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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

11:44 pm

प्राचीन भारत के गर्भनाल से जुडा है पूर्वोत्‍तर



आज भी हमें पूर्वोतर के चेहरे अपने चेहरे नहीं लगते। यही कारण है कि आज भी उनको ‘’चिंकी’’ कहकर अपमानित किया जाता है। कुछ दिनों पूर्व आसाम दंगों के दौरान देश में जगह-जगह इनको योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया गया। जिसतरह दिल्‍ली में पूर्वोत्‍तर के एक छात्र को बेरहमी से पीटा गया उसमें नस्‍लवाल की श्रेष्‍ठता और हीनता की बजबजाती मानसिकता ही थी। हममें से अधिकांश लोग नहीं जानते पूर्वोतर के जनजीवन को जहां हजारों सालों बाद भी, ब्रिटीश कालखंड में ईसायईत के तमाम हथकंडो के झेलने के बाद भी, बडे गर्व के साथ वहां के लोग रामायण और महाभारत से अपने रिश्‍ते जोडते हैं। वह कहते हैं कि उनके ही पूर्वज थे रामायण और महाभारत के लोग जिनकी परंपरायें आज भी हम जीवित किये हैं। सूर्यदेव को सबसे पहले प्रणाम करने वाली अरुणांचल प्रदेश की 54 जनजातियों में से मीजो मिश्‍मी जनजाति खुद को भगवान कृष्‍ण की पटारानी रुक्मिणी का वंशज मानती है। रुक्मिणी आज के अरुणांचल के भीष्‍मकनगर की राजकुमारी थी। उनके पिता का नाम भीष्‍मक और भाई रुकमंद था। इस जनजाति के सिर के बाल आधुनिक हेयर कट सदियों से चले आये हैं, वे कारण बताते हैं कि भगवान कृष्‍ण ने सुदर्शन से यह आधा बाल रुकमंद के साथ युद्ध में मुंडन कर दिया था। 12 लाख की आबादी वाली मेघालय की खासी जयंतिया अपने तीरंदाजी सेना को लेकर आज भी अलग पहचान रखती है। आज भी यह जनजाति तीरंदाजी में अंगूठे का प्रयोग नहीं करते। उनको नहीं मालूम एकलब्‍य कौन थे। सिर्फ इतना मालूम है कि उनके किसी पुरखे ने अपना अंगूठा गुरुदेव को दान किया था इसलिये हम अंगूठा का प्रयोग करना पाप मानते हैं। नागालैंड का दीमापुर कभी हिंडींबापुर नाम से जाना जाता था यहां आज भी दीमाशा जनजाति है जो भीम की पत्‍नी हिडीम्‍बा से उत्‍पन्‍न घटोत्‍कच को अपना पूर्वज मानती है। असम के बोडो खुद को ब्रम्‍हा के पुत्र मानते हैं तो असम के ही कार्बी-आबलांग जनजाति के लोग रामायण के सुग्रीव को अपना पूर्वज मानते हैं। म्‍यामार अर्थात बर्मा से जुडने वाले जनपद उखरुल का पहले का नाम उलूपी रहा जो अर्जुन की पत्‍नी हुआ करती थी। यहां पर ताखुंल जनजाति हैं जो उलूपी को ही अपना पूर्वज मानती है, यह जनजाति मार्शल आर्ट में सिद्धहस्‍त है और अलगाववादी गुट एनएससीएन में कुछ युवक भी शामिल हैं। अर्जुन की दूसरी पत्‍नी चित्रांगदा मणिपुर के मैतेई समाज की है। यही कारण है आज भी पूर्वोत्‍तर में अधिकांश जनजातियां मातृसत्‍तात्‍मक समाज की गौरवशाली परंपरा में है। हजारों सालों की मुगल और ब्रिटीश कालखंड की काली परछाई आज भी उनका पीछा नहीं छोड रही, नहीं तो क्‍यों होता जानलेवा हमला दिल्‍ली में ?  







11:19 am

अंग्रेजी कानून से आजादी कब ?

पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ एपीजे अब्‍दुल कलाम वाराणसी में छात्रों के साथ थे और उन्‍होंने छात्रों से  निवेदन किया कि आपको डिग्री देते समय जो काला चोगा पहनाया जाता है वह हमें गुलामी की याद दिलाता है इसे मत पहने। इसके बाद बीएचयू ने कहा है कि जल्‍दी ही हम विवि के तौर तरीकों में संशोधन करके ब्रिटीश काल की अनेक पंरपराओं का अंत करेंगे। मै स्‍वागत करता हूं उनके इस सराहनीय संकल्‍प का। आज भी कंपनी शासन और ब्रिटीश शासन के दौरान के 34 हजार कानून और विभाग चलाये जा रहे हैं। 1813 में ब्रिटीश हाउस आफ कामंस की डीबेट में विल्‍वर फोर्स कहता है कि ’अगर कम्पनी का माल भारत के गांव-गांव में पहुंचाना है तो हमें ‘’फ्री ट्रेड’’ करना होगा और भारतीय अर्थव्‍यस्‍था को नष्‍ट करना होगा। इसी के बाद 1813 में ही कंपनी का चार्टर फार फ्री ट्रेड नाम का चार्टर आ जाता है। इसमें ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की सरकार पहली पालिसी यह बनाती है कि ब्रिटीश माल पर हिंदुस्‍थान में कोई टैक्‍स नहीं लगेगा। भारतीय वस्‍तुओं पर टैक्‍स लगाने और महंगा करने के लिये इसी चार्टर के अंतर्गत सबसे पहला टैक्‍स सेंट्रल इक्‍साइज टैक्‍स, फिर सेल्‍स टैक्‍स, उत्‍पादन और बिक्री के बाद इनकम टैक्‍स, इसके बाद वस्‍तुओं के आवागमन पर आक्‍ट्राय टैक्‍स और टोल टैक्‍स। इसप्रकार 1813 के चार्टर से भारत पर शोषण के लिये ये पांच टैक्‍स लगाने के लिये बकायदा पांच डिपार्टमेंट भी खोल दिये गये जो आज भी बदस्‍तूर जारी है। बीस-बीस साल के चार्टर के बाद जब फिर से ब्रिटीश पार्लियामेंट में डीबेट होता है तो एक सांसद कहता है-अरे आपने भारतीयों पर सौ रुपये की आमदनी पर 97 रुपये टैक्‍स लगा दिया है इसतरह तो वे मर जायेगें। तो जबाब मिलता है यही तो हम चाहते हैं या तो वे मर जाये या टैक्‍स चोरी शुरु कर दें, जब वे चोरी करेंगे तो भ्रष्‍ट हो जायेगें और हमारी सत्‍ता हमेशा कायम रहेगी। आपको निवेदन करुंगा टैक्‍सेसन का यह सिस्‍टम आजादी के बाद 1972 तक चलता रहा अर्थात सौ रुपये की इनकम पर 97 रुपये का टैक्‍स देना होता था। बहरहाल विलियम एडम 1840 में एक सर्वे कराता है भारत के रिवेन्‍यू अधिकारियों से कि पता करो भारत का कुल ट्रेड दुनियां के कुल व्‍यापार में कितना है तो पता चलता है भारत का पूरे विश्‍व में व्‍यापार में हिस्‍सेदारी 33 फीसदी है जबकि आजादी के इतने सालों बाद हमारा कुल व्‍यापार एक फीसदी के आसपास अटका हुआ है। 
इतना ही नहीं इस सर्वे में यह बात भी लिखी जा रही है कि भारत में स्‍टील बनाने की दस हजार फैक्‍ट्रीया है जिसमें बनी हुई स्‍टील में कभी जंग लग ही नही सकता। इसका एक उदाहरण मेहौरौली का लौह स्‍तंभ है जो आज भी है। ब्रिटीश पार्लियामेंट में बाकायदा सात दिन तक इस बात को लेकर हायतौबा मचता है कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी के सारे जहाज भारतीय लोहे से ही बनाया जाये डेनिश स्‍टील से नहीं बनाये जाये। उस जमाने में भारतीय स्‍टील के बाद डेनमार्क का स्‍टील बनाने में स्‍थान रहा है। क्‍या यह बिना किसी हाईटैक के भारत कर सकता था ? कौन बनाता था यह स्‍टील हमारे सरगुजा से लेकर आसाम, मध्‍यप्रदेश, बिहार और उत्‍तरप्रदेश के आदिवासी ही अपनी फैक्‍ट्रीयों में स्‍टील बनाते थे, जो न तो बीटेक थे नाही आज के तथाकथित हाइटेक थे। अब वही आदिवासी अगर लौह अयस्‍क अपनी खदानों से लेना चाहे तो कानून उनको चोर मानते हुए जेल भेज देता है, जो अंग्रेजों का बनाया हुआ कानून आज भी चल रहा है। 1890 में ब्रिटेन में वेजीटेरियन काउंसिल की एक पत्रिका में गांधी जी लिखते हैं- ‘’ये अंग्रेज कितने क्रूर हैं इन्‍होंने तो भारतीय नमक पर भी टैक्‍स लगा दिया, मुझे लगता है जिन जहाजों से ये भारतीय माल अपने देश में ले जाते हैं उन जहाजों को खाली ले जाने पर डूबने का भय है इसलिये ये नमक लाद कर ले जाते हैं, लेकिन मै चुप नहीं बैठूंगा और नमक कानून तोडूंगा’’। भारतीय संसाधनों के दोहन के लिये 1865 में अंग्रेजों ने इंडियन फारेस्‍ट कानून बनाया ताकी भारतीय जंगलों का सफाया हो सके और आईएफएस अधिकारी को नियुक्‍त कर दिया। इस कानून के मुताबिक कोई भी आदिवासी या भारतीय पेड से लकडी नही काट सकता जबकि अंग्रेजों के ठेकेदार ही इस काम को कर सकते हैं। 1860 का पुलिस एक्‍ट से 1857 के विद्रोह के परिपेक्ष्‍य में समझने का प्रयास किया जाये तो इंडियन पुलिस एक्‍ट जिसमें अंग्रेज सिपाही भारतीयों और क्रातिकारियों पर लाठी चार्ज का अधिकार होता था हर अंग्रेज को राईट टू आफेंस तो होता था लेकिन मार खाने वाले को राईट टू डिफेंस नही था। यह आज भी चल रहा है कानून-व्‍यस्‍था मेंटेन करने के नाम पर कल का छात्रों पर किया गया लाठी चार्ज उसी का नतीजा है। यही कानून आधार बना था 13 अप्रैल्‍ 1919 को जलियावाला बांग कांड का आधार बना । निर्लज्‍ज सरकारी लीपापोती वाले कमीशन के सामने डायर कहता है कि 18 मिनट तक लगातार फायरिंग के बाद मेरे पास कारतूस खतम हो गये थे लेकिन मुझे संतोष इस बात का है कि काफी लोग तो भगदड में मर गये और कुछ कूंए में कूद गये जो डूबकर मर गये और हमारा कारतूस बच गया। जरा याद किजीये उस कुर्बानी को और आईये हम अपने जनप्रतिनियों से कहें कि हमें सौ फीसदी आजाद हिंदुस्‍तान चहिये।