चौथी औद्यौगिक क्रांति के लिये हम कितने तैयार हैं

सबसे पहले तो सिक्कीम मणिपाल विश्वविद्यालय के छात्रों को हार्दिक बधाई। मणिपाल विवि के छात्रों ने सौर उर्जा से चलने वाली कार का निर्माण सफलतापूर्वक किया है। इससे पहले हम सौर उर्जा के लिये सोलर लाईट, सोलर कूकर, सोलर लैंप आदि से अधिक नहीं आगे बढ पाये थ्ो। हांलाकि कुछ प्रदेशों और शहरों में सौर उर्जा से विद्युत सप्लाई के यदा-कदा प्रयास भी दिखाई देने लगे हैं। दुनियां में जिन देशों को सर्वाधिक सौर उर्जा प्रा’ है, उनमें भारत का भी एक स्थान है किंतु इस क्ष्ोत्र में आज भी हम अपेक्षित प्रयास करते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं।
सौर उर्जा से चलने वाला यात्री विमान आगामी दिसंबर माह में नई दि“ी के अंतरराष्ट्रीय हवाई अडडे पर प्रदर्शन के लिये उतरेगा। यह विमान सौर उर्जा से चलने वाला विश्व का पहला विमान होगा। स्वीटरजरलैंड में सबसे पहले इस विमान की निर्माता कंपनी सोलर इम्पल्स ने जब इसे तैयार किया तो राईट बंधुओं के पहले विमान की याद तााजा हो गई। यह सोलर एयरोप्लेन शुरुआत म्ों काफी धीमी गति से उड़ान भर रहा था लेकिन वैज्ञानिकों ने दावा किया कि जल्दी ही आधुनिक विमानों की रफतार यह पकड़ लेगा। मजे की बात यह कि भूगोल की दृष्टि से विचार करें तो स्वीटरजरलैंड हो या नार्वे इन देशों को सबसे कम सौर उर्जा प्रा’ है। दूसरी तरफ रतन टाटा के नैनो कार की बात छोड़ दें तो चीन के एक उद्योगपति ने नैनो सीमेंट तैयार किया है जो आज के सीमेंट से पचास गुना कम कीमत और पांच गुना अधिक शक्तिशाली माना जा रहा है। आज दुनियां में नैनो टेकÝालाजी और सौर उर्जा विश्व के औद्यौगिक परिदृश्य में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। मणिपाल विवि के छात्रों का यह प्रयास भारत के लिये छोटा कदम लेकिन भविष्य की लंबी छंलाग साबित हो सकता है।
आज दुनियां चौथी औद्यौगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी है जो नैनो टैकÝनालाजी और सोलर उर्जा को लेकर होने वाला है। पहली औद्यौगिक क्रांति 178० से 18०० में जब हुई तो भारत में राजा-महाराजा ब्रिटीश हूकूमत का चहेता बनने के लिये आपस में प्रतिस्पर्धा में मशगूल थ्ो। अंग्रेज के सामने चापलूसी करना और झोली फैलाने में ही उनका बडप्पन था। यह वह दौर था जब कोयले की भांप से इंजन चलने लगे और नदियों को व्यापार के तौर पर इस्तेमाल की पहल शुरु हुई। हकीकत में दुनियां के समस्त उत्पादन में तब भी यूरोप का हिस्सा महज 1० फीसदी ही था जबकि भारत चीन नेतृत्व की भूमिका में थ्ो। दूसरी औद्यौगिक क्रांति 186० से 19०० के दौरान हुई और जिस किसी भारतीय ने विज्ञान पर सोचना आरंभ किया, उद्योग और व्यापार पर कदम बढाया उसे अंग्रेजो ने पकड़कर अंडमान की जेल में ठूंस दिया या फिर उन खोजों की भ्रूण हत्या कर दी गई। मैकाले मॉडल आफ एजुकेशन ने हमेशा प्रयास किया कि भारतीय युवक क्लर्क बनते रहें ज्यादा योग्यता न दिखाएं। इस समय यूरोप में बिजली, पेट्रोल, डीजल के उपकरण बनने लगे थ्ो। रेलवे से लेकर समुद्री यातायात का जाल बिछने लगा लेकिन भारत के हाथ परतंत्रता की जंजीर से बंध्ो रहे। तीसरी औद्यौगिक क्रांति 1979 से 2००० के दौरान घटित हुई और दुनियां में कम्यूटर, टेलिफोन, मोबाईल फोन, इंटरनेट का संजाल बिछने लगा। भारतीय युवकों ने तेजी से इस क्ष्ोत्र में कदम बढाये लेकिन नवीन शोध के अभाव में भारतीय युवा गूगल और माईक्रोसाफट जैसी कंपनियों में सस्ता मजदूर बनने को विवश हुआ।
यदि भारत अपनी पहली औद्यौगिक क्रांति करता तो 178० से हजार साल पहले 499 में ही कर सकता था। जब आर्यभटट ने कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्क र लगाती है, इसके अलावा आर्यभटट ने गणित के क्ष्ोत्र में महत्वपूर्ण शोध किया। कापरनिकस इसके हजार साल बाद पैदा हुआ। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र लिखा, मेडिकल साईंस और सर्जरी के क्ष्ोत्र में चरक, सुश्रुत पातंजली आदि वैज्ञानिक काम कर रहे थ्ो लेकिन आज भी हम यह विचार नहीं करते कि प्रथम औद्यौगिक क्रांति भारत में क्यों नहीं हुई। विदेशी और गुलाम मानसिकता के कारण हम रिकार्डो, एडम स्मिथ, माल्थस और कींस को पढते हैं। आर्यभटट और वाराहमीहिर के बजाये कापरनिकस और पाईथागोरस को तोते की तरह रटते हैं। राष्ट्रीय अस्मिता को भूलकर विदेशी संगीतकारों की धून पर नाचना ही हमारी राष्ट्रीय नीयति बन चुकी है। हम अभिश’ है।
दुनियां का चित्र और चरित्र बदलने के लिये जीवशास्त्र और भौतिक शास्त्र के घोड़ों की लगाम कसी जा चुकी है तो दूसरी तरफ अंतिम महायुद्ध दुनिया को खत्म भी कर सकता है। 11 सिंतबर 2००1 को अमेरिका पर अलकायदा का हमला हुआ और उसने सारी दुनिया का ध्यान आतंक पर केंद्रीत किया। अमेरिका में ही क्रेग हेंटर की प्रयोगशाल में कृत्रिम जीव बनाने का प्रयोग शुरु हुआ। तरह-तरह के प्राणियों के पेशियों को मिलाकर महाकाय जीव जो अलकायदा जैसे हमलों का जबाव हो सकता है। ब्रिटेन और अन्य देश भी इस क्ष्ोत्र में तेजी से लगे और मनुष्य स्वयं परमेश्वर बनने की ओर अग्रसर हो गया। लेकिन इस तरह के जीव स्वयं उसके अपने देश और निर्माता का भी विनाश कर सकते हैं यह मानते हुए ब्रिटेन की संसद ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। दूसरे देशों ने भी यही किया। भारत में उद्योगपति क्रीम, पाउडर, फेसवास से अधिक इलेक्ट्रानिक सुविधाभोगी सामानों के निर्माण तक पहुंच पाये हैं। वही भारत की जनता हिंदी, गैरहिंदी, जातिवाद, भाषावाद में उलझी है। फिल्म वालों के जन्मदिन मनाने, क्रिकेट मैच, विदेशी चियर लिडर्स को निहारने, मोमबतियां जलाने से अधिक सोच नहीं पाती। हमारी राजसत्ता अधिक से अधिक वोट कैसे हासिल हों और हमारी सरकार अक्षुण्य कायम रहे इसके लिये तरह-तरह के प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं। जनता, सरकार और समाचार जगत भी घोटाले से लेकर भ्रष्टाचार और नेताओं के मूर्ति अनावरण में अधिक रस लेते हैं।
हमें सौर शक्ति, पवन उर्जा, नैनो टेकÝालाजी और जीववैज्ञानिक के साथ ही चिकित्सा के क्ष्ोत्र में कदम बढाने होंगे। चिकित्सा क्ष्ोत्र में सिर्फ धन कमाने वाले डाक्टरों के उत्पादन से आगे बढकर नये शोध पर काम करने वाल्ो लोगों को तैयार करना होगा। सरकार आम जनता और कारपोरेट के सहयोग से नवीन शोधों पर आधारित प्रयोगशालाएं और कारखाने खोलने होंगे जिससे नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ स्वरोजगार को भी प्रोत्साहन मिलेगा। भारत और उसका कोई राज्य यदि दुनिया की प्रयोगशाला बनना चाहे तो उद्यमियों को नवीन शोध से अरबों डॉलर की आमदनी हो सकती है। लाखों लोगों को नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इनमें से अधिकांश शोध केंद्र यदि ग्रामीण क्ष्ोत्रों में स्थापित किये जाये तो गांवा से शहरों की तरफ पलायन की प्रवृति को भी रोका जा सकता है। इसके लिये अपने परंपरागत श्ौक्षणिक संस्थाओं की पुर्नरचना करके विज्ञान के नये आयामों और प्रौद्योगिकी पर कार्य करना होगा। दुनिया भर में जो नये शोध हो रहे हैं वही आगे चलकर विश्व की दशा और दिशा तय करने वालें होगें और यदि भारत को इस स्पर्धा में आगे आना है तो इच्छा शक्ति के अलावा और कोई बाधा नहीं है।
मार्कण्डेय पाण्डेय


टिप्पणियाँ

  1. बहुत सही कहे सर, आज-कल सब जन्मदिन मनाने में, ............. में ही जुटे हैं।
    एकदम आईना दिखाये हैं।


    लेकिन सुधरेंगे कैसे ? सुधरेंगे भी या नहीं?

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  2. हमारी संस्कृति ,हमारी विरासत अत्यंत समृद्ध थी भैया।आज हम दिखाए की संस्कृति में फँस कर रह गए हैं।आज के दौर में हम शोध और अनुसंधान में पिछड़े हुए है ।आज जरूरत है इन सब को समग्रता से जोड़कर कार्यान्वयन की ..

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  3. अतीत की सुनहरी यादों के साथ वर्तमान के आशावादी काम को समेटते हुए जिस पर हमारी नकारात्मक प्रवित्तियों और उनके नुकसान के प्रति जागरूक किया गया है
    बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक है

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