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सोमवार, 19 नवंबर 2012

6:33 am

वैकल्पिक उर्जा का कोई विकल्‍प नहीं, जीवाश्‍म ईधन से बने बिजली



अगर भारत चाहे तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये बगैर कोयला और पेट्रोलियम से बनने वाली बिजली से खुद को मुक्‍त कर सकता है। वैकल्पिक उर्जा के जरिये निश्चित रुप से भविष्‍य में भारत विकास और समृद्धि की नई कहानी लिख सकता है और ऐसा करते समय उसे अपने जंगलों को नुकसान पहुंचाने की भी जरुरत नहीं होगी। पर्यावरण को लेकर अतंरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कार्य करने वाली संस्‍था ग्रीन पीस का यह कहना है।
संस्‍था ने ग्‍लोबल विंड इनर्जी काउंसिल और द यूरो‍पियन रिनेबल इनर्जी के साथ मिलकर किये गये संयुक्‍त शोध के बाद भारत की उर्जा जरुरतों को वैकल्पिक माध्‍यमों से पूरा करने का एक खाका तैयार किया है। रिर्पोट को तैयार करते समय देश के सामाजिक और आर्थिक तानेबाने को देखते हुए कहा गया है कि भारत अपनी उर्जा की आवश्‍यक्‍ताओं को लंबे समय तक कैसे बिना पर्यावरण हो नुकसान पहुंचाये पूरा कर सकता है। गैर सरकारी संगठन ग्रीन पीस के वरिष्‍ठ अधिकारी अभिषेक कहते हैं कि हाल में ग्रिड फेल होने की घटनाओं ने संकेत दिया है कि जीवाश्‍म या कोयले पर आधारित उर्जा भरोसे के काबिल नही हैं और यह कभी भी सारे सिस्‍टम को ठप कर सकती है।
उल्‍लेखनीय है कि देश में तीस करोड़ आबादी ऐसी है जिससे अभी तक बिजली के दर्शन नहीं हुए हैं। उसे हम जीवाश्‍म उर्जा के भरोसे छोड भी दें तो बिजली से चलने वाले कारोबार की दशा भी बदतर है और गत वित्तिय वर्ष का सात फीसद नुकसान उर्जा की समुचित आपूर्ति न होने के कारण हुआ है। अगर जीडीपी आधारित अर्थव्‍यवस्‍था को सही पटरी पर चलाते रहना है तो भारत को पर्यावरण हितैषी उर्जा को बढावा देना ही होगा तभी जाकर कार्बन उज्‍सर्जन पर भी प्रभावी रोक लगाया जा सकेगा। देश में जिस उर्जा उत्‍पादन प्रणाली में पूंजी निवेश किया जा रहा है उस पर पुर्नविचार करने की आवश्‍यक्‍ता है।
अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍थाओं ने अपने अध्‍ययन में कहा है कि भारत में वैकल्पिक उर्जा प्रणालियों में निजी और सरकारी स्‍तर पर 2050 तक 610000 करोड़ रुपये निवेश करने की आवश्‍क्‍यता है। इस निवेश के कारण भारत को जीवाश्‍म ईधन पर खर्च किये जाने वाले सालाना एक ट्रीलीयन धनराशि की बचत होगी और वर्ष 2020 तक 24 लाख नये रोजगार का अवसर सामने आयेगा। यदि भारत सरकार वैकल्पिक उर्जा के क्षेत्र में कदम आगे बढाती है तो 2050 तक 95 फीसदी भारती उर्जा की आपूर्ति वैकल्पिक स्रोतों से हो जायेगी और यह सबसे सस्‍ती उर्जा होगी। रिर्पोट के अनुसार 2050 तक प्राकृतिक स्रोत से प्राप्‍त उर्जा की कीमत साढे तीन रुपये प्रति यूनिट होने का अनुमान है।
इतना ही नहीं, ग्‍लोबल विंड एनर्जी काउंसिल का कहना है कि भारत स्‍थानीय उर्जा बाजार में अपने लिये 54 हजार करोड़ से अधिक का कारोबार भी विकसित कर सकता है। इस रिर्पोट का दावा है कि आगामी 2030 तक भारत में रोजगार के क्षेत्र में चौदह गुना की बढोत्‍तरी हो सकती है यदि भारत इन उपायों पर अमल करे तो, वहीं विश्‍व में पवन उर्जा के क्षेत्र में भारत को सर्वाधिक संभावनाओं वाला देश बताया गया है। हांलाकि भारतीय योजना आयेग ने बारहवी पंचवर्षीय योजना अवधि में पवन उर्जा के जरीये 15 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्‍य पहले ही निर्धारित कर रखा है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

6:48 am

बिना शराब पीये किया गया बलात्काोर माफ कर दिया जाता है



सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हिमालय की छाया में बसे देश नेपाल आजकल महिलाओं की हिंसा के मामले में पूरी दुनियां में अब्‍वल होता जा रहा है। लिंग आधारित भेदभाव और पुरुष्‍वादी सोच का शिकार यह देश अब दुनियां में महिला हिंसा के मामले में अब्‍वल पाया गया है।
नेपाल ऐसा देश है जो संक्रमण के दौर से गुजर रहा है जहां चारलेन की सड़के राजधानी काठमांडू को त्रिभुवन अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अडडे को आपस में जोड़ती हैं। यहां तक की नेपाल के गांव भी अब आधुनिकता से चमकने लगे हैं। गांव से लेकर कस्‍बों तक आधुनिकता की बयार बहीं है और नये निर्माण वहां भी दिखाई देने लगे हैं। इसके बावजूद वहां के सामाजिक हालात में बहुत कम परिवर्तन देखने को मिलता है, राजतंत्र के जाने के बाद और लोकतंत्र के आगमन से सामाजिक और राजनैतिक हालात में बस इतना ही परिवर्तन दिखाई दे रहा है कि इक्‍का दुक्‍का म‍हिलायें वहां की सियासत में सक्रिय हो गई है।
नेपाल ने अपने संविधान में पहले ही 33 फीसद महिलाओं के लिये राष्‍ट्रीय संसद में स्‍थान आरक्षित कर रखा है और यह विश्‍व के पहले ऐसे देशों में है जहां किन्‍नरों तक को भरपूर राजनैतिक अधिकारों के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में महिलाओं के सहायतार्थ अलग से प्रकोष्‍ठ का निर्माण किया गया है। लेकिन सदियों से चली आ रही पुरुष्‍वादी सोच में वहां कोई परिवर्तन नही दिखाई देता और नेपाल महिलाओं, बच्‍चों के साथ किये जा रहे जूल्‍म और भेदभाव के सबसे बड़े अडडे के रुप में उभर कर सामने आ रहा है।
नई दिल्‍ली में हयूमन राईट संस्‍था की लीली थापा जो नेपाल में विधवाओं के कल्‍याण के लिये कार्य कर रही हैं कहती है कि विधवाओं के उपर जो विधवा होने का कलंक चस्‍पा है वह आज भी नेपाल में कुप्रथा के रुप में जारी है जिसके कारण विधवाओं को समाज में तरह-तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। वे आगे कहती है कि हमने कई जगह ऐसे मामले देखे हैं जहां विधवाओ के साथ उनके ही रिश्‍तेदारों ने बलात्‍कार तक किया है यहां तक की एचआईवी पाजीटिव विधवाओं के साथ भी।  उन महिलाओं के साथ बंम्‍बईया रोग वाली कह कर अपमानित किया जाता है और जिनके पति जिंदा है वे भी उनको तिरस्‍क्‍ृत कर देते हैं।
एक गैर सरकारी संगठन एक्‍सन एड अपनी रिर्पोट में कहता है कि नेपाल में सिराहा जिले में 18 में से सिर्फ दो मामले ही पुलिस दर्ज करती है जो महिलाओं के‍ खिलाफ होते हैं। संगठन कहता है कि वहां सिर्फ इस आधार पर बलात्‍कार के आरोपियों को क्षमा दान मिल जाता है कि वह बलात्‍कार के दौरान शराब नही पिया था। ऐसे ही एक मामले का जिक्र करते हुए एक्‍सन एड की कार्यकर्ता कहते हैं कि ताजा मामला सुनताली धामी का है जो पुलिस अधिकारी है और उसके साथ उसी के सहकर्मियों ने बलात्‍कार किया और वे सिर्फ इस आधार पर बरी हो गये कि वे शराब नही पीये थे।
संगत फाउंडेशन के कमला भसीन नई दिल्‍ली स्थित नेपाली दूतावास पर एक मुलाकात में कहते हैं कि लोकतंत्र का क्‍या मतलब है यदि तीन मेसे एक महिला बलात्‍कार और हिंसा की शिकार है। महिला अधिकार कार्यकर्त्‍ता रीता थापा नेपाल के हालात पर चिंता प्रकट करते हुए वहां की राजव्‍यवस्‍था की आलोचना करती है और दुनियां के सभ्‍य देशों को इसके खिलाफ उठ जाना चाहिये। दर्जन भर गैर सरकारी संगठनों ने आज नई दिल्‍ली में नेपाली दूतावास पर अपना विरोध प्रदर्शन करके नेपाल में हो रहे अबाध महिला अधिकारों की अवहेलना पर चिंता प्रगट किया।
4:14 am

कोरबा जनजाति की महिला लड रही है मातृत्‍व के अधिकार की लडाई



 राजधानी दिल्‍ली में एकतरफ खाने के मौलिक अधिकार को लेकर प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालय जेएनयू मे घमासान मचा है तो दूसरी तरफ छतिसगढ की एक आदिवासी महिला मातृत्‍व के मौलिक अधिकार की लड़ाई लड़ने सड़कों पर उतर आई है। छतिसगढ के आदिवासी ईलाके की एक महिला रायपुर से अपनी लड़ाई लेकर राजधानी नई दिल्‍ली पहुंच गई है। महिला का आरोप वहां के डाक्‍टरों पर है जिन्‍होंने पैसे के लालच में उसके मां बन पाने की संभावना को समाप्‍त कर दिया है। अब यह महिला राजधानी दिल्‍ली की सड़कों पर मातृत्‍व की लड़ाई लड़ने पहुंच गई है। छतिसगढ के रायपुर में पिछले दिनों सरकार की एक योजना को लेकर काफी बवाल मचा था जिसमें सरकार ने गरीबों को ईलाज के लिये चालिस हजार रुपये देने का ऐलान किया था। राज्‍य के डाक्‍टरों ने गरीब आदिवासी महिलाओं को ईलाज के नाम पर गंभीर गैरजरुरी आपरेशन कर सरकार से पैसे की वसूली शुरु कर दी थी।
उत्‍तरी छतिसगढ के सरगुजा की फूलसुंदरी पहाड़ी कोरवा कहती है कि मेरे कुल छह बच्‍चे हैं और मै अब नही चा‍हती। सरकार ने कहा था कि परिवार का सीमित रखने पर सुविधायें मिलेगी हमे ग्रामीण हेल्‍थ वर्कर ने कहा कि एक छोटा सा आपरेशन किया जायेगा जिससे परिवार नियोजन किया जा सकेगा। उल्‍लेखनीय है कि इंदिरा सरकार के दौरान कुछ आदिवासी जन‍जातियों को कानून बना कर परिवार नियोजन से अलग रखा गया था जिसके अंर्तगत फूलकुमारी आती है। इस आदिवासी महिला के पति मनरेगा के अंर्तगत कार्यकरने वाला मजदूर है।
उल्‍लेखनीय है कि पिछले दिनों राजधानी रायपुर में गर्भाशय कांड का मुददा काफी चर्चा में रहा है, जिसमें डाक्‍टरों पर यह आरोप लगाया गया था कि सरकार की गरीबों के निश्‍शुल्‍क ईलाज योजना का लाभ उठाने के लिये धोखा से आपरेशन किये गये। इस बारे में जब राज्‍य के स्‍वास्थ्‍य मंत्री अनिल अग्रवाल से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि डाक्‍टरों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है जो भी दोषी पाये जायेगें वह बक्‍शे नही जायेगे। वहीं दिल्‍ली स्थित चाणक्‍यपुर में राज्‍य के सूचना अधिकारी उमेश मिश्रा का कहना है कि मीडिया ने इस मुददे को काफी उछाल दिया है जबकि कार्रवाई हो रही है और गरीबों के साथ कोई अन्‍याय नही होने दिया जायेगा। 
पहाडी कोरवा जनजाति के कुछ आदिवासी जिनको डाक्‍टरों ने आपरेशन करके मातृत्‍व से वंचित कर दिया है वह मातृत्‍व के अधिकार को लेकर दिल्‍ली में विभिन्‍न कार्यालयों के चक्‍कर लगाने के साथ ही जंतर-मंतर पर बैठने का ऐलान कर रहे हैं। राष्‍ट्रीय पारिवारिक स्‍वास्‍थ्‍य सर्वे के रिकार्ड को देखा जाये तो राष्‍ट्रीय औसत से राज्‍य की कोरवा जनजाति के बच्‍चों का औसत वजन 46 फीसदी कम है। 70 फीसदी बच्‍चों का जन्‍म मानक वजन से कम पर ही होता है, इसी जनजाति की एक युवती ने बताया कि हमारे यहां पढा लिखे लोग नहीं है सिर्फ बीमारियां और छूआछूत के रोग हैं। देखना है कि राज्‍य सरकार डाक्‍टरों के खिलाफ क्‍या कार्रवाई करती है तो वहीं केंद्र सरकार इन आदिवासी महिलाओं के दर्द को कहां तक समझ पाती है क्‍यों कि जानकारों के अनुसार चिकित्‍सा और स्‍वास्‍थ्‍य के लिये जितनी जवाबदेही राज्‍य की है उतनी ही केंद्र सरकार की है।
4:11 am

राईट टू एजुकेशन कानून की भ्रूण्‍ा हत्‍या



राईट टू एजुकेशन के मूल अधिकार को जिसे संसद ने बनाया माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने वैध करार दिया। यह कानून देश भर में समान रुप से लागू होगा और इसके तहत देश के सभी सरकारी स्‍कूलों और निजी स्‍कूलों में गरीब बच्‍चों को पच्‍चीस फीसदी निश्‍श्‍ुल्‍क सीटें समान रुप से प्राप्‍त होंगी। बहुमत से दिये गये फैसले में माननीय न्‍यायालय ने कहा कि सरकारी और गैर सरकारी सहायता प्राप्‍त सभी स्‍कूलों में यह कानून प्रभावी होगा। सरकारी सहायता नहीं लेने वाले निजी या अल्‍पसंख्‍यक स्‍कूलों में यह लागू नहीं होगा।
सवान यह है कि क्‍या शिक्षा के इस अधिकार की दशा भी मनरेगा सौ दिन के रोजगार गारंटी जैसा नही हो गया है ? क्‍या यह कानून सही रुप से लागू हो पाया है ?  क्‍या इसके पालन करने हेतु कोई निगरानी कमेटी का निर्माण किया गया है ? अब तक के तमाम कानूनों को देखने के बाद ऐसा लगता है यह भी अपनी अकाल मौत मर रहा है। इस कानून की भी भ्रुण हत्‍या हो रही है। बाल श्रम को कानूनन जुर्म बना दिया गया लेकिन राजधानी दिल्‍ली में लाखों की संख्‍या ऐसे बच्‍चों की है जो होटल, ढाबों के अतिरिक्‍त जूते पालिस से लेकर गर्मी के मौसम में डीटीसी बसों के आगे पीछे पानी का पाउच बेचने के लिये भागते हैं।
दो साल से अधिक समय हो गया इस कानून के बने लेकिन राज्‍य सरकारें अभी भी इस कानून को लागू नही कर सकी हैं। एक कड़वी सच्‍चाई यह भी है कि ज्‍यादातर निजी स्‍कूल अब एक उद्योग के रुप में चल रहे हैं और इन पर दबंग और पैसे वालों का कब्‍जा है। इन विद्यालयों में बड़े नेताओं सांसदों, विधायकों और अधिकारियों के ही बच्‍चे पढते हैं वे क्‍या कभी यह पसंद करेंगे कि उनके बच्‍चे के साथ कोई गरीब का बच्‍चा पढें ? आज के दौर में सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चे को भेजना तौहीन हो चुका है जब कि प्राईवेट और कांवेंट स्‍कूलों में बच्‍चों को पढाना स्‍टेटेस सिंबल बन चुका है। कभी शिक्षा ज्ञानार्जन का माध्‍यम हुआ करती थी, गुरु शिष्‍य परंपरा हुआ करता था लेकिन समय के साथ यह बाजार का हथियार बन चुका है। अंग्रेजी बोलना और अंग्रेजी माध्‍यम से पढना अब कारपोरेटी शिक्षा की मजबूरी बन चुकी है, मध्‍य वर्ग के आर्थिक दोहन का सबसे बड़ा श्रोत निकल कर आया है।
हांलाकि  मेरीट का अवलोकन करें तो आज भी सरकारी स्‍कूलों का मेरीट प्राईवेट के उपर हावी है, सीबीएसई का रिकार्ड देखा जाये तो सरकारी स्‍कूलों के छात्रों ने सभी को पीछे छोड़ा है। एक सवाल यह भी उठ रहा है क्‍या सरकार सबको शिक्षा का अधिकार देकर सारी जिम्‍मेदारी निजी स्‍कूलों पर थोपना चाहती है ? धीरे-धीरे सरकारी स्‍कूलों से सुविधायें खीचने की यह शुरुआत तो नही ? सरकार निजी स्‍कूलों को बंद करके या सभी सकूलों का सरकारीकरण करके अपने दायित्‍वों को बेहतर तरीके से क्‍यों नही करना चाहती ? लेकिन सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नही वह जिम्‍मेदारी से भागने में ही सूकून महसूस कर रही है जिससे वैश्‍वीकरण और उदारीकरण के लक्ष्‍यों को प्राप्‍त किया जा सके। सरकार की अघोषित नीति बन चुकी है कि वह प्राथमिक शिक्षा पर सबसे ज्‍यादे बजट का प्रावधान करती है और उच्‍च्‍ शिक्षा के अपने दायित्‍वों से भी भाग रही है। प्राथमिक शिक्षा सबके लिये उपल्‍ब्‍ध करा कर रोजगारपरक उच्‍च शिक्षा को कारपोरेट जगत के हवाले किया जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि सरकार सिर्फ पैसे के आधार पर शिक्षा को एक प्रोडक्‍ट के नाते देखती है।
दूसरी बात कि शिक्षा के अधिकार कानून के कारण पच्‍चीस फीसदी सीटें जो गरीब बच्‍चे को दिया जाना है उसका घाटा पूरा करने के लिये अंधाधुध फीस में बढोत्‍तरी की जा रही है जिसका सीधा शिकार मध्‍य वर्ग को ही होना है। यक्ष प्रश्‍न यह है कि क्‍या सिर्फ दाखिला मिल जाने मात्र से ही गरीब का बच्‍चा स्‍कूल में शिक्षा प्राप्‍त कर लेगा यह तो वैसा ही लगता है जैसे देश के अस्‍सी फीसद किसान यह नही जानते कि किसान काल सेंटर क्‍या होता है या नब्‍बे फीसदी जनता सूचना के अधिकार कानून के प्रयोग करने के तरीके के प्रति अंजान है। एक छोटे गरीब बालक को क्‍या पता कि बाल श्रम गैर कानूनी है, उसे तो बस दो जून की रोटी भर चाहिये। मान लें कि स्‍कूल फीस माफ भी कर दी जायेगी तो निजी स्‍कूलों के तरह-तरह के नखरे कौन पूरे करेगा। कभी स्‍कूल का यूनिफार्म, वह भी अलग-अलग दिनों का अलग-अलग तो कभी स्‍कूल टूर तो कभी कल्‍चर प्रोग्राम तो स्‍कूल और रिक्‍शें का किराया तो कभी अनुपस्थित होने का फाईन कौन देगा ? कभी मम्‍मी पापा की मिटींग  हुई तो शायद वह हीनभावना के कारण अपने अभिभावक को बुलाना ही न चाहे या अभिभावक खाते-पीते मम्‍मी पापाओं के साथ मिटींग में बैठने का दुस्‍साहस न कर पाये।
यदि सरकार वास्‍तव में गंभीर है तो उसे चाहिये कि सभी स्‍कूलों का सरकारी करण करके समान शिक्षा की व्‍यवस्‍था करें लेकिन यह संभव नही दिखाई देता क्‍यों कि सरकार के पास इसके लिये इच्‍छा शक्ति होनी चाहिये और फिलहाल वह कहीं नही दिखाई देती कि शिक्षा संस्‍थान नान प्राफिट सरकारी संगठन हो सकें।
4:07 am

माटी के भाव भी नही बेचा कोयला



किसी भी देश के राष्‍ट्रीय संसाधन पर पहला और आखिरी हक उस देश की जनता का होता है।   लेकिन दुर्भाग्‍यबस एक के बाद एक जिस तरह राष्‍ट्रीय संसाधनों के आवंटन को लेकर घोटाले सामने आ रहे हैं उससे यही लगता है कि सत्‍तारुढ सरकार और उनकी पार्टी के मंत्री राष्‍ट्रीय संसाधनों को अपनी निजी प्रापर्टी मानकर व्‍यहार कर रहे हैं। सरकार ने 2006 में कोयला आवंटन को लेकर बिल बनाया फिर किसी वजह से उसको लटकाये रखा हांलाकि इससे पूर्व ही कैबीनेट में निर्णय हो चुका था कि आक्‍शन करना चाहिये। सरकार ने सिद्धांत रुप में यह मान भी लिया था कि आक्‍शन करना चाहिये । बिल पास करने में सरकार ने 2006 का बिल 2008 में राज्‍य सभा में पेश किया और 2010 में पास करवाया। दो-दो साल वहां लटकायें रखना ही संदेह पैदा करता है।  सरकार की समझ में न आने वाली नीति यह कि जो बिल 2010 में पास हो चुका है उसके नियम 2012 में बनाये जा रहे हैं। इसबीच कोयले के ब्‍लाक फ्री ऑफ कास्‍ट बांट दिये गये।
जब पूरे ब्‍लाक बांट दिये तो बाद में सरकार का यह कहना कि हम आक्‍शन करेंगे इसका क्‍या अर्थ है ? अब फिर से कोयला को चिन्हित करने की कवायद शुरु की गई होती तो समय व धन के साथ ही जो चीजें गुजर चुकी हैं उसमें सरकार कैसे बदलाव करती । यह सबकुछ उहापोह दिखाता है कि सरकार की मंशा साफ नही है। जब रेत, और माटी तक की नीलामी होती है यहां तक कि ताड़ के पेड़ भी नीलाम किये जाते हैं तो कोयले जैसा संसाधन को लेकर सरकार इतना लापरवाह कैसे रही ?  सीएजी ने जो रिर्पोट बनाई है वह इसी आधार पर बनाई है कि अगर यह आक्‍शन होता तो कम से कम देश को 1,86000 करोड़ रुपये का राजस्‍व प्राप्‍त होता, ऐसा उनका अनुमान है। इसतरीके से यदि सत्‍ता पक्ष जिदद कर रहा है कि हम सीएजी को नही मानेंगे, हम कोर्ट को नही मानेंगे तो यह दुराग्रह है जो चिंता का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट ने टूजी मामले में कहा था कि टूजी स्‍पेक्‍ट्रम में आपने जो आवंटन किये हैं वह सारे निरस्‍त करें। कोई भी राष्‍ट्रीय संपदा है, तो उसको आक्‍शन करके ही दिया जाना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट कहता है वो सरकार को नहीं मालूम, सीएजी की रिर्पोट आता है उसे सरकार झूठला देती है। ध्‍यान रहे कि सीएजी की रिर्पोट टूजी के समय भी आई तो उसको भी इन्‍होंने इंकार किया गया था। सीएजी शिर्ष संवैधानिक संस्‍था है और सरकार उसकी रिर्पोट को इतनी आसानी से बिना किसी प्रमाण के कैसे झूठा कह सकती है।
देश के राष्‍ट्रीय संसाधन 120 करोड़ लोगों की प्रापर्टी है वह किसी पार्टी की प्रापर्टी नहीं हो सकता । जिन कंपनियों को ब्‍लाक दिये गये उनमें से एक कंपनी ऐसी है जिसको 12 ब्‍लाक दे दिये गये हैं नियमों के अनुसार एक पीढी दो ब्‍लाक कोयला निकालेगी अगली पीढी दो ब्‍लाक कोयला निकालेगी इनकी छह पीढियों तक यह कार्य चलेगा। जिस तरह से सत्‍ताधारी दल के नेतागण कह रहे हैं कि सीएजी की रिर्पोट गलत है वह कहने का अधिकार तो सिर्फ पीएसी को है। परंपरा के अनुसार सीएजी की रिर्पोट को पीएसी अध्‍ययन करेगी।
टूजी स्‍पेक्‍ट्रम के मामले में रिकवरी नही थी लेकिन कोयला ब्‍लाक आवंटन के मामले में रिकवरी किया जा सकता है। दिये गये कुल कोयला ब्‍लाक में 22 बिलीयन मिट्रीक टन के हैं जिसमें से सिर्फ दशमलव एक फीसदी कोयला ही अभी तक बाहर आया है। यदि इसे निरस्‍त किया जाता है तो नुकसान के काफी बड़े हिस्‍से की भरपाई हो जायेगी। इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सारे खदानों को सरकारी कब्‍जे में ले लिया था। अभी भी यदि कोयला आवंटन को रदद करवाते हैं तो अस्‍सी फीसदी कोयला ही निकलेगा और वह 50 लाख करोड़ की प्रापर्टी होगी।  इससे जो राजस्‍व आता है वह देश के विकास में आता नकि किसी एक उद्योगपति के काम आता। इन पैसों से देश के मूलभूत ढांचे के विकास जैसे सड़क, बिजली, पानी सहित स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में खर्च किया जा सकता था।
सरकार बार-बार यह कह रही है कि कोयले के ब्‍लाक इसलिये दिये हैं कि देश में बिजली की कमी है। देखनी वाली बात यह है कि 193 कंपनियों को कोयला के ब्‍लाक दिये गये जिसमें सिर्फ 62 कंपनियां ही बिजली बनाती हैं, 116 कंपनियां स्‍टील आदि बनाती हैं। नियम यह है कि ब्‍लाक लेने के साढे तीन साल में उत्‍पादन शुरु करना है वह ज्‍यादातर कंपनियों ने न‍हीं किया। इसीलिये विपक्ष की इस मांग में दम नजर आता है कि जब 193 मेंसे 158 ने कोयला उत्‍पादन आरंभ ही नहीं किया और उनकी समय सीमा भी समाप्‍त हो चुकी है तो इसे कैंसिल कर देना चाहये। यदि यह निरस्‍त होता है तो बैंक गारंटी भी निरस्‍त होनी चाहिये। पहले 30 ब्‍लाक निरस्‍त किये थे उनमें से एक की भी बैंक गारंटी इनकैस वापस नही ली गई। यह अत्‍यंत चिंताजनक है कि लोकतांत्रिक शासन व्‍यवस्‍था में सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की मांग पर ध्‍यान देने के बजाये जिनको ब्‍लाक दिया गया है, उनको बचाया जा रहा है, उनका पक्ष लिया जा रहा है और उनको अवधि बढा कर देने की कोशिश की जा रही है। यह लोकतंत्र के लिये तो चिंताजनक है ही राष्‍ट्रीय संसाध्‍नों के प्रति नीति नियंताओं की प्रतिबद्धता को संदेह में खड़ा कर देती है।
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