Post Top Ad

Post Top Ad

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

8:28 pm

आतंक की सियासत मजबूरी या विरासत ?



एक फ्रांसिसी फोटोग्राफर मेरे मित्र हैं। महीनों बाद आज लगभग एक घंटा से अधिक समय तक चैट हुआ। बातचीत की शुरुआत वेनिस शहर को लेकर हुई, जहां वह सपरिवार गया था। अचानक उसने पूछा तुम इजरायल के बारे में क्‍या सोचते हो ? मैने पूछा तुम मेरे विचार एक दोस्‍त के नाते जानना चाहते हो या एक भारतीय के नाते ?  उसने तपाक से कहा एक भारतीय के नाते और मैने फौरन कहा कि जो मेरी सरकार सोचती है वही, हवाटएवर इंडिया गर्वमेंट थिंकस। (हांलाकि भारत सरकार ने संयुक्‍त राष्‍ट्र में जो प्रस्‍ताव का समर्थन किया है उसका मै विरोधी हूं। मै इजरायल का समर्थक हूं। लेकिन एक विदेशी को अपना घरेलू अंर्तकलह क्‍यों बताउं ?) फ्रांसिसी मित्र ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में कई ऐसी बातें बताई जो सुनकर चौक गया। उसने कहा कि दो साल पहले भारत (महाकुंभ इलाहाबाद) से आने के बाद मै दुबई, वेनिस, इजरायल, पाकिस्‍तान जा चुका हूं, हांलाकि अप्रैल में फिर भारत आना चाहता था क्‍यों कि मुझे तिब्‍बत में बौद्ध लोगों के उत्‍सव की फोटो लेनी थी। खैर उसने कुछ आतंकी संगठनों के बारे में जो देखा है वह बताया जो कम से कम मेरे लिये नई जानकारी थी। 

उसके अनुसार दुनियां का सबसे क्रूर आतंकी संगठन है लार्डस रेजिस्‍टेंस आर्मी जो उत्‍तरी यूगांडा में सक्रिय हैं। यह संगठन उन युवकों की भर्ती करता है जो अपने सगे भाई या बहन का अपहरण करके हत्‍या कर दें और प्रमाणित करें कि वह पक्‍के आतंकी बन चुके हैं। सन 1986 में उत्‍तरी यूगांडा के अचोली जाति के लोगों ने इसकी स्‍थापना की थी। मैने पूछा क्‍यों ? तो उसने बताया दरअसल शुरुआत में कोई भी आंतकी संगठन असमानता, भेदभाव, अन्‍याय के खिलाफ ही पैदा होते हैं। यही कारण है लार्डस रेजिस्‍टेंट आर्मी के जन्‍म का भी। लेकिन बाद में यह अफ्रीका में बाईबिल पर आधारित कटटरपंथी राष्‍ट्र का पैरोकार हो गया। दरअसल मुसेविनी यूगांडा के राष्‍ट्रपति बने और उन्‍होंने अचोलियों पर बहुत कहर बरपाया था। शुरुआत में ये लोग 14-15 साल के बच्‍चों का अपहरण करेंगे फिर उसे अपनी छोटी बहन, भाई या मां की हत्‍या कर देने तक प्रशिक्षित करते हैं। इतना क्रूर तो अलकायदा भी नहीं है।
अरब क्षेत्र के अनेक देशों में लोकतंत्र है ही नहीं और नाही विपक्ष की कोई कल्‍पना है। जनता की आवाज शासकों के सामने उठाने वाला और सरकार या शासन सत्‍ता की गलत नीतियों का विरोध करने वाला कोई नहीं है। निरंकुश सत्‍ता अपने विरोधियों की हत्‍या कर देगी या उन्‍हें अपना जरखरीद गुलाम बना लेगी। यही कारण है कि अनेक बार आपको अफ्रीकन महा‍द्धीप के अनेक देशों में तख्‍ता पलट, तरह-तरह के रिवोल्‍यूशन, सैनिक शासन दिखाई देगा। तहरीर चौक याद है ?  
यहां के गरीब लोग सहायता के लिये मस्जिदों में जाते हैं। मिस्र में मुस्लिम ब्रदर हुड, फिलीस्‍तीन के हमास और लेबनान के हेजबुल्‍ला जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती हो जाना वहां के युवकों में एक फैशन है। ये आतंकी संगठन बकायदा छात्रों के लिये कोचिंग क्‍लासेज, रोजगार, मेडिकल सेवा और वाद-विवाद में न्‍यायालय जैसा कार्य भी जनता के लिये करते हैं। युवको को भर्ती करने के लिये ये तरह-तरह का संपादित वीडियों दिखाते हैं जैसे इजरायल अपने वेस्‍ट बैंक वालें इलाके में फिलीस्‍तीनीयों की चेकिंग करता है, क्‍यों कि इजरायल के दोनो ओर फिलीस्‍तीन है। इस चेकिंग के दौरान कई गर्भवती महिलायें घंटो खडी रहती हैं और बच्‍चा भी हो जाता है। इजरायल का यहूदी समुदाय फिलीस्‍तीनीयों की जमीन कब्‍जा कर लेते हैं, उनको खेती नहीं करने देते आदि। फिर मजहब और राष्‍ट्रीयता के नाम पर उनको भडकाया जायेगा। इजरायल के सिनेमा हाल से लेकर स्‍कूल, हास्‍पीटल पर हमले करने को शबाव का काम बताया जायेगा।
पाकिस्‍तान में जैश ए मुहम्‍मद इस्‍लामाबाद के अपने हेड क्‍वार्टर से संचालित है। इस्‍लामाबाद में इसका हेडक्‍वार्टर अनेक एकड जमीन पर फैला है। लश्‍करे तोयबा का हेडक्‍वार्टर लाहौर में हैं जो 140 एकड में है। इन हेडक्‍वार्टरों में स्‍वीमिंग पुल, चमडा उद्योग, नकली करेंसी के कारखाने, घोडों के तबेले, मोटर मै‍कैनिक वर्कशाप वगैरह के साथ मदरसे, जिम, फायरिंग, बमप्रशिक्षण आदि के अनेक क्‍लासेज है। लगभग 200 स्‍कूल-कॉलेज और यहां तक की चैनल और बडे अखबार प्रकाशन संस्‍थान भी है। भारत में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो उसके पाकिस्‍तानी प्रतिनिधी को पहले से निश्चित रकम दी जाती है, जिसमें से 35 प्रतिशत रकम आतंकी के परिजन तक पहुंचेगा बाकी रकम दलाल खा जायेगें।
लश्‍करे तोयबा, जैश ए मुहम्‍मद, हिजबुल मुजाहिदीन अपनी गतिविधियां एक दूसरे से सलाह मशविरा के बाद तय करते हैं। कुछ साल पहले इन्होंने एक संयुक्‍त मोर्चा बनाकर हरकत उल जेहाद को बांग्‍लादेश अपनी गतिविधियों के लिये भेजा था। नेपाल में ये अपने दोस्‍तों की तलाश में हैं। माओवादियों, उल्‍फा, तमिल आतंकी, नक्‍सलीयों के साथ इनकी भरपूर सहानुभूति है ताकी भारत को चारों ओर से घेरा जा सके।
दुनियां भर में फैल रहा आतंकवाद नया नहीं है। उन्‍नीसवी शताब्‍दी के अंत में यूरोप में आतंकवाद की बडी लहर आई। इसमें इटली का राजा, आस्‍ट्रीया की रानी, जर्मनी का राजा, रशिया का जार, और अमेरिकी राष्‍ट्रपति तक पर आंतकी हमले हुए। फ्रांस की संसद और वहां के काफी हाउस में बम विष्‍फोट हुए। अमेरिका में गोरे युवकों ने काले युवकों को मारने के लिये ‘’क्रू क्‍लस क्‍लन’’ बनाया, एशिया में तमिल चीतों ने आत्‍मघाती बम का आविष्‍कार कर डाला। हांलाकि एकबार इन सबको पश्चिमी राष्‍ट्रों ने खतम तो किया लेकिन आतंक का आइडिया पूरे विश्‍व में फैल गया। इजरायल-फिलीसतीन संघर्ष के कारण मध्‍यपूर्व देशों से लेकर पूरी दुनियां में आतंक को फैलने में मदद मिली। 1948 में इजरायल के जन्‍म के बाद से ही मध्‍यपूर्व सतत राजनैतिक ज्‍वालामुखी पर धधकता रहा है। पिछले 25 सालों में दोनों पक्षों ने तकरीबन 15 हजार मानव हत्‍याएं की हैं।
इतिहास में इजरायल के यहूदी समुदाय पर जो बेपनाह जुल्‍म हुए, लाखों यहूदियों का कत्‍लेआम हुआ और वह अपनी मातृभूमि से अलग कर दिये गये। पूरी दुनियां के उन देशों में शरण उन्‍होंने ली जहां उन पर वह जिंदा रह सके। भारत भी एक ऐसा ही देश था जहां इजरायलियों ने शरण प्राप्‍त किया। बाद में इजरायल के इतिहासकारों ने लिखा कि भारत ही एक ऐसा देश है, जिसने हमें अपने बराबर बैठाया और हमारे साईनागास (यहूदी मंदिरों) पर कभी हमले नहीं किये। खैर, मै उस इतिहास में नहीं जाना चाहता लेकिन आज जिस तरह इजरायल अपने अस्तित्‍व के लिये बेहद आक्रामक है उसके पीछे उसके ऐतिहासिक कटु अनुभव है।
इजरायल के दोनों ओर फिलिस्‍तीनी प्रदेश है। पश्चिम में‍ स्थि‍त गाजा पटटी अतिशय गरीबी, अन्‍याय और दरिद्रता से ग्रस्‍त है। कुछ साल पहले इजरायल ने उस पर से अपना कब्‍जा छोड दिया लेकिन उसकी बाहरी नाकेबंदी भी की। इजरायली सेना गाजा पटटी में अनाज, दवाएं, और जीवन के लिये जरुरी सामानों की आपूर्ति रोक देती है। इसलिये गाजा के लोग मिशाईलों से हमला करते हैं। इन मिशाईलों में बहुत से तो लोहार भटिटयों में तैयार होते हैं तो कुछ ईरान से चोरी छिपे आते हैं। फिलीस्‍तीन का दूसरा भाग वेस्‍ट बैंक हांलाकि नाम से वेस्‍ट है लेकिन वह इजरायल का पूर्वी भाग है। इस भाग में इजरायल के यहूदी जमीनों पर कब्‍जा कर लेंगे, खेती नहीं होने देंगे। वेस्‍ट बैंक में इजरायल की तकरीबन 600 से ज्‍यादे ही सुरक्षा चौकियां हैं। वहां से निकलने वाले फिलीस्‍तिनियों को वह रोकते हैं, घंटो तक लाईन में खडा करके सुरक्षा जांच करते हैं, इस दौरान कोई गर्भवती महिला का गर्भपात हो जाये तो उनको कोई फर्क नहीं पडता।
इसका परिणाम होता है कि युवकों को धर्म और राष्‍ट्रीयता के नाम से बरगलाया जायेगा, उनको संपादित वीडियो दिखाकर उत्‍तेजित किया जायेगा और आतंक की जमीन तैयार होगी। इन युवकों को हमास, आईसीआइएस तलाश करते हैं और उनको प्रशिक्षण देकर इजरायल के सार्वजनिक स्‍थानों होटलों, सिनेमा घरों और सार्वजनिका प्रतिष्‍ठानों पर हमले के लिये तैयार करते हैं। ज्‍यादातर आतंकियों के नेता चालाक हैं, धूर्त हैं और धनाढय है जो धन का लालच देकर भी युवकों को फंसाते हैं। सामान्‍य युवक इनके जाल आसानी से फंस जाता है।
इन समस्‍त कारणों का लेना-देना सिर्फ गरीबी, बेरोगारी और भूखमरी ही नहीं है। राजनैतिक कारण कहीं ज्‍यादे जिम्‍मेदार है। आज भी लोकतंत्र के नाम पर छदम और दिखावा वाले लोकतंत्र कायम है। ज्‍यादातर में सैनिक सत्‍ता है, राजतंत्र है तो कहीं पर बिलकुल कबीलाई शासन व्‍यवस्‍था है। विपक्ष, अभिव्‍यक्ति की आजादी, विरोध, असहमति के लिये कोई जगह है ही नहीं। सरकार का पूरा ध्‍यान शहरी वर्ग की ओर, मध्‍यमवर्गीय लोगों पर, विदेशी संबंधों ओर बडे उद्योगपतियों पर टिका रहता है। इसबात का फायदा अलकायदा, हमास, हेजबुल्‍ला, मुस्लिम ब्रदर हुड जैसे आतंकी संगठन उठाते हैं। अनेक बार अमेरिका जैसी ताकतों का सत्‍ता पिपासु सहयोग भी इनको मिलने लगता है। अमेरिका अपने फायदे के लिये कभी इनका संहारक तो कभी सहयोगी बन जायेगा।
याद है अमेरिका कभी ईरान के शाह का समर्थक था तो वहीं इजिप्‍ट और अफगानिस्‍तान की साम्‍यवाद समर्थक सरकारों का विरोधी भी था। बाद में रुस ने अफगानिस्‍तान पर हमला करके उसे एक बहाना दे दिया। इजिप्‍ट के राष्‍ट्रपति अनवर सादात ने साम्‍यवाद का विरोध करने के लिये मुस्लिम ब्रदरहुड को पालापोसा जिसका अमेरिका ने भी समर्थन किया। बाद में यही ब्रदरहुड राष्‍ट्रपति सादात के लिये जब खतरा बन गया तो उसके सदस्‍यों की धरपकड  शुरु हो गई। इनके अधिकांश सदस्‍य सउदी अरेबिया, मिस्र और पाकिस्‍तान की ओर पलायन कर गये।
मध्‍यपूर्व में अमेरिकी समर्थक शासकों के सहयोग के लिये, अफगानिस्‍तान में रुस को शह देने के लिये अमेरिका ऐसे ही धर्मांध युवको की तलाश में था जिसमें से एक ओसामा बिन लादेन निकला। इन युवकों को आतंकी अडडा, प्रशिक्षण आदि के लिये जगह अमेरिका ने अपने सरपरस्‍त शासकों के माध्‍यम से उपलब्‍ध करायें जिसमें पाकिस्‍तान के पूर्व राष्‍ट्रपति जियाउल हक ने पूरा सहयोग किया। ओसामा बिन लादेन ने जब खुद अमेरिका के उपर ही हमलें शुरु कर दिये तो अमेरिका इनका विरोधी हो गया। हांलाकि ओसामा की मौत के बाद अलकायदा उतना प्रभावी नहीं रहा जितना लश्‍करें तोयबा, जैस ए मुहम्‍मद हो चुका है। इनका उददेश्‍य सिर्फ कश्‍मीर तक सीमित नहीं है, वास्‍तव में ये कश्‍मीर को दान में लेना नहीं चाहते। सतत युद्ध ही इनका मकसद है। ये जानते हैं कि प्रत्‍यक्ष लडाई में हम कभी भारत के साथ टिकने वाले नहीं है। इसलिये छिपो, मारो और भागो की इनकी रणनीति है। ये भारत को उभरती आर्थिक महाशक्ति के बारे में सोचते हैं तो इनकी रातों की नीद गायब हो जाती है। पाकिस्‍तान आर्थिक ताकत के रुप में भारत का मुकाबला तो नहीं कर सकता लेकिन टांग पीछे खीचने की हर संभव कोशिश करता रहेगा। फिलहाल इतना ही बातें और भी है .....

-मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय
Top of Form