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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

2:31 am

मदर टेरेसा का असली चमत्कार क्या था


मार्कण्डेय पाण्डेय
गरीबों की सेवा में पूरा जीवन समर्पित करने वाली नोबेल शांति पुरस्कार प्रा’ ईसाई प्रचारिका एग्नेस उर्फ टेरेसा को अब रोमन कैथोलिक चर्च के संत की उपाधि से नवाजा जाएगा। वेटिकन के पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा के दूसरे चमत्कार को मान्यता दी है। क्या था चमत्कार ? उन्होंने ब्रेन टयूमर से पीड़ित ब्राजील के एक युवक को ठीक कर दिया था। एक समय टेरेसा से पत्रकारों ने पूछा था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है, ऐसा बाईबिल में लिखा है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, आप क्या मानती हैं? टेरेसा ने कहा जो बाईबिल में कहा गया है वह ठीक है। गत दो साल पहले ईसाई समुदाय ने इलाहाबाद में चंगाई महोत्सव किया। गांव-देहात के गरीब, अनपढè और अभावग्रस्त लोंगो को लाया गया। भूत-प्रेत की झाड़-फंू क कनाडा से आये एक अंग्रेज पादरी मिस्टर यंग्रीन ने शुरु किया। ये यूरोप के वे लोग हैं जो खुद को आधुनिक विज्ञान की विरासत का एकमेव वारिस होने का दावा करते हैं। खैर, कुछ साल पूर्व क्रिस्टोफर हिचेंस ने फिल्म बनाई नर्क का फरिश्ता तो देश के सेकुलरों को सांप सूंघ गया। कारण कि क्रिस्टोफर ने मदर टेरेसा के ऐसे ही तथाकथित सेवा और चमत्कारों की पोल खोल दी। नार्थ-ईस्ट के आदिवासी गरीब जो ईसाई बने। उनके लिये आरक्षण की मांग करते हुए वह नई दिल्ली में धरने पर बैठ गई। जब सवाल किया गया कि यदि हिंदू धर्म में छूआछूत है जिसके कारण आरक्षण दिया जाता है तो आपके धरने पर बैठने से यह स्वत:सिद्ध नहीं होता कि ईसाई मत में भी भ्ोदभाव है?
क्रिस्टोफर हिचेंस अपनी फिल्म में साफ कहते हैं कि अखबारों का बेहतरीन उपयोग करके टेरेसा को करुणा की देवी जैसी छवि बनाई गई है। आस्ट्रàेलिया की विख्यात लेखिका ग्राहम ग्रीन ने कहा कि वे करुणा की कारोबारी हैं। हिच्ोंस की फिल्म में टेरेसा के मरणासन्न रोगियों के केंद्र की हालत को दिखाया गया है। इस फिल्म में मैरी लुडन कहती हैं-हे भगवान यह क्या? एक कमरे में 5० से 6० रोगी कोई कुर्सी तक नहीं, नाही पर्या’ आक्सीजन या ग्लूकोज के बोतल, कैंसर जैसे भयंकर रोग में एसप्रीन या ब्रूफेन दिया जा रहा है। फिल्म में मदर टेरेसा बोलती है कि बहुत पहले से मैने गरीबों की सेवा करने का निश्चय किया था। जो धनी लोग अपने पैसे से प्रा’ करते हैं, उसे मै ईश्वर के प्रति प्रेम से गरीबों को देती हूं। कोलकाता से आगे नार्थ-ईस्ट के राज्य जनजातियों वाले हैं। गरीबी, असहायता, अभाव ने आज भी उनका साथ नहीं छोड़ा है। ऐसे में सेवा का के्रद्र वहां न बनाया जाता तो कहां बनता? आज भी नार्थ-ईस्ट सिसक रहा है, अरुणांचल में चीन घुस आता है, अलगाववादी अपने पैर पसार रहे हैं। क्यों ? क्यों कि देश से जोड़ने वाली जो धारा थी उसको चमत्कार करके सूखा दिया गया।

2:29 am

मरने से पहले अपनी कहानी बताना चाहता था


मार्कण्डेय पाण्डेय
मै पहले एक सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर कार्यरत था। अच्छा खिलाड़ी भी था इसलिये भारत सरकार ने राष्ट्रीय क्रीड़ा प्रशिक्षण के लिये मेरा चयन किया। लेकिन मेरे वरिष्ठ इसकारण मेरे से ईष्याã करने लगे और कुछ ही दिन में मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। मैने बार-बार निवेदन किया लेकिन वे नहीं माने और मै बेरोजगार हो गया। कुछ दिन बाद मेरे कुछ मित्रों ने एक आदमी से परिचय कराते हुए कहा कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और उसका बदला लेने में यह चच्चा तुम्हारी मदद करेंगे। मै उनकी बातों में बह गया और उनके साथ चल पड़ा। तीन दिन तक सफर करने के बाद उन्होंने बड़ी मुश्किल से मुझे सीमापार कराया और मै पाकिस्तान आ गया। वहां पाकिस्तानी सेना के जवानों ने मेरा तहेदिल से स्वागत किया, हमारे खाने-पीने आदि की आलीशान व्यवस्था की और मुझे समझाया कि अपने विभाग के किसी वरिष्ठ अधिकारी को मारकर तुम्हे कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि तुम्हे ऐसे अधिकारियों को बनाने वाले भारत सरकार से बदला लेना है।
इसके बाद उन्होंने मुझे बंदूके और अन्य शस्त्र दिये और पाक जासूसों की सहायता से नियंत्रण रेखा के पार लाकर छोड़ दिया। मैने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों पर हमले किये और पकड़ा न जाउं इसलिये भागकर नियंत्रण रेखा के पार पहुंच जाता था। पाकिस्तान में मेरा इज्जत बढ़ने लगी और मुझे तंजिम का उपप्रमुख बना दिया गया। सेना के अधिकारियों ने बताया कि तुम्हारी प्रसिद्धी रावलपिंडी तक पहुंच गई। फिर बताया गया कि आपको श्रीनगर विश्वविद्यालय और शूरा मेडिकल कॉलेज को बम से उड़ाना है। मैने सोचा कि इन शिक्षा संस्थानों को खतम करके क्या हासिल होगा और मेरी समझ में आने लगा कि पाकिस्तान केवल भारत का अपमान और विभाजन चाहता है। मैने इस वारदात को अंजाम देने से इंकार कर दिया। अब मै जानता हूं कि मेरी हत्या वे कर देंगे लेकिन मरने से पूर्व अपनी कहानी किसी को बताना चाहता था जो आज पूरी हो गई। यह साक्षात्कार वर्ड फोरसाईट ग्रुप के निदेशक संजीव वासलेकर ने अपनी पुस्तक में लिखी है। वह लिखते हैं कि इसके कुछ दिन बाद ही उसकी हत्या हो गई।
अभी दो दिन पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नए साल के जश्न के मौके पर धमाका करने आये अलकायदा के आतंकी मोहम्मद आसिफ को गिरफ्तार किया है। 41 साल का आसिफ उत्तरप्रदेश के संभल का रहने वाला है। वहीं कटक से गिरफ्तार अब्दुल रहमान भी अलकायदा के लिये काम करता है जब कि रहमान मूलरुप से कटक का ही निवासी है। अलकायदा बहुत योजनाबद्ध तरीके से भारत के अंदर अपने पांव पसार रहा है। हांलाकि अलकायदा, जैश ए मोहम्मद और लश्करे तोयबा का आपस में ही प्रतिस्पर्धा है कि कौन सबसे अधिक जनसंहार करता है। जैश ए मोहम्मद का मुख्यालय इस्लामाबाद शहर में अनेक एकड़ जमीन पर फैला है। जबकि लश्करे तोयबा का लाहौर के पास मुदीर गांव में 14० एकड़ में है। वहां स्वीमींग पुल, चमड़ा उद्योग, घोड़ो के तबेले, मदरसे आदि हैं। लश्करे तोयबा के पूरे पाकिस्तान में 15० मदरसे, बड़े समाचार पत्र समूह, और दस हजार कमीशन एजेंट कार्यरत हैं। इन मदरसों में गरीब और अभावग्रस्त परिवार के बच्चों को लाकर जेहादी मानसिकता तैयार कराया जाता है। भारत में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो पाकिस्तान गु’चर एजेंसी से निश्चित रकम प्रा’ करके 35 फीसदी रकम उसके घर पहुंचा दी जाती है बाकी पैसा गोलमाल हो जाता है। पाकिस्तान सरकार को सब पता है और गहराई में जाये तो यह सरकार प्रायोजित आतंकवाद है। पाकिस्तान जानता है कि वह सीधी लड़ाई में भारत से पार नहीं पा सकता तो इस गैर सरकारी कुटिल सेनाओं को भरपूर मदद मुहैया भी कराता है।

2:28 am

वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में जिस तरह छात्रों के एक गुट ने भारत विरोधी नारेबाजी की और उसके बाद कुछ राजनेताओं ने अपने-अपने चश्में से वोटब्ौंक तलाश करना शुरु किया वह निदंनीय है। इस तरह के राष्ट्रविरोधी मानसिकता के छात्रों का समर्थन सिर्फ वोट बैंक को पुख्ता करने के लिये ही नहीं किया जा रहा बल्कि इसके पीछे मोदी सरकार के विरोध की मानसिकता गहराई तक बैठी हुई है। विरोध का कोई मुददा न होने पर विपक्ष इस समय भ्रम और याचक की भूमिका में टकटकी लगाए तलाश रहा है कि क्या घटना हो जिसपर मोदी सरकार को निशाने पर लिया जा सके।
गौर करने वाली बात जो है कि राष्ट्रविरोधी नारे लगाने और आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने वाले छात्र वामपंथी गुट के हैं। जो वामपंथ पूरी शिददत से अपने जन्मकाल से ही मानता आया है कि राज्य विलु’ हो जाएगा अर्थात स्टेट विदरर्स अवे। स्टेटलेस और कास्टलेस सोसाईटी के निर्माण का यूटोपिया अर्थात स्वप्न कार्ल मार्क्स ने देखा और दुनियां को दिखाया। उसी विचारधारा के छात्र नारे लगाते रहे कि भारत तेरे टुकड़े होंगे। यदि देश के टुकड़े होंगे तो यह कैसी विचारधारा? टुकड़े से सीमाएं और बढ़ ही जाएंगी। लेकिन वाममार्गियों को इसकी परवाह नहीं है। इतिहास में देखे तो दुनिया में जितने वामपंथी विचार को माानने वाले देश रहे सबसे अधिक सीमा विवाद को लेकर वहीं आपस में उलझे रहे। मार्क्सवाद पूरी तरह इस सिद्धांत पर ही फेल नहीं हुआ बल्कि रुस में जब पहला संविधान बना तो उसमें सेकुलर देश होने का दावा किया गया। इससे पूर्व कहा गया कि गॉड विल वी एक्पेल्ड फ्राम रसिया अर्थात ईश्वर को रुस से निष्कासित कर दिया जाएगा। सभी चर्च पर ताला बंद कर दिया जाएगा। क्यों कि धर्म अफीम की गोली है।
इतना ही नहीं पूंजीवाद के खिलाफ मार्क्स ने जो अनुमान किए वह पूरी तरह फेल साबित हुए। आज तक न तो किसी सर्वहारा ने क्रांति की नहीं पूंजीवाद खत्म हुआ। उल्टे वक्त के साथ पूंजीवाद का चेहरा और अधिक मानवीय होता गया। पूंजीवादियों ने मजदूर वर्ग के हित में काम करना और सोचना शुरू किया। सरकारों ने मजदूरों के हित में तरह-तरह के कानून बनाने आरंभ कर दिए। हेल्थ बीमा, बोनस, पीएफ आदि के माध्यम से मजदूरों को पूंजीवाद ने साध लिया। आज की दुनियां में वामपंथ पूरी तरह भ्रम की अवस्था में है। मुददा विहीन और विचारधारा के लगातार फेल होते जाने से वह अनाप-शनाप की हरकतों पर उतर आया है। उसे समझ नही आता कि फेसबुक, गूगल, अमेजान, श्नैपडील जैसी कंपनियां बिना किसी फैक्टàी बिना किसी मजदूर के करोड़ों की आमदनी कैसे कर रही है? आखिर हम कहां पर बैठकर हड़ताल करें ? कहां पर तालाबंदी करें? ऑनलाईन होती जा रही दुनिया और लगातार बदलते जा रहे बाजार के दर्शन ने मार्क्सवाद के दर्शन को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। ऐसे में कुछ युवाओं को गुमराह करके, छात्रों के एक सीमित गुट तक ही लालदुर्ग बाकी रह गया है।


2:27 am

ब्लूचिस्तान और पाक कब्जे वाले कश्मीर की छटपटाहट


मार्कण्डेय पाण्डेय
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इनदिनों भारी मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं। एक के बाद एक जिसतरह की घटनाएं पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में घट रही है उससे नहीं लगता कि अधिक दिनों तक पाकिस्तान उसे अपने कब्जे में जबरन रख पायेगा। जैसे ही ब्लूच मुददे पर नवाज हटाओ अभियान वहां चला विश्ोषज्ञों को यह आशंका सताने लगी कि क्या फिर से पाकिस्तान मिलेटàी शासन की ओर बढ रहा है? हांलाकि सेना और नवाज के बीच समझौता हो गया लेकिन सबकुछ ठीकठाक नहीं है। नवाज शरीफ एक माह में दो बार अमेरिका अपना दर्द सुनाकर आये। नवाज आंतरिक मजबूरियों से निपटने और लोगों का ध्यान भटकाने के लिये पूरजोर कोशिश करते रहे कि भारत की तरह ही अमेरिका से पाकिस्तान परमाणु समझौता कर ले किंतु कामयाब नहीं हुए। कारण अमेरिका जानता है कि आज के वैश्विक हालात में भारत पाकिस्तान से बहुत लंबी लकीर खीच चुका है और पूर्ववर्तियों की तरह वह दोनो देशों को एक तराजू में नहीं रखना चाहता। दूसरा कारण यह कि भारत सैन्य मामलों में हमेशा ही जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाता है। भारत की परमाणु नीति भी नो फस्र्ट यूज की है जबकि पाकिस्तान को परमाणु आयुध संम्पन्न करने का मतलब कि हथियार कब आतंकियों के हाथ लगे कुछ नहीं कहा जा सकता।
इस समय पाकिस्तान के सामने दो बड़ी और चुनौतियां उभर आई है। पहला ब्लूचिस्तान और दूसरा पाक अधिकृत कश्मीर। ये दोनों हिस्से पाकिस्तान में कब तक रहेंगे पाकिस्तान भी नहीं जानता। पाकिस्तान कब्जे वाला कश्मीर किसी भी कीमत पर पाकिस्तानी हिस्सा नहीं होना चाहता अब वहां की जनता छटपटाने लगी है कि कम से कम भारतीय हिस्से वाले कश्मीर से ही हमलोग एकजुट हो जाएं। इसके भी कारण है। पहला पाक कश्मीर की बदतर हालत दूसरा भारतीय कश्मीर में मिल रही तमाम सरकारी सुविधाएं और तीसरा अपनी मूल प्रकृति को प्रा’ करना। मजे की बात यह कि जब-जब नवाज शरीफ अमेरिकी राष्ट्रपति और संबंधित मंचों पर गये इसबात का हायतौबा जरुर किये कि ब्लूचिस्तान को पाकिस्तान से भारत ही अलग करवा रहा है। इसलिये अमेरिका हमारे साथ परमाणु संधि कर ले। यदि ब्लूचिस्तान और पाक कश्मीर पाकिस्तान से अलग हो जाते हैं तो पाकिस्तान का इश्लामिक देश होने का मुलम्मा खतम हो जायेगा। उसकी सीमाएं घटेगीं, कटेंगी और सामरिक नजारा ही कुछ और हो जायेगा। आमीन ।।।

2:25 am

आरक्षण की समीक्षा आरक्षित वर्ग के लिये लाभप्रद



मार्कण्डेय पाण्डेय
भारत में आरक्षण का आधार सांस्कृतिक है न कि आर्थिक। क्योंकि अभी भारत में आर्थिक वर्गीय अवधारणा विकसित नही हो पाई है इसलिए जातीय आधार को पूरी तरह खारीज नही किया जा सकता। आरक्षण का विरोध सिर्फ आरक्षण के कारण करना न्यायसंगत नहीं होगा। वास्तव में यह अनारक्षित जातियों के ही दीर्घकालीक हित में है। क्योंकि इतनी बड़ी अविकसित जनसंख्या विकास के लाभों को यदि उच्च जातियों तक पहुंचने देना है तो उनके पदसोपान को आगे लाना ही होगा। यह न केवल सामाजिक न्याय की पश्चिमी अवधारणा को विकसित करेगा बल्कि भारत ज्ौसे देश में सामाजिक समरसता को भी मजबूत करेगा। लेकिन ज्वलंत सवाल यह है कि क्या वास्तव में आरक्षण उनको ही मिल रहा है जिनको इसकी वास्तव में जरुरत है? समाज शास्त के विचारक मानते हैं कि आरक्षण का लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ राज्यों की अनुसूचित जातियों का जब अध्ययन किया गया तो जो परिणाम सामने आए उसके अनुसार अनुसूचित वर्ग का एक हिस्सा आरक्षण का लाभ उठाकर मध्यवर्गीय जीवन जी रहा है और अपनी सामाजिक स्थिति भी मजबूत कर चुका है। विख्यात समाजशास्त्री पीके रॉय वर्मन कहते है कि आरक्षण का वस्तुनिष्ठ लाभ कम पर व्यक्तिनिष्ठ लाभ अधिक हुआ है।
आरक्षण के कारण अनुसूचित जातियो का समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की प्रति सकारात्मक विचार आया है। इसके अलावा तथा आरक्षण प्रा’ जातियो में सामाजिक मॉडल भी उभरे हैं। जैसे रेड्डी, पनियांन, पटेल (महाराष्ट्र व गुजरात), शिन्दे, गुर्जर, भील, मीणा, हरिजन, पासवान, यादव, कुर्मी, लोधी, जाट, कोइरी आदि जातियां अपने को सामाजिक व राजनितिक रूप से सशक्त महसूस करने लगी है। कुछ और सामाजिक चिंतक जैसे आंद्रे बेते, श्रीनिवास, सुरजीत सिन्हा, मजूमदार आदि मानते हैं कि आरक्षण के कारण जो जातियां विकसित हो चुकी है वह आज भी अपने को निम्न जातियों में गिनती करवाती है। जिससे उनको आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ मिलता रहे। अनुसूचित जाति 542 में लगभग 34 जातियों की आबादी तकरीबन 75 फीसदी है। तो इनमे 7 जातियां ऐसी है जो कुल अनुसूचित जाति की अकेले ही 9० फीसदी हैं। इसी तरह अनुसूचित जनजाति में मीणा ,गुर्जर, भील, टोडा कोटा आदि आरक्षण का 8० फीसदी लाभ लेकर अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर चुकी हैं और अपने ही कमजोर वर्ग का शोषण भी कर रही हैं। इसलिए अब आरक्षण की समीक्षा बेहद जरुरी कदम है ताकी जो परिवार एक बार क्लास वन या टू की नौकरी प्रा’ कर लेता है वह अपने ही स्वजातियों के हित में खुद ही पहल करके आरक्षण का लाभ लेना बंद कर दे।


2:23 am

रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत, खाओ चिड़िया भरपेट


मार्कण्डेय पाण्डेय
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने फिर से एक बार राम मंदिर का राग अलापा है। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव नजदीक आते जायेगें संघपरिवार और भाजपा मंदिर मुद्दे को फिर एक बार मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे। लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखकर नहीं लगता कि अब जनता राम मंदिर के नाम पर इनके झांसे में आएगी। राम मंदिर निर्माण के लिये बलिदान देने वाले रामभक्तों को समझ में आने लगा है कि 'भूखे भजन ना होत गोपाला।’ जबकि यह बात न तो भाजपा की केंद्र सरकार समझने को तैयार है ना ही संघ परिवार। यह भी समझने को तैयार नहीं कि सरयू में गत दो दशकों में काफी पानी बह चुका है। राम मंदिर निर्माण का मसला अदालत में जब तक विचाराधीन है, तब तक इस तरह की बातें सिर्फ जनभावनाएं भड़काकर वोट में बदलने की कोशिश ही दिखाई देते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि दरिद्र नारायण ही हमारे आराध्य हैं। स्वामी जी ने तत्कालीन समाज का आह्वान करते हुए कहा था कि राष्ट्र निर्माण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। फुटबाल खेलने से गीता का संदेश अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकता है। इसलिये उन्होंन्ो कहा कि लोहे की मांसपेशिया और फौलाद के स्नायु वाले युवा निर्माण की प्रथम आवश्यकता है। आज देश में आधी आबादी जब मौसमी या आंशिक बेरोजगारी से जूझ रही है, देश का युवा नौकरियों में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लालफिताशाही से मुक्त नहीं हो पाया है। देश में सवा सौ करोड़ की आबादी में 8० करोड़ लोग दरिद्रता, अभाव और बेबसी का जीवन जी रहे हैं। विभिन्न सर्वेक्षण संस्थाओं की मानव विकास सूचकांक संबंधी रिपोर्ट निराश करने वाली होती है, ऐसे में मंदिर-मस्जिद के बजाये राष्ट्र निर्माण हमारी पहली जरुरत दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषणों में बार-बार इस बात को दोहराया है कि हम सभी को मिलकर गरीबी के खिलाफ जंग छेड़नी है। उनका ईशारा निश्चित ही राम मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दे को कुछ दिनों के लिये ठंडे बस्ते में डालकर देश के विकास पर पूरा ध्यान देने का रहा है। किंतु बीच-बीच में भाजपा-संघ नेताओं का राम मंदिर राग अलापने का अर्थ है सबका साथ-सबका विकास जैसे लक्ष्य से भटकाव पैदा करना और जनता का ध्यान उसकी मूल रोजी-रोटी की समस्या से भटकाते रहने का है। भगवान राम देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्य हैं, लेकिन राममंदिर के निर्माण को लेकर दो-दो बार केंद्र में सरकार होने के बावजूद कोई भी ईमानदार कोशिश सरकारी स्तर पर अब तक नहीं की गई। ऐसे में विरोधियों का यह कहना ही ठीक लगा कि जब-जब चुनाव आता है तो भाजपा-संघ परिवार को राम मंदिर याद आने लगता है। इस अवसरवाद पर यह सटीक लगता है कि 'रामजी की चिडिèया रामजी का खेत, खाओं चिड़िया भर-भर पेट।’

2:22 am

लोकतंत्र के ये वंशवादी, धंध्ोबाज राजा-महाराजा


मार्कण्डेय पाण्डेय
सांसदों का वेतन बहुत जल्द दोगुना होने जा रहा है। संसदीय मामलों के मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय को भ्ोजा है। मंत्रालय की मंजूरी मिलते ही आगामी बजट में इसे लागू कर दिया जाएगा। कहीं कोई असहमति, बहस या सैद्धांतिक मतभ्ोद इस प्रस्ताव में पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह लागू होते ही सांसदों का वेतन 5० हजार से बढकर एक लाख रुपया महीना हो जाएगा और इसके अतिरिक्त सांसदों के कार्यालय का खर्च 45 हजार से बढाकर 9० हजार कर दिया जाएगा। कुलमिलाकर सबकुछ जोड़ देने पर हर माह एक सांसद को तकरीबन तीन लाख रुपये प्रा’ होंगे। अच्छा अगर अगला आमचुनाव हार भी गये तो पेंशन के नाते आजीवन 35 हजार रुपये मिलते रहेंगे। ज्यादातार सांसद चाहते हैं कि यह पैसा उनके वेतन के रुप में न बढाया जाए क्यों कि इससे वह आयकर के दायरे में फंस जाते हैं। पैसा दो लेकिन उसको भत्ते के रुप में मिल जाता तो आयकर के झंझट में नहीं फंसना पड़ता। जैसा कि अभी साल 2०1० में सांसदों का वेतन-भत्ता बढाया गया था लेकिन महंगाई देखते हुए फिर से बढाया जाना जरुरी नहीं है क्या?
वर्तमान लोकसभा का जब गठन हुआ तो सांसदों के दिल्ली आते ही उनको पंच सितारा होटल भ्ोज दिया गया जबतक आवास आबंटित नहीं होता। कई तो उसी में पड़े रहे आवास आबंटित न ही हो तो अच्छा। पहली बार चुनकर आए सांसद स्टेशनरी लेकर संसद से आए जिसमें रेलयात्रा कूपन, हवाई यात्राओं का टिकट, लेटरपैड, अनलिमिटेड देश-विदेश कॉल करने के लिये सिम आदि। वे काफी भौचक थ्ो, लगातार यह ही पता कर रहे थ्ो और क्या-क्या सुविधाएं हैं? एक ने कह भी दिया कि सरकार बहुत सुविधाएं देती है। यही कारण है कि गांव-गांव में आज एमपी, एमएलए के उम्मीदवार उत्पन्न हो रहे हैं। भारत में राजनीति एक नया सर्विस सेक्टर बन चुका है जो दोनों केंद्रीय सदनों से लेकर विधान सभा और परिषद तक तकरीबन सात हजार लोगों को राजा-महाराजा जैसी जिंदगी प्रदान करता है। इसलिये इस पेश्ो में आने के लिये प्रत्येक नेता अपने वंशजों को प्रेरित तो करता ही है, बल्कि राजनीति में स्थापित करने के लिये प्रत्येक प्रकार का दांव-पेंच भी इस्तेमाल करता है।
यह भारतीय राजनैतिक व्यवस्था की जागीरदारी प्रथा है। करना सिर्फ इतना है कि चुनावी खर्च का जुगाड़, सत्ता की लहर पर सवार नेताओं की परिक्रमा कर टिकट प्रा’ करना, पांच साल में एक बार मतदाताओं के आगे हाथ जोड़ना। जीत गए तो दोंनो हाथ में लडडू नहीं तो सामाजिक रुतवा तो बढना तय माना जाता है। बाद में लोकतंत्र के नाम पर अपने बच्चों, परिवारीजनों, रिश्तेदारों को लाभ दिलाना अथवा उनको पूरी तरह सेटल कर देना। बहरहाल इस नवजागीरदारी अथवा पोलिटीकल सर्विस सैक्टर का भर्ती आयोग आपके पास है लेकिन आपको भी तो अपने रिश्तेदार का तबादला करवाना है, आपके जो शुभचितक रिश्वत लेते धराए हैं उनकी पैरवी करवानी है, पुलिया बनवाने का ठेका लेना है, आदि अनेक कार्य है भाई। इसके अलावा विद्यालय का उदघाटन, साहित्य सम्म्ोलन के मुख्यअतिथि आदि भी नेता जी को ही बनाना है। दुनिया के जितने आज विकसित देश हैं वहां जनप्रतिनिधियों का निर्माण के ठेके देना, नियुक्ति-तबादला करवाना आदि कार्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में रख दिया गया है। राईट टू इंफार्मेशन का प्रयोग कर जनप्रतिनिधी से जवाब मांगना, पत्र लिखना, ईमेल या उनका घ्ोराव कर अपने वायदों को पूरा करवाना टेढा काम है। गोस्वामी समिति, इंद्रजीत गुप्ता समिति, विधि आयोग आदि कब लागू होगा यह सोचना भर्ती आयोग का काम थोड़े है?



2:21 am

समान नागरिकता संहिता ही एकमात्र समाधान है


मार्कण्डेय पाण्डेय
शाहबानों के बाद अब शायरा बानो अपने अधिकारों को लेकर चर्चा में हैं। शायरा बानो उत्तराखंड की हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर अपने याचिका के कारण शायरा बानो इस समय चर्चा में हैं। उनकी याचिका को गंभीरता से लेते हुए माननीय न्यायालय ने केंद्र सरकार, महिला और बाल विकास मंत्रालय से इस बारे में जबाव भी मांगा है। शायरा ने याचिका के माध्यम से दावा किया था कि तलाक ए बिददत अर्थात तीन बार तलाक कहकर रिश्ता तोड़ लेना साथ ही निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है। याचिका में शायरा कहती हैं कि धर्म और लिंग के आधार पर भारतीय संविधान किसी प्रकार के भ्ोदभाव की इजाजत नहीं देता इसलिये माननीय न्यायाल को मुस्लिम पर्सनल कानून 1937 के सैक्सन दो को तत्काल निरस्त कर देना चाहिए।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक अन्य याचिका में भी मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार और न्याय दिए जाने पर सुनवाई चल रही है। इस सुनवाई के दौरान बेंच ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा कि अब समय काफी बदल गया है और मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने चाहिए साथ ही मुस्लिम पर्सनल ला में भी परिवर्तन जरुरी हो गया है। कुल मिलाकर दोनों ही मामले मुस्लिम महिलाओं के मूल अधिकार, सुरक्षा, मानवाधिकार और नैतिकता से जुड़े हुए हैं। लेकिन आजकल सियासी पार्टियां जिसतरह की राजनीति कर रही हैं, उसमें यह मुददे वोटब्ौंक, सेकुलर-नानसेकुलर और भाजपा-कांग्रेस, केंद्र सरकार ऐसा कर रही है, वैसा कर रही हैं के दांव-पेंच में मामला भटकाया जा सकता है। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि समान नागरिक संहिता लागू करने का मतलब है केंद्र सरकार देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। प्रधानमंत्री आरएसएस की विचारधारा थोप रहे हैं आदि आदि। किंतु संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता की बात कही हैं। यदि संविधान के अनुच्छेद 44 को लागू करना हिंदू राष्ट्र बनाना है तो इसका अर्थ तो यही हुआ कि भारत के संविधान निर्माता ही हिंदू राष्ट्र बनाना ही चाहते रहे होंगे।
क्या एक देश के सभी नागरिकों को समान नियम कानून से संचालित होने का मतलब पांथिक होता है? एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का होना कहां से गलत है? यदि राजनेताओं ने शाहबानों के मामले की तरह इसे भी खीचतान का मामला बनाया तो देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं की समस्या हाशिए पर चली जाएगी। सरकार को चाहिए कि इस मुददे पर मुस्लिम महिलाओं, मुस्लिम विद्बानों और कानून विदों की सलाह लेकर स्थायी और उचित समाधान खोजने का प्रयास करे। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुस्लिम महिलाएं अत्यधिक प्रताड़ना , पारिवारिक उपेक्षा की शिकार हैं और सर्वाधिक तलाक की घटनाओं से उनका जीवन संघर्ष में है।

2:20 am

योजनाबद्ध बना जेएनयू वामपंथ का गढ


मार्कण्डेय पाण्डेय

1966 में भारत सरकार के एक विशेष एक्ट के तहत बना जवाहर लाल नेहरु विवि वामपंथ का गढ़ कैसे बना। पिछड़े जिलों से आने वाले उम्मीदवारों, महिलाओं तथा अन्य कमजोर तबकों को नामांकन में प्राथमिकता दी जाती रही है। कश्मीरी विस्थापितों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों और विधवाओं को भी वरीयता मिलती है। इस प्रकार, वर्षों से जेएनयू आर्थिक व सामाजिक रूप से वंचित तबकों के सबसे उर्वर मस्तिष्क के विद्यार्थियों का गढ़ रहा है। यहां के छात्रों की कमतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि उन्हें वामपंथ के करीब ले आती है। अरावली की श्रृंखला के हरे भरे झुरमुटों में लगभग 1००० एकड़ में बसे इसे पूर्ण अवासीय विश्वविद्यालय ने कभी भी अभिजात तबके को ज्यादा आकर्षित नहीं किया। हॉस्टलों का खान-पान साधारण है और मेस में पानी पीने के लिए ग्लास की जगह जग का इस्तेमाल होता है। विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की मुख्यधारा वामपंथी होने के बावजूद 2००6 के पहले तक यहां आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक रूप से उच्च तबकों का दबदबा था क्योंकि यहां अधिक संख्या इसी तबके से आने वाले विद्यार्थियों की थी। दलितों और आदिवासियों की संख्या उनके लिए आरक्षित अनुपात 22.5 फीसदी तक ही सीमित रह जाती थी। हालांकि यहां वर्ष 1995 से ही ओबीसी विद्यार्थियों को भी नामांकन में वरीयता दी जा रही है, जिसका श्रेय ख्यात छात्र नेता चंद्रशेखर (1964-1997) द्बारा किये गये आंदोलनों को जाता है। लेकिन इसके बावजूद 2००6 तक इस विश्वविद्यालय में सामाजिक रूप से वंचित तबकों की कुल संख्या 28-29 फीसदी से ज्यादा नहीं हो पाती थी। 2००6 में उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित हुई सीटों ने इस तबके को उच्च शिक्षा के प्रति उत्साहित किया।

जेएनयू में सभी विद्यार्थियों को मिलने वाले वजीफे का भी आकर्षण इसके पीछे था। विश्वविद्यालय की वार्षिक रपट (2०13-14) के अनुसार, यहां के 7,677 विद्यार्थियों में से 3,648 दलित बहुजन (1,०58 अनुसूचित जाति, 632 अनुसूचित जनजाति, 1,948 ओबीसी) हैं। अगर हम सीधी भाषा में कहें तो आज विश्वविद्यालय के 5० प्रतिशत विद्यार्थी, गैर-उच्च जातियों के हैं। अगर इसमें 'सामान्य’ कैटेगरी के तहत चुने जाने वाले एससी, एसटी व ओबीसी उम्म्मीदवारों तथा अन्य वंचित सामाजिक समूहों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो ऊँची जातियों व उच्च वर्ग से संबंधित विद्यार्थियों का प्रतिशत नगण्य रह जाएगा।

नतीजा यह है कि पिछले तीन सालों (2०13-14 से) में जवाहरलाल नेहरू विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद पर समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के विद्यार्थी चुने जाते रहे हैं- वी. लेनिन कुमार (2०12), एसएफआई-जेएनयू या डीएसएफ, जो कि तमिलनाडु के ओबीसी थे, अकबर चौधरी (2०13), एआईएसए, जो कि उत्तर प्रदेश निवासी एक मुस्लिम थे और आशुतोष कुमार (2०14) एआईएसए, जो बिहार के यादव हैं। 2०12 में तो जेएनयू छात्र संघ के चारों पद ओबीसी तबके से आने वाले उम्मीदवारों ने ही जीते थे। वर्ष 2०15 में छात्र संघ के चुनाव में विजयी रहे उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी यही बात परिलक्षित होती है। अध्यक्ष - कन्हैया कुमार, एआईएसफ (उच्च हिदू जाति भूमिहार), उपाध्यक्ष- शलेहा रासिद, आइसा (मुसलमान), जनरल सेक्ररेट्री - रामा नागा, आइसा (दलित), ज्वाईंट सेकेरेट्री - सौरभ कुमार शर्मा, एबीवीपी (ओबासी) हैं। गौरतलब है कि जेएनयू छात्र संघ केइस चुनाव में 14 साल बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) का कोई उम्मीदवार जीता है, इस जीत के पीछे स्पष्ट रूप से उसके उम्मीदवार की ओबीसी सामाजिक पृष्ठभूमि भी काम कर रही थी। ध्यातव्य यह भी है कि पिछले साल हुए नामांकनों के बाद जेएनयू में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी की संख्या लगभग 55 फीसदी हो गयी है। जेएनयू में अरबी, परसियन समेत विभिन्न भाषाई कोर्सों में बड़ी संख्या में मुसलमान विद्यार्थी हैं। उनसे संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। अगर उनके साथ अशराफ मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या भी जोड़ दी जाए तो निश्चित ही आज जेएनयू में अद्बिजों संख्या कम से कम 7० फीसदी हो चुकी है। यह भी गौर करें कि 2००6 से 2०15 के बीच जेएनयू में सिर्फ ओबीसी विद्यार्थियों की संख्या 288 से बढ़कर 2434 हो गयी है। यानी पिछले 9 सालों में विवि में ओबीसी छात्रों की संख्या लगभग 1० गुणा बढ़ी है। महिलाओं की संख्या भी काफी बढ़ी है।



1:34 am

काश ! लवकेश मिश्र भी दलित होता


अब संसद में दिए गए स्मृति ईरानी के बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रोहित वेमुला दलित नहीं था। साथ ही आज तेलंगाना पुलिस की रिर्पोट में कहा गया है कि रोहित वेमुला वडेरा जाति से हैं जो कि पिछड़ी जाति में आती है। इस मुददे पर दलित-दलित करके जिसतरह सियासत की गई वह शर्मनाक है। इधर लखनउ में बीटेक के एक छात्र लवकेश मिश्र ने मौत को गले लगा। उसने अपने सोसाईड नोट में एचओडी द्बारा किए जा रहे लगातार उत्पीड़न को कारण बताया है। छात्र का शव उसके कमरे में लटका मिला, जिसे मौके पर पहुंची पुलिस ने उतारा। लवकेश मिश्र ने लिखा कि मै मरना नहीं चाहता लेकिन मै अपने एचओडी दीपक असरानी से तंग आकर जान दे रहा हूं। बहरहाल एचओडी गिरफ्तार हो चुका है और पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही है।
उपरोक्त दो घटनाएं हैं। दोनों ही छात्र हैं, दोनों ने मौत को गल्ो लगाया लेकिन एक छात्र की चर्चा संसद से सड़क तक, अखबार से चैनल तक इसलिए होती रही कि वह तथाकथित दलित था, जो की नहीं था। दूसरे का अपराध यह कि वह सवर्ण कहे जाने वाली जाति में पैदा हुआ। इस प्रकार के दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं क्यों ? क्योंकि सवाल वोटबैंक का है। रोहित की मौत जेएनयू से लेकर हैदराबाद तक, इलाहाबाद से पटना तक और संसद से सड़क तक चर्चा और परिचर्चा का विषय बन गई। अब्बल तो यह कि देश के प्रधानमंत्री को भी लखनउ में कहना पड़ा कि भारत मां का लाल चला गया। दलित वोटबैंक की आड़ में आरक्षण और सामाजिक न्याय के हथियार से राजनैतिक रुप से अल्पसंख्यक हो चुके और दुर्भाग्यवश बिखरे हुए सवर्ण को लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। बेशर्मी की हद तो यह कि राष्ट्रीय चैनलों पर भी बहस और मुबाहिसें इस आधार पर तय किए जा रहे हैं कि मरने वाले की जाति और धर्म क्या था।
दलित विमर्श के नाम पर देश और समाज को तोड़ने वाले सक्रिय हैं। जगह-जगह पर जातीय हिंसा, साम्प्रदायिक तनाव, अलगाववादी आंदोलन, आतंकी गतिविधियां पूरे सामाजिक तानेबाने को छिन्नभिन्न तो कर रही हैं। जाति का जहर घोलते राजनेता, तथाकथित दलित चिंतक और कुछ मीडियाकर्मी माहौल को और अधिक विषाक्त बना रहे हैं। आखिर कमजोर वर्ग कौन है? सिर्फ वही नहीं जो अपने पर किए जा रहे आघात का प्रतिकार नहीं कर पा रहा है बल्कि इस आघात के प्रति सचेत होता हुआ भी नहीं दिखता। पंद्रह फीसदी का यह अलग-थलग पड़ा हुआ समाज दुत्कारा जाता है क्यों ? इस पंद्रह फीसदी का क्या योगदान है देश के विकास और यहां की जीडीपी में? देश के लिये बलिदान देने और सीमाओं की रक्षा में? अब यदि देश की प्रतिभाओं को मरने, कुण्ठित और उप्ोक्षित बनाए रखना है तो सबसे सहज और कारगर उपाय यही है कि देश के नाभि केंद्र पर हमला जारी रखो।



1:31 am

घुटनों के बल चलना है तो बात ही खत्म


मार्कण्डेय पाण्डेय
बात शुरु करते हैं कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी के उपन्यास जय सोमनाथ से जो ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। जगत विख्यात सोमनाथ मंदिर का होने वाला मुख्यपुजारी और परम भटटारक गुरुदेव का पटशिष्य शिवराशि की चर्चा करेगें। शिवराशि अत्यंत विद्बान था और मुख्यपुजारी होने वाला था लेकिन जल्दबाजी और महत्वाकांक्षा अंदर कहीं धधक रही थी। जब गजनी ने सोमनाथ पर हमला किया तो राजा भीमदेव को परास्त करने के लिए शिवराशि ने गजनी को शिवलिंग का गोपनीय मार्ग दिखा दिया। वह एक गोपनीय सुरंग का मार्ग था जिसकी जानकारी सिर्फ मुख्यपुजारी या उसके शिष्य को हुआ करती थी। ईरान के गजनी प्रांत से आया हुआ लूटेरा महमूद गजनी बाबा सोमनाथ तक पहुंचने में कामयाब हुआ। उसने सबसे पहले शिवलिंग पर प्रहार किया और वहीं तत्काल ही शिवराशि को कुत्ते की मौत मार डाला। भारतीय समाज को इतिहास के ऐसे नाजुक मोड़ पर हमेशा ही शिवराशियों, मीरजाफरों, जयचंदो, मानसिहों ने छला है। क्यों ? क्योंकि छोटी सी कुर्सी, वैभव, आराम और सम्मान की कामना उनको देशद्रोही बनाती रही है।
लंबी लड़ाई लड़नी है तो छोटी-छोटी पराजयों को ठोकर मारकर दूर करना होगा। पठानकोट हमला बिना किसी शिवराशि या मीरजाफर के संभव हो सकता है, ऐसा सोचना कठिन है। लेकिन हार मानकर बैठ जाना ठीक नहीं है। देश के रक्षामंत्री मनोहर पणिक्कर का बयान इस समय सुर्खियों में है कि भारत को दर्द देने वाले को भी दर्द का एहसास होना चाहिए। यह दर्द कब और कहां होगा यह हम तय करेंगे। सच कहा गया है कि सठे साठयम समाचरेत अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही उसको सही मार्ग पर आने को बाध्य कर सकता है। अब यह तय कर लिजिए कि आप घुटनों के बल चलेगें तो बात ही खत्म हो जाती है। इतिहास को देखें तो हजारों सालों से भारतीय समाज हर प्रकार के आघात और हमलों को बर्दास्त करता रहा है। यदि हम पराजित हुए तो अपने शौर्य में कमी के कारण नहीं बल्कि अपने घर में बैठे जयचंदो, मानसिहों, और शिवराशियों के विश्वासघात से पराजित हुए। फिर भी चुप नहीं बैठे और युद्ध जारी रखा। अगर कोई कमी रही तो सिर्फ इतना ही कि दुश्मनों को उनकी खोह तक घुसकर उनका पीछा करके उनका सर्वनाश नहीं किया। दुश्मन जैसे ही दयनीय हालत में आया हम पृथ्वीराज चौहान बनकर माफ कर दिए और वहीं दुश्मन दुबारा आघात करता रहा। हमने मार खाया तो इसलिए क्यों कि युद्ध प्रत्यक्ष नहीं, सीधा नहीं बल्कि दगाबाजी, लूट-खसोट, बर्बरता और नपुंसक तरीके से किए गए हमलों पर आधारित था। आज भी गजनी का हमला वैसा ही हो रहा है। जरुरत इतिहास से सबक लेने की है। गिरते हैं सहसवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले। हां अगर देश को घुटनों के बल चलना है तो बात ही खत्म।


1:28 am

सब सरकार करेगी तो आप क्या करोगे ?


मार्कण्डेय पाण्डेय
एक बंदर के हाथ से शकरकंद छूटकर तालाब में गिर गया। पानी से धूलकर वह साफ हो गया और बंदर को उसका स्वाद अच्छा लगने लगा। अब आगे से वह शकरकंद को धूलकर खाने लगा। उसकी नकल करके सभी बंदर शकरकंद धूलकर खाने लगे। स्वामी जी कहा करते थ्ो कि परिवर्तन की पहल खुद से करीए।
अब एक घटना की चर्चा करते हैं। एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में समाचार छपा कि चलती हुई टàेन में बच्चा डायपर गीला होने से परेशान थ। उस बच्चे के पिता ने रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु को टवीट किया और रेल को रोककर, रेलमंत्रालय ने डायपर पहुंचाया। एकतरफ तो यह सुनने में अच्छा लगता है कि हमारी सरकार और सार्वजनिक व्यवस्था कितनी त्वरित और सेवाभावी हो रही है। किंतु सवाल है कि रेलयात्रियों की अनाप-शनाप मांगों के आगे रेलवे का टवीटर हैण्डिल कितने दिनों तक चल पाएगा? आखिर उस रेलयात्री ने घर से चलते समय डायपर लेकर क्यों नहीं यात्रा आरंभ की ? उसके लापरवाही के कारण उस रेल में सफर कर रहे हजारों लोगों को जो दिक्कत हुई उसकी जबावदेही कौन लेगा? हजारों यात्रियों का जो समय बर्बाद हुआ उसके लिये कौन जिम्मेदार है? क्या रेलवे को ऐसी आपातकालीन सुविधा प्रदान करते समय अतिरिक्त शुल्क नहीं लेना चाहिए? बेवजह परेशान करने वाले यात्रियों और सुविधाओं का दुरुपयोग करने वालों को सजा नहीं दी जानी चाहिए?
ऐसी मानसिकता के लोग आज लाखों में नहीं करोड़ों में हैं। जिनको सार्वजनिक व्यवस्था की परवाह नहीं होती, ऐसे लोग ही सार्वजनिक व्यवस्था और नियमों की धज्जियां भी उड़ाते हैं। हर चीज को अपने सुविधानुसार इस्तेमाल करना इनकी बपौती होती है। बाद में टेàन लेट है, व्यवस्था खराब है आदि की शिकायत भी यही लोग करते हैं। हमारे अंदर कितनी एकांतिकता, कितना स्वार्थ और सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति कितनी लापरवाही आ चुकी है। कुछ दिनों पूर्व एक और समाचार था कि मुम्बई में एक लड़की ने अपने पुरुष मित्र को फोन करके कहा कि मुझसे बात करो, अगर व्यस्त हो तब भी बात करो नहीं तो मै सामने एक छोटी सी दुकान है, उस दुकान को अपने कार से उड़ा दूंगी। जब लड़की के पुरुष मित्र ने बात नहीं किया तो उसने उस खोखे जैसी छोटी सी दुकान को कार की टक्कर से गिरा दिया। एक निर्दोष गरीब दुकानदार उस अमीरजादी के गुस्से का शिकार हुआ। ये वो लोग हैं जो बचपन से युवावस्था तक मिनी स्कर्ट पहनकर टीवी पर बूगी-बूगी देखते हैं और आधुनिकता और वैश्वीकरण की बाजी जीत लेने का भ्रम पाल लेते हैं। ये वे लोग हैं जो मानते हैं भगतसिंह और साधु-संयासी विवेकानंद पड़ोसी के यहां जन्म लें। जो चाहते हैं कि मेरा पति, भाई या बेटा मोटी कमाई करें और साथ ही भ्रष्टाचार पर तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी करते हैं। यदि आपको स्वच्छ और पारदर्शी विधि-व्यवस्था चाहिये तो पहले खुद को बदलिए। आईये हम भी पहले शकरकंद को धूलकर खाना आरंभ करें। खुद से पहल करें यही सबसे बड़ी देशसेवा है।

1:27 am

हम क्यों नहीं सम्हालते अपनी विरासत


मार्कण्डेय पाण्डेय
आज दो महत्वपूर्ण बातें हैं जो देश के वसीयत और विरासत से संबंधित है। आगामी फरवरी माह में दिल्ली में विंटेज कारों की रेस होने वाली है, जिसमें सौ से डेढ सौ वर्ष पुरानी का कारों का प्रदर्शन होगा। तो दूसरी ओर 1953 से चालू हुई एचएमटी घड़िया बनाने की फैक्टàी अब बंद होने जा रही है। कभी एचएमटी घड़ियों का श्रीगण्ोश जवाहर लाल नेहरु ने किया था किंतु लंबे अरसे से एचएमटी घाटे में चल रही थी और सरकार का मानना है कि अब इनका पुनरुद्धार नहीं हो सकता इसलिये बंद करना पड़ रहा है।
अमूमन हम अपनी विरासत को लेकर उदासीन होते हैं और एक आमधारणा बन चुकी है कि जो पुराना है वह आउटडेटेड को चुका है। आजकल सामाजिक परिवर्तन के नाम पर सभी पुरानी बातों का त्याग करन्ो का चलन बढ गया है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन को सबकुछ त्याग कर देने के अर्थ में लेना ही मूर्खतापूणã है। दुनियां में थोड़ा हम नजर दौड़ाए तो कुछ अलग ही दिखाई देता है। दमिश्क के पुराने बाजार गत ढाई हजार सालों से आज भी अस्तित्व में हैं। समय के साथ बिकने वाली वस्तुएं बदली हैं किंतु आज भी बाजार वैसा का वैसा ही है। प्रसिद्ध उम्मायुद मस्जिद यहीं पर हैं। आज भी इस स्थान पर दो-ढाई हजार साल पुरानी मस्जिद और चर्च को संरक्षित रखा गया है। इटली का फैब्रीयानों कागज पूरी दुनियां में मशहूर है। दुनियां का प्रसिद्ध चित्रकार मायकल एंजेलों फैब्रीयानों की दुकान से ही कागज खरीदता था। आज यूरो मुद्रा की छपाई भी इसी कागज पर होती है। जबकि इस दुकान की स्थापना 1264 में हुई थी, पीढियां बदलती गई, अनेक शाखांए फैब्रीयानों ने खोल दिया लेकिन आज भी वह मूल दुकान वैसे ही चल रही है। हमारे यहां यदि कोई मकान 4०-5० साल पुराना हो गया तो उसे किसी बिल्डर को बेचकर पैसा बनाने की सोच है।
लंदन में आक्सफोर्ड और कैब्रीज विश्वविद्यालय आज भी पांच सौ सालों से चले आ रहे हैं लेकिन हमने नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों को खो दिया। वह काल के प्रवाह में मिट गए। हम अपना गौरवशाली अतीत भूल गए। राजस्थान और रायगढ के तमाम किले अब होटल बन गये हैं। अपने अतीत की तमाम दुर्लभ खजाने को हम अनदेखा करते हैं। सौ साल नहीं बीते गुरुवर रविन्द्र नाथ ठाकुर का निधन हुए लेकिन हमने शांति निकेतन की दुर्दशा कर दी। हमें मैक्डोलाल्ड, कोकाकोला, हॉलीवुड और बालीवुड में आनंद और गौरव होता है। अपनी राष्ट्रीय अस्मिता में रमने का मन नहीं करता। कारण ? राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कमी और कुछ नहीं।

1:26 am

मीडिया के वैचारिक आरडीएक्स का भारत पर हमला

मार्कण्डेय पाण्डेय
कुछ साल पूर्व स्टार टीवी पर महात्मा गांधी को बास्टर्ड बनिया कहा गया था। सीएनएन और बीबीसी कहता रहा भारत के कब्जे वाला कश्मीर। लेकिन भारत की मीडिया ने कभी नहीं कहा ब्रिटीश कब्जे वाला आयरलैंड। हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का झूठा बयान छापने के कारण आउटलुक पत्रिका को मांफी मांगनी पड़ी थी। अब इस पत्रिका का ताजा अंक फिर से विवाद पैदा करने वाला है। पत्रिका के अंग्रेजी संस्करण के आवरण पृष्ठ पर केंद्रीय एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी का संसद में बोलते हुए चित्र दिया गया है और नीचे लिखा है-सूडो नेशनलिस्ट। पत्रिका ने फैसला सुना दिया है कि नेशनलिस्ट और सूडो नेशनलिस्ट अथवा एंटीनेशनलिस्ट क्या होता है। कुछ दिनों पूर्व प्रख्यात स्तंभकार स्वपÝ दासगुप्ता ने कहा था कि नेशनल मीडिया को अहसास होना चाहिए कि राजधानी नई दिल्ली की खबरें देने से राष्ट्र की रिपोर्टिंग नहीं हो जाती। इसके लिये व्यापक चिंता के विषय लेने होंगे। हमारे चौथ्ो स्तंभ के मनमाना रवैये और पूर्वाग्रह ग्रस्त समाचारों से आजिज आए एक केंद्रीय मंत्री को प्रेस्टीटयूट शब्द तक प्रयोग करना पड़ा। जिस तरह इलेक्टàानिक चैनलों ने सहिष्णुता, अखलाक, रोहित बेमुला, जेएनयू आदि के मुददे पर एकतरफा ढोल पीटा उससे कई सवाल सहज ही खड़े होते दिखने लगे हैं।
संसद में एक नेता ने कहा कि यदि सरकार ने संविधान संशोधन की जुर्रत की तो रक्तपात होगा। मीडिया को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आया। बल्कि एक नेता ने इस बयान को बिलकुल उचित ठहराया और आजतक चैनल की एंकर चुप्पी साधकर मौन समर्थन देती रही। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने हाल ही में कहा कि हिंदी बोलने वाले नेताओं की पार्टी को आसाम मेें घुसने नहीं देंगे और मीडिया ने मौन साध लिया। इक्का-दुक्का अखबारों ने कहीं अंदर के पेज पर एक कालम की खबर दे दी। वहीं उत्तराखंड के कांग्रेस नेता और मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जब कहा कि गाय को मारने वाले को हिंदुस्थान में रहने का हक नहीं है तो सेकुलर जमात ने फौरन डैमेज कंटàोल शुरु कर दिया। जबकि यही बयान हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने दिया तो मीडिया में फक्क से पेटàोल की आग लग गई। आमीर खान के असहिष्णुता संबंधी बयान को मीडिया ने भरपूर उछाला तो वहीं रबीना टंडन के बयान कि कोई असहिष्णुता नहीं है को दबा दिया गया। बल्कि रबीना टंडन प्रगतिशील मीडिया का कोपभाजन बनी और चहुंओर हायतौबा मच गया। उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान ने एक बलात्कार पीड़ित महिला के लिये अशोभनीय टिप्पणी की लेकिन चैनलों को सांप सूंघ गया और चुप्पीमार कर बैठे रहे। इन हालातों में यदि मीडिया की विश्वसनीयता कम होती जा रही है तो इसमें आश्चर्य कैसा?
कुछ दिनों पूर्व एबीपी चैनल के राष्ट्रीय संवाददाता गला फाड़-फाड़ चिल्ला रहे थ्ो कि यह देखिये यहां बैनर पर लिखा है कि अब राष्ट्रधर्म की बारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अटल जी ने कहा था कि आप राष्ट्रधर्म का पालन करें लेकिन वह नहीं किए। इस संवाददाता को राज्यधर्म और राष्ट्रधर्म के मध्य जमीन आसमान का फर्क पता ही नहीं है। यदि पता है तो वह छीपा रहे हैं। एक और उदाहरण आजतक चैनल पर जिसतरह एक केंद्रीय मंत्री पर पूर्व प्रायोजित प्रश्नों की बौछार कर नीचा दिखाने का असफल प्रयास किया गया जिसके बाद वहां पुलिस बुलानी पड़ी, वह भारत में पत्रकारिता के इतिहास की एक शर्मनाक घटना के रुप मेें दर्ज हुई।



1:24 am

गुरुग्राम माडर्न बने, वेस्टर्न नहीं - मार्कण्डेय पाण्डेय


अमेरिका जब ब्रिटीश उपनिवेश के चंगुल से मुक्त हुआ तो सबसे पहला काम किया कि अमेरिका में चलने वाले हर ब्रिटीश नामो-निशान को मिटाना शुरु किया। हर ब्रिटीश प्रचलन, नाम और तरीकों को बदलना आरंभ किया हांलाकि इसकी जरुरत नहीं थी। फिर भी उसने किसी की परवाह नहीं कि और कहा कि अब हम आजाद हैं। उन्होंने अपनी अंग्रेजी भाषा को अमेरिकन कहा, तमाम हिज्ज्ो, बोलने का तरीका, स्पेलिंग आदि को भी बदल दिया। सड़क किनारे पैदल चलने वाली जिस जगह को अंग्रेज फुटपाथ कहा था उसे उन्होंने फुटवे कहना शुरु कर दिया। मशीनों के स्टार्ट होने वाले बटन से लेकर बिजली के स्वीच तक अदल-बदल किया। नाप तौल के पैमाने बदले, व्यापार का तरीका बदला और कहा जिसे हमसे व्यापार करना होगा उसे हमारे तौर-तरीके अपनाने होंगे।
ग्ररुग्राम नाम बदलने से अब फिर से एकबार बहस छिड़ गई है- नाम में क्या रखा है? गुरुग्राम नाम रखने से वह शहर कहीं खो न जाए जहां बड़े-बड़े कारपोरेट हब, शापिंग मॉल्स, भव्य ईमारते और लग्जरी जिंदगी है। एक तर्क यह भी है कि भाजपा सरकार इस तरह के संस्कृत नाम रखकर भगवाकरण कर रही है। आरोप-प्रत्यारोप और सुझावों का दौर जारी है। लेकिन आईये इन आरोपों, आशंकाओं की पड़ताल करते हैं कि क्या वास्तव में यह भगवाकरण है? अथवा इससे विकास की जिस रफ्तार पर यह शहर दौड़ रहा था वह धीमी पड़ जाएगी?
कानपुर शहर जिसे पूरब का मानच्ोस्टर कहा जाता था, अपने सूती कपड़ों, चमड़े के सामान आदि के लिये जो शहर दुनिया में मशहूर था, लाल इमली का नाम किसने नहीं सुना होगा। आज भी उस शहर का नाम कई औपनिवेशिक ईमारतों पर आपको कावनपोरे पढ़ने को मिल जाएगा। कहा जाता है कि महाभारत कालीन योद्धा कर्ण की कुटिया यहीं पर हुआ करती थी जिसके कारण कर्णपुर को अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार कावनपोरे किया फिर देश को आजादी मिलने के बाद इसे कानपुर कर दिया गया। आज भी एक बड़ी आबादी है जो मांग करती है कि कानपुर को कल्याणपुर कर देना चाहिए। यदि हम इतिहास को देखे तो मुगल काल से लेकर औपनिवेशिक काल तक शहरों और स्थानों के नाम तत्कालीन शासकों ने अपनी सुविधा, वर्तनी और उच्चारण के अनुसार बदले हैं।
आजादी मिलने के बाद सर्वप्रथम जब भाषाई आधार पर राज्यों के पुर्नगठन अथवा निर्माण की मांग की जाने लगी तब 1956 में राज्य पुर्नगठन आयोग ने कई नामों में परिवर्तन शुरु किए जैसे मद्रास को चैन्नई, त्रावणकोर को केरल किया गया। इसीप्रकार मध्य भारत मध्यप्रदेश हुआ, मैसूर कर्नाटक के नाम से जाना जाने लगा। कलकत्ता कोलकाता हुआ, बाम्बे मुंबई के रुप में तो पूना पूण्ो के रुप में अपनी पहचान कायम करने लगा। वास्तव में इसमें कोई दो राय नहीं कि क्ष्ोत्रीय पहचान और भारतीय संस्कृति को बरकार रखने वाले नाम होने ही चाहिए।
ऐतिहासिक कारण
गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम करने के पीछे धार्मिक से अधिक सांस्कृतिक कारण बताए जाते हैं। लंबे अरसे से यहां के निवासियों, सामाजिक संगठनो, राजनैतिक कार्यकर्ताओं की यह लंबित मांग थी। महाभारत युद्ध के समय के शस्त्रों के प्रशिक्षण देने वाले गुरु द्रोणाचार्य की यह भूमि मानी जाती है। अगर ठोस रुप से कहें तो सरकार की मंशा सिर्फ इतना ही है गुरुग्राम नाम बदलने में जो आज भी गुरुग्राम नाम से एक गांव जाना जाता है। अब इस पूरे जिले को ही गुरुग्राम नाम दे दिया गया है। गुड़गांव से पहले यमुनानगर में मुस्तफाबाद हुआ करता था, जहां सरस्वती नदी का उदगम माना जाता है। कुछ साल पहले उस नगर का नाम मुस्तफाबाद से बदलकर सरस्वतीनगर कर दिया गया है।
यह बिलकुल सत्य है कि गुरुग्राम के आसपास महाभारत कालीन अनेक स्थल आज भी विद्यमान है जैसे खाण्डसा स्थान कभी खाण्डववन हुआ करता था। यह वही स्थान है जहां एकलव्य तीरंदाजी का अभ्यास किया करते थ्ो। इसके अलावा झाडसा, सोहना, पटौदी ये सभी स्थान ऐसे हैं जहां आपको महाभारतकालीन अवश्ोष, चिन्ह आदि आज भी दिखाई दे जाएेंगे।
द्रोणाचार्य और एकलव्य को लेकर छिड़ गई है बहस
राष्ट्रीय राजधानी का अंग होने और साईबर सिटी के साथ ही महाभारत कालीन स्थान होने के कारण गुड़गांव से गुरुग्राम नाम को लेकर बहस राष्ट्रीय स्तर पर तेज हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर आपसी बहस मुबाहिसों में लोग खुलकर अपनी राय प्रगट कर रहे हैं। ऐसे में इसे सिर्फ गुड़गांव तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा।
योगेंद्र बाजपेई कहते हैं कि गुरु द्रोणाचार्य शस्त्र कला के मर्मज्ञ तो थ्ो किंतु वह अच्छे इंसान अथवा गुरु नहीं थ्ो। उन्होन्ो एकलब्य को लेकर जो किया उसने उनके पूरे किरदार को कलंकित कर दिया। इसके अलावा वह अधर्म की ओर से लड़ने के लिए युद्ध में भाग लिए। तो वहीं वरिष्ठ पुलिस अधिकारी युगुल किशोर तिवारी कहते हैं कि यदि द्रोणाचार्य ने एकलब्य का अंगुठा नहीं लिया होता तो निसंदेह ही एकलब्य कर्ण की तरह ही दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करता और उसे पराजय का सामना करना पड़ता। सिविल सेवा के अधिकारी शशि चर्तुवेदी कहते हैं कि एक तरह से एकलब्य ने बौद्धिक सम्पदा अधिकार का उलंघन और चोरी किया था। जिस पर सामान्य दंड उसे मिला। उसने अपना अपराध भी स्वीकार कर लिया था जिसके कारण सहज ही अपना अगूंठा काट कर दे दिया नहीं तो उस समय के दंड विधान में हाथ काट लेने अथवा मृत्यु दंड का भी विधान हो सकता था। नारद स्मृति के हवाले से वह कहते हैं कि ब्राम्हण यदि झूठ बोले तो उसे सर्वाधिक कठोर दंड का विधान किया गया था। इसीप्रकार भाजपा के नेता वैभव त्रिपाठी, प्रशासनिक अधिकारी अरविंद राय और अम्बुजा सिंमेंट के अधिकारी अजीत सिंह अपनी राय और दावे के साथ गुरुग्राम के पक्ष या विपक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
कहां पर होगें बदलाव
जहां भी गुड़गांव लिखा जाता है वहां अब गुरुग्राम लिखना होगा। रेलवे से लेकर गुड़गांव एक्सप्रेस वे, गुड़गांव हाईवे सहित बैंकों, थानों और सरकारी ईमारतो पर नाम बदले जाएगें। सरकारी कागजों, पर्ची, मुहर, स्टेशनरी और दुकानों के साईनबोर्ड से लेकर मल्टी नेशनल के बेवसाईट आदि पर भी गुरुग्राम लिखना ही पड़ेगा।