गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

बिना शराब पीये किया गया बलात्काोर माफ कर दिया जाता है



सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हिमालय की छाया में बसे देश नेपाल आजकल महिलाओं की हिंसा के मामले में पूरी दुनियां में अब्‍वल होता जा रहा है। लिंग आधारित भेदभाव और पुरुष्‍वादी सोच का शिकार यह देश अब दुनियां में महिला हिंसा के मामले में अब्‍वल पाया गया है।
नेपाल ऐसा देश है जो संक्रमण के दौर से गुजर रहा है जहां चारलेन की सड़के राजधानी काठमांडू को त्रिभुवन अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अडडे को आपस में जोड़ती हैं। यहां तक की नेपाल के गांव भी अब आधुनिकता से चमकने लगे हैं। गांव से लेकर कस्‍बों तक आधुनिकता की बयार बहीं है और नये निर्माण वहां भी दिखाई देने लगे हैं। इसके बावजूद वहां के सामाजिक हालात में बहुत कम परिवर्तन देखने को मिलता है, राजतंत्र के जाने के बाद और लोकतंत्र के आगमन से सामाजिक और राजनैतिक हालात में बस इतना ही परिवर्तन दिखाई दे रहा है कि इक्‍का दुक्‍का म‍हिलायें वहां की सियासत में सक्रिय हो गई है।
नेपाल ने अपने संविधान में पहले ही 33 फीसद महिलाओं के लिये राष्‍ट्रीय संसद में स्‍थान आरक्षित कर रखा है और यह विश्‍व के पहले ऐसे देशों में है जहां किन्‍नरों तक को भरपूर राजनैतिक अधिकारों के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में महिलाओं के सहायतार्थ अलग से प्रकोष्‍ठ का निर्माण किया गया है। लेकिन सदियों से चली आ रही पुरुष्‍वादी सोच में वहां कोई परिवर्तन नही दिखाई देता और नेपाल महिलाओं, बच्‍चों के साथ किये जा रहे जूल्‍म और भेदभाव के सबसे बड़े अडडे के रुप में उभर कर सामने आ रहा है।
नई दिल्‍ली में हयूमन राईट संस्‍था की लीली थापा जो नेपाल में विधवाओं के कल्‍याण के लिये कार्य कर रही हैं कहती है कि विधवाओं के उपर जो विधवा होने का कलंक चस्‍पा है वह आज भी नेपाल में कुप्रथा के रुप में जारी है जिसके कारण विधवाओं को समाज में तरह-तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। वे आगे कहती है कि हमने कई जगह ऐसे मामले देखे हैं जहां विधवाओ के साथ उनके ही रिश्‍तेदारों ने बलात्‍कार तक किया है यहां तक की एचआईवी पाजीटिव विधवाओं के साथ भी।  उन महिलाओं के साथ बंम्‍बईया रोग वाली कह कर अपमानित किया जाता है और जिनके पति जिंदा है वे भी उनको तिरस्‍क्‍ृत कर देते हैं।
एक गैर सरकारी संगठन एक्‍सन एड अपनी रिर्पोट में कहता है कि नेपाल में सिराहा जिले में 18 में से सिर्फ दो मामले ही पुलिस दर्ज करती है जो महिलाओं के‍ खिलाफ होते हैं। संगठन कहता है कि वहां सिर्फ इस आधार पर बलात्‍कार के आरोपियों को क्षमा दान मिल जाता है कि वह बलात्‍कार के दौरान शराब नही पिया था। ऐसे ही एक मामले का जिक्र करते हुए एक्‍सन एड की कार्यकर्ता कहते हैं कि ताजा मामला सुनताली धामी का है जो पुलिस अधिकारी है और उसके साथ उसी के सहकर्मियों ने बलात्‍कार किया और वे सिर्फ इस आधार पर बरी हो गये कि वे शराब नही पीये थे।
संगत फाउंडेशन के कमला भसीन नई दिल्‍ली स्थित नेपाली दूतावास पर एक मुलाकात में कहते हैं कि लोकतंत्र का क्‍या मतलब है यदि तीन मेसे एक महिला बलात्‍कार और हिंसा की शिकार है। महिला अधिकार कार्यकर्त्‍ता रीता थापा नेपाल के हालात पर चिंता प्रकट करते हुए वहां की राजव्‍यवस्‍था की आलोचना करती है और दुनियां के सभ्‍य देशों को इसके खिलाफ उठ जाना चाहिये। दर्जन भर गैर सरकारी संगठनों ने आज नई दिल्‍ली में नेपाली दूतावास पर अपना विरोध प्रदर्शन करके नेपाल में हो रहे अबाध महिला अधिकारों की अवहेलना पर चिंता प्रगट किया।

कोरबा जनजाति की महिला लड रही है मातृत्‍व के अधिकार की लडाई



 राजधानी दिल्‍ली में एकतरफ खाने के मौलिक अधिकार को लेकर प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालय जेएनयू मे घमासान मचा है तो दूसरी तरफ छतिसगढ की एक आदिवासी महिला मातृत्‍व के मौलिक अधिकार की लड़ाई लड़ने सड़कों पर उतर आई है। छतिसगढ के आदिवासी ईलाके की एक महिला रायपुर से अपनी लड़ाई लेकर राजधानी नई दिल्‍ली पहुंच गई है। महिला का आरोप वहां के डाक्‍टरों पर है जिन्‍होंने पैसे के लालच में उसके मां बन पाने की संभावना को समाप्‍त कर दिया है। अब यह महिला राजधानी दिल्‍ली की सड़कों पर मातृत्‍व की लड़ाई लड़ने पहुंच गई है। छतिसगढ के रायपुर में पिछले दिनों सरकार की एक योजना को लेकर काफी बवाल मचा था जिसमें सरकार ने गरीबों को ईलाज के लिये चालिस हजार रुपये देने का ऐलान किया था। राज्‍य के डाक्‍टरों ने गरीब आदिवासी महिलाओं को ईलाज के नाम पर गंभीर गैरजरुरी आपरेशन कर सरकार से पैसे की वसूली शुरु कर दी थी।
उत्‍तरी छतिसगढ के सरगुजा की फूलसुंदरी पहाड़ी कोरवा कहती है कि मेरे कुल छह बच्‍चे हैं और मै अब नही चा‍हती। सरकार ने कहा था कि परिवार का सीमित रखने पर सुविधायें मिलेगी हमे ग्रामीण हेल्‍थ वर्कर ने कहा कि एक छोटा सा आपरेशन किया जायेगा जिससे परिवार नियोजन किया जा सकेगा। उल्‍लेखनीय है कि इंदिरा सरकार के दौरान कुछ आदिवासी जन‍जातियों को कानून बना कर परिवार नियोजन से अलग रखा गया था जिसके अंर्तगत फूलकुमारी आती है। इस आदिवासी महिला के पति मनरेगा के अंर्तगत कार्यकरने वाला मजदूर है।
उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों राजधानी रायपुर में गर्भाशय कांड का मुददा काफी चर्चा में रहा है, जिसमें डाक्‍टरों पर यह आरोप लगाया गया था कि सरकार की गरीबों के निश्‍शुल्‍क ईलाज योजना का लाभ उठाने के लिये धोखा से आपरेशन किये गये। इस बारे में जब राज्‍य के स्‍वास्थ्‍य मंत्री अनिल अग्रवाल से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि डाक्‍टरों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है जो भी दोषी पाये जायेगें वह बक्‍शे नही जायेगे। वहीं दिल्‍ली स्थित चाणक्‍यपुर में राज्‍य के सूचना अधिकारी उमेश मिश्रा का कहना है कि मीडिया ने इस मुददे को काफी उछाल दिया है जबकि कार्रवाई हो रही है और गरीबों के साथ कोई अन्‍याय नही होने दिया जायेगा। 
पहाडी कोरवा जनजाति के कुछ आदिवासी जिनको डाक्‍टरों ने आपरेशन करके मातृत्‍व से वंचित कर दिया है वह मातृत्‍व के अधिकार को लेकर दिल्‍ली में विभिन्‍न कार्यालयों के चक्‍कर लगाने के साथ ही जंतर-मंतर पर बैठने का ऐलान कर रहे हैं। राष्‍ट्रीय पारिवारिक स्‍वास्‍थ्‍य सर्वे के रिकार्ड को देखा जाये तो राष्‍ट्रीय औसत से राज्‍य की कोरवा जनजाति के बच्‍चों का औसत वजन 46 फीसदी कम है। 70 फीसदी बच्‍चों का जन्‍म मानक वजन से कम पर ही होता है, इसी जनजाति की एक युवती ने बताया कि हमारे यहां पढा लिखे लोग नहीं है सिर्फ बीमारियां और छूआछूत के रोग हैं। देखना है कि राज्‍य सरकार डाक्‍टरों के खिलाफ क्‍या कार्रवाई करती है तो वहीं केंद्र सरकार इन आदिवासी महिलाओं के दर्द को कहां तक समझ पाती है क्‍यों कि जानकारों के अनुसार चिकित्‍सा और स्‍वास्‍थ्‍य के लिये जितनी जवाबदेही राज्‍य की है उतनी ही केंद्र सरकार की है।

राईट टू एजुकेशन कानून की भ्रूण्‍ा हत्‍या



राईट टू एजुकेशन के मूल अधिकार को जिसे संसद ने बनाया माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने वैध करार दिया। यह कानून देश भर में समान रुप से लागू होगा और इसके तहत देश के सभी सरकारी स्‍कूलों और निजी स्‍कूलों में गरीब बच्‍चों को पच्‍चीस फीसदी निश्‍श्‍ुल्‍क सीटें समान रुप से प्राप्‍त होंगी। बहुमत से दिये गये फैसले में माननीय न्‍यायालय ने कहा कि सरकारी और गैर सरकारी सहायता प्राप्‍त सभी स्‍कूलों में यह कानून प्रभावी होगा। सरकारी सहायता नहीं लेने वाले निजी या अल्‍पसंख्‍यक स्‍कूलों में यह लागू नहीं होगा।
सवान यह है कि क्‍या शिक्षा के इस अधिकार की दशा भी मनरेगा सौ दिन के रोजगार गारंटी जैसा नही हो गया है ? क्‍या यह कानून सही रुप से लागू हो पाया है ?  क्‍या इसके पालन करने हेतु कोई निगरानी कमेटी का निर्माण किया गया है ? अब तक के तमाम कानूनों को देखने के बाद ऐसा लगता है यह भी अपनी अकाल मौत मर रहा है। इस कानून की भी भ्रुण हत्‍या हो रही है। बाल श्रम को कानूनन जुर्म बना दिया गया लेकिन राजधानी दिल्‍ली में लाखों की संख्‍या ऐसे बच्‍चों की है जो होटल, ढाबों के अतिरिक्‍त जूते पालिस से लेकर गर्मी के मौसम में डीटीसी बसों के आगे पीछे पानी का पाउच बेचने के लिये भागते हैं।
दो साल से अधिक समय हो गया इस कानून के बने लेकिन राज्‍य सरकारें अभी भी इस कानून को लागू नही कर सकी हैं। एक कड़वी सच्‍चाई यह भी है कि ज्‍यादातर निजी स्‍कूल अब एक उद्योग के रुप में चल रहे हैं और इन पर दबंग और पैसे वालों का कब्‍जा है। इन विद्यालयों में बड़े नेताओं सांसदों, विधायकों और अधिकारियों के ही बच्‍चे पढते हैं वे क्‍या कभी यह पसंद करेंगे कि उनके बच्‍चे के साथ कोई गरीब का बच्‍चा पढें ? आज के दौर में सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चे को भेजना तौहीन हो चुका है जब कि प्राईवेट और कांवेंट स्‍कूलों में बच्‍चों को पढाना स्‍टेटेस सिंबल बन चुका है। कभी शिक्षा ज्ञानार्जन का माध्‍यम हुआ करती थी, गुरु शिष्‍य परंपरा हुआ करता था लेकिन समय के साथ यह बाजार का हथियार बन चुका है। अंग्रेजी बोलना और अंग्रेजी माध्‍यम से पढना अब कारपोरेटी शिक्षा की मजबूरी बन चुकी है, मध्‍य वर्ग के आर्थिक दोहन का सबसे बड़ा श्रोत निकल कर आया है।
हांलाकि  मेरीट का अवलोकन करें तो आज भी सरकारी स्‍कूलों का मेरीट प्राईवेट के उपर हावी है, सीबीएसई का रिकार्ड देखा जाये तो सरकारी स्‍कूलों के छात्रों ने सभी को पीछे छोड़ा है। एक सवाल यह भी उठ रहा है क्‍या सरकार सबको शिक्षा का अधिकार देकर सारी जिम्‍मेदारी निजी स्‍कूलों पर थोपना चाहती है ? धीरे-धीरे सरकारी स्‍कूलों से सुविधायें खीचने की यह शुरुआत तो नही ? सरकार निजी स्‍कूलों को बंद करके या सभी सकूलों का सरकारीकरण करके अपने दायित्‍वों को बेहतर तरीके से क्‍यों नही करना चाहती ? लेकिन सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नही वह जिम्‍मेदारी से भागने में ही सूकून महसूस कर रही है जिससे वैश्‍वीकरण और उदारीकरण के लक्ष्‍यों को प्राप्‍त किया जा सके। सरकार की अघोषित नीति बन चुकी है कि वह प्राथमिक शिक्षा पर सबसे ज्‍यादे बजट का प्रावधान करती है और उच्‍च्‍ शिक्षा के अपने दायित्‍वों से भी भाग रही है। प्राथमिक शिक्षा सबके लिये उपल्‍ब्‍ध करा कर रोजगारपरक उच्‍च शिक्षा को कारपोरेट जगत के हवाले किया जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि सरकार सिर्फ पैसे के आधार पर शिक्षा को एक प्रोडक्‍ट के नाते देखती है।
दूसरी बात कि शिक्षा के अधिकार कानून के कारण पच्‍चीस फीसदी सीटें जो गरीब बच्‍चे को दिया जाना है उसका घाटा पूरा करने के लिये अंधाधुध फीस में बढोत्‍तरी की जा रही है जिसका सीधा शिकार मध्‍य वर्ग को ही होना है। यक्ष प्रश्‍न यह है कि क्‍या सिर्फ दाखिला मिल जाने मात्र से ही गरीब का बच्‍चा स्‍कूल में शिक्षा प्राप्‍त कर लेगा यह तो वैसा ही लगता है जैसे देश के अस्‍सी फीसद किसान यह नही जानते कि किसान काल सेंटर क्‍या होता है या नब्‍बे फीसदी जनता सूचना के अधिकार कानून के प्रयोग करने के तरीके के प्रति अंजान है। एक छोटे गरीब बालक को क्‍या पता कि बाल श्रम गैर कानूनी है, उसे तो बस दो जून की रोटी भर चाहिये। मान लें कि स्‍कूल फीस माफ भी कर दी जायेगी तो निजी स्‍कूलों के तरह-तरह के नखरे कौन पूरे करेगा। कभी स्‍कूल का यूनिफार्म, वह भी अलग-अलग दिनों का अलग-अलग तो कभी स्‍कूल टूर तो कभी कल्‍चर प्रोग्राम तो स्‍कूल और रिक्‍शें का किराया तो कभी अनुपस्थित होने का फाईन कौन देगा ? कभी मम्‍मी पापा की मिटींग  हुई तो शायद वह हीनभावना के कारण अपने अभिभावक को बुलाना ही न चाहे या अभिभावक खाते-पीते मम्‍मी पापाओं के साथ मिटींग में बैठने का दुस्‍साहस न कर पाये।
यदि सरकार वास्‍तव में गंभीर है तो उसे चाहिये कि सभी स्‍कूलों का सरकारी करण करके समान शिक्षा की व्‍यवस्‍था करें लेकिन यह संभव नही दिखाई देता क्‍यों कि सरकार के पास इसके लिये इच्‍छा शक्ति होनी चाहिये और फिलहाल वह कहीं नही दिखाई देती कि शिक्षा संस्‍थान नान प्राफिट सरकारी संगठन हो सकें।

माटी के भाव भी नही बेचा कोयला



किसी भी देश के राष्‍ट्रीय संसाधन पर पहला और आखिरी हक उस देश की जनता का होता है।   लेकिन दुर्भाग्‍यबस एक के बाद एक जिस तरह राष्‍ट्रीय संसाधनों के आवंटन को लेकर घोटाले सामने आ रहे हैं उससे यही लगता है कि सत्‍तारुढ सरकार और उनकी पार्टी के मंत्री राष्‍ट्रीय संसाधनों को अपनी निजी प्रापर्टी मानकर व्‍यहार कर रहे हैं। सरकार ने 2006 में कोयला आवंटन को लेकर बिल बनाया फिर किसी वजह से उसको लटकाये रखा हांलाकि इससे पूर्व ही कैबीनेट में निर्णय हो चुका था कि आक्‍शन करना चाहिये। सरकार ने सिद्धांत रुप में यह मान भी लिया था कि आक्‍शन करना चाहिये । बिल पास करने में सरकार ने 2006 का बिल 2008 में राज्‍य सभा में पेश किया और 2010 में पास करवाया। दो-दो साल वहां लटकायें रखना ही संदेह पैदा करता है।  सरकार की समझ में न आने वाली नीति यह कि जो बिल 2010 में पास हो चुका है उसके नियम 2012 में बनाये जा रहे हैं। इसबीच कोयले के ब्‍लाक फ्री ऑफ कास्‍ट बांट दिये गये।
जब पूरे ब्‍लाक बांट दिये तो बाद में सरकार का यह कहना कि हम आक्‍शन करेंगे इसका क्‍या अर्थ है ? अब फिर से कोयला को चिन्हित करने की कवायद शुरु की गई होती तो समय व धन के साथ ही जो चीजें गुजर चुकी हैं उसमें सरकार कैसे बदलाव करती । यह सबकुछ उहापोह दिखाता है कि सरकार की मंशा साफ नही है। जब रेत, और माटी तक की नीलामी होती है यहां तक कि ताड़ के पेड़ भी नीलाम किये जाते हैं तो कोयले जैसा संसाधन को लेकर सरकार इतना लापरवाह कैसे रही ?  सीएजी ने जो रिर्पोट बनाई है वह इसी आधार पर बनाई है कि अगर यह आक्‍शन होता तो कम से कम देश को 1,86000 करोड़ रुपये का राजस्‍व प्राप्‍त होता, ऐसा उनका अनुमान है। इसतरीके से यदि सत्‍ता पक्ष जिदद कर रहा है कि हम सीएजी को नही मानेंगे, हम कोर्ट को नही मानेंगे तो यह दुराग्रह है जो चिंता का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट ने टूजी मामले में कहा था कि टूजी स्‍पेक्‍ट्रम में आपने जो आवंटन किये हैं वह सारे निरस्‍त करें। कोई भी राष्‍ट्रीय संपदा है, तो उसको आक्‍शन करके ही दिया जाना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट कहता है वो सरकार को नहीं मालूम, सीएजी की रिर्पोट आता है उसे सरकार झूठला देती है। ध्‍यान रहे कि सीएजी की रिर्पोट टूजी के समय भी आई तो उसको भी इन्‍होंने इंकार किया गया था। सीएजी शिर्ष संवैधानिक संस्‍था है और सरकार उसकी रिर्पोट को इतनी आसानी से बिना किसी प्रमाण के कैसे झूठा कह सकती है।
देश के राष्‍ट्रीय संसाधन 120 करोड़ लोगों की प्रापर्टी है वह किसी पार्टी की प्रापर्टी नहीं हो सकता । जिन कंपनियों को ब्‍लाक दिये गये उनमें से एक कंपनी ऐसी है जिसको 12 ब्‍लाक दे दिये गये हैं नियमों के अनुसार एक पीढी दो ब्‍लाक कोयला निकालेगी अगली पीढी दो ब्‍लाक कोयला निकालेगी इनकी छह पीढियों तक यह कार्य चलेगा। जिस तरह से सत्‍ताधारी दल के नेतागण कह रहे हैं कि सीएजी की रिर्पोट गलत है वह कहने का अधिकार तो सिर्फ पीएसी को है। परंपरा के अनुसार सीएजी की रिर्पोट को पीएसी अध्‍ययन करेगी।
टूजी स्‍पेक्‍ट्रम के मामले में रिकवरी नही थी लेकिन कोयला ब्‍लाक आवंटन के मामले में रिकवरी किया जा सकता है। दिये गये कुल कोयला ब्‍लाक में 22 बिलीयन मिट्रीक टन के हैं जिसमें से सिर्फ दशमलव एक फीसदी कोयला ही अभी तक बाहर आया है। यदि इसे निरस्‍त किया जाता है तो नुकसान के काफी बड़े हिस्‍से की भरपाई हो जायेगी। इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सारे खदानों को सरकारी कब्‍जे में ले लिया था। अभी भी यदि कोयला आवंटन को रदद करवाते हैं तो अस्‍सी फीसदी कोयला ही निकलेगा और वह 50 लाख करोड़ की प्रापर्टी होगी।  इससे जो राजस्‍व आता है वह देश के विकास में आता नकि किसी एक उद्योगपति के काम आता। इन पैसों से देश के मूलभूत ढांचे के विकास जैसे सड़क, बिजली, पानी सहित स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में खर्च किया जा सकता था।
सरकार बार-बार यह कह रही है कि कोयले के ब्‍लाक इसलिये दिये हैं कि देश में बिजली की कमी है। देखनी वाली बात यह है कि 193 कंपनियों को कोयला के ब्‍लाक दिये गये जिसमें सिर्फ 62 कंपनियां ही बिजली बनाती हैं, 116 कंपनियां स्‍टील आदि बनाती हैं। नियम यह है कि ब्‍लाक लेने के साढे तीन साल में उत्‍पादन शुरु करना है वह ज्‍यादातर कंपनियों ने न‍हीं किया। इसीलिये विपक्ष की इस मांग में दम नजर आता है कि जब 193 मेंसे 158 ने कोयला उत्‍पादन आरंभ ही नहीं किया और उनकी समय सीमा भी समाप्‍त हो चुकी है तो इसे कैंसिल कर देना चाहये। यदि यह निरस्‍त होता है तो बैंक गारंटी भी निरस्‍त होनी चाहिये। पहले 30 ब्‍लाक निरस्‍त किये थे उनमें से एक की भी बैंक गारंटी इनकैस वापस नही ली गई। यह अत्‍यंत चिंताजनक है कि लोकतांत्रिक शासन व्‍यवस्‍था में सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की मांग पर ध्‍यान देने के बजाये जिनको ब्‍लाक दिया गया है, उनको बचाया जा रहा है, उनका पक्ष लिया जा रहा है और उनको अवधि बढा कर देने की कोशिश की जा रही है। यह लोकतंत्र के लिये तो चिंताजनक है ही राष्‍ट्रीय संसाध्‍नों के प्रति नीति नियंताओं की प्रतिबद्धता को संदेह में खड़ा कर देती है।
                                     …………………

वैश्विक स्तरर पर एफडीआई की हकीकत



यूपीए और मनमोहन सिंह सरकार दोहरे दबाव में है। एक ओर घोटालों और भ्रष्टाचार के गंभीर मामलें हैं तो दूसरी ओर सरकार की गिरती साख, महंगाई, अर्थव्यवस्था और उसके प्रबंधन में उसकी नाकामी के कारण यूपीए के सहयोगी दल मौजूदा सरकार पर से अपना भरोसा खो रहे हैं। इसके अलावा  देशी-विदेशी बड़ी पूंजी, कारपोरेट समूह, वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और मीडिया सरकार पर कड़े आर्थिक फैसले लेने और नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहे हैं। सरकार देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों खासकर अमेरिका को खुश करना चाह रही रही है और ये भी साबित करना चाह रही है की वो अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने की लिए बड़े और नीतिगत फैसलें भी ले सकती है। डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि और रसोई गैस के सब्सिडीकृत सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने से लेकर मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), नागरिक उड्डयन क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई के साथ विदेशी एयरलाइंस को भी निवेश की इजाजत, ब्राडकास्टिंग क्षेत्र में डीटीएच आदि में 74 फीसदी एफडीआई और पावर ट्रेडिंग में 49 फीसदी एफडीआई के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की चार प्रमुख कंपनियों में विनिवेश का एलान ये सब सरकार की इसी कोशिश की कड़ियाँ हैं। बहरहालआर्थिक सुधारों में पिछड़ने के कारण जो अमेरिकी मीडिया मनमोहन सिंह को अंडर एचिवरकह रहा था। रातोंरात उसकी नजर में भारतीय प्रधानमंत्री का कायाकल्प हो हो गया है।
अमेरिकी मीडिया एक तरफ तो मनमोहन की तारीफों का पुल बांधने लगा है, दूसरी ओर उनकी सरकार की सेहत के लिए फिक्रमंद भी है. मजे की बात है कि विदेशी मीडिया के मर्जी मुताबिक सरकार और अर्थ व्यवस्था चलाने में अभ्यस्त कांग्रेस  सरकार को सोशल मीडिया मे अपनी आलोचना नागवार गुजरती है। अमेरिका की बात करें तो,  अरब स्पिरिंग के कारण  वैसे भी अमेरिका इस समय बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहा हैं।  दुनियाभर में अपने आर्थिक हितों की सुऱक्षा के लिए उसने अपनी और नाटो की सेना तैनात कर रखी है। अरब और बाकी दुनिया में इजराइल को कुछ भी करने की छूट दे रखी है पर ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पहली बार अल कायदा का भूत अमेरिका को बेहद डराने लगा है। अब सिर्फ आर्थिक सुधारों के जरिए अमेरिकी कंपनियों के हितों की रक्षा की गरज से ही नहीं, बल्कि आतंक के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की भागेदारी भी अमेरिका के लिए अहम है।
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के जरिये लगातार सुधारों के लिए दबाव बनाने वाले अमेरिकी नीति निर्धारकों ने मनमोहन की लगाम अपने और भारतीय मीडिया के जरिए थाम ली है। भारत सरकार को अमेरिकी मीडिया की आलोचना के लिए सरकार, संसद, नीति निर्धारण और कानून बनाने, बदलने की प्रक्रिया में रातोंरात तब्दीली करने में गर्व महसूस हो रहा है। वॉल मार्ट जैसी कंपनिया अपने पक्ष में नीति बनाने के लिए लॉबिंग करती हैं। खुदरा व्यापार के लिए वालमार्ट ने अब तक 650 करोड़ रुपये लॉबिंग पर खर्च किए हैं। एफडीआइ देश के 4.40 करोड़ खुदरा व्यापारियों, 17 करोड़ किसानों और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत जनता को तबाह करने वाली नीति है।
सरकार कहती है कि एफडीआइ से 30 प्रतिशत लघु उद्योगों को फायदा होगा, एक करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा, महंगाई कम होगी, किसानों को फायदा मिलेगा, किसानों के बीच से बिचौलिए गायब हो जाएंगे। लेकिन यह कोरी बयानबाजी है एक वालमार्ट करीब चालीस दुकानों को प्रभावित करेगा। देश में खाद्यान्न के मूल्य और नीति निर्धारण 24 से 26 फीसदी व्यापारियों के हाथ में हैं। किसान अपनी मेहनत, पराक्रम से पूरे देश का पेट भर रहे हैं. रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन हो रहा है, लेकिन वायदा बाजार के कारण महंगाई कम नहीं हो रही। 
सरकार अपने निर्णय के पक्ष में सुनहरी तस्वीर और उजला पक्ष ही रखेगी ये बात लाजिमी है। दुनियां के सबसे बड़े बाजारों में शुमार भारत में खुदरा व्यापार देश की अर्थव्यवथा की रीढ़ की हड्डी है जिस पर सरकार ने हथौड़ा चलाया है। देश में खुदरा व्यापार से जुड़े लाखों व्यापारी बरसों से कम मुनाफे में आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते आ रहे हैं।
थोक व्यापार में एफडीआई की मंजूरी सरकार पहले ही दे चुकी है। खुदरा बाजार में देसी कंपनियों के स्टोर ने खुदरा बाजार और व्यापारियों पर सीधे असर डाला है। आकर्षक ऑफर और कम दाम के कारण इन स्टोर में जुटने लगी है, जिसका सीधा असर गली, मोहल्ले की किराना और सब्जी की दुकानों पर दिखने लगा है। वहीं फेरी वाले और गांव-देहात से कस्बों और गांवों में सब्जी, फल और अनाज बेचने वाले छोटे व्यापारी पर तो इसका सबसे अधिक असर हुआ है।

मल्टी ब्रांड की देसी कंपनियों के सैंकड़ों स्टोर देशभर में खुले हैं जिनमें शहरी इलाके की आबादी का छोटा हिस्सा ही खरीददारी करता है। छोटे शहरों, कस्बों और गांव में बसने वाली आबादी जो देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है अभी भी परंपरागत हाट, बाजार से ही रोजमर्रा की खरीददारी करती है। स्थानीय बाजार और आस-पास के इलाकों से थोक माल खरीदकर खुदरा व्यापार करने वाले कारोबारी स्थानीय जरूरतों और मांग के अनुसार माल खरीदते-बेचते हैं जिससे कीमते कंट्रोल में रहती हैं और लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से मनमाफिक उत्पाद भी उपलब्ध हो जाते हैं। 

आजादी के 65 वर्षों में सत्ता चाहे जिस भी दल के हाथ में रही लेकिन किसान, छोटे व्यापारी और खुदरा कारोबारियों के बारे में किसी ने भी गंभीरता से नहीं सोचा और उदारवादी नीतियों के नाम पर देसी उद्योग धंधों को नाश करने का काम किया। सत्तासीन दलों ने हमेशा विदेशी कंपनियों और शक्तिशाली देशों के समक्ष घुटने टेकते हुए उदारवादी नीतियों, विदेशी मुद्रा और अंतर्राष्ट्रीय बाजार के दबाव के तमाम बहाने बनाकर देश के आम आदमी को तो ठगा ही वहीं देसी उद्योग-धंधे और हाट-बाजार को तबाह करने का कुचक्र रचने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

विपक्षी दल, व्यापारी संगठन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि खुदरा बाजार में एफडीआई की मंजूरी से छोटे व्यापारियों और किसानों को भारी नुकसान होगा लेकिन सरकार मुद्दे की गंभीरता और व्यापकता पर विचार करने की बजाए हठ और कुतर्क पर उतारू है।

विदेशी कंपनियां बेहतर रणनीति, प्रबंधन और संग्रहण क्षमता के चलते देसी व्यापार और कारोबारियों पर बीस साबित होगी ये बात साफ है। विदेशी उत्पादों के प्रति देशवासियों की मानसिकता भी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में यह तय हो गया है कि आने वाले समय में विदेशी कंपनियां देसी हाट और बाजार पर कब्जा जमा लेंगी और देसी उद्योग-धंधे, किसान और खुदरा कारोबारियों के लिए बाजार में कोई जगह नहीं बचेगी।
पिछले कुछ सप्ताहों में यूपीए सरकार का राजनीतिक संकट जिस तरह से बढ़ा है और 2014 के बजाय 2013 में ही आम चुनाव होने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है, उसे देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों का जबरदस्त दबाव बढ गया है। इसी दबाव, जल्दबाजी और घबराहट में कांग्रेस नेतृत्व ने यह दाँव चला है। दरअसल, लगभग चार सौ अरब डालर के भारत के रीटेल कारोबार में कॉरपोरेट हिस्सेदारी केवल पांच प्रतिशत है। रेहड़ी-पटरी पर अपनी दूकान सजा कर गुज़ारा करनेवालों को जोड़ लिया जाए तो देश में फिलहाल कुल पांच करोड़ खुदरा विक्रेता हैं। यानि सीधे सीधे कहा जाए तो प्रत्येक आठ हिदुस्तानियों पर एक रिटेलर है। चीन में यह संख्या 100 चीनियों पर एक की है। फिक्की की दी हुर्इ सूचना के मुताबिक रीटेल कारोबार में खाने-पीने का हिस्सा 63 फीसदी है।
सरकार का यह दावा कि वालमार्ट जैसी कंपनियों के आने से छोटे दुकानदारों की दुकानें बंद नहीं होंगी, जान-बूझ कर दिया गया गलत बयान है।
अमेरिका की आयोवा स्टेट युनिवर्सिटी का अध्ययन दिखाता है कि आयोवा में वालमार्ट के आने के शुरुआती एक दशक में यहां 555 गल्ले की दुकानें, 298 हार्डवेयर की दुकानें, 293 निर्माण सामग्री बेचने वाली दुकानें, 161 अलग-अलग किस् के सामान बेचने वाली दुकानें, 158 महिला परिधान की दुकानें, 153 जूते की दुकानें, 116 दवा की दुकानें और 111 पुरुष वस्त्र की दुकानें बंद हो गर्इं। भारत में, जहां छोटे दुकानदारों द्वारा प्रतिरोध करने की क्षमता और कम है, इससे कुछ भी अलग क्यों होगा?
तथ्य यह है कि बाज़ार में वालमार्ट के आने के 15 वर्षों के दौरान 31 सुपरमार्केट श्रृंखलाएं दिवालिया हो गर्इं। वालमार्ट के 16 लाख कर्मचारियों में सिर्फ 1.2 फीसदी ही गरीबी रेखा से ऊपर जीते हैं। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स कहता है कि एक परिवार के साप्ताहिक खरीद के आंकड़ों को देखें तो वालमार्ट की कीमतें दूसरों के मुकाबले कम नहीं हैं।
थाइलैंड में सुपरमार्केट के चलते पड़ोस की पारंपरिक दुकानों में 14 फीसदी की कमी सिर्फ शुरुआती चार साल के भीतर गर्इ।
भारत में बेंगलुरु, अहमदाबाद और चंडीगढ़ के 33-60 फीसदी सब्ज़ी और फल विक्रेताओं ने ग्राहकों की संख्या में 15-30 फीसदी कमी, बिक्री में 10-30 फीसदी की कमी और आय में 20-30 फीसदी कमी की बात कही है, जिनमें सबसे ज्यादा असर बेंगलुरु में देखा गया है जहां देश के सबसे ज्यादा सुपरमार्केट मौजूद हैं।
अमेरिका में वालमार्ट की दुकानों का औसत आकार 10,800 वर्ग फुट है जिनमें सिर्फ 225 लोग नौकरी करते हैं। इस लिहाज से देखें तो रोज़गार पैदा होने का सरकारी दावा धोखा नहीं लगता?
सरकार ने अपनी आलोचना को नरम करने के लिए इस बात पर जोर दिया है कि वालमार्ट को 100 मिलियन डॉलर तक के निवेश पर सिर्फ 51 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। एकबारगी तो यह बात आकर्षक जान पड़ती है लेकिन क्या वालमार्ट का प्रबंधन इतना मूर्ख है कि जब उसका मौजूदा रीटेल कारोबार 400 अरब डॉलर हो तो वह इतने से संतोष कर लेगा ? वालमार्ट दरअसल एक तम्बू में सिर घुसाने वाले ऊंट की चाल चल रहा है जो बाद में उसमें बैठे लोगों को भगाकर तम्बू पर कब्ज़ा कर लेता है। आप ऊंट की जगह वालमार्ट को रख कर देखिए कि हमारे करोड़ों खुदरा दुकानदारों के सामने कितना भयानक खतरा है।
सरकार बार-बार जो दलील दे रही है कि वालमार्ट को भारत में कारोबार लगाने देने से कीमतें कम होंगी और रोज़गार बढ़ेंगे, यह अब तक दुनिया में कहीं भी साबित नहीं हुआ है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की एक कमेटी की 2004 में आर्इ रिपोर्ट कहती है किवालमार्ट की कामयाबी से वेतन-भत्तों पर दबाव पड़ा है, कामगारों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और देश भर में समुदायों के जीने के तौर-तरीके को खतरा पैदा हुआ है। आखिर किस तर्क से सरकार यह कहती है कि भारत में इसका असर उलटा होगा? इसकी सिर्फ एक वजह है और वो यह कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मदद पहुंचाने के लिए जान-बूझ कर झूठ बोल रही है।
संडे टाइम्स ने एक अध्ययन किया था जो दिखाता है कि ब्रिटेन के 108 तटीय क्षेत्रों यानी देश के 7.4 फीसदी हिस्से में खाद्य बाजार पर टेस्को का पूरा नियंत्रण है। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में सेंटर फॉर फूड चेन रिसर्च में एग्री बिज़नेस के प्रोफेसर डेविड होग्स के मुताबिक वालमार्ट और टेस्को जैसे सुपरमार्केटों की बाध्यता है कि वे अपने मूल क्षेत्र यानी अमेरिका और ब्रिटेन से कारोबार को बाहर ले जाएं क्योंकि उनके अपने बाज़ार अब परिपक्व हो चुके हैं इसलिए वे ज्यादा आबादी और कम सुपरमार्केट वाले देशों की खोज में हैं।
थाइलैंड में टेस्को के सुपरमार्केट का आधे से ज्यादा खुदरा बाज़ार पर कब्ज़ा है। टेस्को जब थाइलैंड में आया था तो इसने स्थानीय लोगों से रोजगार का वादा किया था लेकिन अब इस पर खुले तौर पर लोग गलत तरीके से व्यापार करने और स्थानीय कारोबारियों से उलझने के आरोप लगाते हैं। जहां तक यह दावा है कि ये सुपरमार्केट स्थानीय उत्पादकों से खरीदेंगे, इसका झूठ तब पकड़ा गया जब टेस्को के खिलाफ जुलार्इ 2002 में दर्ज एक मुकदमे में कोर्ट ने पाया कि टेस्को उत्पादकों के उत्पाद ले जाने के लिए स्लॉटिंग शुल्क लेती है और आपूर्तिकर्ताओं से प्रवेश शुल्क लेती है। बैंकॉक में चार साल पहले खुले टेस्को के स्टोर के कारण स्थानीय गल्ले की दुकानों की बिक्री आधे से भी कम रह गई है।

मलेशिया में टेस्को 2002 में गर्इ थी। जनवरी 2004 में पाया गया कि टेस्को से काफी नुकसान हुआ है इसलिए सरकार ने तभी से किसी भी नए सुपरमार्केट के निर्माण पर तीन प्रमुख शहरों में रोक लगा दी।
यह जानना दिलचस्प होगा कि वालमार्ट जो कुछ बेचती है, उसका 92 फीसदी चीनी कंपनियों से आता है। भारत का बाज़ार पहले ही चीन के सस्ते माल से पटा पड़ा है और हमारे व्यापारी चीन द्वारा अपनाए जा रहे गलत श्रम नियमों पर चीख-चिल्ला रहे हैं। सरकार पूरी ईमानदारी से एक बार बताए कि क्या वह अब भी विदेशी उद्यमों के लिए खुदरा बाज़ार को खोल कर हमारे देश के करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीनने को तैयार है। आखिर सरकार की मजबूरी क्‍या है ?
                                     …………………