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फ़रवरी 14, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बचपन में गाँव की पाठशाला

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बचपन में गाँव की पाठशाला में पढ़ते समय छुट्टी के पहने मुहानी होती थी। एक विद्यार्थी खड़ा होकर गिनती और पहाड़े कहता था और शेष सब दोहराते थे। उस समय 16×9 ही हमको सबसे प्रिय लगता था तथा उसको हम लोग बड़े लहजे के साथ कहते थे 'सोलह नम्मा चलारे चवाल सौ'। शेष सब संख्याओं को उनके साधारण नाम से, क्यों कहा जाता था इसका रहस्य जानने की हमने कभी चिंता नहीं की। किंतु यह सत्य है कि इसको दोहराने में आनंद खूब आता था। एक कारण तो यह हो सकता है कि इसमें छुट्टी के आनंद की कल्पना छिपी हो क्योंकि सोलह नम्मा के बाद ही सोलह दहाई एक सौ साठ कहते ही मुहानी समाप्त हो जाती थी और हम सब अपना-अपना बस्ता, जिसको कि पहले से ही बाँधकर सँभालकर रख दिया जाता था, उठा घर की ओर दौड़ पड़ते थे, फिर चाहे स्कूल से निकल रास्ते खेलते-खाते (आम की अमिया) घर रात होते-होते ही पहुँचते। 'सोलह नम्मा चलारे चवाल सौ' को धीरे-धीरे मस्ती से कहकर दिन भर की थकान भी निकल जाती थी। किंतु इसमें एक खराबी थी, इसकी लंबाई तथा शेष सब संख्याओं की भिन्नता के कारण पंडित जी का, जोकि हमारी मुहानी के समय या तो सीधा बाँधते रहते थे या गाँव के किसी व्यक्त

यात्रा से पूर्व

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15 अगस्त भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण दिन है। उस दिन संपूर्ण भारत में स्वतंत्रतोत्सव मनाए गए। सहस्रों वर्षों की दासता के बंधन से मुक्ति का अनुभव किसको आनंदकारी नहीं होता। किंतु आनंद के क्षण थोड़े ही रहते हैं। आनंदोत्सव में मनुष्य एकबारगी अपने आपको भूल जाता है, वास्तविकता की कठोर धरती से उठकर कल्पनाकाश में सहज विचरण करने लगता है। हमने भी इस प्रकार आनंद मनाया और अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार उसकी अनुभूति रही। हरेक की अपनी-अपनी अवधि थी। किंतु अंत में सबको वास्तविकता की कठोर भूमिका स्पर्श करना ही पड़ा। आज भी अनेकों व्यक्ति कटु दु:खद और उत्तरदायित्वपूर्ण वास्तविकता से मुँह छिपाना चाहते हैं। वे कल्पना के मधुमय संसार का ही आस्वाद लेने में मस्त हैं। यदि उनको कोई झकझोरकर सत्य संसार में लाने का प्रयत्न करता है तो उन्हें झुंझलाहट आ जाती है, यदि वास्तविक जगत् की कठिनाइयाँ उनके सामने कही जाती है तो वे समझते हैं कि स्वातंत्र्यानुभूति का महत्त्व कम करने का प्रयत्न किया जाता है अथवा स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाले योद्धाओं की महत्ता को जनता की दृष्टि में नीचे गिराने का प्रयत्न किया जाता है। यह सत्य

सब को काम ही भारतीय अर्थनीति का एकमेव मूलाधार

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बेकारी की समस्या यद्यपि आज अपनी भीषणता के कारण अभिशाप बनकर हमारे सम्मुख खड़ी है किंतु उसका मूल हमारी आज की समाज, अर्थ और नीति व्यवस्था में छिपा हुआ है। वास्तव में जो पैदा हुआ है तथा जिसे प्रकृति ने अशक्त नहीं कर दिया है, काम पाने का अधिकारी है। हमारे उपनिषद्कार ने जब यह घोषणा की कि 'काम करते' हुए हम सौ वर्ष जीएँ (कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् समा:।) तो वे यही धारणा लेकर चले कि प्रत्येक को काम मिलेगा इसीलिए शास्त्रकारों ने प्रत्येक के लिए कर्म की व्यवस्था की। यहाँ तक कि इस आशंका से कि कोई कर्महीन रहकर केवल भोग की ही ओर प्रवृत्त न हो जाए उन्होंने यह धारणा प्रचलित की कि यह भारतभूमि 'कर्मभूमि' है। स्वर्ग के देवता भी अपने कर्म फल क्षय हो जाने पर यही इच्छा करते हैं कि वे भारत में जन्म लें एवं पुन: सुकृत संचय करें। तात्पर्य यह कि हमने किसी भी व्यक्ति के संबंध में बेकारी अथवा कर्म विहीनता की कल्पना नहीं की। अत: भारतीय अर्थनीति का आधार 'सबको काम' ही हो सकता है। बेकारी अभारतीय है। भारतीय शासन का कर्तव्य है कि वह इस आधार को लेकर चले। बेकारी के कारण लोगों को काम न मिल

अखंड भारत: ध्येय और साधन

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भारतीय जनसंघ ने अपने सम्मुख अखंड भारत का ध्येय रखा है। अखंड भारत देश की भौगोलिक एकता का ही परिचायक नहीं अपितु जीवन के भारतीय दृष्टिकोण का द्योतक है जो अनेकता में एकता के दर्शन करता है। अत: हमारे लिए अखंड भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं जो परिस्थिति विशेष में जनप्रिय होने के कारण हमने स्वीकार किया हो बल्कि यह तो हमारे संपूर्ण दर्शन का मूलाधार है। 15 अगस्त, 1947 को भारत की एकता के खंडित होने के तथा जन-धन की अपार हानि होने के कारण लोगों को अखंडता के अभाव का प्रकट परिणाम देखना पड़ा और इसलिए आज भारत को पुन: एक करने की भूख प्रबल हो गई है किंतु यदि हम अपनी युग-युगों से चली आई जीवन-धारा के अंत:प्रवाह को देखने का प्रयत्न करें तो हमें पता चलेगा कि हमारी राष्ट्रीय चेतना सदेव ही अखंडता के लिए प्रयत्नशील रही है तथा इस प्रयत्न में हम बहुत कुछ सफल भी हुए हैं। उत्तरम् यत् समुद्रस्य दक्षिणं हिमवदगिरे: वर्ष तद्भारतं नाम भारतीय यत्न संतति: के रूप में जब हमारे पुराणकारों ने भारतवर्ष की व्याख्या की तो वह केवल भूमिपरक ही नहीं अपितु जनपरक और संस्कृतिपरक भी था। हमने भूमि, जन और संस्कृति को कभी एक-दूसरे से भिन्न न

अब्दुल्ला द्वारा जुलाई समझौते का उल्लंघन स्वतंत्र कश्मीर की रूपरेखा तैयार

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अलग निशान और अलग प्रधान का निर्माण कर जम्मू और कश्मीर के नेता अपनी पृथकतावादी मनोवृत्ति का परिचय पहले ही दे चुके हैं किंतु जो अलग विधान इस राज्य के लिए उन्होंने बनाने का प्रस्ताव किया है। वह इस मनोवृत्ति का व्यापक स्पष्टीकरण करता है। सच में तो भारत के लिए जम्मू और कश्मीर भी उसी प्रकार सम्मिलित है जिस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के पूर्व स्वतंत्र की हुई शेष पाँच सौ चव्वन रियासतें हैं। एक विधान बन चुका है। वह विधान सब पर लागू है और आशा थी कि जम्मू और कश्मीर पर भी यह विधान लागू होगा। किंतु न मालूम किस घड़ी में हमारे प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के मुँह से जनमत संग्रह की बात निकल गई और तब से शेख अब्दुल्ला तथा उनके साथी उसका आधार लेकर स्वतंत्र कश्मीर के मंसूबे पूरे कर रहे हैं। कश्मीर में लड़ाई की स्थिति होने के कारण उस रियासत का भारत के साथ अन्य रियासतों के समान पूरी तरह से विलीनीकरण नहीं हो सका और इसीलिए संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर भारत कश्मीर के उस समय के संबंधों का दिग्दर्शन कराया गया तथा भावी की दिशा इंगित की गई। अस्थायी और अंतरिम प्राविधानों के अंतर्गत अनुच्छेद 370 में यह स्पष्ट द