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शनिवार, 16 जनवरी 2016

2:45 am

हम क्यों नहीं सम्हालते अपनी विरासत

आज दो महत्वपूर्ण बातें हैं जो देश के वसीयत और विरासत से संबंधित है। आगामी फरवरी माह में दिल्ली में विंटेज कारों की रेस होने वाली है, जिसमें सौ से डेढ सौ वर्ष पुरानी का कारों का प्रदर्शन होगा। तो दूसरी ओर 1953 से चालू हुई एचएमटी घड़िया बनाने की फैक्टàी अब बंद होने जा रही है। कभी एचएमटी घड़ियों का श्रीगण्ोश जवाहर लाल नेहरु ने किया था किंतु लंबे अरसे से एचएमटी घाटे में चल रही थी और सरकार का मानना है कि अब इनका पुनरुद्धार नहीं हो सकता इसलिये बंद करना पड़ रहा है।
अमूमन हम अपनी विरासत को लेकर उदासीन होते हैं और एक आमधारणा बन चुकी है कि जो पुराना है वह आउटडेटेड को चुका है। आजकल सामाजिक परिवर्तन के नाम पर सभी पुरानी बातों का त्याग करन्ो का चलन बढ गया है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन को सबकुछ त्याग कर देने के अर्थ में लेना ही मूर्खतापूणã है। दुनियां में थोड़ा हम नजर दौड़ाए तो कुछ अलग ही दिखाई देता है। दमिश्क के पुराने बाजार गत ढाई हजार सालों से आज भी अस्तित्व में हैं। समय के साथ बिकने वाली वस्तुएं बदली हैं किंतु आज भी बाजार वैसा का वैसा ही है। प्रसिद्ध उम्मायुद मस्जिद यहीं पर हैं। आज भी इस स्थान पर दो-ढाई हजार साल पुरानी मस्जिद और चर्च को संरक्षित रखा गया है। इटली का फैब्रीयानों कागज पूरी दुनियां में मशहूर है। दुनियां का प्रसिद्ध चित्रकार मायकल एंजेलों फैब्रीयानों की दुकान से ही कागज खरीदता था। आज यूरो मुद्रा की छपाई भी इसी कागज पर होती है। जबकि इस दुकान की स्थापना 1264 में हुई थी, पीढियां बदलती गई, अनेक शाखांए फैब्रीयानों ने खोल दिया लेकिन आज भी वह मूल दुकान वैसे ही चल रही है। हमारे यहां यदि कोई मकान 4०-5० साल पुराना हो गया तो उसे किसी बिल्डर को बेचकर पैसा बनाने की सोच है।
लंदन में आक्सफोर्ड और कैब्रीज विश्वविद्यालय आज भी पांच सौ सालों से चले आ रहे हैं लेकिन हमने नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों को खो दिया। वह काल के प्रवाह में मिट गए। हम अपना गौरवशाली अतीत भूल गए। राजस्थान और रायगढ के तमाम किले अब होटल बन गये हैं। अपने अतीत की तमाम दुर्लभ खजाने को हम अनदेखा करते हैं। सौ साल नहीं बीते गुरुवर रविन्द्र नाथ ठाकुर का निधन हुए लेकिन हमने शांति निकेतन की दुर्दशा कर दी। हमें मैक्डोलाल्ड, कोकाकोला, हॉलीवुड और बालीवुड में आनंद और गौरव होता है। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता में रमने का मन नहीं करता। कारण ? राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कमी और कुछ नहीं।
मार्कण्डेय पाण्डेय

2:43 am

चौथी औद्यौगिक क्रांति के लिये हम कितने तैयार हैं

सबसे पहले तो सिक्कीम मणिपाल विश्वविद्यालय के छात्रों को हार्दिक बधाई। मणिपाल विवि के छात्रों ने सौर उर्जा से चलने वाली कार का निर्माण सफलतापूर्वक किया है। इससे पहले हम सौर उर्जा के लिये सोलर लाईट, सोलर कूकर, सोलर लैंप आदि से अधिक नहीं आगे बढ पाये थ्ो। हांलाकि कुछ प्रदेशों और शहरों में सौर उर्जा से विद्युत सप्लाई के यदा-कदा प्रयास भी दिखाई देने लगे हैं। दुनियां में जिन देशों को सर्वाधिक सौर उर्जा प्रा’ है, उनमें भारत का भी एक स्थान है किंतु इस क्ष्ोत्र में आज भी हम अपेक्षित प्रयास करते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं।
सौर उर्जा से चलने वाला यात्री विमान आगामी दिसंबर माह में नई दि“ी के अंतरराष्ट्रीय हवाई अडडे पर प्रदर्शन के लिये उतरेगा। यह विमान सौर उर्जा से चलने वाला विश्व का पहला विमान होगा। स्वीटरजरलैंड में सबसे पहले इस विमान की निर्माता कंपनी सोलर इम्पल्स ने जब इसे तैयार किया तो राईट बंधुओं के पहले विमान की याद तााजा हो गई। यह सोलर एयरोप्लेन शुरुआत म्ों काफी धीमी गति से उड़ान भर रहा था लेकिन वैज्ञानिकों ने दावा किया कि जल्दी ही आधुनिक विमानों की रफतार यह पकड़ लेगा। मजे की बात यह कि भूगोल की दृष्टि से विचार करें तो स्वीटरजरलैंड हो या नार्वे इन देशों को सबसे कम सौर उर्जा प्रा’ है। दूसरी तरफ रतन टाटा के नैनो कार की बात छोड़ दें तो चीन के एक उद्योगपति ने नैनो सीमेंट तैयार किया है जो आज के सीमेंट से पचास गुना कम कीमत और पांच गुना अधिक शक्तिशाली माना जा रहा है। आज दुनियां में नैनो टेकÝालाजी और सौर उर्जा विश्व के औद्यौगिक परिदृश्य में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। मणिपाल विवि के छात्रों का यह प्रयास भारत के लिये छोटा कदम लेकिन भविष्य की लंबी छंलाग साबित हो सकता है।
आज दुनियां चौथी औद्यौगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी है जो नैनो टैकÝनालाजी और सोलर उर्जा को लेकर होने वाला है। पहली औद्यौगिक क्रांति 178० से 18०० में जब हुई तो भारत में राजा-महाराजा ब्रिटीश हूकूमत का चहेता बनने के लिये आपस में प्रतिस्पर्धा में मशगूल थ्ो। अंग्रेज के सामने चापलूसी करना और झोली फैलाने में ही उनका बडप्पन था। यह वह दौर था जब कोयले की भांप से इंजन चलने लगे और नदियों को व्यापार के तौर पर इस्तेमाल की पहल शुरु हुई। हकीकत में दुनियां के समस्त उत्पादन में तब भी यूरोप का हिस्सा महज 1० फीसदी ही था जबकि भारत चीन नेतृत्व की भूमिका में थ्ो। दूसरी औद्यौगिक क्रांति 186० से 19०० के दौरान हुई और जिस किसी भारतीय ने विज्ञान पर सोचना आरंभ किया, उद्योग और व्यापार पर कदम बढाया उसे अंग्रेजो ने पकड़कर अंडमान की जेल में ठूंस दिया या फिर उन खोजों की भ्रूण हत्या कर दी गई। मैकाले मॉडल आफ एजुकेशन ने हमेशा प्रयास किया कि भारतीय युवक क्लर्क बनते रहें ज्यादा योग्यता न दिखाएं। इस समय यूरोप में बिजली, पेट्रोल, डीजल के उपकरण बनने लगे थ्ो। रेलवे से लेकर समुद्री यातायात का जाल बिछने लगा लेकिन भारत के हाथ परतंत्रता की जंजीर से बंध्ो रहे। तीसरी औद्यौगिक क्रांति 1979 से 2००० के दौरान घटित हुई और दुनियां में कम्यूटर, टेलिफोन, मोबाईल फोन, इंटरनेट का संजाल बिछने लगा। भारतीय युवकों ने तेजी से इस क्ष्ोत्र में कदम बढाये लेकिन नवीन शोध के अभाव में भारतीय युवा गूगल और माईक्रोसाफट जैसी कंपनियों में सस्ता मजदूर बनने को विवश हुआ।
यदि भारत अपनी पहली औद्यौगिक क्रांति करता तो 178० से हजार साल पहले 499 में ही कर सकता था। जब आर्यभटट ने कहा कि पृथ्वी सूर्य का चक्क र लगाती है, इसके अलावा आर्यभटट ने गणित के क्ष्ोत्र में महत्वपूर्ण शोध किया। कापरनिकस इसके हजार साल बाद पैदा हुआ। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र लिखा, मेडिकल साईंस और सर्जरी के क्ष्ोत्र में चरक, सुश्रुत पातंजली आदि वैज्ञानिक काम कर रहे थ्ो लेकिन आज भी हम यह विचार नहीं करते कि प्रथम औद्यौगिक क्रांति भारत में क्यों नहीं हुई। विदेशी और गुलाम मानसिकता के कारण हम रिकार्डो, एडम स्मिथ, माल्थस और कींस को पढते हैं। आर्यभटट और वाराहमीहिर के बजाये कापरनिकस और पाईथागोरस को तोते की तरह रटते हैं। राष्ट्रीय अस्मिता को भूलकर विदेशी संगीतकारों की धून पर नाचना ही हमारी राष्ट्रीय नीयति बन चुकी है। हम अभिश’ है।
दुनियां का चित्र और चरित्र बदलने के लिये जीवशास्त्र और भौतिक शास्त्र के घोड़ों की लगाम कसी जा चुकी है तो दूसरी तरफ अंतिम महायुद्ध दुनिया को खत्म भी कर सकता है। 11 सिंतबर 2००1 को अमेरिका पर अलकायदा का हमला हुआ और उसने सारी दुनिया का ध्यान आतंक पर केंद्रीत किया। अमेरिका में ही क्रेग हेंटर की प्रयोगशाल में कृत्रिम जीव बनाने का प्रयोग शुरु हुआ। तरह-तरह के प्राणियों के पेशियों को मिलाकर महाकाय जीव जो अलकायदा जैसे हमलों का जबाव हो सकता है। ब्रिटेन और अन्य देश भी इस क्ष्ोत्र में तेजी से लगे और मनुष्य स्वयं परमेश्वर बनने की ओर अग्रसर हो गया। लेकिन इस तरह के जीव स्वयं उसके अपने देश और निर्माता का भी विनाश कर सकते हैं यह मानते हुए ब्रिटेन की संसद ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। दूसरे देशों ने भी यही किया। भारत में उद्योगपति क्रीम, पाउडर, फेसवास से अधिक इलेक्ट्रानिक सुविधाभोगी सामानों के निर्माण तक पहुंच पाये हैं। वही भारत की जनता हिंदी, गैरहिंदी, जातिवाद, भाषावाद में उलझी है। फिल्म वालों के जन्मदिन मनाने, क्रिकेट मैच, विदेशी चियर लिडर्स को निहारने, मोमबतियां जलाने से अधिक सोच नहीं पाती। हमारी राजसत्ता अधिक से अधिक वोट कैसे हासिल हों और हमारी सरकार अक्षुण्य कायम रहे इसके लिये तरह-तरह के प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं। जनता, सरकार और समाचार जगत भी घोटाले से लेकर भ्रष्टाचार और नेताओं के मूर्ति अनावरण में अधिक रस लेते हैं।
हमें सौर शक्ति, पवन उर्जा, नैनो टेकÝालाजी और जीववैज्ञानिक के साथ ही चिकित्सा के क्ष्ोत्र में कदम बढाने होंगे। चिकित्सा क्ष्ोत्र में सिर्फ धन कमाने वाले डाक्टरों के उत्पादन से आगे बढकर नये शोध पर काम करने वाल्ो लोगों को तैयार करना होगा। सरकार आम जनता और कारपोरेट के सहयोग से नवीन शोधों पर आधारित प्रयोगशालाएं और कारखाने खोलने होंगे जिससे नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ स्वरोजगार को भी प्रोत्साहन मिलेगा। भारत और उसका कोई राज्य यदि दुनिया की प्रयोगशाला बनना चाहे तो उद्यमियों को नवीन शोध से अरबों डॉलर की आमदनी हो सकती है। लाखों लोगों को नये क्ष्ोत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इनमें से अधिकांश शोध केंद्र यदि ग्रामीण क्ष्ोत्रों में स्थापित किये जाये तो गांवा से शहरों की तरफ पलायन की प्रवृति को भी रोका जा सकता है। इसके लिये अपने परंपरागत श्ौक्षणिक संस्थाओं की पुर्नरचना करके विज्ञान के नये आयामों और प्रौद्योगिकी पर कार्य करना होगा। दुनिया भर में जो नये शोध हो रहे हैं वही आगे चलकर विश्व की दशा और दिशा तय करने वालें होगें और यदि भारत को इस स्पर्धा में आगे आना है तो इच्छा शक्ति के अलावा और कोई बाधा नहीं है।
मार्कण्डेय पाण्डेय


2:41 am

कहां थे और कहां आ गये हैं हम

आखिर इस गणतंत्र ने हमको क्या दिया ? क्या खोया ? क्या पाया ? गणतंत्र के 68 बरस बीत जाने के बाद पीछे मुडकर सोचने की इच्छा स्वाभाविक रुप से होती है। नियति के साथ जो मिलन हुआ था, जो सपने देखे थे, जो अरमान संजाये थे, क्या वह पूरे हुए ? किसी भी देा की समस्याएं उस देा की पहचान नहीं होती बल्कि उन समस्याओं से मुक्त होने की जददोजहद ही उस देा की वास्तविक पहचान होती है। लगभग 1947 का ही कालखंड था जब पचिम के राजनैतिक विचारक यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि भारत अपनी आजादी को अक्षुण्य नहीं रख पायेगा। भारत जल्दी ही टुकडे-टुकडो में बंट जायेगा। भारत लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था को संभाल नहीं पायेगा। गत छह दाकों में आजादी का हमारा पन्ना कहीं सफेद तो कहीं स्याह, तो कहीं स्वर्णिम तो कहीं रक्तिम भी रहा है। बावजूद इसके गत 68 सालों में यदि आपात-काल को छोड दें तो भारत का लोकतंत्र पूरी दुनियां के सामने रोल मॉडल बनता जा रहा है।
निसंदेह आजाद भारत की यह सबसे बडी उपलब्धि है- हमारा लोकतंत्र। हमारी आजादी ही नहीं, हमारा गणतंत्र भी सफल और शानदार रहा है। लेकिन इसके साथ ही स्याह पक्ष यह भी है कि आज भी अंग्रेजी जमाने के 34 हजार कानून और विभिन्न विभाग चलाये जा रहे हैं। 1813 में विल्वर फोर्स कहता है कि अगर कंपनी का माल भारत के गांव-गांव में पहुंचाना है तो मुक्त व्यापार करना होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ तोडनी होगी। यही साल था 1813, जब ब्रिटीा सरकार चार्टर फॉर फ्री टेàड बिल लागू करती है। इस चार्टर में पहला कानून यह होता है कि ब्रिटेन से आये हुए माल पर कोई भी ट्रैक्स हिंदुस्थान के अंदर नहीं लगेगा। जबकि भारतीय माल पर विभिन्न प्रकार के टैàक्स लागू करने के लिये सेंट्रल एक्साईज, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स, आक्ट्राय और टोल टैक्स लगा दिया गया। इसी साल भारतीय माल पर टैक्स और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढè तोड़ने के लिये इन पांचों टैक्स के साथ पांच प्रकार के विभाग भी खोल दिये गये जो आज भी बदस्तूर जारी है।
इतिहास का अघ्ययन करें तो पता चलता है कि 184० में प्रमुख अर्थाास्त्री विलियम एडम अपनी रिर्पोट में कहता है कि पूरी दुनियां में जो व्यापार है, उसमें अकेले भारत का हिस्सा 33 फीसदी है जबकि आजादी के 68 साल बीतने के बाद भी हमारा व्यापार एक फीसदी के आसपास ठहरा हुआ है। 2 फरवरी 1833 को ब्रिटेन की संसद में लार्ड मैकाले कहता है कि मै 17 साल भारत में रहा, इस दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों में जाने का मौका मिला लेकिन मैने एक भी बेरोजगार या भीख मांगने वाला एक भी आदमी को नहीं देखा। अपने इसी संसदीय बहस में वह कहता है कि भारत में 36 प्रकार के उद्योग हैं और जितनी भी जरुरत के सामान हैं वह सब भारत उत्पादन करता है। मद्रास प्रेसिडेंसी का गर्वनर थामस मूनरों भी बाद में ब्रिटेन की संसद में यही बात दोहराता है कि भारत में टेक्नालाजी इतने उन्नत प्रकार की है कि आप यकीन नहीं करेंगे वहां एक अंगूठी में से पूरा एक थान कपड़ा निकाला जा सकता है, वे भारतीय लोग इतना बारीक कपड़े की बुनाई करते हैं।
यह तो रहा हमारा इतिहास और आज हम कहां खडें हैं। भारत के साथ ही दुनियां के कई और भी देा आजाद हुए और आज वह कहां है, हम कहां खडे हैं। देा को आजादी मिले 68 साल से ज्यादे हो गये। कुछ क्षेत्रों में हमने बहुत प्रगति की है। चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी के अणु खोजने में कामयाबी हासिल किया है तो हमारे प्रधानमंत्री को विकसित देाों के जी-2० में सम्मान के साथ शामिल किया गया है। हमारे उद्योगपतियों ने विदेाों में तमाम कारखाने और उद्योगों को खरीद लिया है। इसके बावजूद सामान्य आदमी भ्रष्टाचार से पीड़ित है, किसान आत्महत्या कर रहा है, छोटे उद्योग से लेकर छोटे व्यापारी आयकर और आबकारी अधिकारियों के लालफिताााही से परेाान है। बैंक से कर्ज प्राप्ति में अडंगा और दलाली की रकम देना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी विकट हाल है। महानगरों में झोपडियों और अवैध कालानियों की भरमार अकेले राजधानी दिल्ली की बात करें तो 895 अवैध कालोनियां विकास के दावों की हवा निकाल रही हैं, पानी बिजली का संकट अलग से, गरीबी रेखा, बेरोजगारी, बीमारी आदि की चर्चा तो होती ही रहती है।
मुटठीभर आतंकी आते हैं और भारतीय सुरक्षा बलों से तीन दिन मुकाबला करते हैं। ताज ओबेराय पर हमले होते हैं, संसद पर हमला होता है, अक्षरधाम पर होता है और हम उसी वक्त आवाज उठाते हैं। दो दिन मोमबत्ती जलाते हैं, कुछ दिन बाद भूल जाते हैं और अगले साल आतंकी फिर तैयारी से आते हैं। वैविक स्तर पर मात्र 3०-4० वर्ष पूर्व विव के अनेक देा भारत से काफी पीछे थे। दरिद्रता और अपराध, पिछड़ापन से त्रस्त थे, वे आज हमसे काफी आगे निकल चुके हैं। उनकी गरीबी समाप्त हो गई, औसत आय हमसे 15 से 2० गुना ज्यादे हो गई। सिर्फ आर्थिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों में, राजनैतिक परिपक्वता में, स्वास्थय और ािक्षा में, पर्यावरण से लेकर कल्चरल डेवलपमेंट तक वह हमसे काफी आगे निकलते हुए दिखाई पडते हैं। उनकी यह संपन्नता सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों के गरीब से गरीब के आंसू पोछने वाली है। यह सब कैसे हुआ ?
यह सब कैसे संभव उन्होंने कर दिखाया ? हमें आत्मनिरीक्षण की आवयक्ता है। हांलाकि सिंगापुर एक छोटा सा देा है लेकिन वह भी कभी अभावों और बेरोजगारी से जूझता हुआ देा था। वहां के राजनैतिक नेताओं ने सूझबूझ से देा के विकास की नीतियां तैयार की और सामान्यजन के अंदर नेानल टीम की भावना को जगाया आज सिंगापुर विकसित देा है। चलिये इस छोटे से देा की बात न भी करें तो भारत की तरह ही जातिय और धार्मिक विविधताओं से भरा हुआ देा मलेािया भी भारत जैसे संकटों का सामना कर रहा था। यदि 199० के मलेािया को देखें तो आज के भारत जैसा ही था लेकिन इसी दौरान डॉ महाथिर मोहम्मद वहां के प्रधानमंत्री हुए। सत्ता में आते ही देावासियों के मन में बीज बोया कि आगामी 2०2० तक मलेािया को विव के अग्रणी देाों में शामिल करना है। संकल्प और सूझबूझ के साथ कार्य ने सरकार और जनता के परस्पर सहयोग ने आज मलेािया की पूरी तवीर ही बदल दी है।
एक कहावत है कि भारतीय घरों में कभी सोने के कलेउ हुआ करते थे। यहां की समपन्नता, उपजाउ भूमि, अनूकूल पर्यावरण सारी दुनियां के लोगों के लिये ईष्याã का कारण हुआ करता था। आजादी के 68 साल के बाद भी और उदारीकरण की अर्थव्यवस्था स्वीकार किये हुए भी आज हम सफल नहीं हो पा रहे हैं। आखिर क्या कारण है। इसका एकमेव कारण है कि हमे और हमारे राजनैतिक नेतत्व को किस दिाा में आगे बढना है यही ज्ञात नहीं है। आजादी के बाद पंडित नेहरु ने बांधों, स्टील फैक्टियों, इंजिनियरिंग संस्थानों के निर्माण पर जोर दिया। इंदिरा गांधी ने गांव-गांव तक बैंकों का जाल बिछाया, हरित क्रांति को प्रोत्साहन दिया। राजीव गांधी ने कम्प्यूटर और परिवहन पर जोर दिया। नरसिंम्ह राव जी के कार्यकाल में मुक्त अर्थव्यवस्था लागू की गई। देा तेजी से आगे बढा। अटलबिहारी बाजपेई के कार्यकाल में ग्राम सड़क योजना से गांवों को जोड़ने, शहरों को गांवों में लाने का कार्य तेजी से हुआ। डॉ मनमोहन सिंह जी ने रोजगार, किसान की कर्ज माफी, सूचना का अधिकार, ग्रामीण विकास की तमाम योजनाएं चलाई। तमाम प्रयासों के बाद भी आज देा में कुल आबादी का 95 फीसदी हिस्सा अभावों, संकटों में जूझ रहा है। संसाधनों के 95 फीसदी हिस्से पर 5 फीसदी लोगों का कब्जा है क्यों ? आईये इस गणतंत्र पर इसी सवाल का उत्तर खोजें।
मार्कण्डेय पाण्डेय



2:38 am

आर्थिक-मंदी, मंदी नहीं आर्थिक अपराध है

भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर ने सरकार को चेतावनी दी है कि दुनिया एक और आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ी है। वास्तव में पश्चिमी जगत का यह धूर्ततापूणã जानबूझकर की गई कार्रवाई होती है, कृत्रिम रुप से अर्थिक मंदी को निर्माण करना। यह एकतरह से उनका मानवता के प्रति आर्थिक अपराध है। उनकी समाज रचना और अर्थिक चिंतन व्यक्ति आधारित है, उनके सोशल कांट्रेक्ट थियरी के अनुसार सभी बातों के लिये मैन इज द मेजर आफ एवरिथिंग अर्थात मनुष्य ही सभी चीजों का मापदंड है। भारतीय चिंतन परंपरा वैश्चिक संदर्भो में सोचती रही है इसलिये सर्वे भवंतु सुखिन: का विचार प्रभावी रहा है।
हमारे यहां प्रत्येक मनुष्य के मन में अंटू द लास्ट का विचार रहता है और अत्योंदय की संस्कृति रही है। भारतीय परंपरागत विचार यह है कि देश में जितनी वस्तुएं हैं, जितनी सुविधाएं हैं वह सभी मिलाकर हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में द बास्केट आफ गुड्स एंड सर्विसेज कहा गया। पश्चिम का विचार है कि देश में जो वस्तुएं और सेवायें मौजूद है, उसका जो बाजार भाव है वही राष्ट्रीय संपत्ति है। तो फिर अंतर कहां आ जाता है मान लिजिये हमारे देश में सौ गिलास निर्माण हुए जिनमें प्रत्येक का मूल्य यदि हम दस रुपया मान लें तो एक हजार रुपया पश्चिम के विचार से हमारी राष्ट्रीय आय हो गई। जबकि भारतीय आर्थिक चिंतन परंपरा में इसे हम राष्ट्रीय संपत्ति कहेंगे। अब यह मान लें कि अगले साल हमने सौ के बजाये दो सौ गिलास साथ में प्लेट भी बना दिया। अधिक उत्पादन के कारण मूल्य घटकर दस के बजाये पांच रुपया हो गया तो बाजार में दो सौ गिलास जाने पर उतना ही पैसा मिलेगा तो पश्चिम के अर्थशास्त्री इसे राष्ट्रीय आय की स्थिर अवस्था कहेगें जबकि भारतीय आर्थिक चिंतन में इसे राष्ट्रीय संपत्ति का दुगुना हो जाना माना जाता है। इसमें एक बात और दो सौ गिलास के उत्पादन पर प्रत्येक गिलास का मूल्य पांच के बजाये चार रुपया हुआ तो वह सौ रुपये की राष्ट्रीय आय का कम हो जाने का रोना भी रोयेंगे। उनके जीडीपी और जीएनपी का नियम अंर्तविरोधों से भरा हुआ है।
जैसा कि वह मूल्य को ही जोड़ते हैं, संपत्ति अथवा आय को नहीं जोड़ते। कल तक जिस महिला को उसका नियोजक घरेलू कार्य के लिये पांच सौ रुपये का वेतन देता था और रुपये की परिभाषा में यह पांच सौ रुपया राष्ट्रीय आय की गणना में गिना जाता है, वही जब वह महिला उस नियोजक की पत्नी हो जाती है तो उसका घरेलू कार्य और पश्चिम की अर्थ चिंतन का घालमेल हो जाता है कि अब इसको राष्ट्रीय आय में कैसे जोड़े। भारत में रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं की अत्यधिक मात्रा पैदा हो और उसकी उपल्बधता विकास के पायदान पर सबसे नीचे खड़े व्यक्ति तक हो इसतरह का सिद्धांत रहा है। सौ हाथों से इक्टठा करके हजार हाथों में बांट दो शतहस्त समाहर, सहत्रहस्त संकिर लेकिन इस चिंतन से व्यक्ति केंद्रीत भोगवादी समाज का कोई लेना देना नहीं है। व्यक्तिवाद पर टिका हुआ उनका दर्शन इसे स्वीकार नहीं करता क्यों कि इसमें व्यक्ति के बजाये सर्वे भवंतु सुखिन: का विचार आता है।
जब अर्थचिंतन ऐसा हो जाता है कि मेरी आमदनी ही बढ़नी चाहिये बाकी समाज से क्या लेना-देना तो सबके सुख की अवधारणा तिरोहित हो जाती है। उनकी अर्थव्यवस्था के केंद्र में बाजार आ जाता है जबकि भारत में परिवार, इसलिये वसुधा को कुटुंब मानकर विचार किया जाता है। मुनाफे की सोच के कारण ही पश्चिम में 192०-3० के आर्थिक मंदी के दौरान कंटàाइव्ड स्कारसिटी पैदा करने के लिये उत्पादन की विपुल मात्रा को जलाने के साथ ही समुद्र में डूबो देने की घटनाएं हुई थी। ताकी वस्तुओं का अभाव कायम रहे और मूल्यों का उच्च स्तर बना रहने से कमाई होती रहे। इसे ही वैश्विक आर्थिक मंदी कहकर प्रचारित किया गया जो मानवता के खिलाफ आर्थिक अपराध है। दुर्भाग्यवश गत 1०० सालों से यही अर्थशास्त्र हमारे स्कूलों कॉलेजों में हमें रटाया गया। साथ ही नेहरुवियन मॉडल आफ एजूकेशन हमें स्कारसिटी की अर्थव्यवस्था को पढ़ाता-समझाता रहा है। इसके पीछे औपनिवेशिक घृणित मानसिकता कायम रहती है कि तीसरी और चौथी दुनिया के देशों को उभरने नहीं देना है। इसके लिये वह तरह-तरह की कलाबाजियां दिखाते है मसलन अर्थशास्त्र के नये नियम बनाना, अपने फायदे के लिये आर्थिक संस्थाओं आईएमएफ, डब्लूटीओ, वर्ड बैंक जैसी संस्थाओं को खड़े करना, तीसरी और चौथी दुनिया के देशों में एनजीओं को फंडिग करना और उनसे विकास विरोधी आंदोलन चलवाना, पुरानी पड़ चुकी टेकÝालाजी और मशीनों को पूंजी निवेश के नाम पर इन विकासशील देशों के गले मढ़ना, तरह-तरह के शोध और हयूमन इंडेक्स बनाकर इन देशों को नीचा दिखाते हुए अपनी शर्तो को मानने पर बाध्य करना आदि कार्य किये जाते हैं।
अगर इन विकसित देशों का इतिहास देखें तो उनकी समृद्धी उपनिवेशों के शोषण पर आधारित थी। द्बितीय विश्वयुद्ध के बाद इन नवस्वतंत्र देशों में जागरुकता और देशभक्ति की भावना जैसे-जैसे आती गई इनका शोषण विकसित देशों को मुश्किल लगने लगा। द्बितीय विश्वयुद्ध के बाद के इन देशों को ही तीसरी दुनिया के देश कहा गया और इनका शोषण वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मानते रहे हैं। साम्राज्यवादी जानते थ्ो कि पैसे की ताकत से हम सरकार चलाने वालों को भी खरीद सकते हैं, उन्हें अपने अनुसार नितियां निर्माण करने के लिये भी बाध्य कर सकते हैं। परंतु कई बार वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत सरकारें इन विकसित देशों की चाल सफल नहीे होने देती। द्बितीय विश्वयुद्ध के पश्चात जापान के सारे उद्योग-धंध्ो नष्ट हो गये लेकिन वहां की सरकार और जनता ने बिना किसी के झांसे में आये संकल्प लेकर अपना पुर्ननिर्माण किया जब कि हमारे यहां अधिक से अधिक उपभोग और सत्ता सुख प्रा’ करने वाले शासक आते रहे। 1965 में पाकिस्तान के साथ भारत का नहर पानी का बंटवारा कौन भूल सकता है जो विश्व बैंक के दबाव में किया गया। इसतरह के अनेक समझौते और फैसले भारत ही नहीं दुनिया की कई सरकारों ने किया है जो अंर्तराष्ट्रीय दबावों में होता रहा है। अपना मुनाफा कैसे बढे इसके लिये वह हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते रहे हैं। विदेशी पूंजी निवेश के नाम पर पुरानी और रददी हो चुकी टेकÝालाजी को विकासशील देशों के गले मढना और इसे विदेशी पूंजी निवेश के नाम से प्रचारित करने का धोखा भी होता रहा है। यही कारण रहा है कि बहुतेरे देश आज भी डैब्ट टàैप से डैथ टàेप अर्थात कर्ज से मौत के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं और पश्चिम की चालाकियों को न समझ पाने के कारण कर्जदार लगातार बनते जा रहे हैं। उनका पूरा अर्थशास्त्र ही बेईमानी और ठगी का शास्त्र है।
इसलिये अब हमें यह समझना होगा कि विपुलता की अर्थव्यवस्था ठीक है या जानबूझकर अभाव और अकाल पैदा करने वाली चालाकियों का धंधा? हमें सोचना होगा कि व्यक्तिगत लाभ केंद्रीत अर्थरचना ठीक है या मानवमात्र को लाभ देने वाली सर्वे संतु निरामया की अर्थचिंतन की प्राचीन भारतीय चिंतनधारा ?
-मार्कण्डेय पाण्डेय

2:33 am

असामाजिक और अन्याय भी हो गया है मंडल कमीशन

गुजरात में आरक्षण की रैली और उसके बाद हो रहे बवाल को लेकर चारों ओर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरक्षण अब राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल हो रहा है। मंडल कमीशन ने जो सामाजिक न्याय का बीज बोया वह अब असामाजिक ही नहीं अन्याय भी बनाता जा रहा है। 1982 से शुरु हुई हंटर कमीशन की रिर्पोट के बाद इस आरक्षण प्रणाली का 1932 में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता कायम रखने के लिये बखूबी इस्तेमाल किया और साम्प्रदायिक बंटवारे के लिये प्रयोग किया। दलित और गैर दलितों में समाज का विभाजन का बीज डालना आरंभ किया। महात्मा गांधी ने कड़ा विरोध तो किया लेकिन बाद में डॉ अंबेदकर के आगे समझौते को तैयार हो गये। आरक्षण की लड़ाई में संविधान सभा में एक वोट की कमी से आरक्षण प्रस्ताव पारित नहीं होने पर डॉ अंबदेकर के सामने अनूसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति को आरक्षण दिये जाने का गंभीर सवाल खड़ा हो गया और वे धारा 1० में संशोधन करने में कामयाब रहे जिसका परिणााम हुआ आरक्षण।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और श्ौक्षणित रुप से पिछड़ों के लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन शर्त यह है कि यह साबित किया जा सके कि वह औरों के मुकाबले सामाजिक और श्ौक्षणिक रुप से पिछड़े हैं। संविधान लागू होने के बाद आगामी दस सालों के लिये महज 22 5 फीसदी आरक्षण लागू किया गया। अनुसृचित जाति के लिये 15 फिसदी और अनुसूचित जनजाति के लिये 7 5 फिसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। धीरे-धीरे इसे खत्म करने के बजाये 1993 में मंडल कमीशन की रिर्पोट के आधार पर इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया। और 22 5 के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फिसदी आरक्षण और दिया गया।
मार्कण्डेय पाण्डेय

2:25 am

आखिर हम कब समझेंगें पूर्वोत्तर का दर्द?

नार्थ-ईस्ट की एक महिला की तबियत खराब होने पर गुड़गांव के अस्पताल में भर्ती हो गई। लेकिन उसे अनुमान नहीं था कि अस्पताल का बिल इतना आ जायेगा जिसे वह चुका नहीं पायेगी। अस्पताल प्रबंधन ने उस बीमार महिला से पैसे के एवज में अस्पताल में झाड़Ô लगवाया और वाशरुम तक साफ करवाया। आये दिन इस तरह के समाचार मिलते रहते हैं। यह कटु सत्य है कि पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भ्ोदभाव, हिंसा और परायापन का व्यवहार किया जाता है। आखिर पूर्वोत्तर के चेहरे हमें क्यों नहीं अपने चेहरे लगते? इतिहास को खंगालें तो भारत और भारतीयता पर सबसे पहला दावा इन्हीं जनजातियों का बनता है। पिछले दिनों नार्थ-ईस्ट में अरुणांचल के दोईमुख विश्वविद्यालय में जाने का अवसर मिला था। रास्तें में जब भी हम किसी से पूछते हाउ मेनी किलोमीटर दोईमुख? तो जबाव मिलता-अरे! आपको दोईमुख जाना है, तो सीधा जाईये न। हम लोग शर्मिंदा हो जाते थ्ो कि हम लोग हिंदीभाषी होकर अंग्रेजी में पूछते हैं जबकि ये लोग गैरहिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी में उत्तर देते हैं। आसाम के नौगांव से चलकर अरुणाचल में प्रवेश बंदरमंदिर से ही जगह-जगह ऐसा ही अनुभव रहा। ईटानगर से थोड़ा आगे दोईमुख रोनो हिल्स पर अवस्थित राजीव गांधी केंद्रीय विवि में हिंदी विभाग में सबसे पहले वहां प्रोफेसर श्री ओकेन लेगो जी से मुलाकात हुई, जो मूलत: अरुणाचल के ही निवासी हैं। स्वागत के बाद हिंदी विभाग से निकलने वाली स्मारिका उन्होंने भ्ोंट की और बताया कि अरुणाचल में हिंदी प्रचार-प्रसार की कोई एक भी संस्था नहीं है। इस बारे में केंद्र की सरकारों ने आज तक कुछ भी नहीं किया है।
हिंदी के प्रचार-प्रसार से बात आगे बढ़ी तो नॉर्थ-ईस्ट का दर्द छलक पड़ा। अरुणाचल की 54 जनजातियों का दर्द, सरकार की उपेक्षा और सबसे बड़ा अपने ही भारतवंशियों के आगे 'अजनबी’, 'पराया’ और 'चिंकी’ कहलाने का दर्द भी छलक पड़ा। पूर्वोत्तर की ये जनजातियां अपने को गर्व से रामायण और महाभारत का वंशज मानती हैं और आज भी परंपराओं को जिंदा किये हुए हैं। मिजो-मिश्मी नाम की जनजाति खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुकमणी का वंशज मानती है। अरुणांचल के लोगों की माने तो रुकमणी भीष्मकनगर की रहने वाली थीं। महाभारत में भी उल्लेख है कि रुकमणी के पिता का नाम भीष्मक और भाई रुकमंद था। महाभारत के अनुसार जब श्रीकृष्ण रुकमणी का अपहरण करने गये तो भाई रुकमंद ने विरोध किया और युद्ध हुआ। पराजय के समय रुकमंद का वध न करने के अनुरोध पर दंड स्वरुप कृष्ण ने रुकमंद का मुंडन मिलिट्री स्टाईल हेयरकट जैसा अपने सुदर्शन चक्र से करके छोड़ दिया था। आज भी मिजो-मिश्मी जनजाति के पुरुष ऐसा ही हेयर स्टाइल रखते हैं।
गुवाहाटी से शिलांग फिर चेरापूंजी जाते समय पहाड़ी रास्तों के किनारे आपको बूढ़ी महिलायें और बच्च्ो आधा-एक किलो कच्ची सुपारी जमीन पर गमछा बिछाकर बेचते मिल जाएंगे। दाम भी कोई निश्चित नहीं है। एक टुकड़ा सुपारी के लिये आप जो दें देंगे वह खुशी से ले लेंगी। दोईमुख विश्वविद्यालय में ही हिंदी के प्रोफेसर डॉ. विश्वजीत मिश्र बताते हैं कि यदि इनको नमक भी खरीदना होता है तो 18 से 2० किमी पैदल पहाड़ी रास्तों पर चलकर जाना होता है। तबीयत खराब हो जाने पर दूर-दूर तक पहाड़ों में और पहाड़ के गांवों में न तो कोई डॉक्टर है न ही अस्पताल की कोई व्यवस्था है। इन पहाड़ों पर खेती योग्य भूमि है ही नहीं। आसाम के चाय बागानों को छोड़ दें तो पूरा नॉर्थ-ईस्ट आखिर करे तो क्या करें? बड़े पैमाने पर मांसाहार का बड़ा कारण यह भी है। मेघालय में खासी-जयंतिया जनजाति की आबादी कुल 13 लाख के आसपास होगी। तीरंदाजी कला में बिलकुल दक्ष यह जनजाति आज भी तीरंदाजी में अंगूठे का प्रयोग नहीं करती, क्यों? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनमें से शायद ही कोई हो जो एकलव्य का नाम भी जानता हो, लेकिन इन सभी को पता है कि उनके किसी पूर्वज ने अपना अंगूठा गुरुदेव को दान कर दिया था। इसलिये अंगूठे का प्रयोग पाप है।
हिडिम्बापुर जी हां! नागालैण्ड का दीमापुर। भीम की पत्नी हिंडिम्बा यहीं की रहने वाली थी और आज भी हिमाशा जनजाति अपने को हिंडिम्बा का वंशज मानती है। भीम का बाहुबली पुत्र घटोत्कच जिन गोटियों से शतरंज खेलता था, वह राजबाड़ी की बड़ी-बड़ी गोटियां आज भी पर्यटकों के कौतूहल का विषय हैं। असम के बोडो जनजाति गर्व से खुद को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का वंशज मानती हैं। जबकि पहाड़ों पर रहने वाली कार्बी-आबलांग सुग्रीव को अपना पूर्वज मानते हैं। मणिपुर के उखरुल जिले का असली नाम उलूपीकुल है, जो अर्जुन की पत्नी उलूपी से जोड़ा जाता है। यह बिलकुल म्यांमार की सीमा से जुड़ा हुआ भारतीय जिला है। मणिपुर का मैत्रेयी समाज अपने को अर्जुन के ससुराल पक्ष का मानता है, क्योंकि उनकी पत्नी चिंत्रांगदा यहीं की थी। आज एनएससीएन अलगावादी गुट के 4० फीसदी से अधिक सदस्य ताखुंल जनजाति से हैं जो मार्शल आर्ट में बेजोड़ मानी जाने वाली जनजाति है।
भारत के ये खांटी वंशज आज ईसाईयत के पंजे में छटपटा रहे हैं। पहाड़ी गांव जहां खाने-पहनने को कुछ नहीं, उनको दो अदद साड़ी, सिरदर्द या पेटदर्द की चार टेबलेट और युवकों को शराब की एक बोतल थमाकर भी ईसाई बना दिया गया। पहाड़ी गांवों में बीच-बीच में लकड़ी के पान की गुमटीनुमा चर्च हर एक-दो किमी पर दिख जाते, लेकिन मेरी निगाहें ढूंढती रही कि कोई मंदिर भी है क्या? मै इस पूरी यात्रा में तलाश करता रहा कि सेवा का दावा करने वाले वे संगठन और संस्थाओं का कोई चिन्ह, पदचिन्ह दिखता है क्या? कोई एनजीओ सा सामाजिक संस्थान के निशान मिलते हैं क्या ? मेरी निराशा को दूर किया एकमात्र रामकृष्ण सेवा मिशन ने, जो लगभग पांच हजार फिट की उंचाई पर चेरापूंजी में स्थित है। वहां मौजूद एक संयासी ने बताया कि यह विश्व में सर्वाधिक उंचाई पर स्थित रामकृष्ण सेवा मिशन का केंद्र है। चारों तरफ एकदम सन्नाटा, बादलों में पानी की फुहारें के बीच हम आश्रम के अंदर गये तो सबसे पहले ही पुस्तक बिक्री केंद्र पर पहुंचे। वहां मौजूद गेरुआधारी संयासियों ने बताया कि आप इन पुस्तकों को अवश्य ले लीजिये, ये नई तो हैं ही, बल्कि इन पर सब्सिडी भी है। इसके अलावा जनजाति बच्चों के बनाये हुए कुछ हस्तशिल्प, दस्ताने, गमछे और टोपियां खरीदी गई। इनसे जो मुनाफा होगा उससे आश्रम में रहने वाले जनजाति के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई हो सकेगी।
पूर्वोत्तर जिसे पूरब का स्वीटजरलैण्ड, देवताओं की भूमि कहा जाता है, वह अभाव, दरिद्रता और संसधानों की कमी से सिसक रहा है। आजादी के सात दशक होने को आये, लेकिन आज भी पूर्वोत्तर अलग-थलग सा दिखता है। इसका अनुचित लाभ ईसाई मिशनरियां उठाती रही हैं। इन्होंने न केवल धर्म बदलवाया, बल्कि संस्कृति, रहन-सहन भी बदलवाया। मातृ प्रधान यहां का समाज आखिर कब तक अनाथ रहेगा? कबतक हम उन्हें पराया मानकर दुत्कारते रहेंगे और राष्ट्रीय एकता-अखंडता का दोहरा चरित्र जीते रहेंगे ? आखिर कब समझेंगे हम पूर्वोत्तर का दर्द ?
-मार्कण्डेय पाण्डेय