाई के दौरान बेंच ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा कि अब समय काफी बदल गया है और मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने चाहिए साथ ही मुस्लिम पर्सनल ला में भी परिवर्तन जरुरी हो गया है। कुल मिलाकर दोनों ही मामले मुस्लिम महिलाओं के मूल अधिकार, सुरक्षा, मानवाधिकार और नैतिकता से जुड़े हुए हैं। लेकिन आजकल सियासी पार्टियां जिसतरह की राजनीति कर रही हैं, उसमें यह मुददे वोटब्ौंक, सेकुलर-नानसेकुलर और भाजपा-कांग्रेस, केंद्र सरकार ऐसा कर रही है, वैसा कर रही हैं के दांव-पेंच में मामला भटकाया जा सकता है। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि समान नागरिक संहिता लागू करने का मतलब है केंद्र सरकार देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। प्रधानमंत्री आरएसएस की विचारधारा थोप रहे हैं आदि आदि। किंतु संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता की बात कही हैं। यदि संविधान के अनुच्छेद 44 को लागू करना हिंदू राष्ट्र बनाना है तो इसका अर्थ तो यही हुआ कि भारत के संविधान निर्माता ही हिंदू राष्ट्र बनाना ही चाहते रहे होंगे।
क्या एक देश के सभी नागरिकों को समान नियम कानून से संचालित होने का मतलब पांथिक होता है? एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का होना कहां से गलत है? यदि राजनेताओं ने शाहबानों के मामले की तरह इसे भी खीचतान का मामला बनाया तो देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं की समस्या हाशिए पर चली जाएगी। सरकार को चाहिए कि इस मुददे पर मुस्लिम महिलाओं, मुस्लिम विद्बानों और कानून विदों की सलाह लेकर स्थायी और उचित समाधान खोजने का प्रयास करे। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुस्लिम महिलाएं अत्यधिक प्रताड़ना , पारिवारिक उपेक्षा की शिकार हैं और सर्वाधिक तलाक की घटनाओं से उनका जीवन संघर्ष में है।

2:20 am

योजनाबद्ध बना जेएनयू वामपंथ का गढ


मार्कण्डेय पाण्डेय

1966 में भारत सरकार के एक विशेष एक्ट के तहत बना जवाहर लाल नेहरु विवि वामपंथ का गढ़ कैसे बना। पिछड़े जिलों से आने वाले उम्मीदवारों, महिलाओं तथा अन्य कमजोर तबकों को नामांकन में प्राथमिकता दी जाती रही है। कश्मीरी विस्थापितों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों और विधवाओं को भी वरीयता मिलती है। इस प्रकार, वर्षों से जेएनयू आर्थिक व सामाजिक रूप से वंचित तबकों के सबसे उर्वर मस्तिष्क के विद्यार्थियों का गढ़ रहा है। यहां के छात्रों की कमतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि उन्हें वामपंथ के करीब ले आती है। अरावली की श्रृंखला के हरे भरे झुरमुटों में लगभग 1००० एकड़ में बसे इसे पूर्ण अवासीय विश्वविद्यालय ने कभी भी अभिजात तबके को ज्यादा आकर्षित नहीं किया। हॉस्टलों का खान-पान साधारण है और मेस में पानी पीने के लिए ग्लास की जगह जग का इस्तेमाल होता है। विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की मुख्यधारा वामपंथी होने के बावजूद 2००6 के पहले तक यहां आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक रूप से उच्च तबकों का दबदबा था क्योंकि यहां अधिक संख्या इसी तबके से आने वाले विद्यार्थियों की थी। दलितों और आदिवासियों की संख्या उनके लिए आरक्षित अनुपात 22.5 फीसदी तक ही सीमित रह जाती थी। हालांकि यहां वर्ष 1995 से ही ओबीसी विद्यार्थियों को भी नामांकन में वरीयता दी जा रही है, जिसका श्रेय ख्यात छात्र नेता चंद्रशेखर (1964-1997) द्बारा किये गये आंदोलनों को जाता है। लेकिन इसके बावजूद 2००6 तक इस विश्वविद्यालय में सामाजिक रूप से वंचित तबकों की कुल संख्या 28-29 फीसदी से ज्यादा नहीं हो पाती थी। 2००6 में उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित हुई सीटों ने इस तबके को उच्च शिक्षा के प्रति उत्साहित किया।

जेएनयू में सभी विद्यार्थियों को मिलने वाले वजीफे का भी आकर्षण इसके पीछे था। विश्वविद्यालय की वार्षिक रपट (2०13-14) के अनुसार, यहां के 7,677 विद्यार्थियों में से 3,648 दलित बहुजन (1,०58 अनुसूचित जाति, 632 अनुसूचित जनजाति, 1,948 ओबीसी) हैं। अगर हम सीधी भाषा में कहें तो आज विश्वविद्यालय के 5० प्रतिशत विद्यार्थी, गैर-उच्च जातियों के हैं। अगर इसमें 'सामान्य’ कैटेगरी के तहत चुने जाने वाले एससी, एसटी व ओबीसी उम्म्मीदवारों तथा अन्य वंचित सामाजिक समूहों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो ऊँची जातियों व उच्च वर्ग से संबंधित विद्यार्थियों का प्रतिशत नगण्य रह जाएगा।

नतीजा यह है कि पिछले तीन सालों (2०13-14 से) में जवाहरलाल नेहरू विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद पर समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के विद्यार्थी चुने जाते रहे हैं- वी. लेनिन कुमार (2०12), एसएफआई-जेएनयू या डीएसएफ, जो कि तमिलनाडु के ओबीसी थे, अकबर चौधरी (2०13), एआईएसए, जो कि उत्तर प्रदेश निवासी एक मुस्लिम थे और आशुतोष कुमार (2०14) एआईएसए, जो बिहार के यादव हैं। 2०12 में तो जेएनयू छात्र संघ के चारों पद ओबीसी तबके से आने वाले उम्मीदवारों ने ही जीते थे। वर्ष 2०15 में छात्र संघ के चुनाव में विजयी रहे उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी यही बात परिलक्षित होती है। अध्यक्ष - कन्हैया कुमार, एआईएसफ (उच्च हिदू जाति भूमिहार), उपाध्यक्ष- शलेहा रासिद, आइसा (मुसलमान), जनरल सेक्ररेट्री - रामा नागा, आइसा (दलित), ज्वाईंट सेकेरेट्री - सौरभ कुमार शर्मा, एबीवीपी (ओबासी) हैं। गौरतलब है कि जेएनयू छात्र संघ केइस चुनाव में 14 साल बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) का कोई उम्मीदवार जीता है, इस जीत के पीछे स्पष्ट रूप से उसके उम्मीदवार की ओबीसी सामाजिक पृष्ठभूमि भी काम कर रही थी। ध्यातव्य यह भी है कि पिछले साल हुए नामांकनों के बाद जेएनयू में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी की संख्या लगभग 55 फीसदी हो गयी है। जेएनयू में अरबी, परसियन समेत विभिन्न भाषाई कोर्सों में बड़ी संख्या में मुसलमान विद्यार्थी हैं। उनसे संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। अगर उनके साथ अशराफ मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या भी जोड़ दी जाए तो निश्चित ही आज जेएनयू में अद्बिजों संख्या कम से कम 7० फीसदी हो चुकी है। यह भी गौर करें कि 2००6 से 2०15 के बीच जेएनयू में सिर्फ ओबीसी विद्यार्थियों की संख्या 288 से बढ़कर 2434 हो गयी है। यानी पिछले 9 सालों में विवि में ओबीसी छात्रों की संख्या लगभग 1० गुणा बढ़ी है। महिलाओं की संख्या भी काफी बढ़ी है।



1:34 am

काश ! लवकेश मिश्र भी दलित होता


अब संसद में दिए गए स्मृति ईरानी के बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रोहित वेमुला दलित नहीं था। साथ ही आज तेलंगाना पुलिस की रिर्पोट में कहा गया है कि रोहित वेमुला वडेरा जाति से हैं जो कि पिछड़ी जाति में आती है। इस मुददे पर दलित-दलित करके जिसतरह सियासत की गई वह शर्मनाक है। इधर लखनउ में बीटेक के एक छात्र लवकेश मिश्र ने मौत को गले लगा। उसने अपने सोसाईड नोट में एचओडी द्बारा किए जा रहे लगातार उत्पीड़न को कारण बताया है। छात्र का शव उसके कमरे में लटका मिला, जिसे मौके पर पहुंची पुलिस ने उतारा। लवकेश मिश्र ने लिखा कि मै मरना नहीं चाहता लेकिन मै अपने एचओडी दीपक असरानी से तंग आकर जान दे रहा हूं। बहरहाल एचओडी गिरफ्तार हो चुका है और पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही है।
उपरोक्त दो घटनाएं हैं। दोनों ही छात्र हैं, दोनों ने मौत को गल्ो लगाया लेकिन एक छात्र की चर्चा संसद से सड़क तक, अखबार से चैनल तक इसलिए होती रही कि वह तथाकथित दलित था, जो की नहीं था। दूसरे का अपराध यह कि वह सवर्ण कहे जाने वाली जाति में पैदा हुआ। इस प्रकार के दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं क्यों ? क्योंकि सवाल वोटबैंक का है। रोहित की मौत जेएनयू से लेकर हैदराबाद तक, इलाहाबाद से पटना तक और संसद से सड़क तक चर्चा और परिचर्चा का विषय बन गई। अब्बल तो यह कि देश के प्रधानमंत्री को भी लखनउ में कहना पड़ा कि भारत मां का लाल चला गया। दलित वोटबैंक की आड़ में आरक्षण और सामाजिक न्याय के हथियार से राजनैतिक रुप से अल्पसंख्यक हो चुके और दुर्भाग्यवश बिखरे हुए सवर्ण को लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। बेशर्मी की हद तो यह कि राष्ट्रीय चैनलों पर भी बहस और मुबाहिसें इस आधार पर तय किए जा रहे हैं कि मरने वाले की जाति और धर्म क्या था।
दलित विमर्श के नाम पर देश और समाज को तोड़ने वाले सक्रिय हैं। जगह-जगह पर जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक तनाव, अलगाववादी आंदोलन, आतंकी गतिविधियां पूरे सामाजिक तानेबाने को छिन्नभिन्न तो कर रही हैं। जाति का जहर घोलते राजनेता, तथाकथित दलित चिंतक और कुछ मीडियाकर्मी माहौल को और अधिक विषाक्त बना रहे हैं। आखिर कमजोर वर्ग कौन है? सिर्फ वही नहीं जो अपने पर किए जा रहे आघात का प्रतिकार नहीं कर पा रहा है बल्कि इस आघात के प्रति सचेत होता हुआ भी नहीं दिखता। पंद्रह फीसदी का यह अलग-थलग पड़ा हुआ समाज दुत्कारा जाता है क्यों ? इस पंद्रह फीसदी का क्या योगदान है देश के विकास और यहां की जीडीपी में? देश के लिये बलिदान देने और सीमाओं की रक्षा में? अब यदि देश की प्रतिभाओं को मरने, कुण्ठित और उप्ोक्षित बनाए रखना है तो सबसे सहज और कारगर उपाय यही है कि देश के नाभि केंद्र पर हमला जारी रखो।



1:31 am

घुटनों के बल चलना है तो बात ही खत्म


मार्कण्डेय पाण्डेय
बात शुरु करते हैं कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी के उपन्यास जय सोमनाथ से जो ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। जगत विख्यात सोमनाथ मंदिर का होने वाला मुख्यपुजारी और परम भटटारक गुरुदेव का पटशिष्य शिवराशि की चर्चा करेगें। शिवराशि अत्यंत विद्बान था और मुख्यपुजारी होने वाला था लेकिन जल्दबाजी और महत्वाकांक्षा अंदर कहीं धधक रही थी। जब गजनी ने सोमनाथ पर हमला किया तो राजा भीमदेव को परास्त करने के लिए शिवराशि ने गजनी को शिवलिंग का गोपनीय मार्ग दिखा दिया। वह एक गोपनीय सुरंग का मार्ग था जिसकी जानकारी सिर्फ मुख्यपुजारी या उसके शिष्य को हुआ करती थी। ईरान के गजनी प्रांत से आया हुआ लूटेरा महमूद गजनी बाबा सोमनाथ तक पहुंचने में कामयाब हुआ। उसने सबसे पहले शिवलिंग पर प्रहार किया और वहीं तत्काल ही शिवराशि को कुत्ते की मौत मार डाला। भारतीय समाज को इतिहास के ऐसे नाजुक मोड़ पर हमेशा ही शिवराशियों, मीरजाफरों, जयचंदो, मानसिहों ने छला है। क्यों ? क्योंकि छोटी सी कुर्सी, वैभव, आराम और सम्मान की कामना उनको देशद्रोही बनाती रही है।
लंबी लड़ाई लड़नी है तो छोटी-छोटी पराजयों को ठोकर मारकर दूर करना होगा। पठानकोट हमला बिना किसी शिवराशि या मीरजाफर के संभव हो सकता है, ऐसा सोचना कठिन है। लेकिन हार मानकर बैठ जाना ठीक नहीं है। देश के रक्षामंत्री मनोहर पणिक्कर का बयान इस समय सुर्खियों में है कि भारत को दर्द देने वाले को भी दर्द का एहसास होना चाहिए। यह दर्द कब और कहां होगा यह हम तय करेंगे। सच कहा गया है कि सठे साठयम समाचरेत अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही उसको सही मार्ग पर आने को बाध्य कर सकता है। अब यह तय कर लिजिए कि आप घुटनों के बल चलेगें तो बात ही खत्म हो जाती है। इतिहास को देखें तो हजारों सालों से भारतीय समाज हर प्रकार के आघात और हमलों को बर्दास्त करता रहा है। यदि हम पराजित हुए तो अपने शौर्य में कमी के कारण नहीं बल्कि अपने घर में बैठे जयचंदो, मानसिहों, और शिवराशियों के विश्वासघात से पराजित हुए। फिर भी चुप नहीं बैठे और युद्ध जारी रखा। अगर कोई कमी रही तो सिर्फ इतना ही कि दुश्मनों को उनकी खोह तक घुसकर उनका पीछा करके उनका सर्वनाश नहीं किया। दुश्मन जैसे ही दयनीय हालत में आया हम पृथ्वीराज चौहान बनकर माफ कर दिए और वहीं दुश्मन दुबारा आघात करता रहा। हमने मार खाया तो इसलिए क्यों कि युद्ध प्रत्यक्ष नहीं, सीधा नहीं बल्कि दगाबाजी, लूट-खसोट, बर्बरता और नपुंसक तरीके से किए गए हमलों पर आधारित था। आज भी गजनी का हमला वैसा ही हो रहा है। जरुरत इतिहास से सबक लेने की है। गिरते हैं सहसवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले। हां अगर देश को घुटनों के बल चलना है तो बात ही खत्म।


1:28 am

सब सरकार करेगी तो आप क्या करोगे ?


मार्कण्डेय पाण्डेय
एक बंदर के हाथ से शकरकंद छूटकर तालाब में गिर गया। पानी से धूलकर वह साफ हो गया और बंदर को उसका स्वाद अच्छा लगने लगा। अब आगे से वह शकरकंद को धूलकर खाने लगा। उसकी नकल करके सभी बंदर शकरकंद धूलकर खाने लगे। स्वामी जी कहा करते थ्ो कि परिवर्तन की पहल खुद से करीए।
अब एक घटना की चर्चा करते हैं। एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में समाचार छपा कि चलती हुई टàेन में बच्चा डायपर गीला होने से परेशान थ। उस बच्चे के पिता ने रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु को टवीट किया और रेल को रोककर, रेलमंत्रालय ने डायपर पहुंचाया। एकतरफ तो यह सुनने में अच्छा लगता है कि हमारी सरकार और सार्वजनिक व्यवस्था कितनी त्वरित और सेवाभावी हो रही है। किंतु सवाल है कि रेलयात्रियों की अनाप-शनाप मांगों के आगे रेलवे का टवीटर हैण्डिल कितने दिनों तक चल पाएगा? आखिर उस रेलयात्री ने घर से चलते समय डायपर लेकर क्यों नहीं यात्रा आरंभ की ? उसके लापरवाही के कारण उस रेल में सफर कर रहे हजारों लोगों को जो दिक्कत हुई उसकी जबावदेही कौन लेगा? हजारों यात्रियों का जो समय बर्बाद हुआ उसके लिये कौन जिम्मेदार है? क्या रेलवे को ऐसी आपातकालीन सुविधा प्रदान करते समय अतिरिक्त शुल्क नहीं लेना चाहिए? बेवजह परेशान करने वाले यात्रियों और सुविधाओं का दुरुपयोग करने वालों को सजा नहीं दी जानी चाहिए?
ऐसी मानसिकता के लोग आज लाखों में नहीं करोड़ों में हैं। जिनको सार्वजनिक व्यवस्था की परवाह नहीं होती, ऐसे लोग ही सार्वजनिक व्यवस्था और नियमों की धज्जियां भी उड़ाते हैं। हर चीज को अपने सुविधानुसार इस्तेमाल करना इनकी बपौती होती है। बाद में टेàन लेट है, व्यवस्था खराब है आदि की शिकायत भी यही लोग करते हैं। हमारे अंदर कितनी एकांतिकता, कितना स्वार्थ और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति कितनी लापरवाही आ चुकी है। कुछ दिनों पूर्व एक और समाचार था कि मुम्बई में एक लड़की ने अपने पुरुष मित्र को फोन करके कहा कि मुझसे बात करो, अगर व्यस्त हो तब भी बात करो नहीं तो मै सामने एक छोटी सी दुकान है, उस दुकान को अपने कार से उड़ा दूंगी। जब लड़की के पुरुष मित्र ने बात नहीं किया तो उसने उस खोखे जैसी छोटी सी दुकान को कार की टक्कर से गिरा दिया। एक निर्दोष गरीब दुकानदार उस अमीरजादी के गुस्से का शिकार हुआ। ये वो लोग हैं जो बचपन से युवावस्था तक मिनी स्कर्ट पहनकर टीवी पर बूगी-बूगी देखते हैं और आधुनिकता और वैश्वीकरण की बाजी जीत लेने का भ्रम पाल लेते हैं। ये वे लोग हैं जो मानते हैं भगतसिंह और साधु-संयासी विवेकानंद पड़ोसी के यहां जन्म लें। जो चाहते हैं कि मेरा पति, भाई या बेटा मोटी कमाई करें और साथ ही भ्रष्टाचार पर तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी करते हैं। यदि आपको स्वच्छ और पारदर्शी विधि-व्यवस्था चाहिये तो पहले खुद को बदलिए। आईये हम भी पहले शकरकंद को धूलकर खाना आरंभ करें। खुद से पहल करें यही सबसे बड़ी देशसेवा है।

1:27 am

हम क्यों नहीं सम्हालते अपनी विरासत


मार्कण्डेय पाण्डेय
आज दो महत्वपूर्ण बातें हैं जो देश के वसीयत और विरासत से संबंधित है। आगामी फरवरी माह में दिल्ली में विंटेज कारों की रेस होने वाली है, जिसमें सौ से डेढ सौ वर्ष पुरानी का कारों का प्रदर्शन होगा। तो दूसरी ओर 1953 से चालू हुई एचएमटी घड़िया बनाने की फैक्टàी अब बंद होने जा रही है। कभी एचएमटी घड़ियों का श्रीगण्ोश जवाहर लाल नेहरु ने किया था किंतु लंबे अरसे से एचएमटी घाटे में चल रही थी और सरकार का मानना है कि अब इनका पुनरुद्धार नहीं हो सकता इसलिये बंद करना पड़ रहा है।
अमूमन हम अपनी विरासत को लेकर उदासीन होते हैं और एक आमधारणा बन चुकी है कि जो पुराना है वह आउटडेटेड को चुका है। आजकल सामाजिक परिवर्तन के नाम पर सभी पुरानी बातों का त्याग करन्ो का चलन बढ गया है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन को सबकुछ त्याग कर देने के अर्थ में लेना ही मूर्खतापूणã है। दुनियां में थोड़ा हम नजर दौड़ाए तो कुछ अलग ही दिखाई देता है। दमिश्क के पुराने बाजार गत ढाई हजार सालों से आज भी अस्तित्व में हैं। समय के साथ बिकने वाली वस्तुएं बदली हैं किंतु आज भी बाजार वैसा का वैसा ही है। प्रसिद्ध उम्मायुद मस्जिद यहीं पर हैं। आज भी इस स्थान पर दो-ढाई हजार साल पुरानी मस्जिद और चर्च को संरक्षित रखा गया है। इटली का फैब्रीयानों कागज पूरी दुनियां में मशहूर है। दुनियां का प्रसिद्ध चित्रकार मायकल एंजेलों फैब्रीयानों की दुकान से ही कागज खरीदता था। आज यूरो मुद्रा की छपाई भी इसी कागज पर होती है। जबकि इस दुकान की स्थापना 1264 में हुई थी, पीढियां बदलती गई, अनेक शाखांए फैब्रीयानों ने खोल दिया लेकिन आज भी वह मूल दुकान वैसे ही चल रही है। हमारे यहां यदि कोई मकान 4०-5० साल पुराना हो गया तो उसे किसी बिल्डर को बेचकर पैसा बनाने की सोच है।
लंदन में आक्सफोर्ड और कैब्रीज विश्वविद्यालय आज भी पांच सौ सालों से चले आ रहे हैं लेकिन हमने नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों को खो दिया। वह काल के प्रवाह में मिट गए। हम अपना गौरवशाली अतीत भूल गए। राजस्थान और रायगढ के तमाम किले अब होटल बन गये हैं। अपने अतीत की तमाम दुर्लभ खजाने को हम अनदेखा करते हैं। सौ साल नहीं बीते गुरुवर रविन्द्र नाथ ठाकुर का निधन हुए लेकिन हमने शांति निकेतन की दुर्दशा कर दी। हमें मैक्डोलाल्ड, कोकाकोला, हॉलीवुड और बालीवुड में आनंद और गौरव होता है। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता में रमने का मन नहीं करता। कारण ? राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कमी और कुछ नहीं।

1:26 am

मीडिया के वैचारिक आरडीएक्स का भारत पर हमला

मार्कण्डेय पाण्डेय
कुछ साल पूर्व स्टार टीवी पर महात्मा गांधी को बास्टर्ड बनिया कहा गया था। सीएनएन और बीबीसी कहता रहा भारत के कब्जे वाला कश्मीर। लेकिन भारत की मीडिया ने कभी नहीं कहा ब्रिटीश कब्जे वाला आयरलैंड। हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का झूठा बयान छापने के कारण आउटलुक पत्रिका को मांफी मांगनी पड़ी थी। अब इस पत्रिका का ताजा अंक फिर से विवाद पैदा करने वाला है। पत्रिका के अंग्रेजी संस्करण के आवरण पृष्ठ पर केंद्रीय एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी का संसद में बोलते हुए चित्र दिया गया है और नीचे लिखा है-सूडो नेशनलिस्ट। पत्रिका ने फैसला सुना दिया है कि नेशनलिस्ट और सूडो नेशनलिस्ट अथवा एंटीनेशनलिस्ट क्या होता है। कुछ दिनों पूर्व प्रख्यात स्तंभकार स्वपÝ दासगुप्ता ने कहा था कि नेशनल मीडिया को अहसास होना चाहिए कि राजधानी नई दिल्ली की खबरें देने से राष्ट्र की रिपोर्टिंग नहीं हो जाती। इसके लिये व्यापक चिंता के विषय लेने होंगे। हमारे चौथ्ो स्तंभ के मनमाना रवैये और पूर्वाग्रह ग्रस्त समाचारों से आजिज आए एक केंद्रीय मंत्री को प्रेस्टीटयूट शब्द तक प्रयोग करना पड़ा। जिस तरह इलेक्टàानिक चैनलों ने सहिष्णुता, अखलाक, रोहित बेमुला, जेएनयू आदि के मुददे पर एकतरफा ढोल पीटा उससे कई सवाल सहज ही खड़े होते दिखने लगे हैं।
संसद में एक नेता ने कहा कि यदि सरकार ने संविधान संशोधन की जुर्रत की तो रक्तपात होगा। मीडिया को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आया। बल्कि एक नेता ने इस बयान को बिलकुल उचित ठहराया और आजतक चैनल की एंकर चुप्पी साधकर मौन समर्थन देती रही। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हाल ही में कहा कि हिंदी बोलने वाले नेताओं की पार्टी को आसाम मेें घुसने नहीं देंगे और मीडिया ने मौन साध लिया। इक्का-दुक्का अखबारों ने कहीं अंदर के पेज पर एक कालम की खबर दे दी। वहीं उत्तराखंड के कांग्रेस नेता और मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जब कहा कि गाय को मारने वाले को हिंदुस्थान में रहने का हक नहीं है तो सेकुलर जमात ने फौरन डैमेज कंटàोल शुरु कर दिया। जबकि यही बयान हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने दिया तो मीडिया में फक्क से पेटàोल की आग लग गई। आमीर खान के असहिष्णुता संबंधी बयान को मीडिया ने भरपूर उछाला तो वहीं रबीना टंडन के बयान कि कोई असहिष्णुता नहीं है को दबा दिया गया। बल्कि रबीना टंडन प्रगतिशील मीडिया का कोपभाजन बनी और चहुंओर हायतौबा मच गया। उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान ने एक बलात्कार पीड़ित महिला के लिये अशोभनीय टिप्पणी की लेकिन चैनलों को सांप सूंघ गया और चुप्पीमार कर बैठे रहे। इन हालातों में यदि मीडिया की विश्वसनीयता कम होती जा रही है तो इसमें आश्चर्य कैसा?
कुछ दिनों पूर्व एबीपी चैनल के राष्ट्रीय संवाददाता गला फाड़-फाड़ चिल्ला रहे थ्ो कि यह देखिये यहां बैनर पर लिखा है कि अब राष्ट्रधर्म की बारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अटल जी ने कहा था कि आप राष्ट्रधर्म का पालन करें लेकिन वह नहीं किए। इस संवाददाता को राज्यधर्म और राष्ट्रधर्म के मध्य जमीन आसमान का फर्क पता ही नहीं है। यदि पता है तो वह छीपा रहे हैं। एक और उदाहरण आजतक चैनल पर जिसतरह एक केंद्रीय मंत्री पर पूर्व प्रायोजित प्रश्नों की बौछार कर नीचा दिखाने का असफल प्रयास किया गया जिसके बाद वहां पुलिस बुलानी पड़ी, वह भारत में पत्रकारिता के इतिहास की एक शर्मनाक घटना के रुप मेें दर्ज हुई।



1:24 am

गुरुग्राम माडर्न बने, वेस्टर्न नहीं - मार्कण्डेय पाण्डेय


अमेरिका जब ब्रिटीश उपनिवेश के चंगुल से मुक्त हुआ तो सबसे पहला काम किया कि अमेरिका में चलने वाले हर ब्रिटीश नामो-निशान को मिटाना शुरु किया। हर ब्रिटीश प्रचलन, नाम और तरीकों को बदलना आरंभ किया हांलाकि इसकी जरुरत नहीं थी। फिर भी उसने किसी की परवाह नहीं कि और कहा कि अब हम आजाद हैं। उन्होंने अपनी अंग्रेजी भाषा को अमेरिकन कहा, तमाम हिज्ज्ो, बोलने का तरीका, स्पेलिंग आदि को भी बदल दिया। सड़क किनारे पैदल चलने वाली जिस जगह को अंग्रेज फुटपाथ कहा था उसे उन्होंने फुटवे कहना शुरु कर दिया। मशीनों के स्टार्ट होने वाले बटन से लेकर बिजली के स्वीच तक अदल-बदल किया। नाप तौल के पैमाने बदले, व्यापार का तरीका बदला और कहा जिसे हमसे व्यापार करना होगा उसे हमारे तौर-तरीके अपनाने होंगे।
ग्ररुग्राम नाम बदलने से अब फिर से एकबार बहस छिड़ गई है- नाम में क्या रखा है? गुरुग्राम नाम रखने से वह शहर कहीं खो न जाए जहां बड़े-बड़े कारपोरेट हब, शापिंग मॉल्स, भव्य ईमारते और लग्जरी जिंदगी है। एक तर्क यह भी है कि भाजपा सरकार इस तरह के संस्कृत नाम रखकर भगवाकरण कर रही है। आरोप-प्रत्यारोप और सुझावों का दौर जारी है। लेकिन आईये इन आरोपों, आशंकाओं की पड़ताल करते हैं कि क्या वास्तव में यह भगवाकरण है? अथवा इससे विकास की जिस रफ्तार पर यह शहर दौड़ रहा था वह धीमी पड़ जाएगी?
कानपुर शहर जिसे पूरब का मानच्ोस्टर कहा जाता था, अपने सूती कपड़ों, चमड़े के सामान आदि के लिये जो शहर दुनिया में मशहूर था, लाल इमली का नाम किसने नहीं सुना होगा। आज भी उस शहर का नाम कई औपनिवेशिक ईमारतों पर आपको कावनपोरे पढ़ने को मिल जाएगा। कहा जाता है कि महाभारत कालीन योद्धा कर्ण की कुटिया यहीं पर हुआ करती थी जिसके कारण कर्णपुर को अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार कावनपोरे किया फिर देश को आजादी मिलने के बाद इसे कानपुर कर दिया गया। आज भी एक बड़ी आबादी है जो मांग करती है कि कानपुर को कल्याणपुर कर देना चाहिए। यदि हम इतिहास को देखे तो मुगल काल से लेकर औपनिवेशिक काल तक शहरों और स्थानों के नाम तत्कालीन शासकों ने अपनी सुविधा, वर्तनी और उच्चारण के अनुसार बदले हैं।
आजादी मिलने के बाद सर्वप्रथम जब भाषाई आधार पर राज्यों के पुर्नगठन अथवा निर्माण की मांग की जाने लगी तब 1956 में राज्य पुर्नगठन आयोग ने कई नामों में परिवर्तन शुरु किए जैसे मद्रास को चैन्नई, त्रावणकोर को केरल किया गया। इसीप्रकार मध्य भारत मध्यप्रदेश हुआ, मैसूर कर्नाटक के नाम से जाना जाने लगा। कलकत्ता कोलकाता हुआ, बाम्बे मुंबई के रुप में तो पूना पूण्ो के रुप में अपनी पहचान कायम करने लगा। वास्तव में इसमें कोई दो राय नहीं कि क्ष्ोत्रीय पहचान और भारतीय संस्कृति को बरकार रखने वाले नाम होने ही चाहिए।
ऐतिहासिक कारण
गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम करने के पीछे धार्मिक से अधिक सांस्कृतिक कारण बताए जाते हैं। लंबे अरसे से यहां के निवासियों, सामाजिक संगठनो, राजनैतिक कार्यकर्ताओं की यह लंबित मांग थी। महाभारत युद्ध के समय के शस्त्रों के प्रशिक्षण देने वाले गुरु द्रोणाचार्य की यह भूमि मानी जाती है। अगर ठोस रुप से कहें तो सरकार की मंशा सिर्फ इतना ही है गुरुग्राम नाम बदलने में जो आज भी गुरुग्राम नाम से एक गांव जाना जाता है। अब इस पूरे जिले को ही गुरुग्राम नाम दे दिया गया है। गुड़गांव से पहले यमुनानगर में मुस्तफाबाद हुआ करता था, जहां सरस्वती नदी का उदगम माना जाता है। कुछ साल पहले उस नगर का नाम मुस्तफाबाद से बदलकर सरस्वतीनगर कर दिया गया है।
यह बिलकुल सत्य है कि गुरुग्राम के आसपास महाभारत कालीन अनेक स्थल आज भी विद्यमान है जैसे खाण्डसा स्थान कभी खाण्डववन हुआ करता था। यह वही स्थान है जहां एकलव्य तीरंदाजी का अभ्यास किया करते थ्ो। इसके अलावा झाडसा, सोहना, पटौदी ये सभी स्थान ऐसे हैं जहां आपको महाभारतकालीन अवश्ोष, चिन्ह आदि आज भी दिखाई दे जाएेंगे।
द्रोणाचार्य और एकलव्य को लेकर छिड़ गई है बहस
राष्ट्रीय राजधानी का अंग होने और साईबर सिटी के साथ ही महाभारत कालीन स्थान होने के कारण गुड़गांव से गुरुग्राम नाम को लेकर बहस राष्ट्रीय स्तर पर तेज हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर आपसी बहस मुबाहिसों में लोग खुलकर अपनी राय प्रगट कर रहे हैं। ऐसे में इसे सिर्फ गुड़गांव तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा।
योगेंद्र बाजपेई कहते हैं कि गुरु द्रोणाचार्य शस्त्र कला के मर्मज्ञ तो थ्ो किंतु वह अच्छे इंसान अथवा गुरु नहीं थ्ो। उन्होन्ो एकलब्य को लेकर जो किया उसने उनके पूरे किरदार को कलंकित कर दिया। इसके अलावा वह अधर्म की ओर से लड़ने के लिए युद्ध में भाग लिए। तो वहीं वरिष्ठ पुलिस अधिकारी युगुल किशोर तिवारी कहते हैं कि यदि द्रोणाचार्य ने एकलब्य का अंगुठा नहीं लिया होता तो निसंदेह ही एकलब्य कर्ण की तरह ही दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करता और उसे पराजय का सामना करना पड़ता। सिविल सेवा के अधिकारी शशि चर्तुवेदी कहते हैं कि एक तरह से एकलब्य ने बौद्धिक सम्पदा अधिकार का उलंघन और चोरी किया था। जिस पर सामान्य दंड उसे मिला। उसने अपना अपराध भी स्वीकार कर लिया था जिसके कारण सहज ही अपना अगूंठा काट कर दे दिया नहीं तो उस समय के दंड विधान में हाथ काट लेने अथवा मृत्यु दंड का भी विधान हो सकता था। नारद स्मृति के हवाले से वह कहते हैं कि ब्राम्हण यदि झूठ बोले तो उसे सर्वाधिक कठोर दंड का विधान किया गया था। इसीप्रकार भाजपा के नेता वैभव त्रिपाठी, प्रशासनिक अधिकारी अरविंद राय और अम्बुजा सिंमेंट के अधिकारी अजीत सिंह अपनी राय और दावे के साथ गुरुग्राम के पक्ष या विपक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
कहां पर होगें बदलाव
जहां भी गुड़गांव लिखा जाता है वहां अब गुरुग्राम लिखना होगा। रेलवे से लेकर गुड़गांव एक्सप्रेस वे, गुड़गांव हाईवे सहित बैंकों, थानों और सरकारी ईमारतो पर नाम बदले जाएगें। सरकारी कागजों, पर्ची, मुहर, स्टेशनरी और दुकानों के साईनबोर्ड से लेकर मल्टी नेशनल के बेवसाईट आदि पर भी गुरुग्राम लिखना ही पड़ेगा।


शनिवार, 16 जनवरी 2016

2:45 am

हम क्यों नहीं सम्हालते अपनी विरासत

आज दो महत्वपूर्ण बातें हैं जो देश के वसीयत और विरासत से संबंधित है। आगामी फरवरी माह में दिल्ली में विंटेज कारों की रेस होने वाली है, जिसमें सौ से डेढ सौ वर्ष पुरानी का कारों का प्रदर्शन होगा। तो दूसरी ओर 1953 से चालू हुई एचएमटी घड़िया बनाने की फैक्टàी अब बंद होने जा रही है। कभी एचएमटी घड़ियों का श्रीगण्ोश जवाहर लाल नेहरु ने किया था किंतु लंबे अरसे से एचएमटी घाटे में चल रही थी और सरकार का मानना है कि अब इनका पुनरुद्धार नहीं हो सकता इसलिये बंद करना पड़ रहा है।
अमूमन हम अपनी विरासत को लेकर उदासीन होते हैं और एक आमधारणा बन चुकी है कि जो पुराना है वह आउटडेटेड को चुका है। आजकल सामाजिक परिवर्तन के नाम पर सभी पुरानी बातों का त्याग करन्ो का चलन बढ गया है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन को सबकुछ त्याग कर देने के अर्थ में लेना ही मूर्खतापूणã है। दुनियां में थोड़ा हम नजर दौड़ाए तो कुछ अलग ही दिखाई देता है। दमिश्क के पुराने बाजार गत ढाई हजार सालों से आज भी अस्तित्व में हैं। समय के साथ बिकने वाली वस्तुएं बदली हैं किंतु आज भी बाजार वैसा का वैसा ही है। प्रसिद्ध उम्मायुद मस्जिद यहीं पर हैं। आज भी इस स्थान पर दो-ढाई हजार साल पुरानी मस्जिद और चर्च को संरक्षित रखा गया है। इटली का फैब्रीयानों कागज पूरी दुनियां में मशहूर है। दुनियां का प्रसिद्ध चित्रकार मायकल एंजेलों फैब्रीयानों की दुकान से ही कागज खरीदता था। आज यूरो मुद्रा की छपाई भी इसी कागज पर होती है। जबकि इस दुकान की स्थापना 1264 में हुई थी, पीढियां बदलती गई, अनेक शाखांए फैब्रीयानों ने खोल दिया लेकिन आज भी वह मूल दुकान वैसे ही चल रही है। हमारे यहां यदि कोई मकान 4०-5० साल पुराना हो गया तो उसे किसी बिल्डर को बेचकर पैसा बनाने की सोच है।
लंदन में आक्सफोर्ड और कैब्रीज विश्वविद्यालय आज भी पांच सौ सालों से चले आ रहे हैं लेकिन हमने नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों को खो दिया। वह काल के प्रवाह में मिट गए। हम अपना गौरवशाली अतीत भूल गए। राजस्थान और रायगढ के तमाम किले अब होटल बन गये हैं। अपने अतीत की तमाम दुर्लभ खजाने को हम अनदेखा करते हैं। सौ साल नहीं बीते गुरुवर रविन्द्र नाथ ठाकुर का निधन हुए लेकिन हमने शांति निकेतन की दुर्दशा कर दी। हमें मैक्डोलाल्ड, कोकाकोला, हॉलीवुड और बालीवुड में आनंद और गौरव होता है। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता में रमने का मन नहीं करता। कारण ? राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कमी और कुछ नहीं।
मार्कण्डेय पाण्डेय

2:43 am

चौथी औद्यौगिक क्रांति के लिये हम कितने तैयार हैं

सबसे पहले तो सिक्कीम मणिपाल विश्वविद्यालय के छात्रों को हार्दिक बधाई। मणिपाल विवि के छात्रों ने सौर उर्जा से चलने वाली कार का निर्माण सफलतापूर्वक किया है। इससे पहले हम सौर उर्जा के लिये सोलर लाईट, सोलर कूकर, सोलर लैंप आदि से अधिक नहीं आगे बढ पाये थ्ो। हांलाकि कुछ प्रदेशों और शहरों में सौर उर्जा से विद्युत सप्लाई के यदा-कदा प्रयास भी दिखाई देने लगे हैं। दुनियां में जिन देशों को सर्वाधिक सौर उर्जा प्रा’ है, उनमें भारत का भी एक स्थान है किंतु इस क्ष्ोत्र में आज भी हम अपेक्षित प्रयास करते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं।
सौर उर्जा से चलने वाला यात्री विमान आगामी दिसंबर माह में नई दि“ी के अंतरराष्ट्रीय हवाई अडडे पर प्रदर्शन के लिये उतरेगा। यह विमान सौर उर्जा से चलने वाला विश्व का पहला विमान होगा। स्वीटरजरलैंड में सबसे पहले इस विमान की निर्माता कंपनी सोलर इम्पल्स ने जब इसे तैयार किया तो राईट बंधुओं के पहले विमान की याद तााजा हो गई। यह सोलर एयरोप्लेन शुरुआत म्ों काफी धीमी गति से उड़ान भर रहा था लेकिन वैज्ञानिकों ने दावा किया कि जल्दी ही आधुनिक विमानों की रफतार यह पकड़ लेगा। मजे की बात यह कि भूगोल की दृष्टि से विचार करें तो स्वीटरजरलैंड हो या नार्वे इन देशों को सबसे कम सौर उर्जा प्रा’ है। दूसरी तरफ रतन टाटा के नैनो कार की बात छोड़ दें तो चीन के एक उद्योगपति ने नैनो सीमेंट तैयार किया है जो आज के सीमेंट से पचास गुना कम कीमत और पांच गुना अधिक शक्तिशाली माना जा रहा है। आज दुनियां में नैनो टेकÝालाजी और सौर उर्जा विश्व के औद्यौगिक परिदृश्य में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। मणिपाल विवि के छात्रों का यह प्रयास भारत के लिये छोटा कदम लेकिन भविष्य की लंबी छंलाग साबित हो सकता है।
आज दुनियां चौथी औद्यौगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी है जो नैनो टैकÝनालाजी और सोलर उर्जा को लेकर होने वाला है। पहली औद्यौगिक क्रांति 178० से 18०० में जब हुई तो भारत में राजा-महाराजा ब्रिटीश हूकूमत का चहेता बनने के लिये आपस में प्रतिस्पर्धा में मशगूल थ्ो। अंग्रेज के सामने चापलूसी करना और झोली फैलाने में ही उनका बडप्पन था। यह वह दौर था जब कोयले की भांप से इंजन चलने लगे और नदियों को व्यापार के तौर पर इस्तेमाल की पहल शुरु हुई। हकीकत में दुनियां के समस्त उत्पादन में तब भी यूरोप का हिस्सा महज 1० फीसदी ही था जबकि भारत चीन नेतृत्व की भूमिका में थ्ो। दूसरी औद्यौगिक क्रांति 186० से 19०० के दौरान हुई और जिस किसी भारतीय ने विज्ञान पर सोचना आरंभ किया, उद्योग और व्यापार पर कदम बढाया उसे अंग्रेजो ने पकड़कर अंडमान की जेल में ठूंस दिया या फिर उन खोजों की भ्रूण हत्या कर दी गई। मैकाले मॉडल आफ एजुकेशन ने हमेशा प्रयास किया कि भारतीय युवक क्लर्क बनते रहें ज्यादा योग्यता न दिखाएं। इस समय यूरोप में बिजली, पेट्रोल, डीजल के उपकरण बनने लगे थ्ो। रेलवे से लेकर समुद्री यातायात का जाल बिछने लगा लेकिन भारत के हाथ परतंत्रता की जंजीर से बंध्ो रहे। तीसरी औद्यौगिक क्रांति 1979 से 2००० के दौरान घटित हुई और दुनियां में कम्यूटर, टेलिफोन, मोबाईल फोन, इंटरनेट का संजाल बिछने लगा। भारतीय युवकों ने तेजी से इस क्ष्ोत्र में कदम बढाये लेकिन नवीन शोध के अभाव में भारतीय युवा गूगल और माईक्रोसाफट जैसी कंपनियों में सस्ता मजदूर बनने को विवश हुआ।
यदि भारत अपनी पहली औद्यौगिक क्रांति करता तो 178० से हजार साल पहले 499 में ही कर सकता था। जब आर्यभटट ने कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्क र लगाती है, इसके अलावा आर्यभटट ने गणित के क्ष्ोत्र में महत्वपूर्ण शोध किया। कापरनिकस इसके हजार साल बाद पैदा हुआ। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र लिखा, मेडिकल साईंस और सर्जरी के क्ष्ोत्र में चरक, सुश्रुत पातंजली आदि वैज्ञानिक काम कर रहे थ्ो लेकिन आज भी हम यह विचार नहीं करते कि प्रथम औद्यौगिक क्रांति भारत में क्यों नहीं हुई। विदेशी और गुलाम मानसिकता के कारण हम रिकार्डो, एडम स्मिथ, माल्थस और कींस को पढते हैं। आर्यभटट और वाराहमीहिर के बजाये कापरनिकस और पाईथागोरस को तोते की तरह रटते हैं। राष्ट्रीय अस्मिता को भूलकर विदेशी संगीतकारों की धून पर नाचना ही हमारी राष्ट्रीय नीयति बन चुकी है। हम अभिश’ है।
दुनियां का चित्र और चरित्र बदलने के लिये जीवशास्त्र और भौतिक शास्त्र के घोड़ों की लगाम कसी जा चुकी है तो दूसरी तरफ अंतिम महायुद्ध दुनिया को खत्म भी कर सकता है। 11 सिंतबर 2००1 को अमेरिका पर अलकायदा का हमला हुआ और उसने सारी दुनिया का ध्यान आतंक पर केंद्रीत किया। अमेरिका में ही क्रेग हेंटर की प्रयोगशाल में कृत्रिम जीव बनाने का प्रयोग शुरु हुआ। तरह-तरह के प्राणियों के पेशियों को मिलाकर महाकाय जीव जो अलकायदा जैसे हमलों का जबाव हो सकता है। ब्रिटेन और अन्य देश भी इस क्ष्ोत्र में तेजी से लगे और मनुष्य स्वयं परमेश्वर बनने की ओर अग्रसर हो गया। लेकिन इस तरह के जीव स्वयं उसके अपने देश और निर्माता का भी विनाश कर सकते हैं यह मानते हुए ब्रिटेन की संसद ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। दूसरे देशों ने भी यही किया। भारत में उद्योगपति क्रीम, पाउडर, फेसवास से अधिक इलेक्ट्रानिक सुविधाभोगी सामानों के निर्माण तक पहुंच पाये हैं। वही भारत की जनता हिंदी, गैरहिंदी, जातिवाद, भाषावाद में उलझी है। फिल्म वालों के जन्मदिन मनाने, क्रिकेट मैच, विदेशी चियर लिडर्स को निहारने, मोमबतियां जलाने से अधिक सोच नहीं पाती। हमारी राजसत्ता अधिक से अधिक वोट कैसे हासिल हों और हमारी सरकार अक्षुण्य कायम रहे इसके लिये तरह-तरह के प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं। जनता, सरकार और समाचार जगत भी घोटाले से लेकर भ्रष्टाचार और नेताओं के मूर्ति अनावरण में अधिक रस लेते हैं।
हमें सौर शक्ति, पवन उर्जा, नैनो टेकÝालाजी और जीववैज्ञानिक के साथ ही चिकित्सा के क्ष्ोत्र में कदम बढाने होंगे। चिकित्सा क्ष्ोत्र में सिर्फ धन कमाने वाले डाक्टरों के उत्पादन से आगे बढकर नये शोध पर काम करने वाल्ो लोगों को तैयार करना होगा। सरकार आम जनता और कारपोरेट के सहयोग से नवीन शोधों पर आधारित प्रयोगशालाएं और कारखाने खोलने होंगे जिससे नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ स्वरोजगार को भी प्रोत्साहन मिलेगा। भारत और उसका कोई राज्य यदि दुनिया की प्रयोगशाला बनना चाहे तो उद्यमियों को नवीन शोध से अरबों डॉलर की आमदनी हो सकती है। लाखों लोगों को नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इनमें से अधिकांश शोध केंद्र यदि ग्रामीण क्ष्ोत्रों में स्थापित किये जाये तो गांवा से शहरों की तरफ पलायन की प्रवृति को भी रोका जा सकता है। इसके लिये अपने परंपरागत श्ौक्षणिक संस्थाओं की पुर्नरचना करके विज्ञान के नये आयामों और प्रौद्योगिकी पर कार्य करना होगा। दुनिया भर में जो नये शोध हो रहे हैं वही आगे चलकर विश्व की दशा और दिशा तय करने वालें होगें और यदि भारत को इस स्पर्धा में आगे आना है तो इच्छा शक्ति के अलावा और कोई बाधा नहीं है।
मार्कण्डेय पाण्डेय


2:41 am

कहां थे और कहां आ गये हैं हम

आखिर इस गणतंत्र ने हमको क्या दिया ? क्या खोया ? क्या पाया ? गणतंत्र के 68 बरस बीत जाने के बाद पीछे मुडकर सोचने की इच्छा स्वाभाविक रुप से होती है। नियति के साथ जो मिलन हुआ था, जो सपने देखे थे, जो अरमान संजाये थे, क्या वह पूरे हुए ? किसी भी देा की समस्याएं उस देा की पहचान नहीं होती बल्कि उन समस्याओं से मुक्त होने की जददोजहद ही उस देा की वास्तविक पहचान होती है। लगभग 1947 का ही कालखंड था जब पचिम के राजनैतिक विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि भारत अपनी आजादी को अक्षुण्य नहीं रख पायेगा। भारत जल्दी ही टुकडे-टुकडो में बंट जायेगा। भारत लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था को संभाल नहीं पायेगा। गत छह दाकों में आजादी का हमारा पन्ना कहीं सफेद तो कहीं स्याह, तो कहीं स्वर्णिम तो कहीं रक्तिम भी रहा है। बावजूद इसके गत 68 सालों में यदि आपात-काल को छोड दें तो भारत का लोकतंत्र पूरी दुनियां के सामने रोल मॉडल बनता जा रहा है।
निसंदेह आजाद भारत की यह सबसे बडी उपलब्धि है- हमारा लोकतंत्र। हमारी आजादी ही नहीं, हमारा गणतंत्र भी सफल और शानदार रहा है। लेकिन इसके साथ ही स्याह पक्ष यह भी है कि आज भी अंग्रेजी जमाने के 34 हजार कानून और विभिन्न विभाग चलाये जा रहे हैं। 1813 में विल्वर फोर्स कहता है कि अगर कंपनी का माल भारत के गांव-गांव में पहुंचाना है तो मुक्त व्यापार करना होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ तोडनी होगी। यही साल था 1813, जब ब्रिटीा सरकार चार्टर फॉर फ्री टेàड बिल लागू करती है। इस चार्टर में पहला कानून यह होता है कि ब्रिटेन से आये हुए माल पर कोई भी ट्रैक्स हिंदुस्थान के अंदर नहीं लगेगा। जबकि भारतीय माल पर विभिन्न प्रकार के टैàक्स लागू करने के लिये सेंट्रल एक्साईज, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स, आक्ट्राय और टोल टैक्स लगा दिया गया। इसी साल भारतीय माल पर टैक्स और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढè तोड़ने के लिये इन पांचों टैक्स के साथ पांच प्रकार के विभाग भी खोल दिये गये जो आज भी बदस्तूर जारी है।
इतिहास का अघ्ययन करें तो पता चलता है कि 184० में प्रमुख अर्थाास्त्री विलियम एडम अपनी रिर्पोट में कहता है कि पूरी दुनियां में जो व्यापार है, उसमें अकेले भारत का हिस्सा 33 फीसदी है जबकि आजादी के 68 साल बीतने के बाद भी हमारा व्यापार एक फीसदी के आसपास ठहरा हुआ है। 2 फरवरी 1833 को ब्रिटेन की संसद में लार्ड मैकाले कहता है कि मै 17 साल भारत में रहा, इस दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों में जाने का मौका मिला लेकिन मैने एक भी बेरोजगार या भीख मांगने वाला एक भी आदमी को नहीं देखा। अपने इसी संसदीय बहस में वह कहता है कि भारत में 36 प्रकार के उद्योग हैं और जितनी भी जरुरत के सामान हैं वह सब भारत उत्पादन करता है। मद्रास प्रेसिडेंसी का गर्वनर थामस मूनरों भी बाद में ब्रिटेन की संसद में यही बात दोहराता है कि भारत में टेक्नालाजी इतने उन्नत प्रकार की है कि आप यकीन नहीं करेंगे वहां एक अंगूठी में से पूरा एक थान कपड़ा निकाला जा सकता है, वे भारतीय लोग इतना बारीक कपड़े की बुनाई करते हैं।
यह तो रहा हमारा इतिहास और आज हम कहां खडें हैं। भारत के साथ ही दुनियां के कई और भी देा आजाद हुए और आज वह कहां है, हम कहां खडे हैं। देा को आजादी मिले 68 साल से ज्यादे हो गये। कुछ क्षेत्रों में हमने बहुत प्रगति की है। चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी के अणु खोजने में कामयाबी हासिल किया है तो हमारे प्रधानमंत्री को विकसित देाों के जी-2० में सम्मान के साथ शामिल किया गया है। हमारे उद्योगपतियों ने विदेाों में तमाम कारखाने और उद्योगों को खरीद लिया है। इसके बावजूद सामान्य आदमी भ्रष्टाचार से पीड़ित है, किसान आत्महत्या कर रहा है, छोटे उद्योग से लेकर छोटे व्यापारी आयकर और आबकारी अधिकारियों के लालफिताााही से परेाान है। बैंक से कर्ज प्राप्ति में अडंगा और दलाली की रकम देना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी विकट हाल है। महानगरों में झोपडियों और अवैध कालानियों की भरमार अकेले राजधानी दिल्ली की बात करें तो 895 अवैध कालोनियां विकास के दावों की हवा निकाल रही हैं, पानी बिजली का संकट अलग से, गरीबी रेखा, बेरोजगारी, बीमारी आदि की चर्चा तो होती ही रहती है।
मुटठीभर आतंकी आते हैं और भारतीय सुरक्षा बलों से तीन दिन मुकाबला करते हैं। ताज ओबेराय पर हमले होते हैं, संसद पर हमला होता है, अक्षरधाम पर होता है और हम उसी वक्त आवाज उठाते हैं। दो दिन मोमबत्ती जलाते हैं, कुछ दिन बाद भूल जाते हैं और अगले साल आतंकी फिर तैयारी से आते हैं। वैविक स्तर पर मात्र 3०-4० वर्ष पूर्व विव के अनेक देा भारत से काफी पीछे थे। दरिद्रता और अपराध, पिछड़ापन से त्रस्त थे, वे आज हमसे काफी आगे निकल चुके हैं। उनकी गरीबी समाप्त हो गई, औसत आय हमसे 15 से 2० गुना ज्यादे हो गई। सिर्फ आर्थिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों में, राजनैतिक परिपक्वता में, स्वास्थय और ािक्षा में, पर्यावरण से लेकर कल्चरल डेवलपमेंट तक वह हमसे काफी आगे निकलते हुए दिखाई पडते हैं। उनकी यह संपन्नता सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों के गरीब से गरीब के आंसू पोछने वाली है। यह सब कैसे हुआ ?
यह सब कैसे संभव उन्होंने कर दिखाया ? हमें आत्मनिरीक्षण की आवयक्ता है। हांलाकि सिंगापुर एक छोटा सा देा है लेकिन वह भी कभी अभावों और बेरोजगारी से जूझता हुआ देा था। वहां के राजनैतिक नेताओं ने सूझबूझ से देा के विकास की नीतियां तैयार की और सामान्यजन के अंदर नेानल टीम की भावना को जगाया आज सिंगापुर विकसित देा है। चलिये इस छोटे से देा की बात न भी करें तो भारत की तरह ही जातिय और धार्मिक विविधताओं से भरा हुआ देा मलेािया भी भारत जैसे संकटों का सामना कर रहा था। यदि 199० के मलेािया को देखें तो आज के भारत जैसा ही था लेकिन इसी दौरान डॉ महाथिर मोहम्मद वहां के प्रधानमंत्री हुए। सत्ता में आते ही देावासियों के मन में बीज बोया कि आगामी 2०2० तक मलेािया को विव के अग्रणी देाों में शामिल करना है। संकल्प और सूझबूझ के साथ कार्य ने सरकार और जनता के परस्पर सहयोग ने आज मलेािया की पूरी तवीर ही बदल दी है।
एक कहावत है कि भारतीय घरों में कभी सोने के कलेउ हुआ करते थे। यहां की समपन्नता, उपजाउ भूमि, अनूकूल पर्यावरण सारी दुनियां के लोगों के लिये ईष्याã का कारण हुआ करता था। आजादी के 68 साल के बाद भी और उदारीकरण की अर्थव्यवस्था स्वीकार किये हुए भी आज हम सफल नहीं हो पा रहे हैं। आखिर क्या कारण है। इसका एकमेव कारण है कि हमे और हमारे राजनैतिक नेतत्व को किस दिाा में आगे बढना है यही ज्ञात नहीं है। आजादी के बाद पंडित नेहरु ने बांधों, स्टील फैक्टियों, इंजिनियरिंग संस्थानों के निर्माण पर जोर दिया। इंदिरा गांधी ने गांव-गांव तक बैंकों का जाल बिछाया, हरित क्रांति को प्रोत्साहन दिया। राजीव गांधी ने कम्प्यूटर और परिवहन पर जोर दिया। नरसिंम्ह राव जी के कार्यकाल में मुक्त अर्थव्यवस्था लागू की गई। देा तेजी से आगे बढा। अटलबिहारी बाजपेई के कार्यकाल में ग्राम सड़क योजना से गांवों को जोड़ने, शहरों को गांवों में लाने का कार्य तेजी से हुआ। डॉ मनमोहन सिंह जी ने रोजगार, किसान की कर्ज माफी, सूचना का अधिकार, ग्रामीण विकास की तमाम योजनाएं चलाई। तमाम प्रयासों के बाद भी आज देा में कुल आबादी का 95 फीसदी हिस्सा अभावों, संकटों में जूझ रहा है। संसाधनों के 95 फीसदी हिस्से पर 5 फीसदी लोगों का कब्जा है क्यों ? आईये इस गणतंत्र पर इसी सवाल का उत्तर खोजें।
मार्कण्डेय पाण्डेय



2:38 am

आर्थिक-मंदी, मंदी नहीं आर्थिक अपराध है

भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर ने सरकार को चेतावनी दी है कि दुनिया एक और आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ी है। वास्तव में पश्चिमी जगत का यह धूर्ततापूणã जानबूझकर की गई कार्रवाई होती है, कृत्रिम रुप से अर्थिक मंदी को निर्माण करना। यह एकतरह से उनका मानवता के प्रति आर्थिक अपराध है। उनकी समाज रचना और अर्थिक चिंतन व्यक्ति आधारित है, उनके सोशल कांट्रेक्ट थियरी के अनुसार सभी बातों के लिये मैन इज द मेजर आफ एवरिथिंग अर्थात मनुष्य ही सभी चीजों का मापदंड है। भारतीय चिंतन परंपरा वैश्चिक संदर्भो में सोचती रही है इसलिये सर्वे भवंतु सुखिन: का विचार प्रभावी रहा है।
हमारे यहां प्रत्येक मनुष्य के मन में अंटू द लास्ट का विचार रहता है और अत्योंदय की संस्कृति रही है। भारतीय परंपरागत विचार यह है कि देश में जितनी वस्तुएं हैं, जितनी सुविधाएं हैं वह सभी मिलाकर हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में द बास्केट आफ गुड्स एंड सर्विसेज कहा गया। पश्चिम का विचार है कि देश में जो वस्तुएं और सेवायें मौजूद है, उसका जो बाजार भाव है वही राष्ट्रीय संपत्ति है। तो फिर अंतर कहां आ जाता है मान लिजिये हमारे देश में सौ गिलास निर्माण हुए जिनमें प्रत्येक का मूल्य यदि हम दस रुपया मान लें तो एक हजार रुपया पश्चिम के विचार से हमारी राष्ट्रीय आय हो गई। जबकि भारतीय आर्थिक चिंतन परंपरा में इसे हम राष्ट्रीय संपत्ति कहेंगे। अब यह मान लें कि अगले साल हमने सौ के बजाये दो सौ गिलास साथ में प्लेट भी बना दिया। अधिक उत्पादन के कारण मूल्य घटकर दस के बजाये पांच रुपया हो गया तो बाजार में दो सौ गिलास जाने पर उतना ही पैसा मिलेगा तो पश्चिम के अर्थशास्त्री इसे राष्ट्रीय आय की स्थिर अवस्था कहेगें जबकि भारतीय आर्थिक चिंतन में इसे राष्ट्रीय संपत्ति का दुगुना हो जाना माना जाता है। इसमें एक बात और दो सौ गिलास के उत्पादन पर प्रत्येक गिलास का मूल्य पांच के बजाये चार रुपया हुआ तो वह सौ रुपये की राष्ट्रीय आय का कम हो जाने का रोना भी रोयेंगे। उनके जीडीपी और जीएनपी का नियम अंर्तविरोधों से भरा हुआ है।
जैसा कि वह मूल्य को ही जोड़ते हैं, संपत्ति अथवा आय को नहीं जोड़ते। कल तक जिस महिला को उसका नियोजक घरेलू कार्य के लिये पांच सौ रुपये का वेतन देता था और रुपये की परिभाषा में यह पांच सौ रुपया राष्ट्रीय आय की गणना में गिना जाता है, वही जब वह महिला उस नियोजक की पत्नी हो जाती है तो उसका घरेलू कार्य और पश्चिम की अर्थ चिंतन का घालमेल हो जाता है कि अब इसको राष्ट्रीय आय में कैसे जोड़े। भारत में रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं की अत्यधिक मात्रा पैदा हो और उसकी उपल्बधता विकास के पायदान पर सबसे नीचे खड़े व्यक्ति तक हो इसतरह का सिद्धांत रहा है। सौ हाथों से इक्टठा करके हजार हाथों में बांट दो शतहस्त समाहर, सहत्रहस्त संकिर लेकिन इस चिंतन से व्यक्ति केंद्रीत भोगवादी समाज का कोई लेना देना नहीं है। व्यक्तिवाद पर टिका हुआ उनका दर्शन इसे स्वीकार नहीं करता क्यों कि इसमें व्यक्ति के बजाये सर्वे भवंतु सुखिन: का विचार आता है।
जब अर्थचिंतन ऐसा हो जाता है कि मेरी आमदनी ही बढ़नी चाहिये बाकी समाज से क्या लेना-देना तो सबके सुख की अवधारणा तिरोहित हो जाती है। उनकी अर्थव्यवस्था के केंद्र में बाजार आ जाता है जबकि भारत में परिवार, इसलिये वसुधा को कुटुंब मानकर विचार किया जाता है। मुनाफे की सोच के कारण ही पश्चिम में 192०-3० के आर्थिक मंदी के दौरान कंटàाइव्ड स्कारसिटी पैदा करने के लिये उत्पादन की विपुल मात्रा को जलाने के साथ ही समुद्र में डूबो देने की घटनाएं हुई थी। ताकी वस्तुओं का अभाव कायम रहे और मूल्यों का उच्च स्तर बना रहने से कमाई होती रहे। इसे ही वैश्विक आर्थिक मंदी कहकर प्रचारित किया गया जो मानवता के खिलाफ आर्थिक अपराध है। दुर्भाग्यवश गत 1०० सालों से यही अर्थशास्त्र हमारे स्कूलों कॉलेजों में हमें रटाया गया। साथ ही नेहरुवियन मॉडल आफ एजूकेशन हमें स्कारसिटी की अर्थव्यवस्था को पढ़ाता-समझाता रहा है। इसके पीछे औपनिवेशिक घृणित मानसिकता कायम रहती है कि तीसरी और चौथी दुनिया के देशों को उभरने नहीं देना है। इसके लिये वह तरह-तरह की कलाबाजियां दिखाते है मसलन अर्थशास्त्र के नये नियम बनाना, अपने फायदे के लिये आर्थिक संस्थाओं आईएमएफ, डब्लूटीओ, वर्ड बैंक जैसी संस्थाओं को खड़े करना, तीसरी और चौथी दुनिया के देशों में एनजीओं को फंडिग करना और उनसे विकास विरोधी आंदोलन चलवाना, पुरानी पड़ चुकी टेकÝालाजी और मशीनों को पूंजी निवेश के नाम पर इन विकासशील देशों के गले मढ़ना, तरह-तरह के शोध और हयूमन इंडेक्स बनाकर इन देशों को नीचा दिखाते हुए अपनी शर्तो को मानने पर बाध्य करना आदि कार्य किये जाते हैं।
अगर इन विकसित देशों का इतिहास देखें तो उनकी समृद्धी उपनिवेशों के शोषण पर आधारित थी। द्बितीय विश्वयुद्ध के बाद इन नवस्वतंत्र देशों में जागरुकता और देशभक्ति की भावना जैसे-जैसे आती गई इनका शोषण विकसित देशों को मुश्किल लगने लगा। द्बितीय विश्वयुद्ध के बाद के इन देशों को ही तीसरी दुनिया के देश कहा गया और इनका शोषण वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मानते रहे हैं। साम्राज्यवादी जानते थ्ो कि पैसे की ताकत से हम सरकार चलाने वालों को भी खरीद सकते हैं, उन्हें अपने अनुसार नितियां निर्माण करने के लिये भी बाध्य कर सकते हैं। परंतु कई बार वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत सरकारें इन विकसित देशों की चाल सफल नहीे होने देती। द्बितीय विश्वयुद्ध के पश्चात जापान के सारे उद्योग-धंध्ो नष्ट हो गये लेकिन वहां की सरकार और जनता ने बिना किसी के झांसे में आये संकल्प लेकर अपना पुर्ननिर्माण किया जब कि हमारे यहां अधिक से अधिक उपभोग और सत्ता सुख प्रा’ करने वाले शासक आते रहे। 1965 में पाकिस्तान के साथ भारत का नहर पानी का बंटवारा कौन भूल सकता है जो विश्व बैंक के दबाव में किया गया। इसतरह के अनेक समझौते और फैसले भारत ही नहीं दुनिया की कई सरकारों ने किया है जो अंर्तराष्ट्रीय दबावों में होता रहा है। अपना मुनाफा कैसे बढे इसके लिये वह हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते रहे हैं। विदेशी पूंजी निवेश के नाम पर पुरानी और रददी हो चुकी टेकÝालाजी को विकासशील देशों के गले मढना और इसे विदेशी पूंजी निवेश के नाम से प्रचारित करने का धोखा भी होता रहा है। यही कारण रहा है कि बहुतेरे देश आज भी डैब्ट टàैप से डैथ टàेप अर्थात कर्ज से मौत के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं और पश्चिम की चालाकियों को न समझ पाने के कारण कर्जदार लगातार बनते जा रहे हैं। उनका पूरा अर्थशास्त्र ही बेईमानी और ठगी का शास्त्र है।
इसलिये अब हमें यह समझना होगा कि विपुलता की अर्थव्यवस्था ठीक है या जानबूझकर अभाव और अकाल पैदा करने वाली चालाकियों का धंधा? हमें सोचना होगा कि व्यक्तिगत लाभ केंद्रीत अर्थरचना ठीक है या मानवमात्र को लाभ देने वाली सर्वे संतु निरामया की अर्थचिंतन की प्राचीन भारतीय चिंतनधारा ?
-मार्कण्डेय पाण्डेय

2:33 am

असामाजिक और अन्याय भी हो गया है मंडल कमीशन

गुजरात में आरक्षण की रैली और उसके बाद हो रहे बवाल को लेकर चारों ओर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरक्षण अब राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल हो रहा है। मंडल कमीशन ने जो सामाजिक न्याय का बीज बोया वह अब असामाजिक ही नहीं अन्याय भी बनाता जा रहा है। 1982 से शुरु हुई हंटर कमीशन की रिर्पोट के बाद इस आरक्षण प्रणाली का 1932 में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता कायम रखने के लिये बखूबी इस्तेमाल किया और साम्प्रदायिक बंटवारे के लिये प्रयोग किया। दलित और गैर दलितों में समाज का विभाजन का बीज डालना आरंभ किया। महात्मा गांधी ने कड़ा विरोध तो किया लेकिन बाद में डॉ अंबेदकर के आगे समझौते को तैयार हो गये। आरक्षण की लड़ाई में संविधान सभा में एक वोट की कमी से आरक्षण प्रस्ताव पारित नहीं होने पर डॉ अंबदेकर के सामने अनूसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति को आरक्षण दिये जाने का गंभीर सवाल खड़ा हो गया और वे धारा 1० में संशोधन करने में कामयाब रहे जिसका परिणााम हुआ आरक्षण।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और श्ौक्षणित रुप से पिछड़ों के लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन शर्त यह है कि यह साबित किया जा सके कि वह औरों के मुकाबले सामाजिक और श्ौक्षणिक रुप से पिछड़े हैं। संविधान लागू होने के बाद आगामी दस सालों के लिये महज 22 5 फीसदी आरक्षण लागू किया गया। अनुसृचित जाति के लिये 15 फिसदी और अनुसूचित जनजाति के लिये 7 5 फिसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। धीरे-धीरे इसे खत्म करने के बजाये 1993 में मंडल कमीशन की रिर्पोट के आधार पर इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया। और 22 5 के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फिसदी आरक्षण और दिया गया।
मार्कण्डेय पाण्डेय

2:25 am

आखिर हम कब समझेंगें पूर्वोत्तर का दर्द?

नार्थ-ईस्ट की एक महिला की तबियत खराब होने पर गुड़गांव के अस्पताल में भर्ती हो गई। लेकिन उसे अनुमान नहीं था कि अस्पताल का बिल इतना आ जायेगा जिसे वह चुका नहीं पायेगी। अस्पताल प्रबंधन ने उस बीमार महिला से पैसे के एवज में अस्पताल में झाड़Ô लगवाया और वाशरुम तक साफ करवाया। आये दिन इस तरह के समाचार मिलते रहते हैं। यह कटु सत्य है कि पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भ्ोदभाव, हिंसा और परायापन का व्यवहार किया जाता है। आखिर पूर्वोत्तर के चेहरे हमें क्यों नहीं अपने चेहरे लगते? इतिहास को खंगालें तो भारत और भारतीयता पर सबसे पहला दावा इन्हीं जनजातियों का बनता है। पिछले दिनों नार्थ-ईस्ट में अरुणांचल के दोईमुख विश्वविद्यालय में जाने का अवसर मिला था। रास्तें में जब भी हम किसी से पूछते हाउ मेनी किलोमीटर दोईमुख? तो जबाव मिलता-अरे! आपको दोईमुख जाना है, तो सीधा जाईये न। हम लोग शर्मिंदा हो जाते थ्ो कि हम लोग हिंदीभाषी होकर अंग्रेजी में पूछते हैं जबकि ये लोग गैरहिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी में उत्तर देते हैं। आसाम के नौगांव से चलकर अरुणाचल में प्रवेश बंदरमंदिर से ही जगह-जगह ऐसा ही अनुभव रहा। ईटानगर से थोड़ा आगे दोईमुख रोनो हिल्स पर अवस्थित राजीव गांधी केंद्रीय विवि में हिंदी विभाग में सबसे पहले वहां प्रोफेसर श्री ओकेन लेगो जी से मुलाकात हुई, जो मूलत: अरुणाचल के ही निवासी हैं। स्वागत के बाद हिंदी विभाग से निकलने वाली स्मारिका उन्होंने भ्ोंट की और बताया कि अरुणाचल में हिंदी प्रचार-प्रसार की कोई एक भी संस्था नहीं है। इस बारे में केंद्र की सरकारों ने आज तक कुछ भी नहीं किया है।
हिंदी के प्रचार-प्रसार से बात आगे बढ़ी तो नॉर्थ-ईस्ट का दर्द छलक पड़ा। अरुणाचल की 54 जनजातियों का दर्द, सरकार की उपेक्षा और सबसे बड़ा अपने ही भारतवंशियों के आगे 'अजनबी’, 'पराया’ और 'चिंकी’ कहलाने का दर्द भी छलक पड़ा। पूर्वोत्तर की ये जनजातियां अपने को गर्व से रामायण और महाभारत का वंशज मानती हैं और आज भी परंपराओं को जिंदा किये हुए हैं। मिजो-मिश्मी नाम की जनजाति खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुकमणी का वंशज मानती है। अरुणांचल के लोगों की माने तो रुकमणी भीष्मकनगर की रहने वाली थीं। महाभारत में भी उल्लेख है कि रुकमणी के पिता का नाम भीष्मक और भाई रुकमंद था। महाभारत के अनुसार जब श्रीकृष्ण रुकमणी का अपहरण करने गये तो भाई रुकमंद ने विरोध किया और युद्ध हुआ। पराजय के समय रुकमंद का वध न करने के अनुरोध पर दंड स्वरुप कृष्ण ने रुकमंद का मुंडन मिलिट्री स्टाईल हेयरकट जैसा अपने सुदर्शन चक्र से करके छोड़ दिया था। आज भी मिजो-मिश्मी जनजाति के पुरुष ऐसा ही हेयर स्टाइल रखते हैं।
गुवाहाटी से शिलांग फिर चेरापूंजी जाते समय पहाड़ी रास्तों के किनारे आपको बूढ़ी महिलायें और बच्च्ो आधा-एक किलो कच्ची सुपारी जमीन पर गमछा बिछाकर बेचते मिल जाएंगे। दाम भी कोई निश्चित नहीं है। एक टुकड़ा सुपारी के लिये आप जो दें देंगे वह खुशी से ले लेंगी। दोईमुख विश्वविद्यालय में ही हिंदी के प्रोफेसर डॉ. विश्वजीत मिश्र बताते हैं कि यदि इनको नमक भी खरीदना होता है तो 18 से 2० किमी पैदल पहाड़ी रास्तों पर चलकर जाना होता है। तबीयत खराब हो जाने पर दूर-दूर तक पहाड़ों में और पहाड़ के गांवों में न तो कोई डॉक्टर है न ही अस्पताल की कोई व्यवस्था है। इन पहाड़ों पर खेती योग्य भूमि है ही नहीं। आसाम के चाय बागानों को छोड़ दें तो पूरा नॉर्थ-ईस्ट आखिर करे तो क्या करें? बड़े पैमाने पर मांसाहार का बड़ा कारण यह भी है। मेघालय में खासी-जयंतिया जनजाति की आबादी कुल 13 लाख के आसपास होगी। तीरंदाजी कला में बिलकुल दक्ष यह जनजाति आज भी तीरंदाजी में अंगूठे का प्रयोग नहीं करती, क्यों? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनमें से शायद ही कोई हो जो एकलव्य का नाम भी जानता हो, लेकिन इन सभी को पता है कि उनके किसी पूर्वज ने अपना अंगूठा गुरुदेव को दान कर दिया था। इसलिये अंगूठे का प्रयोग पाप है।
हिडिम्बापुर जी हां! नागालैण्ड का दीमापुर। भीम की पत्नी हिंडिम्बा यहीं की रहने वाली थी और आज भी हिमाशा जनजाति अपने को हिंडिम्बा का वंशज मानती है। भीम का बाहुबली पुत्र घटोत्कच जिन गोटियों से शतरंज खेलता था, वह राजबाड़ी की बड़ी-बड़ी गोटियां आज भी पर्यटकों के कौतूहल का विषय हैं। असम के बोडो जनजाति गर्व से खुद को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का वंशज मानती हैं। जबकि पहाड़ों पर रहने वाली कार्बी-आबलांग सुग्रीव को अपना पूर्वज मानते हैं। मणिपुर के उखरुल जिले का असली नाम उलूपीकुल है, जो अर्जुन की पत्नी उलूपी से जोड़ा जाता है। यह बिलकुल म्यांमार की सीमा से जुड़ा हुआ भारतीय जिला है। मणिपुर का मैत्रेयी समाज अपने को अर्जुन के ससुराल पक्ष का मानता है, क्योंकि उनकी पत्नी चिंत्रांगदा यहीं की थी। आज एनएससीएन अलगावादी गुट के 4० फीसदी से अधिक सदस्य ताखुंल जनजाति से हैं जो मार्शल आर्ट में बेजोड़ मानी जाने वाली जनजाति है।
भारत के ये खांटी वंशज आज ईसाईयत के पंजे में छटपटा रहे हैं। पहाड़ी गांव जहां खाने-पहनने को कुछ नहीं, उनको दो अदद साड़ी, सिरदर्द या पेटदर्द की चार टेबलेट और युवकों को शराब की एक बोतल थमाकर भी ईसाई बना दिया गया। पहाड़ी गांवों में बीच-बीच में लकड़ी के पान की गुमटीनुमा चर्च हर एक-दो किमी पर दिख जाते, लेकिन मेरी निगाहें ढूंढती रही कि कोई मंदिर भी है क्या? मै इस पूरी यात्रा में तलाश करता रहा कि सेवा का दावा करने वाले वे संगठन और संस्थाओं का कोई चिन्ह, पदचिन्ह दिखता है क्या? कोई एनजीओ सा सामाजिक संस्थान के निशान मिलते हैं क्या ? मेरी निराशा को दूर किया एकमात्र रामकृष्ण सेवा मिशन ने, जो लगभग पांच हजार फिट की उंचाई पर चेरापूंजी में स्थित है। वहां मौजूद एक संयासी ने बताया कि यह विश्व में सर्वाधिक उंचाई पर स्थित रामकृष्ण सेवा मिशन का केंद्र है। चारों तरफ एकदम सन्नाटा, बादलों में पानी की फुहारें के बीच हम आश्रम के अंदर गये तो सबसे पहले ही पुस्तक बिक्री केंद्र पर पहुंचे। वहां मौजूद गेरुआधारी संयासियों ने बताया कि आप इन पुस्तकों को अवश्य ले लीजिये, ये नई तो हैं ही, बल्कि इन पर सब्सिडी भी है। इसके अलावा जनजाति बच्चों के बनाये हुए कुछ हस्तशिल्प, दस्ताने, गमछे और टोपियां खरीदी गई। इनसे जो मुनाफा होगा उससे आश्रम में रहने वाले जनजाति के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई हो सकेगी।
पूर्वोत्तर जिसे पूरब का स्वीटजरलैण्ड, देवताओं की भूमि कहा जाता है, वह अभाव, दरिद्रता और संसधानों की कमी से सिसक रहा है। आजादी के सात दशक होने को आये, लेकिन आज भी पूर्वोत्तर अलग-थलग सा दिखता है। इसका अनुचित लाभ ईसाई मिशनरियां उठाती रही हैं। इन्होंने न केवल धर्म बदलवाया, बल्कि संस्कृति, रहन-सहन भी बदलवाया। मातृ प्रधान यहां का समाज आखिर कब तक अनाथ रहेगा? कबतक हम उन्हें पराया मानकर दुत्कारते रहेंगे और राष्ट्रीय एकता-अखंडता का दोहरा चरित्र जीते रहेंगे ? आखिर कब समझेंगे हम पूर्वोत्तर का दर्द ?
-मार्कण्डेय पाण्डेय