गुरुवार, 30 मई 2013

समृद्धि के असली मायने



हमारे पास यदि पैसा हो तो सबसे पहला काम किसी बडे शहर में मकान या फलैट खरीदेगें, महंगी नई ब्रांड की कार और सुख-सुविधा का प्रत्‍येक साधन। अगले चरण में दो चार रायफल आदि खरीदेंगे फिर चुनाव लडने की सोचेंगे, वहीं जहां पुस्‍तैनी घर गांव होगा उसी निर्वाचन क्षेत्र से लडने के लिये बडे-बडे होर्डिंग लगाकर गांव वालों को फर्जी तौर होली, दिवाली, ईद या नये साल की शुभकामनाएं देना शुरु कर देंगे, खैर। कनाडा के एक मित्र से कभी-कभी बात करते-करते उबन होने लगती है कारण कि वह मेरा दिमाग चाटता है।  भारतीय जन-जीवन के बारे में पूछ-पूछ कर और मै हर कमी को भी विशेषता के रुप में बता कर उसके मन में उज्‍ज्‍वल छवि बनाये रखने का प्रयास करता हूं। उसने चर्चा के दौरान कुछ बातें बताई और पूछा आप जिम बाल्सिली को जानते हो ? मैने कहा नहीं। तो उसने बताना शुरु किया कि वह ब्‍लैकबेरी फोन के संस्‍थापक है और अपने जीवन के 40 वें साल में अरबपति बन गये। लेकिन उन्‍होंने अपना गांव वाटरलू नहीं छोडा और गांव के युवको को रोजगार मिले इसके लिये अपनी कंपनी ब्‍लैकवेरी को गांव में ही स्‍थापित कराया। उनके लिये टोरंटो और न्‍यूयार्क में घर बनाना आसान था लेकिन गांव में ही रहना पसंद किया और विश्‍वविद्यालय के शोध छात्रों के लिये प्रयोगशाला और शोधसंस्‍थान का निर्माण किया। अपने गांव में वह दुनियां के नामचीन वैज्ञानिकों को बुलाते हैं और विभिन्‍न विषयों पर वाद-विवाद करके गांव की बेरोजगारी कैसे दूर हो इसका उपाय खोजते र‍हते हैं। उनका सपना है कि उनका गांव दुनियां का नंबर वन शोध संस्‍थान कैसे बने। हमारे यहां के राजनेताओं की तरह वह करोड्रों रुपया खर्च करके सदी के सबसे बडा वैवाहिक समारोह पर पैसा नही खर्च करते।
इसीतरह इजरायल में स्‍टेफ वर्थहाईमर प्रसिद्ध उद्योगपति है और देश के कुल उत्‍पादन का दस फीसद वर्थ के उद्योगों द्धारा होता है, हम सभी वारेन वफैट को तो जानते ही हैं, कहा जाता है कि दुनियां के सबसे अमीर इंसान है। वारेन भी अब वर्थ के पार्टनर हैं और वह चा‍हते तो अपना व्‍यवसाय अमेरिका, यूरोप में कर सकते थे लेकिन उन्‍होंने इजरायल के अत्‍यंत पिछडे ईलाके में अपना उद्योग डाला जो लेबनान की सीमा पर है। आज युद्ध हो जाये तो इनका उद्योग तबाह हो जायेगा लेकिन उनको इसकी परवाह नही है। उनका सपना है कि देश के पिछडे क्षेत्र के युवक भी मुख्‍यधारा में आकर समृद्ध हों। इतना ही नही मनोरंजन के लिये आर्टगैलरी और संग्रहालय भी बनाकर उन्‍होंने रखा है साथ ही 14 से 18 साल के छात्रों को निश्‍शुल्‍क औद्योगिक प्रशिक्षण देने की कार्यशाला भी कार्य करती है। मेरे मित्र ने बताया कि वहां पर मौजूद वैज्ञानिक शोध केंद्र में तकरीबन 1800 इंजिनियर कार्य करते हैं और जब एकबार मै उनके उद्योग केंद्र को देखने गया तो स्‍वयं स्‍टेफ मेरे साथ चार-पांच घंटे तक प्रत्‍यके विभाग में घुमते रहे और कोई कर्मचारी न तो काम छोडकर उनके सम्‍मान में खडा हुआ और नाही उनके आने जाने का कोई गौर किया, बस सभी अपने काम में तल्‍लीन दिखे। यहां तक कि चौकीदार भी बस सुरक्षा ही करता नाकि खडे होकर बडे साहब को सलाम ठोकता।
हमारे यहां इसका उल्‍टा है मंहगी टयूशन बच्‍चा हिंदी में फेल हो जाये या किसी भी भारतीय भाषा में फेल हो जाये तो कोई फिक्र नहीं अग्रेंजी में पास हो जाये जिससे वह मम्‍मा को अंग्रेजी में कम से कम गाली तो दे सके। हमारी अस्मिता क्‍या है ? विकास क्‍या है ?  प्रगति क्‍या है ? संस्‍कार क्‍या है ? इस पर विचार करने का समय किसके पास है। ‘’सास भी कभी बहू थी’’ और ‘’बुगी-बुगी’’ की देखने और तेरह साल की बेटी के मिनी स्‍कर्ट पहन कर स्‍टेज पर नाचने से न तो हम बहुत प्रगतिशील हो गये है नाही वैश्‍वीकरण की बाजी हमने जीत ली है। 
-मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय